कैंपस

‘एनएसयूआई का प्रत्याथी था, मेरा भाषण वामपंथी नेता ने लिखा, एबीवीपी के ​सीनियर ने चंदा दिया’

कैंपस की कहानियां: इस विशेष सीरीज़ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता रमेश यादव अपना अनुभव साझा कर रहे हैं.

Allahabad University1

पिछले दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के परिणाम आए हैं. इस बार अध्यक्ष पद पर समाजवादी छात्र परिषद के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है.

बताया जा रहा है कि देश के राजनीतिक हालात की तरह कैंपसों का राजनीतिक माहौल भी ख़राब हो गया है लेकिन जो मैंने पिछले 15-20 सालों में देखा है, उसके आधार पर मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति बाकी विश्वविद्यालयों के मुकाबले बेहतर मालूम पड़ती है.

राजनीति का ककहरा मैंने इसी कैंपस से सीखा है. बीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में मैंने अमेठी से इलाहाबाद की ओर रुख किया था और 2003 में पहली बार छात्रसंघ चुनाव लड़ने का मौका मिला.

मैं पिछड़ी जाति से था और मुझे एनएसयूआई के पैनल से टिकट मिला था, लेकिन उस चुनाव में  युवा और वरिष्ठ छात्रों का जैसा रिस्पॉन्स था वो वाकई मेरे लिए अभूतपूर्व रहा.

टिकट मिलने के बाद किसी वरिष्ठ छात्र ने जब चुनाव जीतने के गुर सिखाए तो ये नहीं पूछा कि तुम किस पार्टी से उम्मीदवार हो. इलाहाबाद का हर वरिष्ठ छात्र नेता अपने से जूनियर छात्रों को पार्टी लाइन से परे हटकर सलाह देता था.

मेरा भाषण तैयार करने में जिस सीनियर नेता ने मदद की थी वो वामपंथी रुझान रखते थे. वो हमेशा इस बात के लिए प्रेरित करते कि कैसे माइक हाथ में लेते ही सबको अपने भाषण से चमत्कृत कर देना है.

ठीक इसी तरह से चुनावी चंदा जुटाने में जिस सीनियर ने सबसे ज्यादा मदद की थी वो एबीवीपी के वरिष्ठ नेता रह चुके थे. ऐसा नहीं था कि वो अपनी पार्टी के पैनल को मदद नहीं कर रहे थे, वो उनकी भी मदद कर रहे थे लेकिन उनका कहना था कि देखो जब भी पैसे की किल्लत हो बताना. इस नर्सरी से अच्छे नेता हमेशा निकलते रहना चाहिए. यहां सब कुछ नहीं सीखोगे तो कहां जाकर सीखोगे.

इसी तरह पिछड़ी जाति से होने के बावजूद जो मेरी अपनी टीम थी, उसमें ज्यादातर ब्राह्मण और क्षत्रिय थे. मेरे ये दोस्त बिना जात-पात की परवाह किए मुझे कंधों पर उठाकर घूमते रहते थे. नए-नए नारे गढ़ते रहते थे. उनके भीतर इतना जुनून रहता था कि कई बार थक जाने के बाद उनके चेहरे की खुशी देखकर मुझे ऊर्जा मिलती थी.

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ऐसे ही हम जब कई दूसरी पार्टियों के छात्रनेता आपस में बैठते थे तो सबमें अलग-अलग विचारधारा से जुड़े होने के चलते मतभेद तो होते थे लेकिन मनभेद नहीं होता था.

छात्रों के मसले पर हम अलग-अलग पार्टियों के नेताओं ने साथ में कई बार हड़तालें की, लाठियां खाईं.

वहां के छात्रों ने भी कभी किसी पार्टी का वर्चस्व विश्वविद्यालय पर कायम नहीं होने दिया. सभी राजनीतिक दलों की छात्र इकाइयां यहां पर चुनाव में उतरती थी. कभी कोई पैनल जीतता था तो कभी कोई पैनल.

राजनीति में बढ़ते बाहुबल और धनबल के बीच में ऐसे संकेत लोकतंत्र के बहुत शुभ हैं.

फिलहाल मुझे विश्वविद्यालय में चुनावी जीत नहीं मिली, लेकिन वहां से मिली सीखें आजतक मुझे एक बेहतर इंसान और एक बेहतर नेता बनने में मदद कर रही हैं. जाति और धर्म जैसे दायरे मेरे जीवन और मेरी राजनीति में कभी बाधक नहीं बने हैं.

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