भारत

हमारे सुपरस्टार सत्ता की ख़ुशामद क्यों करते हैं?

एक बार शोहरत या पैसा, या दोनों हासिल कर लेने के बाद भारतीय अभिनेता, कारोबारी और खिलाड़ी सामाजिक मुद्दों या सरकार के ख़िलाफ़ बोलकर इसे दांव पर लगाने का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहते.

Amitabh Bachchan Modi Photo By PIB

(फाइल फोटो साभार: पीआईबी)

पिछले साल नवंबर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक 1000 और 500 रुपये के नोटों को चलन से बाहर करने का ऐलान किया, तब अर्थशास्त्रियों की जमात अपनी राय प्रकट करने में आगे थी. यह उम्मीद के मुताबिक ही था.

ज्यादा आश्चर्यजनक यह है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने इस मसले पर सार्वजानिक तौर पर बयान देने का विकल्प चुना. नोटबंदी के एक हफ्ते के बाद विराट कोहली ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘मैंने भारतीय राजनीति का जितना इतिहास देखा है, उसमें निश्चित तौर पर यह अब तक का सबसे महान कदम है. मैं इससे बहुत प्रभावित हुआ हूं. यह अविश्वसनीय है.’

नेताओं के साथ क्रिकेटरों की और क्रिकेटरों के साथ नेताओं की नजदीकी कोई नई चीज नहीं है. कई दशकों से भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के नेता क्रिकेट प्रशासन (और खासकर शायद कुप्रशासन में) में सक्रिय रहे हैं.

सभी दलों के नेता जीतने वाली क्रिकेट टीम के साथ फोटा खिंचाना पसंद करते हैं. फिर भी कोहली का बयान अनूठा था.

इससे पहले किसी भारतीय खिलाड़ी ने सत्ता में बैठे प्रधानमंत्री का इतना खुल कर पक्ष नहीं लिया था. (हमारे क्रिकेट कप्तान राजनीति, इतिहास या अर्थशास्त्र के बारे में क्या जानते हैं कि वे नोटबंदी के ‘भारतीय राजनीति के इतिहास का महानतम कदम’ होने के अपने दावे को सही ठहरा सकें, यह अलग मामला है.)

भारत में क्रिकेट खिलाड़ियों और फिल्मी सितारों पर सबसे ज्यादा प्यार बरसाया जाता है. हमारे क्रिकेट खिलाड़ी तो कभी-कभार ही किसी ताकतवर नेताओं का पक्ष लेते हैं, मगर हमारे फिल्मी सितारे यह काम हमेशा करते रहते हैं. जो अभिनेता जितना मशहूर और बड़ा है, वह इस मामले में उतना ज्यादा अवसरवादी है.

बिग बी यानी सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का उदाहरण लीजिए, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्शकों का सबसे ज्यादा प्रेम पानेवाले अभिनेता हैं. 1980 के दशक में अमिताभ बच्चन बच्चन कांग्रेस के काफी करीब थे, जो उस दशक के ज्यादातर हिस्से में दिल्ली की गद्दी पर काबिज थी.

ये बात सबको पता थी कि वे राजीव और सोनिया गांधी के करीबी मित्र थे. राजीव गांधी के आग्रह पर बच्चन ने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ा (और जीते भी).

1990 के दशक में बच्चन और नेहरू-गांधी परिवार में दूरी आनी शुरू हो गई. इसी बीच कांग्रेस ने भारतीय राजनीति में अपनी ताकत गंवानी शुरू कर दी.

इसी दौरान कई क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ और उन्होंने मिलकर 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार का गठन किया. इनमें से एक पार्टी, मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी थी.

इधर बच्चन परिवार की नेहरू-गांधी परिवार के साथ मित्रता में कमी आई, तो उधर उनकी दोस्ती मुलायम सिंह यादव और उनके सहयोगियों के साथ बढ़ गई.

अक्सर इनकी साथ में फोटो आती थी और वे साथ में नजर आते थे. कभी अमिताभ को लोकसभा के लिए कांग्रेस का टिकट मिला था. एक तरह से इसी याद को ताजा करते हुए इस बार जया बच्चन समाजवादी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुनी गईं.

