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न्यायाधीशों के नाम पर घूस के आरोप बेहद गंभीर: सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, वह जो भी हों, कितने भी शक्तिशाली हों, कानून से नहीं बच सकते हैं और न्याय होगा.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के नाम पर घूस लेने के आरोपों को बेहद गंभीर बताया और जोर देकर कहा कि किसी को भी न्याय के प्रवाह को अशुद्ध करने की इजाजत नहीं दी जाएगी.

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा वह जो भी हों, कितने भी शक्तिशाली हों, कानून से नहीं बच सकते हैं और न्याय होगा. न्यायमूर्ति एके सीकरी और अशोक भूषण की पीठ ने कहा कि कोई भी इस मामले के महत्व को कम नहीं कर सकता क्योंकि आरोप बेहद गंभीर हैं और इन पर विचार करने की जरूरत है.

पीठ ने कहा, सीबीआई ने छापे मारे हैं और मामला दर्ज हो चुका है. कोई भी इस मामले के महत्व को कम नहीं कर सकता. यह बेहद गंभीर मामला है. हमारा प्रयास है कि कोई भी न्याय के प्रवाह को अशुद्ध न करे. वह जो भी हो, कितना भी शक्तिशाली हो, कानून से नहीं बच सकता. न्याय देने की जरूरत है.

याचिकाकर्ता गैर सरकारी संगठन कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण से पीठ ने कहा कि जिस तरह से मामले को उसके समक्ष सूचीबद्ध किया गया, वह पीड़ादायी है.

न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा, जब आठ नवंबर को इस मामले का जिक्र हो चुका था और इसे उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया जा चुका था, तब अदालत संख्या 2 में गुरुवार को दूसरी याचिका लगाये जाने की क्या आवश्यकता थी. आप मुझे बता सकते थे और अगर संभव होता तो मैं इससे खुद को अलग कर लेता. आप मुझे जानते हैं.

भूषण ने कहा कि उन्हें अधिक दुख हुआ क्योंकि आठ नवंबर को रजिस्ट्री ने उन्हें सूचित किया था कि जिस मामले को अदालत संख्या 2 में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था, उसे एक दूसरी पीठ को सौंप दिया गया है क्योंकि प्रधान न्यायाधीश ने इस बाबत पहले ही आदेश दिया था.

पीठ ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश यह फैसला करते हैं कि किस पीठ के समक्ष कोई मामला सूचीबद्ध किया जाएगा.

पीठ ने कहा, इस मामले की व्यापक और समुचित जांच होनी चाहिए. इस बात की पड़ताल किए जाने की जरूरत है कि सीबीआई को जांच जारी रखने की इजाजत दी जाए या जैसा कि आपने अनुरोध किया है एसआईटी को इजाजत दी जाए.

भूषण ने कहा कि अदालत ने एक संविधान पीठ से सुनवाई का आदेश दिया है, इसलिए और क्या मांगा जा सकता है…आप (न्यायमूर्ति सीकरी) उस पीठ का हिस्सा हो सकते हैं.

न्यायमूर्ति सीकरी ने इस पर कहा, मेरी इसमें रुचि नहीं है. अगर आप कहें तो मैं उस पीठ से खुद को अलग कर सकता हूं.

इस बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस सूरी तथा सचिव गौरव भाटिया ने कहा कि एसोसिएशन इस मामले में पक्ष बनना चाहती है. भूषण ने कहा कि वह एससीबीए की अर्जी के खिलाफ नहीं हैं लेकिन इस बाबत उचित आवेदन दायर किया जाना चाहिए.

पीठ ने हालांकि सूरी और भाटिया के मौखिक अनुरोध पर एसोसिएशन को एक पक्ष मान लिया और मामले को पहले की याचिकाओं के साथ जोड़ दिया. इन याचिकाओं पर 13 नवंबर को उच्चतम न्यायालय की पांच सर्वाधिक वरिष्ठ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ सुनवाई करेगी.

गौरतलब है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो की एक प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और अन्य लोगों ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश से संबंधित मामल में शीर्ष अदालत में अपने पक्ष में निबटारा कराने का आश्वासन देते हुए साजिश रची और इसके लिए रिश्वत के रूप में मोटी रकम मांगी. इस प्राथमिकी में उड़ीसा उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश को भी आरोपी के रूप में नामित किया गया है.

इस संबंध में उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी जिस पर न्यायालय ने यह मामला गुरुवार को संविधान पीठ को सौंप दिया. मामले में शीर्ष अदालत के पांच वरिष्ठतम न्यायाधीश सुनवाई करेंगे.

न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि उसके द्वारा 19 सितंबर को दर्ज की गई प्राथमिकी से संबंधित सामग्री और दस्तावेज सुरक्षित रखें जाएं.

कोर्ट ने कहा कि जांच ब्यूरो को 13 नवंबर को सीलबंद लिफाफे में ये दस्तावेज और संबंधित सामग्री संविधान पीठ के समक्ष पेश करनी चाहिए.

शीर्ष अदालत ने याचिका पर केंद्र और सीबीआई को नोटिस जारी किया है. उक्त याचिका में इस मामले की जांच के लिए शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल गठित करने और उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी निगरानी करने का अनुरोध किया गया है.