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18वें साल में झारखंड: क्या भूख और कुपोषण से जीतकर राज्य विकास की नई इबारत गढ़ सकेगा?

ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार से अलग राज्य बनने के बाद लगा था कि झारखंड आर्थिक समृ़द्धि की नई परिभाषाएं गढ़ेगा लेकिन 17 साल बाद भी राज्य से कथित भूख से मरने जैसी ख़बरें ही सुर्खियां बन रही हैं.

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झारखंड की राजधानी रांची में जगह-जगह लगे होर्डिंग में सरकार के लुभावने वादे. (फोटो: नीरज सिन्हा)

अगर आप झारखंड की राजधानी रांची में हैं तो राज्य स्थापना दिवस समारोह की सरकारी तैयारियां एकटक निहार सकते हैं. बड़े-बड़े होर्डिंग्स, सड़कों पर रंगरोगन.

सरकारी भवनों और मुख्य समारोह स्थल पर लट्टू की तरह नाचती रंग-बिरंगी बत्तियां. सत्ता में काबिज बीजेपी के राजनेताओं के कटआउट के साथ वादे-दावों के स्लोगन यह अहसास कराने की कोशिश करेंगे कि अलग राज्य की खुशियां, उत्साह, उमंग से जनता सराबोर है.

लेकिन राजधानी से कुछ किलोमीटर फासले पर गांवों-कस्बों और आदिवासी, दलित इलाकों की जमीनी हालात की पड़ताल करेंगे तो निराशा- हताशा के स्वर सुनाई पड़ेंगे. भूख, गरीबी, बेरोजगारी, बेबसी, बीमारी, पलायन, जल, जंगल, जमीन पर बढ़ते खतरे ये सवाल करेंगे कि बिरसा की धरती में उनके उलगुलान (आंदोलन या विद्रोह) के सपने कब साकार होंगे.

15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जंयती है. लंबे संघर्ष और आंदोलन के बाद साल 2000 में इसी पंद्रह तारीख को बिहार से बंटवारे के बाद झारखंड अलग राज्य बना था.

अलग राज्य बनने के बाद हर किसी ने यही सोचा था अब खुशियां, उम्मीदें, आकांक्षाओं के पंख लगेंगे. लेकिन भोगौलिक और प्रशासनिक अधिकार मिलने के बाद भी संतुलित, समग्र विकास और बेहतर भविष्य के भरोसे पर संशय के भाव नजर आते हैं.

हालांकि इन दिनों शासन का एक स्लोगन पर जोर हैः  ‘हो रहे हैं सपने साकार, ये है रघुबर सरकार’.  सरकार ने बताया है कि स्थापना दिवस समारोह के साथ 2500 करोड़ की योजनाएं प्रारंभ होगीं तथा जरूरतमंदों के बीच पांच हजार करोड़ की परिसंपत्तियां बांटी जाएगीं. राजधानी के मोराबादी मैदान में होने वाले इस समारोह में देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद शिरकत करेंगे.

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15 नवंबर को रांची में सरकारी समारोह की तैयारी की एक झलक. (फोटो: नीरज सिन्हा)

इन्हीं खुशियों में अलग-अलग जगहों पर नई परियोजनाओं के आधारशिला रखने और वादों-घोषणाओं का सिलसिला भी जारी है. खूंटी में सरकार ने रक्षा विश्वविद्यालय तथा धनबाद में एक नए विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया है. मुख्यमंत्री का कहना है कि शिक्षा समेत अन्य क्षेत्रों में 50 हजार नियुक्तियां शीघ्र होगीं.

इनके अलावा पंद्रह नवंबर को जिन योजनाओं की शुरुआत को लेकर बीजेपी सरकार जोर-शोर से प्रचार कर रही है उनमें मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना, 108 एंबुलेंस योजना, जोहार कार्यक्रम प्रमुखता से शामिल है. सरकार का दावा है कि ये योजनाएं गरीबों की जिंदगी में बहार लेकर आएगी. जाहिर है समारोह को लेकर बीजेपी में उत्साह है.

बीजेपी का शासन

अलग राज्य के 17 सालों में यहां लगभग बारह साल भाजपा और भाजपानीत सरकारें रहीं. हालांकि अक्सर बीजेपी खेमे से ये बातें निकलती रही है कि पूर्व में गठबंधन की वजह से सरकार चलाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. अब बीजेपी और सरकार दोनों यह दावा कर रही हैं कि झारखंड में पूर्ण बहुमत की सरकार होने से विकास का पहिया भी तेज घूम रहा है.

