प्रासंगिक

मेरा झारखंड बनना अब भी बाकी है

कई बार पत्र-पत्रिकाओं के लेख आपको बता सकते हैं कि हमारे सपनों का झारखंड सपने से भी आगे जा चुका है पर इस सपने की सच्चाई देखनी हो तो गांव की पगडंडी पर आइये.

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रांची के बिरसा चौक पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बिरसा मुंडा को श्रद्धा सुमन अर्पित किए. (फोटो साभार: फेसबुक/रघुबर दास)

जोहार. आज 15 नवंबर है. आज से 17 साल पहले ठीक आज ही के दिन करीब 11 बजे अपने सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची में इतिहास की कक्षा में बैठा था कि अचनाक मांदर और ढोल की थाप कान मे पड़ी. हम सब निकल के बाहर आये तो देखा प्रांगण मे छात्र-छात्राएं नाच रहे हैं.

पता चला इतिहास बन चुका है. नया राज झारखंड बन चुका था. ‘आबुआ दिशुम,आबुआ राज’ का सपना पूरा हो चुका था. सिर उठा के देखा तो आसमान मे आश्चर्यजनक रूप से एक इंद्रधनुष बन गया था. नीचे अबीर उड़ रहे थे. मेरे जैसे लड़कों के लिए वो अजीब भावुकता वाले उलझन का क्षण था.

सुबह जिस कक्षा मे एक बिहारी के रूप में घुसा था, अब बाहर आया तो मै झारखंडी हो चुका था. एक आंख बिहार के विरह में भीगी थी, दूसरी में झारखंड के लिए खुशी का पानी था. कभी नाचता कभी बैठ जाता. फिर खुद को समझाया कि क्या बिहार और क्या झारखंड.

ये बंटवारा नहीं, बस सुविधाओं के वितरण का नाम है. अपने अंदर के हिंदुस्तान को जगाया और अबीर उड़ाने लगा.

हर नया राज्य एक सपने के साथ निर्मित होता है और उसी को जीता है. झारखंड के निर्माण के पीछे भी तिलका मांझी, सिद्दु-कान्हु, चांद-भैरव, झुनी-फूलो, बिरसा, तेलंग खड़िया, शेख भिखारी, पांडेय गणपत राय और नीलांबर पीतांबर जैसे कई दीवानों का सपना था.

सपना था कि सदियों से हाशिये पर नंगे-भूखे रहे आदिवासियों का उत्थान हो, हर झारखंडी की उन्नति हो. ये काम सिर्फ आदिवासियों के लिए आदिवासियों के द्वारा नहीं होना था. इसमे एक एक झारखंडी का सपना, उसका खून, उसका पसीना शामिल था जो इस धरती पर जन्मे और इसी में मिल जाने वाले थे.

झारखंड को प्रकृति ने छप्पर फाड़ के उपहार दिया. दामन खनिजों से भरा, आंचल में नदी भरे, मस्तक पर पहाड़ गाड़े और छाती पर भरपूर जंगल उगाये. हमें बस अपना काम करना था और इन उपहारों का सही उपयोग और वितरण करना था.

आज 17 साल बाद उस झारखंड को देख रहा हूं. सपने अब भी सिरहाने पड़े हैं. खंड-खंड में बंटी राजनीति ने एक अखंड झारखंड में दो झारखंड गढ़ दिये. एक आदिवासियों का झारखंड, दूसरा गैर-आदिवासियों का झारखंड.

बांटना राजनीति का सबसे सबसे कारगार फार्मूला है और इसे यहां खूब भुनाया गया. एक ही जमीन पर जन्मे भाईयों को दो वर्गों मे बांटा गया.

करना तो ये था कि पेट भरे झारखंडियों को हाशिये पर खड़े झारखंडियों का हाथ पकड़ उन्हें अपने साथ लाना था पर दोनों के हाथ बंटवारे की लाठी थमा दी गई. राजनीति के ऊपर बैठे लोगों में कोई बंटवारा नहीं रहा, सारा फसाद गांव-देहात में सदियों से साथ रह रहे, घुलमिल गए संस्कृति और समाज के बीच बोया गया.

इस राज मे केंद्र से चमचमाती योजनाएं उल्का पिंड की तरह आती जो जमीन तक आते-आते भस्म हो जाती और ये भभूत नेता और बड़े बाबूओं के ललाट चमकता. दूसरे तरफ हरे-भरे झारखंड को कब लाल दाग लग गया पता न चला.

लगभग 18 जिले लाल चादर की लपेट मे है जहां जंगलों में पीपल, पलाश और सखुआ, महुआ की जगह बंदूक और कारतूस उग आये. जंगल में कोयल नहीं कूहुकती, दहशत बोलती है.

कई हिस्से ऐसे हैं जहां कानून दुबका है और बंदूक न्याय करती है. धरती के नीचे प्रचुर संसाधन है और ऊपर बेरोजगारी, अशिक्षा, बीमारी, कुपोषण, अराजकता और पलायन है.

आप अभी आइए छोटानागपुर या संथाल परगना के किसी गांव में, जहां से हजारों की संख्या मे रोज मोटरी-गदेड़ी बांध आदिवासियों का जत्था पशुओं की तरह बस में ऊपर-नीचे लद के धनकटनी के बंगाल जा रहा है कमाने.

वापसी मे लायेगा बोरी भर चावल, 400 रुपया, एक चाइना मोबाइल और एक जोड़ी कपड़ा. और उन आदिवासी बहनों का मत पूछियेगा जो लेकर आती हैं शारीरिक यातनाओं का एक सिसकता बीता हुआ कल और पेट में एक और आने वाला भूखा नंगा झारखंडी.

खटिया पर लेटा जाता बीमार और डॉक्टर के अभाव में उसी खटिया पर लाश बन के लौटता झारखंडी बता देगा कि आज झारखंड कहां है.

कई बार पत्र-पत्रिकाओं के लेख आपको बता सकते हैं कि हमारे सपनों का झारखंड सपने से भी आगे जाकर गढ़ा जा चुका है पर इस सपने की सच्चाई देखनी हो तो गांव की पगडंडी पर आइये. वहां से पढ़िए झारखंड को.

स्कूलों मे नंगे बदन मिड डे मील के लिए लाइन लगे थरिया बजाते बच्चे झारखंड की शिक्षा व्यवस्था का सच है.

सरकारी योजनाओं ने समाधान को कम, बिचौलियों को ज्यादा जन्म दिया. डिजिटल इंडिया के नारों के बीच गांव का गांव कागज पत्तर सिम कार्ड और टूटे पुराने मोबाइल के जाल में उलझा है. हर भोले झारखंडी के पीछे एक दलाल लगा है उसे नोचने के लिए.

किसी का जॉब कार्ड गिरवी है तो किसी का पासबुक बंधक. एक बड़ी भूखी झारखंडी आबादी जो आधार से लिंक है और अफसोस है कि आधार के ऊपर खड़ा लोकतंत्र कई बार भात-भात बोल कर भी मिट्टी हबक लेता है. राज का पेशवा कहता है हम कॉरपोरेट के साथ मिल राज्य के भूख और कुपोषण से लड़ेंगे.

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15 नवंबर को रांची में झारंखड स्थापना दिवस समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद व अन्य. (फोटो साभार: फेसबुक/रघुबर दास)

दुनिया भर का अनुभव है कि कॉरपोरेट की अपनी भूख सबको निगल जाती है. भूख, गरीब, मजदूर सबको निगल जाना ही कॉरपोरेट के क्षुधा पूर्ति का आधार है पर सरकार हमें कहती हैं हम इसके साथ मिल भूख से लड़ेंगे.

हम इस नए दर्शन और फॉर्मूले का चमत्कार देखेने को अभिशप्त हैं. हम झारखंडियों की नियति में मजदूरी करना लिख दिया जा रहा जहां पेट भरने के नाम पर जमीन से मालिकाना हक छीन उद्योगपतियों को दिया जा रहा.

उद्योग राक्षस की तरह आ रहा है. झारखंडियों से जल, जंगल, जमीन छिनता है और बदले में देता है भविष्य का छलावा.

इन सब के बीच एक झारखंड महेंद्र सिंह धोनी और दीपिका कुमारी का भी है. सारी विसंगतियों के बीच भी जंगल के वनफूल की गमक फैल भी रही है. राज्य की प्रतिभाएं सारी सीमा तोड़ आगे बढ़ने को संघर्ष कर रही हैं.

सिविल सेवा से लेकर मल्टी नेशनल कंपनी तक का सफर करने वाले झारखंडी कम नहीं हैं. पर इतना कुछ काफी नही है. आज बिरसा के मूर्तियों को गर्दन से आंख तक मालाओं से ढक दिया जायेगा पर ये फूल और माला बिरसा के सपनों को नहीं ढक पायेंगे.

ये सपना अभी अधूरा है. मै खुद संथाल परगना की धरती में जन्मा हूं. मै किसी बड़े विश्वविद्यालय मे बैठा कोई आदिवासी चिंतक या शोधार्थी नहीं बल्कि इस संस्कृति का हिस्सा हूं. मैंने यहां के लोगों का जीवन, समाज का तानाबाना देखा है, मैं इसी धागे से गुंथा और बुना हूं.

इसके रंग को जिया है. इनकी समस्याओं को भी नंगी आंखों से देखा है, महसूस किया है. मेरे अंदर मांदर की थाप है तो दूसरी तरफ एक नए झारखंड के निर्माण की छटपटाहट भी. अभी बहुत काम बाकी है और उम्मीद भी कि ये सब पूरा हो.

झारखंड की स्थापना के बाद गीत लिखा था…

‘15 नवंबर के बिहनवा हो,
झारखंड निर्माण हो गईल.
पूरा भईल बिरसा के सपनवा हो,
झारखंड निर्माण हो गइल.
अब ना सुनब केकरो भषनवा हो,
अब ना लेब केकरो एहसनवा हो,
झारखंड निर्माण हो गईल.’

मेरा झारखंड अभी बनना बाकी है. साढ़े तीन अक्षर के सदाबहार शब्द ‘उम्मीद‘ के साथ 15 नवंबर की शुभकामना. बाकी तो आज मांदर पीट नाचने का दिन है ही, क्या जनता, क्या नेता… ढोल पीटना किसे अच्छा नहीं लगता. राज्य में भी उत्सव है और हम भी क्या करें न झूमें तो भविष्य की मांदर पे उम्मीद की थाप मारते हैं और नाचते हैं. जय हो.

(नीलोत्पल लेखक हैं और उनकी पहली कृति  ‘डार्क हॉर्स’ को युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है)