लेकिन बात यहीं पर न खत्म हुई, न अभी हो गई है. हाल के वर्षों में अमिताभ बच्चन नरेंद्र मोदी और भाजपा के करीब आ गए हैं.

जनवरी, 2010 में अपनी एक फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में गुजरात गए अमिताभ बच्चन ने राज्य का ब्रांड एम्बेसडर बनने की पेशकश की. एक ऐसे मुख्यमंत्री के द्वारा, जो 2002 के दागों को पीछे छोड़ देने के लिए लालायित था और राजनीति के राष्ट्रीय मंच पर अपने लिए स्थान बनाने का सपना पाले हुए था, इस प्रस्ताव को धन्यवाद के साथ स्वीकार कर लिया गया.

मई, 2016 में अमिताभ बच्चन ने प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के शासन के दो साल के उत्सव के एक सरकारी कार्यक्रम की मेजबानी की. उसके बाद से उन्होंने मोदी की आर्थिक नीतियों का भी सक्रिय तरीके से प्रचार किया है.

एक अभिनेता जो कभी कांग्रेस, तो कभी समाजवादी पार्टी के साथ अपनी नजदीकियों का प्रदर्शन किया करता था, आज एक बिल्कुल ही तीसरी पार्टी की शरण में है.

इससे पहले, इस साल जब सरकार मुंबई में आई बाढ़ से होनेवाले नुकसानों को सीमित रखने में नाकाम रही, तो अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया:

‘प्रकृति से लड़ने की कोशिश मत कीजिए…किसी को दोष मत दीजिए…’

इसे केंद्र और राज्य की सत्ताधारी भाजपा को आलोचनाओं से बचाने की कोशिश के तौर पर देखा गया.

अभिनेता भी नागरिक है. उनके राजनीतिक दृष्टिकोणों या चुनावों के लिए उनसे शिकायत नहीं की जानी चाहिए. लेकिन, अमिताभ के आसानी से एक पार्टी से दूसरी पार्टी और दूसरी पार्टी से तीसरी पार्टी के सफर को शुद्ध मौकापरस्ती के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता है.

उनके व्यवहार की तुलना सम्मानित हॉलीवुड अभिनेताओं के व्यवहार के साथ कीजिए. अक्सर उनके भी राजनीतिक जुड़ाव रहे हैं, लेकिन यह जुड़ाव किसी एक पार्टी के साथ ही रहा है.

हॉलीवुड अभिनेता जॉर्ज क्लूनी एक प्रतिबद्ध डेमोक्रेट हैं. अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, अपने घुटनों पर बैठ कर भी याचना करते, तो भी वे क्लूनी को अपने शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए राजी नहीं कर पाते.

दूसरी तरफ, हॉलीवुड निर्देशक क्लिंट ईस्टवुड ने एक बार रिपब्लिक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया था लेकिन वे डेमोक्रेटों के किसी भी पार्टी आयोजन से काफी दूर रहे हैं.

पश्चिम के अभिनेता सामाजिक मुद्दों के साथ जुड़ने में काफी तत्पर रहते हैं. यही कारण है कि हॉलीवुड अभिनेत्री वेनेसा रेडग्रेव और एंजेलिना जोली और कई अन्यों ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा वंचितों और हाशिये पर के लोगों के लिए लड़ाई लड़ते हुए बिताया है.

पश्चिम में, मजबूत सामाजिक और राजनीतिक विचारों वाले अभिनेताओं को अक्सर ज्यादा साहसी और दृढ़ पाया गया है. लेकिन, ऐसा नहीं है कि भारत में अमिताभ बच्चन ही अपवाद हैं.

Aamir Mohan Bhagwat PTI

एक समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ आमिर खान. (फाइल फोटो: पीटीआई)

हिंदी फिल्म के दूसरे अभिनेता भी सत्ताधारी राजनीतिज्ञों के साथ जुड़ने के लिए तैयार रहे हैं. इसके अपवाद आपको हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं में ही मिलेंगे, जैसा कि कभी एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव के मामले में दिखा था.

