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‘जानवर समाज का हिस्सा हैं इसलिए वे हमारी राजनीति का हिस्सा बने रहेंगे’

जिन लोगों को मायावती पसंद नहीं हैं. वे उनके चुनाव चिह्न को ‘पागल हाथी’ कहते हैं. इस तरह वे एक ही बार में ‘पागल’ और ‘हाथी’ दोनों के लिए अमर्यादित और असंवेदनशील टिप्पणी कर बैठते है.

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अमिताभ बच्चन गुजरात पर्यटन के ब्रैंड एंबेस्डर हैं. पर्यटन के प्रचार के लिए उनके साथ कई फिल्में बनाई गई हैं. इन्हीं में से एक फिल्म में वे घुड़खर प्रजाति के गधों के साथ नज़र आए थे. ये गधे कच्छ के रण में ही पाए जाते हैं और विलुप्त होने के कगार पर हैं. बीते दिनों प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अमिताभ से अपील की थी कि वे गुजरात के गधों का प्रचार न करें. (फोटो साभार: इंडिया ट्रिब्यून)

पुरातत्व के जानकारों ने इतिहास में जहां-जहां इंसानों के अवशेष खोजे, उन्हें वहीं पर जानवरों के भी अवशेष मिले हैं. कहीं-कहीं तो इंसान और जानवर साथ-साथ दफ़न किए गए हैं. जम्मू-कश्मीर में बुर्जहोम एक ऐसी जगह है जहां आज से लगभग 5000 साल से भी ज्यादा समय पहले इंसानों की कब्र में कुत्ते भी पाए गए हैं.

यह इंसान और जानवर के प्यार की एक दास्तां है. इंसान और जानवर न केवल मिट्टी में दबे हैं बल्कि किस्सों-कहानियों, मिथकों और महाकाव्यों में साथ-साथ हैं. रामायण में जाम्बवंत रीछ हैं लेकिन वे विवेकवान और ज्ञानी के रूप में दिखाए गए हैं तो हनुमान बलवान हैं, संगीत के जानकार हैं.

महाभारत में इंसानों की तरह जानवर भी इस महाकाव्य की धारा नियंत्रित करते हैं. इस महाकाव्य में एकलव्य के तांबई रंग पर द्रोणाचार्य के शिष्यों का कुत्ता भौंकता है. पांडवों में सबसे ज्ञानी माने जाने वाले युधिष्ठिर के साथ एक कुत्ता स्वर्ग जाता है. यह कोई सामान्य कुत्ता नहीं बल्कि स्वयं धर्म ही था, ऐसा माना जाता है.

तो कहने का आशय यही है कि इंसान और जानवर साथ-साथ रहते आए हैं. जानवर उसके सबसे आदिम साथी हैं लेकिन इंसान महान बन गया जानवर महान नहीं बन पाए. उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी है. जानवरों को मारा-पीटा और पालतू बनाया जाता है. उनके गले में, पैर में, नाक में जंजीर या रस्सी डालकर उनकी आज़ादी छीन ली जाती है.

जानवरों की आज़ादी के बारे में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बहुत ही सुंदर और संवेदनशील लेख लिखा है कि किस प्रकार इंसान ने विधाता की एक सुंदर कृति घोड़े को गुलाम बना लिया. इंसान जानवरों को बुद्धिहीन, निर्दयी, गंदा, अपवित्र और कई नकारात्मक गुणों की खान के रूप में देखता है.

हम इंसानों के बीच यह सब चल ही रहा था कि जानवरों को उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में पिछले बरस ही खीँच लाया गया. गाय का मांस खाने के शक में एक इंसान को कई और इंसानों ने मार डाला.

भाजपा ने गाय के सवाल पर आवाज़ उठाई और कहा कि गायों पर सदियों से हिंसा की जाती रही है, उन्हें कसाईबाड़े में काटा जाता है. इसलिए अगर उसकी सरकार उत्तर प्रदेश में बनी तो वह गाय का संरक्षण करेगी और जहां पर उन्हें काटा जाता है, उन जगहों को बंद करवा देगी.

