भारत

मोदी अब अच्छे दिन के बारे में बात नहीं करते, उन्हें पता है कि लोग हंसेंगे: पी.चिदंबरम

साक्षात्कार: पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से नरेंद्र मोदी सरकार, जीएसटी, रॉबर्ट वाड्रा, कार्ति चिदंबरम, विपक्ष, गुजरात चुनाव समेत विविध विषयों पर विस्तृत बातचीत.

Chidambaram Photo by The Wire

फोटो: द वायर

स्वाति चतुर्वेदी: नमस्कार. वायर स्पेशल में आपका स्वागत है. मैं स्वाति चतुर्वेदी, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से अर्थव्यवस्था, इसकी वृद्धि दर के धराशायी होने, उनके बेटे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों, यह सवाल कि आखिर कब राहुल गांधी इस देश को कायदे का विपक्ष देंगे, अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ी चिंताओं आदि को लेकर बातचीत करूंगी.

अर्थव्यवस्था, यूपीए और एनडीए के दौर में बैंकों के डूबे हुए कर्ज़

चलिए आपके पसंदीदा विषय- अर्थव्यवस्था से बात शुरू करते हैं. यूपीए-2 के दौरान पॉलिसी पैरालिसिस की स्थिति थी और अब वर्तमान वित्त मंत्री हर चीज का दोष विरासत पर मढ़ देते हैं. वे कहते हैं कि आप बैंकों के सिर पर एनपीए (गैर-निष्पादन परिसंपत्तियों) का इतना बड़ा बोझ लाद कर गए कि उनके (एनडीए के) पास बैंकों को (वित्तीय मदद देकर) उबारने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था. आपका क्या कहना है?

पी. चिदंबरम: 2014 में एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग असेट्स) (गैर-निष्पादन परिसंपत्तियों) का स्तर क्या था और आज एनपीए का स्तर क्या है? कई तरह के कर्जे हैं. इनमें से कर्जों की एक श्रेणी 2014 के एनपीए की है.

चतुर्वेदी: बिल्कुल.

चिदंबरम: आप यह भूल रही हैं कि कर्जे की एक श्रेणी अच्छा प्रदर्शन करनेवाले कर्जों (परफॉर्मिंग लोन्स) की है. वे अच्छा प्रदर्शन करनेवाली परिसंपत्तियां (असेट्स) थीं. परफॉर्मिंग असेट्स आज नॉन परफॉर्मिंग असेट्स क्यों बन गए हैं?

चतुर्वेदी: हमें बताइए.

चिदंबरम: ऐसा इसलिए है, क्योंकि अर्थव्यवस्था रसातल की ओर चली गई है. इसलिए, उस समय जो परफॉर्मिंग असेट्स थे, वे नॉन परफॉर्मिंग असेट्स में बदल गए हैं. 2014 में एनपीए का स्तर सिर्फ 3 करोड था. बाकी सारे कर्जे बिल्कुल सही ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे. इन पर ब्याज दिया जा रहा था, किस्तें चुकाई जा रही थीं. यानी ये बिल्कुल सेहतमंद परफॉर्मिंग असेट्स थे. अगर ये कर्जे भी आज अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं, तो इसकी वजह अर्थव्यवस्था की बदइंतजामी है. इसलिए वैसे कर्जे नॉन परफॉर्मिंग असेट्स बन गए हैं.

चतुर्वेदी: मेरा सवाल अलग है. सारे सार्वजनिक बैंकों का एक ही मालिक है. वही जो उनकी बांहें मरोड़ता है. सरकार चाहे जिसकी भी हो, वे सरकारों की दुधारू गाएं हैं. आपके कार्यकाल में भी ऐसा ही था. एनडीए के कार्यकाल में भी ऐसा ही है. आपको क्या लगता है, अब क्या करना चाहिए? राजनीतिक दोषारोपण को भूल जाइए, जो हमेशा चलता रहता है. जब आप वित्त मंत्री थे, तब आप सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अकेले सबसे बड़े स्वामी थे. अब अरुण जेटली हैं. आपको क्या लगता है, इसका क्या समाधान है?

चिदंबरम: मुझे नहीं लगता कि देश का जनमत आज बदल कर यह कहनेवाला हो गया है कि ‘चलिए, सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देते हैं.’ राजनीतिक पार्टियां सिर्फ जनमत को ही प्रकट कर सकती हैं.

चतुर्वेदी: लेकिन, क्या आपको यह नहीं लगता कि कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां उन्हें दुधारू गायों की तरह इस्तेमाल करती हैं? 50 लोग हैं, जिनके ऊपर सबसे बड़े कर्जे हैं. सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए की, ये 50 लोग वही रहे हैं.

चिदंबरम: यह सही नहीं है. ऐसा कोई मौका नहीं आया, जब मैंने फोन उठाया हो और किसी चेयरमैन को कहा हो, ‘यह कर्ज दे दीजिए’. एसबीआई की चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य, जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुई हैं, ने बयान दिया कि किसी ने भी कभी उन्हें ए या बी को कर्ज देने के लिए नहीं कहा. अगर मैं अपनी सरकार की तरफ से, अपनी तरफ से कहूं, तो मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमने कभी किसी भी बैंक को किसी भी ए या बी को कर्ज देने के लिए नहीं कहा.

चतुर्वेदी: कभी नहीं?

चिदंबरम: कभी नहीं.