तो कितना बदला

मुख्यमंत्री रघुबर दास दावा करते रहे हैं कि उनकी सरकार बेदाग होने के साथ लगातार जनहितों पर सशक्त फैसले लेती रही है.

सरकार को इसका भी गुमान है कि झारखंड का विकास दर बढ़कर 8.6 प्रतिशत हो गया है, जो गुजरात के बाद देश में दूसरे नंबर पर है तथा 2015-16 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 62 हजार 818 रुपये हो गई है.

सड़क निर्माण के साथ आधारभूत संरचना खड़े करने में तीन सालों में जितने काम हुए वे पहले 14 साल में नहीं हो सके. विकास की यही रफ्तार रही, तो अगले पांच साल में राज्य देश का समृद्ध, सशक्त राज्य होगा. गरीबी मिट जाएगी और कोई बेघर नहीं होगा. उन्होंने ये भी कहा है कि इस साल के अंत तक राज्य से उग्रवाद खत्म होगा.

लेकिन राज्य सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट यह बताती है कि पांच सालों में विकास दर के आकड़े बढ़ते रहे हैं लेकिन अब भी प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से राष्ट्रीय औसत के करीब आने में झारखंड को 18 साल लगेंगे.

आम आदमी को राहत नहीं देते

कई विषयों के जानकार झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार रजत कुमार गप्ता कहते हैं कि राजधानी में बड़े समारोह और आंकड़ों की बाजीगरी आम आदमी के जीवन में राहत नहीं पहुंचाते. सच यह है कि बड़े समारोह कर सरकार और उनके लोग खुद को खुश कर रहे हैं. जबकि बीजेपी में शीर्ष पर बैठे लोगों को भी जमीनी हालात का पता है.

लेकिन केंद्रीय नेता और मंत्री अक्सर राज्य सरकार के कामकाज पर पीठ थपथपाते रहे हैं, इस सवाल पर गुप्ता कहते हैं कि ये राजनैतिक मजबूरियां हो सकती है.

रजत गुप्ता का कहना है कि बेशक छोटे और नए राज्य की अवधारणा विकास, सुशासन और उम्दा कार्यसंस्कृति की गारंटी हो सकती है, लेकिन झारखंड इस पैमाने पर विफल रहा है. यह ठीक है कि पहले गठबंधन की सरकार में कई किस्म की अड़चनें आती रही, लेकिन अब सशक्त सरकार होने के बाद भी नौकरशाही नियंत्रण से बाहर है.

वे कहते हैं कि तीन साल में परिवर्तन को लेकर जितने दावे किए जा रहे हैं, उससे दस गुना बेहतर काम हो सकता था. यही वजह है कि भूख से होने वाली मौतों को स्वीकारने की स्थिति में सरकार नहीं है.

अब चलिए ग्राउंड पर

द वायर के लिए हम बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू और आसपास के कई सुदूर गांवों में आदिवासियों से रूबरू हुए.

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झारखंड के खूंटी जिले के रूगड़ी गांव में नंदी अपने बच्चों के साथ. (फोटो: नीरज सिन्हा)

सुबह के आठ बजे हैं. उलिहातू जाने के रास्ते रूगड़ी गांव में एक आदिवासी महिला नंदी अपने कच्चे और धंसे मिट्टी के घर के बाहर सहजन के डंठल से साग निकाल रही थीं. बेटा कुंअर और बेटी बिरसी पानी में घुला बासी भात खा रहे हैं. नंदी बताती है कि यही तो रोज की जिंदगी है.

घर के अंदर झांकने भर से गरीबी-बेबसी जार-जार नजर आती रही.  बिजली, शौचालय, साफ पानी, दवाईयां, जूते- चप्पल और भरपेट भोजन इस परिवार के लिए सपने जैसा है. हालांकि सरकार की तरफ से बीस किलो अनाज इन्हें जरूर मिलते हैं.

नंदी बताने लगी कि उनके पति अचू मुंडा लकड़ी बेचने और दिहाड़ी पर काम करते हैं. इसी के सहारे वे किसी तरह जीवन बसर करते हैं. अक्सर भात और जंगली साग ही उनका निवाला होता है. शुक्रवार को सैको बाजार से आलू खरीदा गया था. उस रात पूरा परिवार भात और तरकारी खाकर खुश था. नंदी को अब जाड़े की रात बेहद डराने लगी है. दरअसल ओढ़ना और बिछौना के नाम पर उनके पास कुछ फटे-पुराने कपड़े हैं.

