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गोंडा से ग्राउंड रिपोर्ट: जाति, धर्म, धन और धुरंधर लोकतंत्र की शान

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले का ज़मीनी जायज़ा लेने से पता चला कि अपने भाषणों में राजनीतिक दल भले ही काला धन लाने, परिवारवाद मिटाने जैसी आदर्शवादी बातें करें लेकिन चुनाव में जीत धन बल और बाहुबल से ही मिलती है.

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उत्तर प्रदेश में सपा की एक चुनावी रैली. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हुए तो उन्होंने भारतीय राजनीति की कुछ बुराइयों पर ज़ोरदार हमला बोला. परिवारवाद उनमें से एक था. वे देश भर में जहां-जहां गए, वहां-वहां जनता से पारिवारिक अखाड़ों को पस्त कर देने की अपील की.

बीते शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के स्टार प्रचारक की हैसियत से गोंडा जिले में थे. वे जिस इलाके में सभा संबोधित कर रहे थे, उस गोंडा सीट से भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के पुत्र प्रतीक भूषण सिंह भाजपा के प्रत्याशी हैं.

गोंडा के पत्रकार वेदप्रकाश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘मोदी हर रैली में परिवारवाद पर तीखा हमला बोलते हैं लेकिन गोंडा में वे ख़ुद अपने सांसद के बेटे के पक्ष में रैली करने आए और परिवारवाद के ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं बोले.’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिवारवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के बीच भाजपा ने सिर्फ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के कई नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट दिए हैं. गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, वरिष्‍ठ भाजपा नेता लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन, हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह, ब्रजभूषण शरण सिंह के बेटे प्रतीक भूषण सिंह, प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार, ब्रह्मदत्त द्विवेदी के पुत्र सुनील दत्त द्विवेदी, स्वामी प्रसाद मौर्य के पुत्र उत्कृष्ट मौर्य और कल्याण सिंह की बहू प्रेमलता सिंह को भाजपा ने चुनाव मैदान में उतारा है. उत्तराखंड में भी करीब आधे दर्जन उम्मीदवार इसी तरह के हैं जो परिवार से आते हैं.

मोदी ने जनता से यह भी अपील कर डाली कि गोंडा में नकल का टेंडर निकलता है. नकल माफियाओं को हराना है. मोदी जब यह बोल रहे थे तो 53 स्कूलों के मालिक और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह मंच पर थे और वे असहज थे. शायद उन्होंने मोदी से कुछ कहना चाहा लेकिन मोदी की सुरक्षा में लगे कमांडोज़ ने उन्हें और पीछे हटने को कह दिया.

मोदी शिक्षा माफिया पर हमला बोलते हुए समाजवादियों के आॅस्ट्रेलिया से शिक्षा ग्रहण करने पर तंज कर रहे थे, तब आॅस्ट्रेलिया से शिक्षा प्राप्त भाजपा प्रत्याशी प्रतीक भूषण सिंह भी मंच पर ही थे.

गोंडा एलबीएस डिग्री कॉलेज के पास एक साइबर कैफे के संचालक ने कहा, ‘इस रैली का हाल तो ग़ज़ब रहा. हो सकता है कि प्रतीक भूषण लड़ाई में टिक जाते लेकिन मोदी की रैली के बाद इतनी बेइज़्जती हो गई है कि अब पासा पलट गया है. मोदी का भाषण उनके अपने वसूल के ख़िलाफ़ तो था ही, पूरा भाषण ही उनके ख़िलाफ़ था. शिक्षा माफिया पर हमला अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हीं पर हमला था. परिवारवाद की लड़ाई भी उनके खिलाफ़ जाती है, जिसके तहत मोदी लगातार परिवारवाद को नेस्तनाबूद करने की बात कहते हैं.’

