राजनीति

2012 में अगर प्रणब प्रधानमंत्री बनते, तो ​कांग्रेस का इतिहास शायद कुछ और होता

अगर प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति की जगह प्रधानमंत्री बनाया जाता तो उनकी राजनीतिक कुशलता 2014 में नरेंद्र मोदी की आसान जीत के रास्ते में अवरोध बन कर खड़ी होती.

pranab-mukherjee-pti

प्रणब मुखर्जी (फाइल फोटो: पीटीआई)

क्या वर्ष 2012 की गर्मियों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह की जगह प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री न बनाकर और बदले में मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति की कुर्सी पर पदोन्नति न देकर एक बड़ा राजनीतिक मौका गंवा दिया?

क्या अगर यूपीए-2 के वक्त कांग्रेस दूसरों, खासकर अपने गठबंधन के सहयोगियों के विचारों को लेकर ज्यादा लचीलापन दिखाती तो वह भारतीय जनता पार्टी को 2014 में ज्यादा तगड़ी टक्कर देने की स्थिति में होती?

क्या 2009 में कांग्रेस पार्टी को मिलीं 200 के करीब सीटों को कांग्रेस नेताओं ने 280 सीटों के बराबर समझ लिया, जिसने उनके अहं को आसमान में चढ़ाने का काम किया?

ये सवाल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दिए गए कुछ साक्षात्कारों से पैदा हुए हैं. ये साक्षात्कार प्रणब मुखर्जी की नई किताब द कोलिशन ईयर्स, जो उनके संस्मरणों का तीसरा भाग है, के प्रकाशकीय प्रचार का हिस्सा हैं. मुखर्जी इंडियन एक्सप्रेस की ‘एक्सप्रेस अड्डा’ सीरीज के तहत आयोजित एक संवाद-सत्र में भी शामिल हुए.

इस किताब की ही तरह, मुखर्जी अभी तक अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के वर्षों से संबंधित मामलों पर टिप्पणी करने या उनके बारे में कोई खुलासा करने से दूर रहे हैं. इस साल मार्च में, इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में मुखर्जी ने घोषणा की थी कि वे आने वाले समय में राष्ट्रपति भवन में बिताए गए वर्षों के बारे में लिखने की इच्छा रखते हैं.

रायसीना हिल्स में अपने कार्यकाल के बारे में उन्होंने अभी तक सिर्फ यह एक खुलासा किया है कि उनका प्रधानमंत्री मोदी के साथ काफी किताबी किस्म का रिश्ता था और इस दौरान उनके बीच असहमति के भी मौके आए. लेकिन, दोनों को मतभेदों के बीच रास्ता निकालना आता था.

इस बात के मद्देनजर कि उनके संस्मरण का तीसरा भाग अहम सियासी फैसलों से जुड़े कई संवेदनशील मुद्दों की परतें खोलता है, मोदी के साथ उनके मतभेदों के बारे में तफसील से जानने के लिए राष्ट्रपति कार्यकाल के वर्षों पर मुखर्जी की किताब का इंतजार शिद्दत से किया जाएगा.

कम से कम दो मुद्दों पर मुखर्जी और मोदी के बीच मतभेद जगजाहिर हैं. पूर्व राष्ट्रपति ने नियमित तौर पर सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया और कानून बनाने के लिए बार-बार अध्यादेश का रास्ता लेने से बचने की सलाह दी.

मुखर्जी के संस्मरण के तीसरे खंड और उसके बाद मीडिया के साथ उनकी बातचीत में सबसे अहमियत प्रधानमंत्री पद को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों को मिली है.

एक बार नहीं, तीन बार, प्रधानमंत्री पद उनके हाथों से फिसल गया- पहली बार, 2004 में, उसके बाद 2009 में जब मनमोहन सिंह का बाईपास ऑपरेशन हुआ था और अंतिम बार 2012 में, राष्ट्रपति चुनाव से पहले.

मुखर्जी से यह सवाल पूछा गया कि क्या सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को ‘विश्वास’ (ट्रस्ट फैक्टर) के कारण चुना, क्योंकि कहीं न कहीं यह डर था कि वे पार्टी पर कब्जा कर लेंगे या अगर उन्हें शीर्ष पद पर बैठाया गया, तो वे गांधी के वर्चस्व को चुनौती देंगे.