चतुर्वेदी: क्योंकि वे विजय माल्या जैसे मामलों का हवाला देते हैं. वे कहते हैं कि यूपीए ने माल्या को कभी कर्जे की कमी नहीं होने दी. और अब वे इसका खामियाजा भुगत रहे हैं.

चिदंबरम: उन्हें कंसटोरियम के चेयरमैन को (ऐसा करने के लिए) कहनेवाले का नाम लेने दीजिए. यह बात समझनी चाहिए कि ज्यादातार कर्जे किसी एक बैंक द्वारा दिए गए कर्जे नहीं हैं. ये कंसटोरियम द्वारा दिए गए कर्जे हैं. किसी के पास भी इतनी क्षमता या प्रभावक्षेत्र नहीं है कि वह सभी बैंकों के चेयरमैनों तक पहुंच सके. हकीकत ये है कि यूपीए के समय में, हमने माल्या के खाते के खिलाफ कार्रवाई करनी शुरू कर दी थी.

एक्साइज डिपार्टमेंट ने कार्रवाई शुरू कर दी, सर्विस टैक्स डिपार्टमेंट ने कार्रवाई शुरू कर दी, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने कार्रवाई शुरू कर दी. हवाई जहाज को जब्त कर लिया गया. ये सारी बातें रिकॉर्ड में हैं. यह कहना कि यूपीए या यूपीए सरकार के किसी व्यक्ति ने बैंकों के चेयरमैन को माल्या को कर्ज देने के लिए कहा था, एक हैरान करनेवाला झूठ है.

जीएसटी का गड़बड़झाला

फोटो: रॉयटर्स

फाइल फोटो: रॉयटर्स

चतुर्वेदी: जीएसटी का विचार कांग्रेस लेकर आई थी. भाजपा ने हर स्तर पर इसमें रुकावट डालने का काम किया. राज्यों के द्वारा और राज्यसभा तथा लोकसभा में. अब जीएसटी, नोटबंदी के साथ आया है, जो मेरे ख्याल से एक आपदा है. अर्थव्यवस्थ पर पड़ी इस दोहरी मार पर आपकी राय क्या है? क्या वित्त मंत्री के तौर पर आप जैसा जीएसटी चाहते थे, यह वैसा है?

चिदंबरम: यह जीएसटी नहीं है.

चतुर्वेदी: क्या वाकई?

चिदंबरम: आपको इसे किसी दूसरे नाम या किसी दूसरे संक्षिप्त रूप से पुकारना होगा.

चतुर्वेदी: आपके नेता इसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहते हैं.

चिदंबरम: मैं तो इसके लिए संक्षिप्त रूप ‘जी-एस-टी’ के प्रयोग के भी पक्ष में नहीं हूं. वर्णमाला के तीन अक्षरों, जी, एस, टी, को भी इससे दूर रखा जाना चाहिए. परिभाषा की बात करें, तो जीएसटी का मतलब एक दर से है. संक्रमण के दौर में आप एक दर बढ़ा सकते हैं और एक घटा सकते हैं- मेरिट रेट और डिमेरिट रेट.

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने अपनी रिपोर्ट में इसकी सिफारिश की थी. लेकिन, इन लोगों ने आठ दरें लगाईं और उसके ऊपर से उन्होंने उपकर लगाए और उसके ऊपर से उन्होंने राज्य सरकारों को करों को वापस लेने की आजादी दी है. मिसाल के लिए, कुछ दिनों पहले गुजरात ने गुजरात से जुड़े कुछ विशिष्ट उत्पादों पर से कुछ कर वापस लिए.

चतुर्वेदी: खाखरा, नमकीन और मानवनिर्मित धागे.

चिदंबरम: यह जीएसटी के साथ किया गया खिलवाड़ है. यह जीएसटी की भौंडी नकल है. उनके द्वारा बनाए गए इस कानून का सबकुछ और उनके द्वारा लाया गया कर दोषपूर्ण है. अवधारणा, डिजाइन, ढांचा, दरें, आधार (बैकबोन), अनुपालन जरूरतें- सबकुछ दोषपूर्ण है. तो, जो कर आप लागू कर रहे हैं, उसमें अगर इतने दोष हों, तो आप ऐसी ही अव्यवस्था को जन्म देंगे.

अब इसे नोटबंदी से जोड़ दीजिए, तो इसने वास्तव में इस देश में लघु और मध्यम उद्यमों की जान ले ली है. इससे छोटे स्तर पर जितना कम कहा जाए, उतना अच्छा. वे सब बंद हो गए हैं.

चतुर्वेदी: आपने एक बार कहा था कि नरेंद्र मोदी की अर्थव्यवस्था की समझ पोस्टर स्टांप तक ही सीमित है. उनकी सरकार को करीब साढ़े तीन साल हो गए हैं. क्या आपको अपनी उस राय पर फिर से विचार करने का मौका मिला या आप आज भी उसी राय पर कायम हैं?

चिदंबरम: इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि मैंने ये बात उनके इस ताने के जवाब में कही थी कि वित्त मंत्री की उम्र और विनियम दर (एक्सचेंज रेट) एक साथ बढ़ रही है… या ऐसा ही कुछ. जब उन्होंने ऐसा कहा, तब मैंने यह टिप्पणी की थी.. क्योंकि विनिमय दरों को लेकर उनकी जानकारी जाहिर तौर पर काफी सीमित थी.