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उत्तर प्रदेश में एक चुनावी सभा. (फाइल फोटो: पीटीआई)

परिवारवाद के ख़िलाफ़ अभियान और परिवार के समर्थन में प्रचार जैसे विरोधाभास के सवाल पर गोंडा भाजपा के जिलाध्यक्ष पीयूष मिश्रा कहते हैं, ‘परिवारवाद के ख़िलाफ़ कौन सा अभियान था? मोदी जी किस तरह के परिवारवाद पर अटैक करते हैं? वे अटैक करते हैं कि एक ही परिवार का देश के अंदर साम्राज्य है. एक ही परिवार का प्रदेश के अंदर साम्राज्य है. अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं क्योंकि वे मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं. राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद का सपना देख रहे हैं तो वे सोनिया गांधी के पुत्र हैं. ये परिवादवाद है.’

मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री बने, प्रधानमंत्री का बेटा प्रधानमंत्री तो यह परिवारवाद है. लेकिन सांसद का बेटा सांसद बने, विधायक का बेटा विधायक बने तो यह क्या है? इसके जवाब में पीयूष मिश्रा ने कहा, ‘डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनता है, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनता है तो नेता का बेटा नेता बनेगा तो इसमें बुराई क्या है?’

लेकिन इसी तरह मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री बने तो बुराई है?

इसके जवाब में बड़े आत्मविश्वास से पीयूष कहते हैं, ‘सीएम का बेटा सीएम कैसे बन सकता है, सीएम तो जनता चुनती है. विधायक चुन के जाते हैं, फिर वे सीएम चुनते हैं. लेकिन वहां ऊपर से थोप दिया जाता है. यह विधानसभा चुने कि मुख्यमंत्री कौन होगा. मुलायम या सोनिया न तय करें कि सीएम या पीएम कौन होगा. ग्राउंड पर अगर कोई काम कर रहा है तो उसको टिकट मिलना चाहिए. सांसद के बेटे को अगर टिकट मिला तो कोई अपराध थोड़े हो गया?’

परिवारवाद और अपराधीकरण के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई यूपी में आकर कहां खड़ी है, इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी कहते हैं, ‘किसी भी बड़ी पार्टी के लिए, वो चाहे जो दावा करे, यूपी में इन चीजों से निजात पाना मुश्किल है. एडीआर का जों सर्वे आया है उसमें कहा गया है कि 25 प्रतिशत अपराधी बीजेपी में भी हैं. पूर्वांचल के नेताओं को हम सब जानते हैं. जो ज़मीनी सच्चाई है, वो इस विधानसभा चुनाव में ज्यादा उभर करके मज़बूती के साथ खड़ी हुई है. उसके सामने तमाम आदर्श ठिठक जाते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर आप आदर्शों की हवा बनाते हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाइयों के आगे उनके पांव लड़खड़ाने लगते हैं. यूपी में क्षेत्रीय दल मज़बूती से लड़ रहे हैं, कोई राष्ट्रीय दल उनको बहा नहीं ले जा रहा है. और जो उनकी ज़मीनी हक़ीक़त है, जातिगत सवाल, परिवार का सवाल है, अपराध का सवाल है, उस हक़ीक़त के साथ खड़े हैं.’

पूर्वांचल के गांवों से लौटे अरुण त्रिपाठी अलग से रेखांकित करते हुए कहते हैं, ‘मैं बस्ती से होकर लौटा हूं, धुआंधार पैसा बंट रहा है. मोदी जी ने नोटबंदी को लेकर अभियान चलाया, उसका समर्थन, नाराज़गी अलग सवाल है, लेकिन ये अभियान चुनाव में भ्रष्टाचार को रोक नहीं पाया है. हर प्रत्याशी बेतहाशा पैसा बांट रहा है. पता नहीं कहां से पैसा आ गया है. कहा गया था कि नोटबंदी के बाद सपा-बसपा के पास पैसा नहीं रहेगा, सिर्फ़ भाजपा के पास रहेगा. लेकिन हमारे इलाक़े में साड़ी-पैसा सब बंट रहा है. रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अपराध सब यूपी चुनाव में अपने ढंग से अपनी भूमिका निभा रहे हैं. सारे आदर्श हवा में हैं.’