इसी तरह हाथी भी एक जानवर है जो शांतिप्रिय और शाकाहारी माना जाता है. इसका संबंध दुनिया के कई धर्मों से है. बौद्ध धर्म में हाथी बहुत सम्मानित जानवर है तो हिंदू धर्म में हाथी को गजराज कहा जाता है. एक बार तो उसकी रक्षा स्वयं भगवान विष्णु ने की थी. बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिह्न ही हाथी है.

जिन लोगों को मायावती पसंद नहीं हैं, उन्होंने उनके हाथी को पागल हाथी कहा, विशेषकर सोशल मीडिया पर. इस प्रकार वे एक ही बार में पागलों और हाथियों दोनों के लिए अमर्यादित और असंवेदनशील टिप्पणी कर बैठे. इसमें उनका दोष नहीं है. इंसानी फितरत ही है कि वह अपने को महान कहे लेकिन इस चक्कर में वह जानवरों और पागलों पर अत्याचार करता है.

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अब आते हैं अखिलेश यादव पर. वे काफी सज्जन माने जाते रहे हैं. उन्होंने अपने पिता के दोस्तों में शुमार रहे अमिताभ बच्चन को बिना मांगी सलाह दी है कि वे गुजरात के गधों का विज्ञापन न करें. इसका सीधा अर्थ निकाला गया कि उन्होंने गधा शब्द का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दोस्त अमित शाह के लिए किया है.

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोशल मीडिया पर लोगों ने उपहास उड़ाया तो कुछ लोगों ने इसे आपत्तिजनक माना. जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि नरेंद्र मोदी सामान्य शब्दों में राजनीतिक अर्थ भर देते हैं. उन्होंने अगले ही दिन यह काम कर डाला और अपने आपको जनता का सेवक पुनः घोषित कर दिया. गधा शब्द में उन्होंने राजनीतिक अर्थ भर दिया है.

अभी ज्यादा समय नहीं हुए जब इलाहाबाद में लोकसेवा आयोग में त्रि-स्तरीय आरक्षण के खिलाफ उच्च जाति के नौजवानों ने समाजवादी पार्टी कई नेताओं को जातिसूचक गालियां दीं और लोकसेवा आयोग के गेट पर भैंस का चित्र बना दिया था.

उन्होंने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसा करके वे समाजवादी पार्टी के द्वारा समर्थित लोक सेवा आयोग के चेयरमैन अनिल यादव को उसकी जाति आधारित औकात बता देंगे.

वास्तव में जानवर के शरीर और रूप की व्याख्या इंसानी फितरत को ध्यान में रखकर की जाती रही है लेकिन इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि जानवरों के आधार पर इंसान को भी कष्ट, अपमान और बहिष्करण झेलना पड़ा है.

वनों में रहने वाले समूह, दलित और घुमंतू समुदायों में शामिल कई जातियां सुअर पालती हैं. सुअर पालने के कारण भी मुख्यधारा का समाज उन्हें हिकारत से देखता है और उनका कई आधारों पर बहिष्करण करता है. कुछ बहुत ही विद्वेषपूर्ण गालियों के साथ कुत्ते और सुअर का नाम ऐसे ही नहीं जोड़ा जाता है.

इसकी एक आधारभूमि होती है जो जानवर और इंसान दोनों को पहले एक ही धरातल पर लाकर उनका अस्तित्व मिटाकर एक कलंकित शरीर में तब्दील कर देती है. उनका सामाजिक सांस्कृतिक अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है.

राजनीति में अपने प्रतिद्वंद्वी को मिटाना हर खिलाड़ी का सपना होता है. इसे पूरा करने के लिए वह जानवरों की मदद लेता है. उत्तर प्रदेश में चुनाव चल रहे हैं और राजनेताओं के इतिहास और सांस्कृतिक अभिरुचि को ध्यान में रखते हुए मैं कहना चाहता हूँ कि इस प्रदेश की राजनीति की भाषा में जानवर बने रहेंगे.

जानवर शिकायत भी नहीं कर सकते !

(रमाशंकर सिंह ने अभी हाल ही में जी. बी.पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से पी एच डी की है)