याद कीजिए कि भाजपा का आधिकारिक पक्ष यह था कि अगर वह सत्ता में आती है, तो विनिमय दर प्रति डॉलर, 40 रुपये होगी. कृपया उन्हें अपना वह वादा पूरा करने के लिए कहिए और इसे (विनिमय दर को) 40 रुपये प्रति डॉलर कर दीजिए!

अगर नोटबंदी और जीएसटी के साथ रुपया प्रति डॉलर चालीस हो जाता है, तो यह आनेवाले 20 सालों के लिए भारत की अर्थव्यवस्था के ताबूत में कील ठोंक देगा. इसलिए मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने साफगोई दिखाते हुए यह स्वीकार कर लिया है कि अर्थव्यवस्था का उनका ज्ञान (कमजोर है)- मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं देता हूं. वे एक प्रशिक्षित अर्थशास्त्री नहीं हैं. वे कभी केंद्र सरकार में नहीं थे.

मैक्रो इकॉनमिक्स ज्यादातर मुख्यमंत्रियों के लिए अपरिचित चीज है. इसलिए आज, एक मुख्य आर्थिक सलाहकार के अलावा, उन्हें नीति आयोग के भीतर एक ढांचे का निर्माण करना पड़ा है और उन्होंने वहां दो लोगों को बिठाया है, जिनका काम उन्हें अर्थव्यवस्था के मसलों पर सलाह देना है.

और इससे भी ऊपर उन्होंने अब इकोनॉमिक एडवायजरी काउंसिल (आर्थिक सलाहकार परिषद) का फिर से गठन किया है और उन्होंने वहां पांच लोगों को रखा है, जिनका काम सिर्फ उन्हें अकेले को सलाह देना है. यह इस बात की स्वीकृति है कि आर्थिक मामलों में वे सलाहों के भरोसे हैं.

चतुर्वेदी: अब, चूंकि आप अर्थव्यवस्था के बारे में बात कर रहे हैं- वे दर कब बदलते हैं, हम वृद्धि (ग्रोथ) को कैसे समझें, इस बारे में आपका क्या कहना है? साथ ही, वे कई ऐसी चीजें कर रहे हैं, जैसे, बैंकों का रीकैपटलाइजेशन, ये ऐसी चीज हैं, जो आप पहले कर चुके हैं.

वे कौन सी चीज अलग तरह से कर सकते थे और आदर्श रूप में ऐसा क्या हो सकता था, जिससे भारत की वृद्धि की कहानी (ग्रोथ स्टोरी) उस तरह से ध्वस्त नहीं हुई होती, जैसे हुई है?

चिदंबरम: उन्हें अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ करना बंद करना चाहिए था. वे नोटबंदी से बच सकते थे. किसी ने नोटबंदी की सलाह नहीं दी थी. हम आज तक यह नहीं जानते कि इसके पीछे किसका दिमाग था?

निश्चित तौर पर वे जीएसटी पर हम लोगों से सलाह ले सकते थे. आखिरकार मैंने ही जीएसटी की घोषणा की थी. यूपीए ने ही जीएसटी की इबारत लिखी थी. इसके विधेयक को सबसे पहले (प्रणब) मुखर्जी ने पेश किया था.

वे जीएसटी पर हमारी जानकारी का इस्तेमाल कर सकते थे और जीएसटी को (उसकी मदद से) डिजाइन कर सकते थे. आखिरएक तटस्थ समूह जीएसटी कानून का निर्माण क्यों नहीं कर सकता था? इसका निर्माण राजस्व विभाग और पीएमओ में बैठ करने की क्या जरूरत थी? एक तटस्थ संस्था जीएसटी को डिजाइन कर सकती थी.

चतुर्वेदी: लेकिन, पलटकर वे यह भी कह सकते हैं कि आप लोग भी किसी निष्पक्ष संस्था को यह काम दे सकते थे, बजाय इसे अपने हाथ में रखने के.

चिदंबरम: हम लोगों ने जिस जीएसटी का निर्माण जिस मॉडल पर किया था, उसकी सिफारिश वित्त मंत्री की परिषद ने की थी. इस परिषद ने जीएसटी लागू करनेवाले एक दर्जन देशों का दौरा करने के बाद इस मॉडल की सिफारिश की थी. इसलिए वित्त मंत्री की परिषद एक किस्म की निष्पक्ष संस्था थी. इसने दर्जन भर देशों की यात्रा की थी और एक ऐसे मॉडल की सिफारिश की थी, जो स्वीकृत जीएसटी मॉडल के अनुरूप था.

आपने मॉडल का मजाक बनाकर रख दिया. आपने जब राजस्व मंत्रालय के भीतर, पीएमओ के साथ मिलकर इसका (जीएसटी का) निर्माण किया.. और जब आपने कई दरें बना दी, तब आपने इस मॉडल को भानुमति के पिटारे में बदल कर रख दिया.

चतुर्वेदी: नरेंद्र मोदी आए और उन्होंने कहा कि हमें ‘अच्छे दिन’ की सौगात मिलनेवाली है. मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद क्या कोई ‘अच्छे दिन’ का अनुभव कर रहा है और क्या गुड गवर्नेंस के वादे को निभाया जा रहा है?

चिदंबरम: अब तो प्रधानमंत्री भी ‘अच्छे दिन’ की बात नहीं करते हैं. अपनी रैलियों में वे ‘अच्छे दिन आनेवाले हैं’ नहीं कहते हैं. उन्होंने इससे तौबा कर लिया है. जिस तरह से कुछ महीनों के लिए ‘इंडिया शाइनिंग’ की धूम थी और उसके बाद उसे दफना दिया गया था, वैसे ही ‘अच्छे दिन’ को दफना दिया गया है.

