भारत

भूख से एक नागरिक की मौत सत्ता को ​शर्मिंदा क्यों नहीं करती?

कई बरस से लोग भूख से मर रहे हैं, लेकिन सत्ता हमेशा इस बात से इंकार करती है कि इस देश में किसी की मौत भूख के चलते भी होती है.

Koyli Devi Jharkhand Death Starvation ANI

झारखंड के सिमडेगा ज़िले में रहने वाली संतोषी की मां कोयली देवी, जिनका कहना है कि उनकी बेटी की मौत भूख सरकारी राशन नहीं मिलने से हो गई. (फोटो साभार: एनएनआई)

झारखंड के जलडेगा प्रखंड की ताताय नायक की 11 साल की बेटी संतोषी कुमारी की 28 सितंबर को मौत हो गई. सरकारी अधिकारी कहते हैं कि संतोषी की मौत भूख से नहीं हुई है बल्कि बीमारी से हुई है. उसके परिवार वाले कहते हैं कि उसकी मौत गरीबी व भूख के कारण हुई है. आप चाहें तो मरने वालों का नाम और जगह बदल दें तो यह कहानी उत्तर भारत के कई राज्यों की कहानी बन जाती है.

मौत तो एक बहाना है

कई बरस से लोग भूख से मर रहे हैं और कहा जा रहा है कि नहीं भाई, लोग भूख से नहीं मर रहे हैं. इस बात को वे लोग कहते रहे हैं जिन्हें इस बात की ट्रेनिंग दी गई होती है कि उनके रहते कोई भूख से न मरे. यह एक प्रशासनिक ढर्रा है जिसमें दोष पीड़ित व्यक्ति पर ही मढ़ दिया जाता है.

इसी प्रकार मई 2016 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में नत्थू नामक एक 48 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई. नत्थू कई दिन से प्रदेश सरकार द्वारा वितरित किए जा रहे खाद्य पैकेट को प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था. वह पांच दिन से भूखा था. चिलचिलाती धूप को वह सह न पाया और दम तोड़ दिया.

इसके बाद, बांदा के सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर सिंह के मुताबिक, कहा गया कि नत्थू तो गांजा पीता था. सुधीर सिंह की जनहित याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न केवल भूख से मरने की बात को तवज्जो दिया बल्कि आदेश भी पारित किया कि राज्य सरकार द्वारा मृतक के आश्रितों की सहायता की जाय.

ऐसा ही दो वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में हुआ था. 7 नवम्बर 2015 को इलाहाबाद की बारा तहसील के गीज पहाड़ी गांव में मुसहर जाति के समरजीत उर्फ तोताराम (35) और उसकी सात वर्षीय बेटी राधा की भूख से मौत हो गई. जब दो मुसहरों की मौत हुई थी तो गीज गांव के चारों तरफ धान की फसल खड़ी थी. कुछ खेत कट गए थे जबकि कुछ खेतों में धान काटा जा रहा था.

इस दृश्य को देखकर नही लगता था कि धान के इन्हीं खेतों के बगल में कुछ और लोगों के घर होंगे जिनके पास न खेत हैं, और न धान. गीज पहाड़ी गांव में हुई मौतों के बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा था कि दोनों मौतें भूख से नहीं हुई हैं.

इसके बाद पीयूसीएल की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य के तौर पर प्रोफेसर रंजना कक्कड़, डाक्टर निधि, डाक्टर वत्सल और सूबेदार सिंह के साथ हम भी 15 नवम्बर 2015 को वहां गए. हमारी टीम में दो चिकित्सक थे. हमने पूरे गांव से बात की थी कि और पाया था कि मुसहरों की किसी प्रकार की जीविका आधार खत्म हो गया था.

न वे मनरेगा में काम कर रहे थे और न ही प्रधान ने उन्हें काम दिलाने की कोशिश की थी. इस समय हमने गीज पहाड़ी गांव के अन्य मुसहरों का वजन लिया था और शारीरिक माप भी दर्ज की थी. उनमें से किसी का भी वजन 50 किलो नही था.

तोताराम का वजन मात्र 32 किलो और उसकी बेटी का वजन मात्र 13 किलो था. ऐसे में वे भुखमरी का शिकार हो गए. तीन महीने के बाद, एक सेमिनार में मेरी एक दोस्त ने जब इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से लोगों से साझा किए तो एक सीनियर प्रोफेसर ने कहा कि मैंने कभी भी लोगों को भूख से मरते हुए नहीं देखा है!

क्या यह निर्धारित है कि कौन पहले मर जाएगा?

इसमें उनका कोई दोष नहीं था. वास्तव में वे मुसहर समुदाय की भूख के प्रति सुभेद्यता को समझ नहीं पा रहे थे. वे भूख से होने वाली मौत को तकनीकी रूप से व्याख्यायित करना चाह रहे थे. थोड़ा ठंडे दिमाग से सोचें तो भूख से होने वाली कोई मौत एक दिन में नही होती है. सबसे पहले वह अपने शिकार को मौत के प्रति सुभेद्य बना देती है.

सुभेद्यता या वल्नरेबिलिटी उस दशा को कहा जाता है जिसमें किसी व्यक्ति या समूह को किसी वातावरण या दशा में आसानी से नुकसान पहुंचता हो या इसकी आशंका हो. नवजात शिशु शीत लहर के प्रति सुभेद्य होते हैं या हमारी आंखे धूल के प्रति सुभेद्य होती हैं, एचआईवी के मरीज सामान्य से बुखार के प्रति सुभेद्य होते हैं.