मुखर्जी ने इस सवाल को सोनिया गांधी की ओर यह कहते हुए मोड़ दिया कि इसका जवाब उन्हें देना चाहिए कि क्या (मनमोहन) सिंह का चयन इसलिए किया गया, क्योंकि वे पूर्व राष्ट्रपति को (उन्हें) वफादारी इंडेक्स में नीचे रखती थीं.

मुखर्जी ने जिन बातों का खुलासा किया, उनमें से काफी कुछ का संबंध ‘क्या हुआ होता अगर’ वाली दुनिया से है. लेकिन, उन पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि (अगर वैसा होता तो) इतिहास की धारा अलग होती और हमारा वर्तमान समय नाटकीय ढंग से अलग होता.

2004 में भाजपा की हार सोनिया गांधी और कांग्रेस, दोनों के लिए ही किसी आश्चर्य की तरह थी. उन वजहों, जिनके बारे में सिर्फ उनको ही पता है, सोनिया गांधी ने नेतृत्व की भूमिका को अस्वीकार कर दिया और नई-नई बनाई दोहरी सत्ता प्रणाली के सहारे अपना सिक्का चलाने का निर्णय लिया.

उन्होंने कई कारणों से मुखर्जी का चयन नहीं किया. अपना पूरा जीवन राज्यसभा में बिताने के बाद प्रणब मुखर्जी 2004 में भले पहली बार लोकसभा में चुने गए हों, लेकिन इसके बावजूद मनमोहन सिंह की तुलना में प्रणब ज्यादा ‘राजनीतिक’ शख्स थे. और यही बात उनके खिलाफ गई.

निश्चित तौर पर सोनिया गांधी एक राजनीतिक तौर पर तेज-तर्रार नेता को प्रधानमंत्री के पद पर नहीं बैठाना चाहती थीं, जिसकी राजनीतिक महत्वकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं थीं. स्पष्ट तौर पर 7 रेस कोर्स रोड में उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था.

मुखर्जी को सरकार के बाहर रखना भी जोखिमों को दावत देने के समान हो सकता था- यही वजह है कि अपनी पसंद का मंत्रालय न मिलने के बावजूद उन्हें एक तरह से सरकार का हिस्सा बनने के लिए बाध्य किया गया.

2004 में भाजपा को 138 सीटें मिली थीं और कांग्रेस की झोली में सिर्फ 145 सीटें आई थीं. इसका नतीजा यह था कि कांग्रेस बुरी तरह से क्षेत्रीय सहयोगियों पर निर्भर थी, जो मिलकर संख्या बल में निजी वफादारों से ज्यादा ठहरते थे.

इन हालातों में सोनिया गांधी किसी ऐसे कांग्रेस नेता को सबसे बड़े पद पर बैठाने का जोखिम मोल नहीं ले सकती थीं, जिनकी दूसरी पार्टियों के भीतर भी अच्छी खासी रब्त-ज़ब्त थी और जो दरबारी राजनीति का पका हुआ खिलाड़ी था.

सिंह में ये कौशल नहीं थे और न ही गांधी को यह लगता था कि उनमें इन चालबाजियों को सीखने की इच्छा थी. वे वफादार बने रहने की ख्वाहिश रखते थे और इतिहास में अपना नाम नीतिगत फैसलों के द्वारा दर्ज कराना चाहते थे न कि राजनीतिक चालाकियों के द्वारा.

इसमें कोई शक नहीं कि मुखर्जी, सिंह की तुलना में ज्यादा आजाद साबित हुए होते.

किताब के लोकार्पण के मौके पर, पूर्व प्रधानमंत्री ने यह कबूल भी किया कि 2004 में प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रणब मुखर्जी ज्यादा योग्य थे, लेकिन ‘इस फैसले में उनकी भूमिका नाममात्र की’ थी.

इस जवाब ने भले श्रोताओं को हंसने का मौका दिया हो, लेकिन तीनमूर्ति ऑडिटोरियम में उस वक्त मौजूद सोनिया गांधी निश्चित तौर पर मनमोहन सिंह की साफगोई से बहुत ज्यादा खुश नहीं हुई होंगी.

president-pranab-mukherjee-prime-minister-manmohan-singh-along-congress-chief-sonia-gandhi

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (फोटो: रॉयटर्स)

कई लोगों का मानना है कि जनवरी, 2009 में मुखर्जी को संभवतः एक बार फिर अपने लिए उम्मीद की किरणें नजर आईं, जब सिंह कई हफ्तों तक परिदृश्य से बाहर थे.