मोदी को भी पता है कि अगर वे आज अच्छे दिन की बात करेंगे, तो लोग हंसेंगे. वे अच्छे दिन की बात नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उन वादों को इस सरकार द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है. मुझे लगता है कि वे अब दूसरी चीजों के बारे में बात कर रहे हैं, जैसे स्वच्छ भारत और इसी तरह की दूसरी चीजों के बारे में.

चतुर्वेदी: नया भारत.

चिदंबरम: नया भारत. लेकिन यह बस एक नारे को दूसरे नारे से बदल देने का मामला है. अगर नारों से आर्थिक वृद्धि को गति मिल सकती, अगर नारों से सरकारें बचतीं, तो इंडिया शाइनिंग ने वाजपेयी सरकार को बचा लिया होता. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ.

यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप

चतुर्वेदी: मोदी ने कहा था कि यूपीए-2 के दौरान बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ था और यह सरकार भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करेगी. क्या आपको लगता है कि यह एक जुमला है? मैं आपको दो उदाहरण दूंगी. उन्होंने कहा कि उनके प्रधानमंत्री बनने के एक महीने के भीतर रॉबर्ट वाड्रा को गिरफ्तार कर लिया जाएगा. उनके प्रधानमंत्री बने साढ़े तीन साल का वक्त बीत गया है और कई केस आपके बेटे के खिलाफ भी हैं.

चिदंबरम: आपको गलत जानकारी है. कोई केस नहीं है. आरोप हैं.

चतुर्वेदी: आरोप हैं. तो, मेरा कहना यह है कि क्या आपको लगता है कि इन चीजों को एक राजनीतिक हथियार की तरह विपक्ष के माथे पर रख दिया गया है या जिसे वे बड़े पैमाने का भ्रष्टाचार कहते हैं, उसके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है?

चिदंबरम: ऐसी किसी चीज पर जिसका मुझसे संबंध है, मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता, क्योंकि अपने विश्वासों और आस्थाओं में मैं आश्वस्त हूं कि हमने कोई गलत काम नहीं किया है. उसे किनारे रख दीजिए. टेलीकॉम और कोयला क्षेत्र में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे.

कोयला क्षेत्र में एक दोषसिद्धि हुई है, जो कि सिविल सर्वेंट हैं. मुझे लगता है कि एक पूर्व मंत्री.. मैं निश्चित तौर पर नहीं कह सकता. टेलीकॉम में, अब तक किसी को दोषसिद्ध नहीं किया गया है. इसलिए जब कोई मामला कोर्ट में जाता है और उस पर कोई फैसला आता है, तब हम कोई निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वास्तव में कोई भ्रष्टाचार हुआ था या नहीं. अब ऐसा लगता है कि सरकार ने यूपीए-2 के दौरान के भ्रष्टाचार के आरोपों पर हार मान ली है. अब वे वापस बोफोर्स पर लौट आए हैं.

यह इस बात को दिखाता है कि सरकार कांग्रेस पार्टी पर भ्रष्टाचार का पट्टा लगाने के लिए बेताब है. बोफोर्स मामले में फैसला हो चुका है, जिसमें कहा गया कि सीबीआई के समक्ष कोई सबूत पेश नहीं किया गया.

चतुर्वेदी: क्या आपको लगता है कि यह थोड़ा सा संदेह पैदा करनेवाला है कि रॉबर्ट वाड्रा पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है? उन्होंने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था. पूरे ‘दामाद जी’ भ्रष्टाचार मामले को.

चिदंबरम: जैसा कि मैंने कहा, मैं आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता. अगर कोई भ्रष्टाचार हुआ है, तो कानून का तकाजा है कि आप चार्जशीट दायर करें. कोर्ट जाएं और आरोप तय करवाएं और मुकदमा शुरू करें. अब मीडिया के लिए आरोप ही पर्याप्त हैं. जैसा कि किसी ने कहा, अब निर्दोष साबित होने तक हर किसी को दोषी मान लिया जाता है.

लेकिन, एक वकील होने के नाते, कानून में प्रशिक्षित व्यक्ति होने के नाते, हम इसके ठीक विपरीत मत रखते हैं- हर कोई तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि उसका दोष साबित नहीं हो जाता. किसी व्यक्ति को आप सिर्फ कानून के नियम के तहत ही दोषी साबित कर सकते हैं.

यही एकमात्र तरीका है. दूसरा कोई और तरीका नहीं है. आपको पहले चार्जशीट दायर करनी पड़ेगी. कोर्ट में आरोप तय करने पड़ेंगे और मुकदमा चलाना पड़ेगा. एक और काफी प्रसिद्ध मामला तब के टेलीकॉम मंत्री के खिलाफ का है. लेकिन, इसमें आरोप तक तय नहीं किए जा सके. चार्जशीट की बारी आने पर कोर्ट ने इसे उठाकर बाहर फेंक दिया.

लेकिन, अगर याद करें, तो उस केस को लेकर कितना ज्यादा शोर, कितना ज्यादा गुस्सा था, लेकिन चार्जशीट को ही बाहर फेंक दिया गया. मैं आरोपों पर टिप्पणी नहीं करूंगा. मैं तभी टिप्पणी करूंगा, जब किसी के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी जाती है. तब मुझे लगता है कि सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि वह उस पर प्रतिक्रिया दे. यूपीए में कोई भी आरोपों का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं है.