इन्होंने अपने राजनतिक विचारों को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक पार्टियों की ही स्थापना कर ली. वर्तमान में प्रकाश राज और कमल हासन को भी इनकी ही परंपरा में कहा जा सकता है, जिन्होंने हमारे समाज के बहुसंख्यकवादी रुझानों के खिलाफ साहसी तरीके से अपनी आवाज उठाई है.

अभिनेताओं के लिए राजनीतिक होना अनिवार्य नहीं है. हम वैसे लोगों के प्रति भी सम्मान रखते हैं, जिन्होंने सारी चीजों के ऊपर खुद को अपनी कला के प्रति ही समर्पित रखा है और जो राजनीतिक आयोजनों और शख्सियतों से दूर रहते हैं.

लेकिन, उन अभिनेताओं के प्रति शिकायत रखना गलत नहीं है, जो हमेशा सत्ताधारी राजनीतिज्ञों के साथ गलबहियां करने की जुगत में रहते हैं. 2006 में जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब शाहरुख खान अपनी एक फिल्म का न्योता देने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिलने उनके घर गए.

बाद में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि ‘सोनिया ‘एक मजबूत महिला हैं, जिनकी आप तारीफ कर सकते हैं.’ लोग उम्मीद कर सकते हैं (हालांकि, इस बात पर शर्त नहीं लगाई जा सकती) कि जब उनकी अगली फिल्म आएगी, तब शाहरुख इसी तरह, एक बार फिर इस परिवार की तारीफ करेंगे, जो अभी विपक्ष में है.

मई, 2016 में अभिनेता ऋषि कपूर ने उस समय काफी सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने ट्विटर पर नेहरू-गांधी के नाम पर कई योजनाओं और भवनों का नाम रखे जाने को लेकर अपनी नाराजगी प्रकट की.

उन्होंने जो कहा, वह झूठ नहीं था, मगर मैं यह सोचे बिना नहीं रह पाया कि यही बात अगर उन्होंने नेहरू-गांधी के सत्ता में रहते हुए कही होती, तो क्या यह ज्यादा विश्वसनीय होने के साथ-साथ ज्यादा प्रभावशाली नहीं होती!

जब यूपीए सत्ता में था, तब वे (ऋषि कपूर) इस सवाल पर चुप थे, जबकि उस दौर में कई लोगों, जिनमें मैं भी था, ने इस परंपरा की तीखी आलोचना की थी.

भारतीय अभिनेताओं की विशेषता के अनुरूप, किसी कम सचेत क्षण में बढ़ती असहिष्णुता पर बोलने के बाद आमिर खान ने बाद में सत्ता में बैठे लोगों के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत से पुरस्कार ग्रहण किया और सांकेतिक तौर पर उनके आगे नतमस्तक हुए.

सबसे मशहूर भारतीय, राजनीतिक रूप से ताकतवर लोगों के प्रति जरूरत से ज्यादा श्रद्धा का प्रदर्शन करते हैं. यही हाल सबसे धनवान लोगों का भी है. महत्वपूर्ण उद्योगपति हर बजट की सार्वजनिक तौर पर तारीफ करते हैं, चाहे सत्ता में कोई भी हो. (वे निजी तौर पर क्या कहते हैं, यह बिल्कुल दूसरी बात है.)

भारतीय उद्योग जगत के ये बाहुबली, ट्विटर पर उतने बाहुबली नहीं दिखाई देते, जहां वे मोदी की चापलूसी, परले दर्जे के खुशामदी लहजे में करते हुए दिखाई देते हैं.