Allahabad: BJP

उत्तर प्रदेश में बैनर-पोस्टर से पटा इलाहाबाद का एक चौराहा. (फोटो: पीटीआई)

गोंडा चौराहे पर हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रामकुमार ने बातचीत में कहा, ‘गोंडा में सात विधानसभा हैं. हर इलाके में हमारे जानने वाले लोग हैं. रैली में लाने और वोट अपने पक्ष में करने के लिए एक-एक व्यक्ति को न्यूनतम 250 रुपये दिए जा रहे हैं. नक़दी भी बंट रही है, गाड़ियों में फ्री में पेट्रोल पड़ रहा है.’

ज़मीन की इस भ्रष्ट हक़ीक़त की वजह पूछने पर वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह कहते हैं, ‘अमूमन आदमी ईमानदार है तो ऐसी हालत क्यों है? वह ऐसा करता क्यों है? गांव हो या शहर हो, लोगों को सिस्टम से न्याय नहीं मिलता है, वह चलती-फिरती अदालत है, चलता-फिरता थाना है, चलता-फिरता प्रशासन तंत्र है. आम आदमी को अदालत में घूस देकर भी बीस साल इंतज़ार करना है. नेता त्वरित परिणाम दिलाता है. हर बाहुबली ने यही किया है. इसीलिए नजीबाबाद में सिर्फ़ सुल्ताना डाकू जाना जाता है. जगजीत सिंह गाते हैं कि दैरो-हरम में चैन जो मिलता क्यों जाते मयख़ाने लोग… सिस्टम में लोगों का भरोसा होता तो वे बाहुबली की शरण में क्यों जाते? आम आदमी को न्याय चाहिए. उसे एक जगह नहीं मिलेगा तो दूसरी जगह जाएगा. प्रशासन फेल है तो वह नेता के पास जाता है.’

परिवारवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण के सवाल पर राम कृपाल सिंह कहते हैं, ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना. हर पार्टी में एक खाने के दांत होते हैं और एक दिखाने के होते हैं. दूसरे, ये सब चीज़ें सिस्टम का हिस्सा हो चुकी हैं, अगर होंगी भी तो धीरे-धीरे होंगी. सांप का केंचुल उतना ही उतर सकता है जितना नया केंचुल बन गया होगा. पूरा नोट देने पर सांप मर जाएगा. तुरंत हटाने का दावा भले कर दिया जाए, लेकिन अंतत: दावा करने वाला भी उसी सच्चाई से दो-चार होगा.’

यूपी विधानसभा का चुनाव में निर्णायक भूमिका किस चीज़ की है? इस सवाल के जवाब पत्रकार रमेश पांडेय ने कहा, ‘निर्णायक भूमिका किसी मुद्दे की नहीं है. गोंडा ज़िले की सातों सीटों पर जाति का गणित, धर्म का उन्माद, ब्राह्मण-ठाकुर और मुसलमान का वर्चस्व कायम करने की होड़, धनबल का प्रदर्शन और बाहुबल की आज़माइश ही निर्णायक चीज़ें हैं. जो इन सबमें भारी पड़ेगा, वही चुनाव जीतेगा. बाक़ी भाषणों की अच्छी-अच्छी आदर्शवादी बातें लोगों को बहलाने के लिए हैं. यदि भारत एक लोकतंत्र है तो इस लोकतंत्र की यही शान है.’

  • Anurag Mishra

    अच्छी रपट। गोंडा के बहाने समकालीन राजनीति के पाखण्डों की पोल खोलती हुई। इस प्रहसन को दिखाती हुई कि हमारे पाखण्ड अच्छे हैं जबकि दूसरों के ख़राब। शुचिता और पवित्रता के स्वघोषित दावे कितने भ्रामक हैं, इसके बारे में अपने आसपास से कुछ और ब्यौरे जुटाते हुए एक दृष्टि के साथ लिखी गयी रिपोर्ट।