इस बीच जंगलों-पहाड़ों से गुजरते बिरसा के गीतों की स्वर लहरियां भी सुनाई पड़ती हैं. रास्ते में एक गीतों के बारे में पूछने पर युवा सनिका मुंडा बताते हैं कि पंद्रह तारीख को बिरसा का जन्म दिवस जो है. हम लोग उन्हें भगवान मानते हैं और अब भी उनके लौटने का इंतजार करते हैं.

अबुआ दिशुम, अबुआ राज (अपना देश, अपना राज)

सनिका बताने लगे कि इस इलाके के धरती पुत्रों को पता है कि पंद्रह नवंबर को ही झारखंड अलग राज्य बना था लेकिन अबुआ दिशुम, अबुआ राज ( अपना देस, अपना राज) की खुशियां कहीं गुम है.

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लातरडीह के आदिवासियों को बिजली और रोजगार का इंतजार. (फोटो: नीरज सिन्हा)

गौरतलब है कि इसी संदर्भ में तेरह नवंबर को रांची में एक कार्यक्रम में उलिहातू गांव और आदिवासियों की हालत पर चर्चा करते हुए राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने भी सहजता से कहा- सोचें, क्या झारखंड में अबुआ दिशुम और अबुआ राज है?

हालांकि सरकार ने उलिहातू पहुंचने के लिए चौड़ी और पक्की सड़कें बनवा दी है. वहां बिरसा कांप्लेक्स का भी निर्माण कराया गया है. बिजली पहुंचा दी गई है. इनके अलावा कई और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई है. लेकिन इन सबके बीच आदिवासियों के सीने में कसक है.

उलिहातू में ही बड़ी संख्या में गांव के पुरुष-महिलाएं, नौजवान परंपरागत तौर पर ग्राम सभा की बैठक करते दिखे. उनके हाथों में तख्तियां साफ ताकीद करती रही कि सरकार की नीतियों और रुख से वे आहत हैं.

मुखिया नेजन मुंडा और वार्ड सदस्य सामुएल पूर्ति बताते हैं कि पिछले सितंबर महीने में यहां बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत कई नेता आए थे, तब ग्राम प्रधान समेत पंचायत प्रतिनिधियों की उपेक्षा की गई थी.

बिरसा मुंडा के वंशज सुखराम मुंडा, नेलशन मुंडा, सुमन पूर्ति, फिलोमनी टोप्पो की चिंता है कि जल, जंगल, जमीन पर खतरे बढ़े हैं. पूरे गांव के लोग ये नहीं चाहते कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत चौदह नवंबर को बीजेपी के लोग बिरसा की धरती से मिट्टी ले जाने के लिए यहां आएं. सुखराम मुंडा और फिलोमनी टोप्पोइस बात पर गुस्सा जाहिर करते हैं कि आदिवासियों की जमीन लेने के लिए बीजेपी और सरकार बिरसा मुंडा के नाम को आगे कर राजनीति कर रही है. सच यह है कि उड़िहातू समेत बिरसा की धरती के लोग भाजपा और सरकार के रवैये से बेहद आहत हैं.

अपने करम पर जीते हैं

उलिहातू के बिल्कुल करीब लातरडीह और तुबिद गांव हैं. यहां पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं हैं. बिजली का इंतजार भी आदिवासी दशकों से करते रहे हैं.  तुबिद गांव के बुजुर्ग मोरा मुंडा मुस्कराते हुए पूछते हैं किसकी सरकार और कैसी सरकार. बस सरकार से अनाज मिल जाने से जिंदगी तो नहीं बदलती. वे लोग अपनी मेहनत और तकदीर के बूते जीते हैं.

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तुबिद गांव के आदिवासी बुजुर्ग मोगा. (फोटो: नीरज सिन्हा)

लातरडीह गांव की आदिवासी महिला पालो स्थानीय मुंडारी भाषा में कहती हैं कि सरकार के लोग बिरसा की जन्मस्थली तो आते रहते हैं लेकिन इस धरती के बारे में वे लोग जानने की कोशिश करते तो अच्छा होता.

वे लोग सीधे-भोले हैं लेकिन इतना तो समझते हैं कि सबको बिरसा के नाम से मतलब है उनकी धरती से नहीं.

आखिर क्या चाहती हैं आप, इस सवाल पर पालो कहती हैं कि बिजली, सड़क, शौचालय, पानी के लिए तरसना पड़े तो कैसा लगेगा आप ही बताएं?  रोजगार के लिए कम से कम बकरी पालन, शूकर पालन के अवसर तो दीजिए. हम उतने भर से खुश हो जाएंगे.