मैंने इस लेख की शुरुआत नोटबंदी लागू करने के तुरंत बाद विराट कोहली द्वारा इसकी प्रशंसा की थी. इसके चार महीने के बाद, जब इसके नकारात्मक प्रभाव सबको दिखाई देने लगे थे तब उद्योगपति राजीव बजाज ने काफी खुल कर नोटबंदी की आलोचना की. उन्होंने नासकॉम के एक सम्मेलन में कहा,

अगर कोई समाधान या विचार सही है, तो यह मक्खन में गरम छुरी की तरह चला जाएगा, लेकिन अगर कोई विचार काम नहीं कर रहा है, जैसे उदाहरण के लिए नोटबंदी, तो इसके क्रियान्वयन को दोष मत दीजिए. मुझे लगता है कि आपका विचार ही अपने आप में गलत है.’

लेकिन कारोबारियों के द्वारा सरकारी नीतियों की ऐसी आलोचना काफी कम और कभी-कभार ही देखने को मिलती है. हमारे यहां जॉर्ज सोरोस (हंगरी-अमेरिकी कारोबारी, निवेशक, मानवसेवी) का कोई देसी संस्करण नहीं है, जो अपने धन, अपनी बुद्धि और अपनी प्रतिष्ठा को राजनीतिज्ञों और सरकारों के अनैतिक और तानाशाही कार्यों के खिलाफ लगा देगा.

(यहां यह याद किया जा सकता है कि किसी भी भारतीय उद्योगपति ने आपातकाल का विरोध नहीं किया था, जबकि कइयों ने इसका समर्थन किया था.) जब ट्रंप ने कुछ चुनिंदा मुस्लिम देशों के नागरिकों की अमेरिका में एंट्री पर घिनौना प्रतिबंध लगा दिया, तब माइक्रोसॉफ्ट से लेकर गूगल और एप्पल से लेकर फेसबुक जैसी कई बड़ी कंपनियों ने सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध किया.

दूसरी तरफ भारत में तो केंद्र सरकार के सर्वाधिक संदेहास्पद और आर्थिक तौर पर बेहद नुकसानदेह फैसलों को भी कारोबारियों द्वारा सर्वसम्मति से या करीब-करीब सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जाता है.

इस साल अगस्त में द टेलीग्राफ  में प्रकाशित एक लेख में इस अंतर को दर्ज किया गया था. इसका शीर्षक था: साइलेंस ऑफ बिजनेस लैम्ब्स: सीईओज इन अमेरिका स्पीक आउट बट नॉट दोज़ इन इंडिया (कारोबारी मेमनों की चुप्पी: अमेरिकी सीईओ मुंह में जुबान रखते हैं, मगर भारतीय सीईओ नहीं.

आखिर भारतीय पूंजीपति तबका, भारतीय अभिनेताओं की तरह ही सत्ता में बैठे लोगों के साथ नमक की तरह मिल कर रहने के लिए क्यों तैयार है?

हमारे सार्वजनिक संस्थानों की कमजोरी और उनका दुरुपयोग करने की नेताओं की क्षमता, इसका एक कारण हो सकता है. जब अमेरिकी कारोबारी जॉर्ज सोरोस और हॉलीवुड अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप, डोनाल्ड ट्रंप से लोहा लेते हैं, तो वे यह जान रहे होते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप इंटरनटल रिवेन्यू सर्विस या फेडरल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन को इनके खिलाफ मामला बनाने का हुक्म नहीं दे सकते हैं.

लेकिन भारत में सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए ऐसे सांस्थानिक अवरोधों का अस्तित्व नहीं है. कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही शासनों ने अपने आलोचकों और प्रतिद्धंद्वियों को तंग करने के लिए सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल खुल कर किया है.

हमारे देश के सबसे अमीर और सबसे लोकप्रिय लोगों द्वारा ताकतवर लोगों की इस चाटुकारिता को व्यक्तिगत साहस की कमी के तौर पर भी समझाया जा सकता है. एक बार शोहरत या धन, या दोनों हासिल कर लेने के बाद भारतीय अभिनेता या कारोबारी (और खिलाड़ी भी) सामाजिक अन्याय या सरकार के अपराधों के खिलाफ बोलकर इसे दांव पर लगाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते हैं.

(लेखक इतिहासकार हैं)

यह लेख मूलतः द टेलीग्राफ में प्रकाशित हुआ था. इसे लेखक की अनुमति से पुनर्प्रकाशित किया गया है.

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