टैक्स टेररिज़्म

चतुर्वेदी: उद्योग जगत का कहना है- चलिए अर्थव्यवस्था की ओर वापस चलते हैं- टैक्स इंस्पेक्टर राज को खुला छोड़ दिया गया है. अगर आप सरकार के खिलाफ कुछ लिखते हैं या किन्हीं कारणों से सरकार आपको पसंद नहीं करती है…यह एक ऐसी सरकार है जो किसी भी किस्म की आलोचना को लेकर काफी छुईमुई सी है.

अभी पिछले दिनों ही हमने देखा कि आधी रात की कार्रवाई में- आधी रात भी नहीं, देर रात 3 : 00 बजे- एक पत्रकार को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उसके पास एक मंत्री की सीडी थी. तो, क्या आपको लगता है कि इस तरह के माहौल में, एफडीआई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आनेवाला है- इस पर मजेदार यह है कि हमारे यहां कुछ काफी विचित्र वैट नियम हैं..और भी बहुत कुछ. आप इसका परिणाम किस तरह से निकलते देखते हैं?

चिदंबरम: मुझे नहीं लगता कि एफडीआई का इससे कोई लेना-देना है. विदेशी पैसा तब तक भारत में आता रहेगा, जब तक कि भारतीय बाजार और अमेरिकी या यूरोपीय बाजार से मिलनेवाले (या मिलने की पेशकश करनेवाले) ब्याज और रिटर्न के बीच अंतर रहेगा.. यही कारण है कि एफडीआई की आमद काफी ज्यादा है.

अब जहां तक टैक्स टेररिज्म का सवाल है, मैं आंकड़ों के हिसाब से बात करता हूं. तथ्यों के हिसाब से बात करता हूं. अब, मेरे सामने मौजूद तथ्य मुझे बताते हैं कि उन्होंने टैक्स कानूनों में कुछ काफी कठोर संशोधन किए हैं. खासकर इनकम टैक्स कानूनों में.

उन्होंने अपने टैक्स अधिकारियों को जरूरत से ज्यादा शक्ति से लैस कर दिया है, जिसमें कारण न बताने की भी शक्ति शामिल है. मुझे लगता है कि जांच एजेंसियां कारोबारी लोगों को परेशान करने पर भिड़ी हुई हैं. और चूंकि जो काफी ताकतवर और काफी धनवान हैं, वे सुरक्षित नजर आते हैं, इसलिए जांच एजेंसियों की इन कोशिशों का सबसे ज्यादा शिकार छोटे कारोबार करनेवाले लोग हुए हैं.

यही कारण है कि कोई भी उद्यमी कुछ भी अतिरिक्त निवेश करना या अपने कारोबार को बढ़ाना नहीं चाहता है. आज कोई भी ऐसा उद्यमी नहीं है जो खुश है… जो भारत में निवेश किए रहने में खुश है. यही कारण है कि कोई अतिरिक्त निवेश नहीं हो रहा है. और हमारे सामने उन संशोधनों की एक फेहरिस्त है, जो उन्होंने टैक्स कानूनों में किए हैं. मुझे लगता है कि भविष्य की सरकार को इन संशोधनों को वापस लेना पड़ेगा.

चतुर्वेदी: क्या वाकई?

चिदंबरम: बिल्कुल. टैक्स अधिकारियों को दी गई कई शक्तियों को वापस लेना होगा. मुझे यकीन है कि भविष्य की समझदार सरकार ठीक यही काम करेगी.

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरा

चतुर्वेदी: अरुण शौरी ने मुझसे कहा कि वर्तमान में देश में एक अघोषित आपातकाल है. जो भी सरकार की आलोचना करता है, वह मुश्किल में है. इस बारे में आपको क्या कहना है?

चिदंबरम: देखिए यह सच है. लोगों को धमकियां दिए जाने, उन्हे चुप कराए जाने, और प्रताड़ित किए जाने के कई उदाहरण हैं. इनमें से कई मामलों की व्याख्या सिर्फ संयोग के तौर पर नहीं की जा सकती. मेरसल विवाद के सामने आने पर इनकम टैक्स अधिकारी ठीक अगले दिन मेरसल के दफ्तर क्यों गए? यह संयोग नहीं हो सकता. वे ये काम दो हफ्ते पहले भी कर सकते थे. यह काम दो महीने के बाद भी किया जा सकता था.

मैं इसकी व्याख्या संयोग के तौर पर नहीं कर सकता. कई ऐसे उदाहरण हैं, जो संयोग की दलील का साथ नहीं देते. इन सबका यह अर्थ निकलता है कि कोई है, जो इन एजेंसियों को आलोचकों को चुप कराने का निर्देश दे रहा है.

चतुर्वेदी: तो क्या आप यह कहेंगे कि अभिव्यक्ति की आजादी वास्तव में खतरे में है? आप अपने स्तंभ में इसके बारे में लिखते रहते हैं. क्या आप वास्तव में यह सोचते हैं कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है?

चिदंबरम: ऐसा वाकई में है और ऐसा सिर्फ उन लोगों का दरवाजा खटखटाकर नहीं किया जा रहा है, जिन्होंने कथित तौर पर कानून का उल्लंघन किया है. जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है. अभिव्यक्ति के एक रूप के तौर पर साधारण लोगों का एक खास किस्म के कपड़े पहनना, अभिव्यक्ति के एक रूप के तौर पर ब्लॉग लिखना, ट्वीट करना, कार्टून बनाना या प्रदर्शित करना, विश्वविद्यालयों में बोलना… ये सब खतरे में हैं.

बीते दिन आईआईटी दिल्ली में निर्धारित मेरा लेक्चर रद्द कर दिया गया. नागपुर में सीताराम येचुरी का लेक्चर रद्द कर दिया गया. इसके कई उदाहरण हैं और इसलिए मुझे लगता है कि लोगों के बीच इस बात को लेकर जबर्दस्त भावना है कि यह सरकार साफ तौर पर लोगों को चुप करा रही है या धमका कर उनका मुंह सिल रही है.

आरबीआई और निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता

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चतुर्वेदी: दो उदाहरण- जब रघुराम राजन को हटाया गया- जब उन्हें हटाया गया और जिस तरह से हटाया गया और किस तरह से नोटबंदी लागू की गई- एक ही झटके में आरबीआई की स्वायत्तता को गिरवी रख दिया गया. क्या आप इससे सहमत हैं?

चिदंबरम: हां मैंने इसके बारे में लिखा है. मुझे नहीं लगता है कि आरबीआई ने कोई गौरवपूर्ण काम किया, जब इसे 7 नंवबर को चिट्ठी मिली और इसने कई सदस्यों की गैरहाजिरी में एक संक्षिप्त बोर्ड मीटिंग बुलाई और 8 नंवर को आज्ञाकारी ढंग से प्रस्ताव पर उस पर अपनी मुहर लगा दी.

मेरे ख्याल से यह आरबीआई की स्वायत्तता पर एक गंभीर आघात था. और मुझे डर है कि वे इस चोट से अब तक उबर नहीं पाए हैं. नोटबंदी की विफलता के बाद दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के बीच आरबीआई की साख कमजोर हुई है.

चतुर्वेदी: हमने आरबीआई के मामले में एक संस्था को देखा.. हमने एक और संस्था को देखा है, जिसके बारे में आपने काफी सारगर्भित तरीके से ट्वीट किया था कि इलेक्शन कमिश्नर, गुजरात चुनाव की तारीखों का क्या हुआ…आपको क्या लगता है कि इस सरकार के साढ़े तीन साल में संस्थाओं को इतना नुकसान पहुंचा है. संस्थाओं को इतना ज्यादा नुकसान क्यों पहुंचा है?

चिदंबरम: संस्थाओं को नुकसान तब पहुंचता है, जब संस्थाएं तन कर खड़ी नहीं होती हैं. सत्ता में बैठे लोग संस्थाओं को नष्ट करने की कोशिश करेंगे. लेकिन, जिन पर संस्थाओं की जिम्मेदारी है, उन्हें तन कर खड़े होने में सक्षम होना चाहिए. अगर वे खड़े नहीं हो पाते, तो तो नुकसान होगा. यह काफी दुखद है कि चुनाव आयोग ने 13 दिनों के अंतराल पर हिमाचल और गुजरात चुनावों की तारीखों की घोषणा की. मैं अपनी बात इस तरह कहना चाहूंगा.

अगर गुजरात चुनाव की तारीख को 24 अक्टूबर तक टाला जाना जरूरी था, जो हिमाचल के लिए चुनावों की तारीखों की घोषणा भी 24 अक्टूबर को की जा सकती थी. हिमाचल के चुनाव की घोषणा 13 दिन पहले और गुजरात के चुनाव की घोषणा 13 दिन बाद करने की क्या जरूरत थी?

इसका कारण इसके अलावा और क्या हो सकता है कि हिमाचल सरकार को किसी तरह की घोषणा करने से रोक दिया जाए और गुजरात सरकार को घोषणाएं करने के लिए 13 दिन की मोहलत और दी जाए.

चतुर्वेदी: साफ तौर पर यह बराबरी का मौका नहीं है.

चिदंबरम: बिलकुल, यह बराबरी का मौका नहीं है. साफ तौर पर यह काफी भेदभावपूर्ण और साफ तौर पर यह इस बात को उजागर करता है कि चुनाव आयोग दबाव में आ गया.

मोदी सरकार की कश्मीर नीति

चतुर्वेदी: आखिरी दो सवाल. कश्मीर पर सरकार ने यू-टर्न लिया है. वे बातचीत की मेज पर न जाने की आक्रामक नीति पर चल रहे थे और उन्होंने एक नया वार्ताकार नियुक्त कर दिया है. आपको क्या लगता है, अब समझदारी भरा रास्ता क्या होगा, पेलेट गन और दूसरी चीजों के साथ क्या हुआ, इस बात को ध्यान में रखते हुए?

चिदंबरम: मुझे नहीं लगता कि उन्होंने यू-टर्न लिया है. मुझे लगता है कि यह सिर्फ ध्यान भटकानेवाली चाल है. आपने सेना प्रमुख को सुना. आपने पीएमओ के राज्यमंत्री को सुना. मेरा मानना है कि ये दोनों आवाजें सरकार के वास्तविक नजरिए की नुमाइंदगी करती हैं.

एक वार्ताकार की नियुक्ति- और यहां तक कि उन्होंने इस बात से इनकार किया है कि वे वार्ताकार हैं- दिनेश्वर शर्मा की नियुक्ति एक ध्यान भटकानेवाली चाल है, जिसका मकसद एक वर्ग को खुश या तुष्ट करना है, जो यह कहता है कि ‘आप वार्ता क्यों नहीं कर रहे हैं?’ सेना प्रमुख और पीएमओ के राज्य मंत्री को सुनने के बाद मुझे नहीं लगता कि इन महानुभाव को वहां की अवाम के सभी तबकों के साथ अर्थवान बातचीत करने का अधिकार दिया गया है.