भोजन को तरसते बच्चे

हमारा अगला पड़ाव नामसीली गांव है. संजय मुंडा और उनकी पत्नी दुलू अपनी बेटी दिव्या के साथ खेत से काम कर लौट रहे हैं. दुलू को इसकी चिंता है कि पिछले तीन महीने से आंगनबाड़ी केंद्र में दिन का भोजन मिलना बंद है.

छानबीन करने पर पता चला कि पूरे राज्य में आंगनबाड़ी केंद्रों में कमोबेश यही स्थिति है. नामसीली गांव के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिलने और बिजली आने का भी इंतजार है.

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नामसीली गांव में संजय मुंडा, उनकी पत्नी दुलू और सनिका पाहन. (फोटो: नीरज सिन्हा)

सर्द हवाओं के बीच नंगे बदन सनिका पाहन भी खेतों से काम कर लौट रहे थे. बताया कि कई दफा बिजली के लिए आवेदन दिया लेकिन ना जाने सरकारी फाइलों में कहां गुम हो जाता है.

उनका कहना था पठारी इलाके में लोग खेतों में सिंचाई के लिए हाड़तोड़ मेहनत करते हैं. डाड़ी-चुआं से साझा तौर पर मेहनत कर वे लोग किसी तरह पानी लाते हैं. सिंचाई की कोई भी छोटी-बड़ी योजना जमीन पर नहीं उतरी है, लिहाजा दिहाड़ी खटना और खेती करना ही आदिवासियों का मुख्य पेशा है.

गौरतलब है कि झारखंड में 38 लाख हेक्टेयर जमीन खेती योग्य है और 17 सालों में अरबों खर्च करने के बाद भी 29 फीसदी इलाके में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकी है.

मनरेगा का दर्द

इन्हीं हालात के मद्देनजर भोजन के अधिकार, मनरेगा समेत कई विषयों पर काम करते रहे मशहूर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं कि झारखंड जैसे राज्य में मनरेगा मजबूती के साथ रोजगार मुहैया कराए और योजनाएं जमीन पर उतरे, इसकी खासी जरूरत है.

बकौल द्रेज मनरेगा में पहले से थोड़ा काम सुधरा जरूर है लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब भी बिचौलिये-ठेकेदार गठजोड़ से इसे मुक्त नहीं कराया जा सका है. लिहाजा जरूरतमंदों का हक अधिकार मारा जाता रहा है.

आंकड़े बताते हैं कि 2017-18 में राज्य में मनरेगा के 41.19 लाख जॉब कार्ड जारी किए गए हैं. इसके तहत कुल 76.32 लाख मजदूर हैं. लेकिन 20. 99 लाख जॉब कार्ड और 27. 25 लाख मजदूर क्रियाशील हैं. अलबत्ता प्रति हाउसहोल्ड को औसत 34.16 दिन रोजगार मुहैया कराए गए हैं. सौ दिन काम पूरे करने वाले परिवारों की संख्या महज 15 हजार 455 है.

इनके अलावा स्वास्थ्य, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम तथा रोजगार के क्षेत्र में तमाम कवायद के बाद भी हालत संतोषजनक नहीं हैं.

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हाल ही में बिरसा के गांव के प्रदर्शन करते आदिवासी. (फोटो: नीरज सिन्हा)

चिंता यह कि रांची में राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में रोज ढाई से तौन सौ मरीजों का इलाज फर्श पर होता है.

समारोहों पर उठते सवाल  

ऐसे हालात में सरकार द्वारा आयोजित जश्न और समारोह पर भी सवाल उठते रहे हैं. इस साल फरवरी महीने मेें देश-दुनिया के पूंजी निवेशकों को रिझाने के लिए राज्य सरकार ने मोमेंटम झारखंड कार्यक्रम का आयोजन किया था. इस आयोजन के प्रचार पर अकेले चालीस करोड़ खर्च किए गए थे.

अब राज्य को इसका इंतजार है कि पूंजी निवेश के नाम पर 3.10 लाख करोड़ के प्रस्तावों पर हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) धरातल पर कब तक उतरते हैं.

सितंबर महीने में सरकार के एक हजार दिन पूरे होने और इसके बाद अक्टूबर में माइनिंग-मिनरल्स समिट और अब अलग राज्य स्थापना दिवस समारोह के आयोजन में भारी तामझाम पर हर तबके में सवाल खड़े हो रहे हैं. हालांकि सरकार इसे उपलब्धियां गिनाती है.

केवल बड़े उद्योग

झारखंड चैंबर ऑफ कामर्स के पूर्व अध्यक्ष और उद्योग व वाणिज्य की अच्छी समझ रखने वाले विकास सिंह कहते हैं कि पहली दफा बहुमत की सरकार तो बनी लेकिन सरकार के मंत्रियों के पास अनुभव की बेहद कमी है.