वास्तव में इस देश में कोई नहीं चाहता है कि कोई व्यक्ति भूख से मर जाए. महात्मा गांधी ऐसा नहीं चाहते थे. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने अपने मशहूर भाषण ‘नियति से मिलाप’ में महात्मा गांधी का नाम लिए बिना कहा भी था कि हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही महत्वाकांक्षा रही है कि हर एक व्यक्ति की आंख से आंसू मिट जाएं. ऐसा हो नहीं पाया है. इस भाषण के सात दशक बाद तोताराम, राधा और संतोषी की भूख से मौत हो गयी.

वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, वर्ष 2017 में झारखंड में भाजपा की सरकार है. अन्य राज्यों में जहां अन्य पार्टियों की सरकार है वहां भी भूख से मौत होती है. भूख से होने वाली मौत किसी पार्टी विशेष की सरकार से नहीं जुड़ी है, जैसा कि सोशल मीडिया पर इस समय कहा जा रहा है, बल्कि इसका संबंध आर्थिक और सामाजिक संरचना से जुड़ा है.

इसका संबंध किन्ही समूहों की अन्य समूहों के मुकाबले उनकी सुभेद्यता से है. अनुसूचित जातियां, आदिवासी, घुमंतू समुदाय अपने देश के अन्य लोगों की अपेक्षा ज्यादा संकट में हैं.

अर्थशास्त्री टीएन श्रीनिवासन को उद्धृत करती हुई रामचंद्र गुहा की किताब इण्डिया आफ्टर गांधी(पृष्ठ 711) बताती है कि यदि भारत में कोई व्यक्ति गरीब है…तो बहुत संभावना है कि वह ग्रामीण क्षेत्र में रहता हो, बहुत संभावना है कि वह अनुसूचित जाति या जनजाति या अन्य सामाजिक रूप से भेदभाव के शिकार तबके का सदस्य हो सकता है, बहुत संभावना है कि वह कुपोषित, बीमार और बुरे स्वास्थ्य का शिकार हो, बहुत संभावना है कि वह निरक्षर हो या अच्छी शिक्षा से हीन हो जिसके साथ निम्न स्तर की दक्षता हो और बहुत संभावना है कि वह कुछ विशेष राज्यों में रहता हो…जैसे बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा.

यह लेख श्रीनिवासन ने यह बात 2000 में आयी अपनी किताब ‘एट लेक्चर्स ऑन इंडियन इकोनॉमिक रिफार्म्स’ में कही थी. जब यह किताब प्रेस में रही होगी तब झारखंड अलग राज्य भी नहीं बना था. यहां पर इस विवरण को देने का मकसद यही था कि नाम बदल देने से रूप नहीं बदल जाता है. गरीबी और भुखमरी बनी रहती है जब तक कि उसे दूर करने के उपाय न किए जाएं.

आज बिहार, झारखंड मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा में गरीबी और भुखमरी बनी रही है. इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों जितनी रुचि राशन कार्डों के ऊपर अपनी फोटो छपाने और दूसरे की हटाने की रही है, उतनी ही तन्मयता से यदि कामकाज किया जाय तो भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है.

कहीं कुछ ज्यादा गड़बड़ है

दैनिक जागरण में छपी के खबर के मुताबिक झारखंड के खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग के मंत्री सरयू राय ने कहा है कि सिमडेगा में 11 वर्ष की बच्ची की मौत की वजह चाहे जो हो, उसे जुलाई से राशन नहीं मिला था. आधार कार्ड से लिंक न करवा पाने के कारण उस परिवार का राशन कार्ड निरस्त कर दिया गया था. दूसरी तरफ प्रसाशन के जिम्मेदार अफसर इस मौत को मलेरिया से हुई मौत बता रहे है.

बताया गया है कि मार्च 2017 में मुख्य सचिव ने राज्य के सभी उपायुक्तों संग वीडियो कांफ्रेंसिंग कर ऐसे राशन कार्डों को रद्द कर देने को कहा था, जो आधारकार्ड से जुड़े न हों. यह उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था. मुख्य सचिव के इस निर्देश पर खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग ने आपत्ति जताई थी.

वास्तव में सरकार किसी भी नीति को इस प्रकार कल्पित (डिजाइन) करती है जिससे वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके. उसकी इस मंशा पर शक नहीं करना चाहिए. आखिर कोई सरकार अपने ही नागरिकों को मौत के मुंह में क्यों धकेलना चाहेगी?

दिक्कत नीतियों की उस डिजाइन में है जो लोगों को बहिष्कृत कर उन्हें मौत के मुंह में धकेल देती है. यदि झारखंड में आधार कार्ड को राशन कार्ड से जुड़ने की अनिवार्यता न होती तो उस बच्ची को बचाया जा सकता था जो इस ‘एक्सक्ल्युजन बाय डिजाइन’ की शिकार हो गयी.

आधार कार्ड को अनिवार्य किए जाने के पीछे जो भी ‘पवित्र उद्देश्य’ रहे हों लेकिन इसने अपने शुरुआती दौर में ही एक संरचनागत बहिष्करण को जन्म दिया है. इससे जन कल्याणकारी नीतियों का लाभ लेने से भारत की गरीब जनसंख्या एक बड़ा हिस्सा बहिष्कृत होने लगा है. यह कोई अनायास नही है कि आधार कार्ड की प्राथमिक आलोचना अर्थशास्त्र और लोकनीति के जानकारों ने की है.

अंत में लोग भात ही तो मांग रहे हैं, वे सरकार से खजाना तो नहीं मांग रहे हैं.

(रमाशंकर सिंह स्वतंत्र शोधकर्ता हैं.)