जब वे बात करेंगे, तब पता चलेगा कि वे बात भी कर पाए कि नहीं.

चतुर्वेदी: लेकिन, यह देखते हुए कि कश्मीर में क्या हो रहा है, पेलेट गन और मेजर (लीतुल) गोगोई द्वारा एक वोटर को जीप के साथ बांधने की घटना और इस तरह के उन्मादी राष्ट्रवाद और (विश्वविद्यालय) परिसरों में जो हो रहा है- जेएनयू पर राष्ट्रद्रोही होने का ठप्पा लगा दिया गया…आप इन सारी चीजों को किस तरह से देखते हैं?

चिदंबरम: मुझे लगता है कि कश्मीर पर सरकार की नीति पूरी तरह से भटकी हुई है. हकीकत ये है कि कश्मीर में हालात इतने खराब हैं, जितने कभी नहीं हुए. यह 2011 से भी कहीं ज्यादा खराब है. 2011 से लेकर 2015 के मध्य तक यानी एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद- किए गए सारे अच्छे कामों को  पिछले दो वर्षों में गंवा दिया गया है.

चतुर्वेदी: क्या आप इसके लिए चिंतित हैं?

चिदंबरम: निश्चित तौर पर. कश्मीर में जो हो रहा है उससे मैं काफी चिंतित हूं और जम्मू-कश्मीर के लोगों से हमारी मुलाकात नियमित तौर पर होती है. मुझे लगता है कि घाटी में एक भीषण उत्तेजना है. इस वर्तमान सरकार का रास्ता बिल्कुल दिशाहीन और गलत है, जो हमें एक फिसलनभरी ढलान की ओर लेकर जाएगा.

वार्ताकार की इस नियुक्ति से हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सरकार के हृदय में परिवर्तन हुआ है. मुझे यह यकीन नहीं है कि उनके हृदय या उनके रुख में कोई बदलाव हुआ है. मैं अभी भी यह यकीन करता हूं कि उन्होंने अपनी आक्रामक नीति छोड़ी नहीं है और यह (नीति) सैन्य समाधान की है.

राहुल गांधी

Vadodara: Congress vice-president Rahul Gandhi addresses a public meeting during his road show at Karjan village in Vadodara on Tuesday. PTI Photo (PTI10_10_2017_000070B)

वड़ोदरा की एक चुनावी रैली में राहुल गांधी (फोटो: पीटीआई)

चतुर्वेदी: आखिरी सवाल. भारत को एक विपक्ष की बेहद शिद्दत से दरकार है. वैसे तो, हर लोकतंत्र को एक विपक्ष की जरूरत होती है, लेकिन इस वक्त हमें इसकी सचमुच जरूरत है.आपकी पार्टी को पिछली बार 44 सीटें मिलीं और अब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने वाले हैं. क्या हमें आखिरकार एक कायदे का विपक्ष मिलनेवाला है या वे जैसा कि भाजपा कहती है, एक असफल वंशवादी साबित होनेवाले हैं?

चिदंबरम: हम विपक्ष हैं. देश में सिर्फ दो पार्टियां हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच रखती हैं- एक है कांग्रेस, दूसरी है भाजपा. कोई भी इस देश के हर हिस्से, हर शहर और हर गांव से कांग्रेस के कदमों के निशान को नहीं मिटा सकता है. हां, यह सही है कि पिछले चुनावों में जनता ने कांग्रेस को सिर्फ 44 सीटे दीं. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि वे फिर कांग्रेस को वोट नहीं देगी.

हमें लोगों को यह समझाना है कि भाजपा शासन रोजगार विहीन विकास (जॉबलेस ग्रोथ) को लेकर आया है. वे विकास और विकास की बात करते हैं. यह रोजगार के बगैर विकास है. ग्रामीण क्षेत्रों में विकास थम गया है.

हमें लोगों को यह समझाना है कि भाजपा जिस तरह का यह शासन कर रही है,  वह सिर्फ उन ताकतों को मजबूती देती है, जो देश को बांटते हैं और उस तरह का विकास लेकर नहीं आते, जिसकी हमें जरूरत है.

हंगर इंडेक्स में हमारे स्थान को देखिए. हमारे देश में कुपोषण के स्तर को देखिए. हमारे देश में वंचितों की संख्या को देखिए. उन लोगों की शिक्षा को देखिए, जिन्हें अच्छी प्राथमिक शिक्षा नहीं मिली है. बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित लोगों की संख्या को देखिए.

मैं यह आरोप नहीं लगा रहा हूं कि यह सब 2014 के बाद हुआ है. मैं यह कहना चाह रहा हूं कि इन चीजों में सुधार लाने के प्रयास हमेशा से होते रहे हैं और हकीकत ये है कि चीजों में सुधार हुआ है.

2014 के बाद इनमें सुधार लाने की कोई कोशिश नहीं हुई है. स्थिति और खराब हुई है. 2014 में हंगर इंडेक्स में हमारा स्कोर 17 था और आज यह 31 है. इसका कारण ये है कि आपने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की उपेक्षा की और इसे लागू करने से इनकार कर दिया. कल्पना कीजिए, अगर मनरेगा को भी दफना दिया जाता, जैसी की धमकी दी गई थी, तो क्या होता? इससे किस तरह की गरीबी पैदा होती, इसकी कल्पना कीजिए.