यहां के छोटे उद्योगों को बचाना-बढ़ाना शायद सरकार भूल चुकी है. सच कहिए तो दे आर ओनली लुकिंग फॉर बिगर मॉडल (वे लोग सिर्फ बड़े मॉडल देख रहे हैं) और इनके पीछे जो दिमाग काम करते रहे हैं उन्हें राज्य के हितों से कोई लगाव नहीं है.

उन लोगों को दुख इसका होता है कि कोई सुनने को तैयार नहीं है. लगातार होते बड़े समारोह और जश्न के बरक्स इसे देखा जा सकता है. विकास सिंह कहते हैं कि हजारों करोड़ों के एमओयू तो पहले भी हुए, उनका क्या हश्र हुआ, राज्य ने देखा है. बिजली और सरकारी सिस्टम की हालत से लोग यहां वाकिफ हैं.

विपक्ष को मिला मौका  

इधर सरकारी समारोह और सरकार की नीतियों और रवैये के खिलाफ विपक्षी दलों ने मोर्चा खोल रखा है. इससे सियासत भी गर्म है.

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रांची में विपक्षी दल झामुमो का प्रदर्शन. (फोटो: नीरज सिन्हा )

12 नवंबर को राजभवन के सामने भाकपा माले ने बड़ी जनसभा की. इसमें भूख के सवाल पर हल्ला बोला गया. पार्टी के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य का कहना है कि जनता के पैसे की बर्बादी झारखंड में जिस तरह से हो रही है, वह लोगों के दुख को और बढ़ाती है.

इसके अगले ही दिन तेरह नवंबर को सभी विपक्षी दलों ने राजभवन के सामने सभा की और गांवों में सरकार की नातियों के खिलाफ साझा आंदोलन की हुंकार भरी.

पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी कहते हैं सरकार जश्न मना रही है और गावों में शोक है. जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय का कहना है कि कथित तौर पर भूख से होती मौतों, किसानों की आत्महत्या, आंदोलनों के खिलाफ पुलिस फायरिंग जैसे सवालों पर सरकार को समारोह में अपना पक्ष रखना चाहिए.

इसके अगले दिन 14 नवंबर को प्रमुख विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राजभवन के सामने ही भूमि अधिग्रहण के विरोध में बड़ी सभा करके सरकार पर हमले किए. पूर्व मुख्यमंत्री हेंमत सोरेन कहते हैं कि जनता के पैसे की बर्बादी कर सरकार झूठी सुर्खियां बटोरने में जुटी है.

जबकि बीजेपी के नेताव प्रवक्ता भी लगातार विपक्षी दलों के आरोपों पर पलटवार कर रहे हैं. लक्ष्मण गिलुआ, नीलकंठ सिंह मुंडा सरीखे प्रदेश के शीर्ष नेता कहते रहे हैं कि केंद्र और राज्य सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों से विपक्ष बेचैन है.

17 साल पूरे लेकिन सवाल और भी हैं

  1. गांवों में संस्थागत प्रसव अब भी सिर्फ 57. 3 फीसदी हो रहे हैं
  2. 6-23 महीने के 67 फीसदी बच्चों को ही पर्याप्त भोजन मिलता है
  3. पांच साल के 45 फीसदी बच्चे नाटे हैं
  4. 15-49 साल की 65.2 फीसदी महिलाएं एनिमिया से पीड़ित हैं

(स्रोत: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे- 4)

  1.  राज्य में 15.79 फीसदी आदिवासी और 19.62 फीसदी दलित परिवार एक कमरे के कच्चे मकान में रहते हैं
  2. आदिवासियों के 80 फीसदी तथा दलितों के 82 फीसदी परिवारों की आमदनी प्रति महीने पांच हजार रुपये से कम है.
  3. आदिवासियों में 53 फीसदी लोग मार्जिनल वर्कर हैं ( जिन्हें छह महीने से कम काम मिलता हैं)
  4. आदिवासी महिलाओं के बीच अब भी साक्षरता दर 46.2 प्रतिशत है.
  5. राज्य के ग्रामीण इलाकों में लगभग एक हजार स्वास्थ्य केंद्रों के अपने भवन नहीं हैं
  6. ग्रामीण इलाकों में जरूरत के हिसाब से 41 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है
  7. 63.6 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के कमरे नहीं हैं.
  8. 42 फीसदी रूरल हेल्थ सेंटर में बिजली नहीं. साथ ही 35.8 फीसदी स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है.

  ( स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2016- 17)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं)