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मैंने आज़ादी के बाद जैसा हिंदुस्तान देखा था, उसी हिंदुस्तान में मरना चाहता हूं: मुनव्वर राना

जन्मदिन विशेष:  इस सियासी उथल-पुथल में एक बुजुर्ग की हैसियत से मुझे ख़ौफ़ लगता है कि कहीं हिंदुस्तान में ज़बान, तहज़ीब और मज़हब के आधार पर कई हिंदुस्तान बन जाएं. यह बहुत अफ़सोसनाक होगा.

(फोटो साभार: फ़ेसबुक)

(फोटो साभार: फ़ेसबुक)

लखनऊ: मशहूर शायर मुनव्वर राना का कहना है कि सियासत ने उर्दू पर जितने वार किए, उतने दुनिया की किसी और ज़बान पर होते तो उसका वजूद ख़त्म हो गया होता. लेकिन उर्दू की अपनी ताक़त है कि यह अब तक ज़िंदा है और मुस्कुराती दिखती है.

देश में बढ़ती असहिष्णुता के ख़िलाफ़ दो साल पहले अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले राना ने मुल्क़ के मौजूदा सूरत-ए-हाल पर रंज का इज़हार करते कहा कि उनकी आख़िरी ख़्वाहिश है कि वह अपने उसी पुराने हिंदुस्तान में आख़िरी सांस लेना चाहते हैं.

रविवार को अपना 65वां जन्मदिन मनाने जा रहे राना ने उर्दू ज़बान की हालत का ज़िक्र करते हुए कहा, हमने पूरी ज़िंदगी में उर्दू ज़बान को आसमान से नीचे गिरते हुए देखा है. हमने एक शेर भी कहा कि हर एक आवाज़ अब उर्दू को फरियादी बताती है, यह पगली फिर भी अब तक ख़ुद को शहज़ादी बताती है.

उन्होंने कहा सियासत ने इस पर जितने वार किए, उतने वार दुनिया की किसी और ज़बान पर होते तो उसका वजूद ख़त्म हो गया होता. लेकिन उर्दू की अपनी ताक़त है कि यह अब तक ज़िंदा है और मुस्कुराती और खिलखिलाती हुई दिखती है.

राना ने कहा कि सियासत में ऐसी ताक़तें ही घूम-फिरकर हुक़ूमत में आईं जिन्होंने मिलकर इस जबान को तबाह किया. किसी शख़्स या किसी मिशन को इंसाफ़ न देना, उसको क़त्ल करने के बराबर है. जब आज़ादी के वक़्त सारा सरकारी काम उर्दू में होता था. यहां तक कि मुल्क़ के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की शादी का कार्ड भी उर्दू में ही छपा था, आख़िर ऐसा क्या हो गया कि उर्दू इतनी पराई हो गई.

देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में अक्टूबर 2015 में अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करने वाले राना ने शनिवार को कहा, तो मुल्क़ के कमज़ोर तबके यानी अल्पसंख्यक लोगों के साथ-साथ बहुसंख्यक लोग भी महसूस करने लगे हैं कि जो मौजूदा सूरत-ए-हाल हैं, वे अगर जारी रहे तो कहीं ऐसा ना हो कि हमारी भविष्य की पीढ़ियां हिंदुस्तान के इस नक़्शे को नहीं देख पाएं.

उन्होंने कहा, यह जो सियासी उथल-पुथल है, उसमें एक बुजुर्ग की हैसियत से मुझे यह ख़ौफ़ लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि हिंदुस्तान में ज़बान, तहज़ीब और मज़हब के आधार पर कई हिंदुस्तान बन जाएं. यह बहुत अफ़सोसनाक होगा. मैंने जैसा हिंदुस्तान देखा था, आज़ादी के बाद पूरा का पूरा, वैसा ही हिंदुस्तान देखते हुए मरना चाहता हूं.

एक सवाल पर राना ने कहा कि उन्हें किसी भी शायर ने प्रभावित नहीं किया. इसकी वजह यह नहीं है कि वह ख़ुद को बहुत क़ाबिल समझते हैं. असल में उन्होंने ज़बान, अदब और तहज़ीब को एक खानदान की तरह देखा. आमतौर पर कह दिया जाता है कि वह मीर, दाग़, इक़बाल या ग़ालिब से बहुत मुतास्सिर हैं. हक़ीक़त में ऐसा बिल्कुल नहीं है जितने भी शायर या कवि हैं, उन सबको वह एक खानदान समझते हैं.

उन्होंने कहा इस खानदान में छोटे-बड़े का फेर इसलिए नहीं था, क्योंकि जब किसी खानदान में शादी होती है तो सबको बुलाया जाता है. उसमें वह रिश्तेदार भी आता है, जो गवर्नर हो चुका होता है, और वह रिश्तेदार भी शरीक होता है, जो ट्रक चालक या रिक्शा चालक होता है.

मैंने ज़बान को भी ऐसे ही समझा. मैंने बहुत मामूली लेखक की किताब को भी उतना ही दिल लगाकर पढ़ा जितना बड़े से बड़े लेखक की किताब को.

उत्तर प्रदेश के रायबरेली में 26 नवंबर, 1952 को जन्मे राना ने कहा कि उनकी ज़िंदगी पर उनके माता-पिता का ख़ासतौर पर मां का ख़ास असर रहा. मेरे खानदान के पास जो भी ज़मींदारियां रहीं हों लेकिन मैंने अपने वालिद के हाथ में ट्रक का स्टीयरिंग देखा था.

बेहद ग़रीबी के दिन भी देखे. मां को फ़ाक़ाकशी करते हुए देखा. वह मुफ़लिसी के दिन भी गुज़ारे हैं मैंने जब, चूल्हे से खाली हाथ तवा भी उतर गया.