विज्ञान

एक भारतीय ने विमान उड़ाने की ‘कोशिश’ की थी, आविष्कार नहीं

‘प्राचीन तकनीक’ को अगर पाठ्यक्रम में शामिल करना ही है, तो इसके पीछे मक़सद मेहनत की भावना को जगाना होना चाहिए. आज किसी शिवकर बापूजी तलपड़े को कोशिश करने और नाकाम होने की छूट होनी चाहिए.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. (फोटो साभार: यूट्यूब वीडियो)

सफलता एक विचित्र चीज है. यह उद्यमशीलता की एक लंबे और संघर्ष से भरे सफर का बस एक लम्हा है. यह सचिन तेंदुलकर का 99 शतकों के बाद बनाया गया सौवां शतक है. 99 शतक इससे बाहर हैं.

यह थॉमस एडिसन और उनके सहयोगियों का प्रसिद्ध चमकदार बल्ब है. जगमगाहट के इस क्षण के आने से पहले सही सामग्री की तलाश में 6,000 से ज्यादा बार की गई कोशिशें याद नहीं की जातीं.

कामयाबी, धैर्य की मोमबत्ती की क्षणिक चमक है, जिसके बाद वह स्थिर होकर जलती रहती है और आहिस्ता-आहिस्ता रोशनी बिखेरती रहती है. उस क्षण के बाद मोमबत्ती की लौ को बुझा देना चमक के लिए तो अच्छा हो सकता है, लेकिन यह मोमबत्ती के साथ नाइंसाफी होगी.

मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह का यह कहना कि भारतीय इंजीनियरों को उस भारतीय की कहानी पढ़ाई जानी चाहिए, जिसने राइट बंधुओं से आठ साल पहले हवाई जहाज उड़ाने का कारनामा कर दिखाया था, वास्तव में उस मोमबत्ती को ही बुझाने की कोशिश करने की तरह है.

भारतीय श्रेष्ठता की चाहत ने उनकी आंखों पर इस तरह पट्टी बांध दी है कि एक भारतीय द्वारा 1895 ईस्वी में हवाई जहाज उड़ाने की बात पर उनका टेप रिकॉर्डर अटक गया है जबकि मुमकिन है कि ऐसी किसी घटना का कोई अस्तित्व ही न हो.

वे इन बातों को नजरअंदाज कर देते हैं कि ऐसी किसी घटना की बुनियाद में काफी मेहनत लगी होनी चाहिए. साथ ही ऐसी सफलता अपने साथ शाबाशियां भी लेकर आती हैं.

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सत्यपाल सिंह (फोटो: पीटीआई)

यहां जिस मुंबईकर की बात की जा रही है, उनका नाम शिवकर बापूजी तलपड़े है. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक तलपड़े ने शहर के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में बतौर इंस्ट्रक्टर काम करते हुए इस हवाई जहाज का निर्माण किया.

ऐसा मालूम पड़ता है कि वे हिंदू मिथकों- भारद्वाज ऋषि द्वार रचित ‘विमानिका शास्त्र’ में आए विमानों के कथित वर्णनों से प्रभावित थे और वैसा ही विमान बनाना चाहते थे. किस्से-कहानियों के आधार पर तैयार किए गए अपनी रिपोर्ट में वास्तुविद्-इतिहासकार प्रताप वेलकर कहते हैं कि जिस दिन इस विमान को उड़ाया जाना था, उस दिन कम ही लोग दर्शक के तौर पर मौजूद थे.

हालांकि, डेक्कन क्रॉनिकल में केआरएन स्वामी नाम के एक लेखक की एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूद दर्शकों में उस समय बड़ौदा के राजा भी शामिल थे.

अंतिम परिणाम के हिसाब से इस अंतर्विरोध को मामूली कहा जा सकता है. वेलकर और स्वामी दोनों कहते हैं कि तलपड़े का विमान कुछ समय के लिए हवा में रहा था और जमीन पर आने से पहले इसने 1,500 फीट ऊंचाई तक उड़ान भरी.

इस कारनामे को अंजाम देने के लिए मरकरी (पारा) वोर्टेक्स इंजन का इस्तेमाल किया गया. यह मरकरी यानी पारे का एक ड्रम था, जो सूर्य की रौशनी के संपर्क में आने पर हाइड्रोजन छोड़ता था और जहाज को ऊपर की ओर उड़ाता था.

यह जानना दिलचस्प होगा कि पारा सूर्य की रौशनी के साथ किसी किस्म की प्रतिक्रिया नहीं करता है. ये बात जरूर है कि यह सूरज की रोशनी से प्रेरित रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भागीदारी कर सकता है. लेकिन यह ऑक्सीजन के साथ बहुत थोड़ी मात्रा में प्रतिक्रिया करता है.

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शिवकर बापूजी तलपड़े. (फोटो: विकीपीडिया)

इसलिए यह साफ नहीं है कि प्लेन को हवा में उड़ाने के लिए जिस हाइड्रोजन की बात की गई है, वह आखिर आया कहां से? इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने लेख में स्वामी ने यह दावा किया है कि तलपड़े का विमान इतने बल (थर्स्ट) को जन्म देने में कामयाब हुआ कि इसने 200 किलोग्राम के विमान को हवा में उड़ा दिया और उसे 1,500 फीट की ऊंचाई तक ले गया.

वेलकर इससे इनकार करते हैं. अंत में वेलकर और स्वामी दोनों ने एक स्वर में यह कहा है कि यह चालकरहित विमान था. लेकिन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा है कि तलपड़े ने इस विमान को खुद उड़ाया. लेकिन उनके ऐसा कहने का कोई आधार नहीं है.

इन और दूसरी कहानियों को पूरी तरह से खारिज किया जा चुका है- खासकर पश्चिम की वैज्ञानिक परंपराओं के द्वारा. लेकिन सत्यपाल सिंह उनकी बात मानने को तैयार नहीं हैं. इसे खारिज करने का अकाट्य तर्क यह है कि अगर कोई तलपड़े के सिद्धांत पर हवा में उड़नेवाला विमान बनाना चाहे, तो उसे ऐसा करने में कामयाबी मिलनी चाहिए. लेकिन ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं हो सका है.

ये सारी बातें, एक जरूरी तथ्य को दरगुजर कर देती हैं. वेलकर के मुताबिक 1895 की एक अज्ञात तारीख को तलपड़े द्वारा अपने विमान का प्रदर्शन किए जाने के बाद वे दूसरा विमान बनाने के लिए न तो बड़ौदा के राजा, न ही किसी व्यवसायी से फंड जुटा पाने में कामयाब हो पाए.

इस कार्य में सरकार की तरफ से उन्हें कोई मदद नहीं मिली. आखिरकार जब वेलकर तलपड़े द्वारा लिखित रिसर्च पेपर तक पहुंच पाने में कामयाब रहे, जो जीएच बेडकर नामक एक वैज्ञानिक के पास था, तो बेडकर ने उन्हें बताया कि इस पेपर से यही पता चलता है कि तलपड़े अपने प्रयासों में नाकाम रहे थे.

हमें अपने छात्रों को यह नहीं सिखाना चाहिए कि तलपड़े ने विमान उड़ाया था. ठोस प्रमाणों की गैरहाजिरी में हमें यह भी नहीं पढ़ाना चाहिए कि वे कामयाब रहे थे, क्योंकि इस सफलता को लेकर विवाद है.

हमें उन्हें यह सिखाना चाहिए कि तलपड़े ने कोशिश की थी, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है. हमारे अज्ञान के अंधकार में एक ऐसी मोमबत्ती का निर्माण करना निरर्थक है, जो क्षणभर के लिए जगमगाकर बुझ जाता है और विवाद को जन्म देता है. हमें अपने छात्रों को ऐसी मोमबत्ती का निर्माण करने के लायक बनाना चाहिए, जो जलती रहती है, बुझती नहीं है.

जैसा कि विज्ञान के इतिहासकार अपराजित रामनाथ ने द वायर में लिखा था, ‘(शोध) को प्राथमिकता की लड़ाई में महदूद कर देना जटिल पोट्रेट को भौंड़े स्केच से बदल देने जैसा है.’

‘प्राचीन तकनीक’ को अगर पाठ्यक्रम में शामिल करना ही है, तो इसके पीछे मकसद जीवट और उद्यमशीलता की भावना को जगाना होना चाहिए. आज किसी शिवकर बापूजी तलपड़े को कोशिश करने और नाकाम होने की छूट होनी चाहिए. बजाय इसके कि नाकामी जीवन भर के लिए उसमें निराशा भर दे.

