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ममता जन्मजात विद्रोही हैं, उनकी अनदेखी करना असंभव: प्रणब

प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में लिखा है, ‘ममता ने निडर और आक्रामक रूप से अपना रास्ता बनाया. आज वह जिस मकाम पर हैं, वह उनके संघर्ष का परिणाम है.

Kolkata: West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee addresses during Budh Purnima celebrations in Kolkata on Thursday. PTI Photo by Ashok Bhaumik (PTI5_11_2017_000123B)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ममता बनर्जी को जन्मजात विद्रोही करार दिया और उन क्षणों को याद किया जब वह एक बैठक से सनसनाती हुई बाहर चली गई थीं और वह खुद को कितना अपमानित और बेइज्जत महसूस कर रहे थे.

मुखर्जी ने अपने नई किताब ‘द कोएलिशन ईयर्स’ में ममता के व्यक्तित्व की उस आभा का जिक्र किया है जिसका विवरण कर पाना मुश्किल और अनदेखी करना असंभव है. पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि ममता ने निडर और आक्रामक रूप से अपना रास्ता बनाया और यह उनके खुद के संघर्ष का परिणाम था.

उन्होंने लिखा, ममता बनर्जी जन्मजात विद्रोही हैं. उनकी इस विशेषता को वर्ष 1992 में पश्चिम बंगाल कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव के एक प्रकरण से बेहतर समझा जा सकता है, जिसमें वह हार गई थीं. प्रणव ने याद किया है कि उन्होंने अचानक अपना दिमाग बदला और पार्टी इकाई में खुले चुनाव की मांग की.

पूर्व राष्ट्रपति के मुताबिक, मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि बनर्जी समेत पश्चिम बंगाल कांग्रेस के शीर्ष नेता खुले चुनाव को टालना चाहते थे, क्योंकि इससे पार्टी की गुटबाजी का बदरंग चेहरा सामने आ सकता था, जिसके बाद प्रधानमंत्री और कांग्रेस प्रमुख पीवी नरसिम्हा राव ने उनसे मध्यस्थता करने और समाधान निकालने के लिए कहा.

उन्होंने कहा, उस साल सर्दियों के मौसम के एक दिन मैंने ममता बनर्जी से मुलाकात का अनुरोध किया ताकि संगठनात्मक चुनावों की प्रक्रिया के बारे में उनके द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों पर चर्चा की जा सके.

उन्होंने किताब में कहा है, चर्चा के दौरान अचानक ममता नाराज हो गईं और मुझ पर तथा अन्य नेताओं पर उनके खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया. अब उन्होंने संगठनात्मक चुनाव की मांग की और कहा कि वह हमेशा से चुनाव चाहती थीं ताकि संगठनात्मक मामलों में जमीनी स्तर के कार्यकर्ता भी अपनी राय रख सकें.

उन्होंने लिखा है कि ममता उन्हें और अन्य पर आरोप लगाती रहीं और संगठन के पद आपस में बांट लेने का आरोप लगाकर चुनाव प्रक्रिया को बर्बाद करने की बात कही. मुखर्जी ने लिखा कि ममता की इस प्रतिक्रिया से वह भौचक्के रह गए और उन्होंने कहा कि वह तो उनके और अन्य नेताओं के अनुरोध पर मामले का कोई समाधान निकालना चाहते थे.

लेकिन उन्होंने दावा किया कि वह उनके रुख से कतई सहमत नहीं हैं और खुले चुनाव चाहती हैं. इतना कहने के बाद वह तेजी से बैठक से चली गईं और मैं स्तब्ध था और खुद को अपमानित महसूस कर रहा था.

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि गुप्त मतदान के जरिये पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में वह सोमेन मित्रा से बहुत कम अंतर से हार गई थी.

मुखर्जी ने लिखा है, जब नतीजे का ऐलान हुआ, मैं वही मौजूद था. गुस्से से भरी ममता मेरे पास आईं और पूछा, आप खुश हैं. मुझे हराने की आपकी तमन्ना पूरी हो गई. मैंने उनसे कहा वह एकदम गलत सोच रही हैं. प्रणब ने ममता से कहा कि जब से वह उनसे अंतिम बार मिली हैं तब से उन्होंने संगठनात्मक चुनाव में कोई भूमिका नहीं निभाई.

कांग्रेस के पूर्व नेता ने अपनी किताब में कहा कि ममता बनर्जी का एक मजबूत नेता के रूप में उभरना पश्चिम बंगाल की समकालीन राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना रही.

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, उन्होंने निडर और आक्रामक ढंग से अपना करियर बनाया और वह आज जिस मुकाम पर हैं, उसे उन्होंने अपने संघर्ष और मेहनत से हासिल किया है. उन्होंने ममता के व्यक्तित्व की उस आभा का जिक्र किया जिसका विवरण कर पाना मुश्किल और अनदेखी करना असंभव है.

मुखर्जी ने 1984 लोकसभा चुनाव में ममता की जीत का वर्णन किया जब उन्होंने जादवपुर से माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर मार्क्सवादी पार्टी के गढ़ में सेंध लगाई.

उन्होंने कहा, वह शानदार जीत थी और वह सही मायने में विजेता नजर आ रही थीं. अपने ओजपूर्ण राजनीतिक जीवन में उन्होंने मुश्किल चुनौतियों का सामना हमेशा बड़ी बहादुरी से किया और इनको अवसरों में बदलने का प्रयास किया.