चतुर्वेदी: मोदी ने कहा था कि वे इसे ‘शर्म (असफलता) के स्मारक के तौर पर रख रहे हैं.

चिदंबरम: शर्म के स्मारक! भगवान का शुक्र है कि मनरेगा अपनी जगह पर है. लेकिन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू नहीं किया गया, यही कारण है कि इतनी भूख है, इतना कुपोषण है. इसी तरह से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर ब्रेक लगा दिया गया.

इसी तरह से शिक्षा का आधिकार, जिसे हमने पारित किया था, भी लागू नहीं किया गया है. इसलिए, देश को आगे ले जाने के बजाय- 60 सालों में देश आगे गया, हां, हो सकता है कि इसने छोटे-छोटे डग भरे हों, हो सकता है कि आगे बढ़ने के रास्ते में यह लड़खड़ाया हो, लेकिन कम से कम गति की दिशा आगे की ओर थी.

आज मुझे ऐसा नहीं लगता कि हम आगे की ओर बढ़ रहे हैं. हकीकत यह है कि हम  मायनों में पीछे की ओर जा रहे हैं. कई क्षेत्रों में ऐसा लगता है कि प्रगति रुक गई है. यही कारण है कि मैंने यह कहा कि भाजपा ने सरकार का जो मॉडल अपनाया और लागू किया है, वह पीछे की ओर ले जानेवाला है. इसने प्रगति पर विराम लगा दिया है और कई तरह से एक गिरावट लेकर कर आया है.

चतुर्वेदी: लेकिन, कई लोग यह सवाल पूछते हैं कि क्या राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर सकते हैं, जो एक जबरदस्त वक्ता हैं, जिनमें पैनापन है और जो सतत प्रचार की मुद्रा में रहते हैं. दूसरी तरफ आपके नेता, भाजपा उन्हें एक असफल वंशवादी कहती है और कहती है कि वे पूरी तरह से शामिल नहीं होते. और आपको यह कभी यह पता नहीं होता कि वे कब कहीं के लिए उड़ान भर देंगे?

चिदंबरम: मैं इस ‘वंशवाद’ वाले सवाल का जवाब देना चाहता हूं क्योंकि इसका इस्तेमाल एक से ज्यादा बार किया गया है.

चतुर्वेदी: स्मृति ईरानी उन्हें एक असफल वंशवादी कहती हैं.

चिदंबरम: 1989 से किसी संवैधानिक पद को संभालने वाला नेहरू-गांधी परिवार का आखिरी सदस्य कौन है? पिछले 28 सालों में नेहरू-गांधी परिवार का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं रहा है, जिसने मंत्री या किसी अन्य संवैधानिक पद को संभाला हो.

28 सालों में 6-7 प्रधानमंत्री रहे. कई मंत्री बने. कई सरकारें बनीं. इसलिए यह दलील देना कि एक ही वंश ही इस देश को चला रहा है, अपने आप में बेहद मूर्खतापूर्ण है. और हमें इस इस ओछे और मूर्खतापूर्ण दलील को देना बंद कर देना चाहिए. सवाल है कि वाजपेयी भी एक अच्छे वक्ता थे. मेरा मानना है कि वे वर्तमान प्रधानमंत्री की तुलना में कहीं ज्यादा असरदार वक्ता थे. और वे विशाल हृदय वाले व्यक्ति थे.

वे असलियत में बेहद संवेदनशील थे और कोई उन पर मतदाताओं को बांटने या ध्रुवीकृत करने का आरोप नहीं लगा सकता है. और हर किसी को यह लगता था, और मैं यह स्वीकार करता हूं कि 2004 में मैंने भी यह सोचा था कि चुनाव में भाजपा की जीत होगी. मीडिया ने भाजपा के लिए जबरदस्त जीत की भविष्यवाणी की थी. लेकिन, भाजपा हार गई. मुझे यह नहीं लगता कि आप 18 महीने बाद होनेवाले चुनावों के परिणामों की भविष्यवाणी नहीं कर सकते.

हम प्रयास कर रहे हैं. हम एक वैकल्पिक तर्क सामने रख रहे हैं. गवर्नेंस का वैकल्पिक मॉडल सामने रख रहे हैं. हम अपने रिकॉर्ड से ताकत ले रहे हैं. हां, गलतियां हुई हैं, लेकिन हम अपने रिकॉर्ड को सामने ला रहे हैं. हमारा रिकॉर्ड कुछ धब्बों के साथ अच्छा रिकॉर्ड है. हमारे रिकॉर्ड का सबसे अहम पहलू यह है कि 10 सालों में हमने 14 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है.

इस रिकॉर्ड को देखते हुए, मेरा यकीन है कि भारत के लोग कांग्रेस पार्टी में अपना भरोसा फिर से जताएंगे या जताना जारी रखेंगे. अगर वे ऐसा नहीं करते, तो हम विपक्ष में बैठेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं, तो हम सरकार बनाएंगे. लेकिन यही लोकतंत्र है. मुझे नहीं लगता कि यह ज़िंदगी और मौत का सवाल है. यह भारत के लोगों को समझाने का मामला है.

चतुर्वेदी: धन्यवाद

(स्वाति चतुर्वेदी पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं.)

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Categories: भारत, राजनीति, विशेष

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