उसी साल चुनाव होने वाले थे और इस बात को लेकर कोई निश्चितता नहीं थी कि क्या सोनिया गांधी एक बार फिर मनमोहन सिंह को यूपीए के प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर आगे करने की इच्छा रखती हैं.

लेकिन, मुखर्जी के लिए चीजें बहुत ज्यादा नहीं बदली थीं. जो बात, 2004 में उनके खिलाफ गई थी, वही इस बार भी उनकी राह की रुकावट बन कर खड़ी हो गई.

यह बात सबसे ज्यादा 26/11 के बाद दिखाई दी, जब शिवराज पाटिल के इस्तीफे के बाद गृह मंत्रालय, मुखर्जी की इच्छा के बावजूद उन्हें नहीं दिया गया.

इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि प्रधानमंत्री के कार्यालय में मुखर्जी के होने की स्थिति में भी सोनिया गांधी पार्टी और सरकार पर उसी तरह से पूरा नियंत्रण रख पातीं, जैसा उन्होंने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते रखा.

संभव है, मुखर्जी पार्टी के मसलों को भी प्रभावित करने में अपनी भूमिका की मांग करते. खासकर, 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों के चयन के सवाल पर.

सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी रहतीं, लेकिन उन्हें मुखर्जी से मशविरा लेने की जरूरत पड़ती. संभव है कि सरकार और सत्ताधारी दल के बीच संबंध उतने सहज नहीं रहते, क्योंकि स्वभाव के लिहाज से सोनिया गांधी और प्रणब मुखर्जी, दोनों ही काफी दृढ़ व्यक्तित्व वाले हैं और इनमें से कोई भी अपनी निजता को दबने नहीं देता.

लेकिन, 2012 में सोनिया गांधी ने एक मौका गंवा दिया जब उनके पास बदलाव करने और यूपीए-2 के पतन को रोकने का एक मौका था. अगर मनमोहन सिंह को पदोन्नति देते हुए राष्ट्रपति बना दिया जाता और प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री, तो इतिहास कुछ और ही हो सकता था.

2012 तक, यूपीए की ढलान शुरू हो गई थी और सोनिया गांधी को हालात पर काबू पाने के लिए नाटकीय कदम उठाने की दरकार थी.

मुखर्जी ने यह दावा किया कि उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार इसलिए बनाया गया, क्योंकि उस समय यूपीए जीत के जादुई आंकड़े से थोड़ी दूर था. सोनिया गांधी ने इस उम्मीद में उन्हें आगे किया कि वे अपने निजी संपर्कों से जीत के जादुई आंकड़े को हासिल कर लेंगे.

लेकिन, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर मुखर्जी प्रधानमंत्री बने होते, तो वे राष्ट्रपति पद पर मनमोहन सिंह का चुनाव सुनिश्चित कर पाते.

वे शायद यह भी सुनिश्चित कर पाते कि ममता बनर्जी गठबंधन के साथ बनी रहें, और कुछ नहीं, तो कम से कम बंगाली गौरव के लिए ही सही.

अगर, मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनाया जाता, तो उनकी राजनीतिक कुशलता मोदी की आसान जीत के रास्ते में अवरोध बन कर खड़ी होती. उद्योग जगत के भीतर उनका रिश्ता मोदी को इतनी आसानी से कॉरपोरेट जगत के समर्थन को अपने पक्ष में नहीं मोड़ने देता.

अगर मुखर्जी का नेतृत्व होता, तो नीतिगत लकवा (पॉलिसी पैरालिसिस) का आरोप भी उतना असरदार नहीं रहता. कांग्रेस को उस वक्त किसी घाघ या लड़ाइयों में पके हुए नेता की जरूरत थी, न कि एक विद्वान भद्रजन की.

मुखर्जी को राष्ट्रपति के तौर पर नियुक्त करना, एक प्रतिभा को व्यर्थ करने का उदाहरण था. सोनिया गांधी ने बदलाव करने की जगह चीजों को अपने हाथों से फिसल जाने का मौका दिया. ऐसा लगता है कि उन्होंने पूर्वाग्रह को तर्क के ऊपर तरजीह दी.

(नीलांजन मुखोपाध्याय लेखक और पत्रकार हैं. उन्होंने ‘नरेंद्र मोदी : द मैन’, ‘द टाइम्स’ और ‘सिख्स : द अनटोल्ड एगनी ऑफ 1984’ जैसी किताबें लिखी हैं.)

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए क्लिक करें.