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि अच्छा शोध वैश्विक धरोहर होता है, जो अमूल्य है. मिसाल के लिए, अलग-अलग प्रयोगशालाओं में काम करने वाले दो वैज्ञानिक अपने प्रयोगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली वैज्ञानिक पद्धति से जुड़े होते हैं.

अपनी अलग मूल्य-प्रणाली का निर्माण करने के लिए इस संबंध को दरगुजर करना, हमें कहीं नहीं लेकर जाएगा. न इससे हमें अपने अतीत को बेहतर तरीके से जानने में मदद मिलेगी, न ही अपने भविष्य को आकार देने में ही यह हमारा मददगार साबित होगा. इसलिए यह स्वीकार करना कि आॅरविल और विल्बर राइट ने 1903 में पहली बार एक विमान उड़ाया था, एक तार्किक बात है.

वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा आज भी इस बात को इसलिए स्वीकार किया जाता है, क्योंकि उस विमान का फिर से निर्माण किया जा सकता है. यह विमान उसी तरह से उड़ान भरेगा, जैसा वर्णन राइट बंधुओं और इतिहासकारों ने किया है.

ऐसा विमान उन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होगा, जिन्हें कई बार प्रमाणित किया जा चुका है. इसलिए यह कहना कि यह प्राचीन भारतीय ज्ञान पर जाली ढंग से आधिपत्य जमाता है, गलत धारणा है.

दरअसल ऐसा नहीं है. इसी बिंदु पर पश्चिम की वह मिथ्या आलोचना छिपी है, जिसे आधुनिक, उत्तर-औपनिवेशिक भारत के एक हिस्से के दिमाग में भरा गया है.

‘सफलता’ की एक विमान के तौर पर व्याख्या करना, जिसने हजारों साल पहले के प्राकृतिक नियमों के अनुसार उड़ान भरी थी और ‘सफलता’ को वैश्विक पटल पर रिसर्च की गुणवत्ता में सुधार के तौर पर व्याख्या करना, दरअसल आज उस अंतर्द्वंद्व को बयां करता है, जिससे सिंह और उनके जैसे लोग बाहर निकल पाने में नाकाम रहे हैं.

यही वह अंतर्द्वंद्व है, जो भारत को अतीत के ज्ञान देने वाले से आधुनिक ज्ञान लेने वाले में तब्दील होने से रोकता है. यही वह अंतर्द्वंद्व है, जिसे एक इतिहासकार आसानी से वर्तमान में अतीत का अक्स खोजने की आदत कह कर खारिज कर देंगे.

हमें ग्रहण करने के मामले में सहज बनना पड़ेगा, ताकि हम एक बार फिर से देने वाले बन सकें. हम लोग अतीत से उस दुनिया को कुछ नहीं दे सकते हैं, जो काफी आगे बढ़ चुकी है.

इसी के साथ, भारत के रिसर्च आउटपुट को बेहतर करने के लिए, मात्रा और गुणवत्ता दोनों की दृष्टियों से, एक ऐसे राज्य की दरकार है, जो घटित होने वाले बदलावों को स्वीकार करे. इसके लिए एक ऐसे राज्य की जरूरत है जो अंतरराष्ट्रीय करारों का पालन करने वाले रिसर्चों के लिए पर्याप्त फंड मुहैया कराए और जो यह सुनिश्चित करे कि ऐसे फंड रिसर्च करने वालों तक समय पर पहुंचे और उनका सही तरीके से उपयोग किया जाए, बजाय इसके कि प्रतिभाएं उस तरह गुमनामी के अंधेरे में समा जाएं, जैसे तलपड़े समा गए.

इसके लिए एक ऐसे राज्य की जरूरत है, जो शोध के पकने का इंतजार करने के लिए तैयार हो, जो चमक के क्षण के आने से पहले मोमबत्तियों के जलने के महत्व को समझता हो और चमक के न होने पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ता, असंतोष का प्रदर्शन नहीं करता.

अगर सत्यपाल सिंह जैसी सोच प्रमुखता हासिल करती है, तो भारत को अंधकार के एक लंबे दौर के लिए तैयार रहना चाहिए.

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