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पद्मावती के नाम पर तलवारें भांजने वाले सूरमा आत्मदाह करने वाली महिला की मौत पर चुप क्यों हैं?

देश में मिथकीय पद्मावती के नाम पर भावनाएं आहत हो जाती हैं लेकिन पुलिस प्रताड़ना से तंग आकर जान देने वाली एक महिला की मौत पर वही भावनाएं मुर्दा सन्नाटे से भर जाती हैं.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और फिल्म पद्मावती का पोस्टर. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और फिल्म पद्मावती का पोस्टर. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पद्मावती को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दे दिया है. पिछले हफ्ते ही उन्होंने ‘राष्ट्रमाता पद्मावती पुरस्कार’ की घोषणा की.

यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाएगा जिन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई महत्वपूर्ण काम किया हो. साथ ही, मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की है कि ‘पद्मावती’ फिल्म को प्रदेश में रिलीज़ नहीं होने देंगे.

मुख्यमंत्री की इस घोषणा के कुछ घंटे पहले भोपाल के ही मुख्य सरकारी अस्पताल में इंदरमल बाई नाम की एक महिला की मौत हो गई. इंदरमल बाई का शरीर बुरी तरह जल चुका था और उनको बचाया नहीं जा सका.

कुछ पुलिस वाले इंदरमल बाई को कई दिनों से लगातार प्रताड़ित कर रहे थे. इससे मजबूर होकर उन्होंने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली. वे पुलिसवाले उस समय वहां मौजूद थे.

उन्होंने उस महिला को अपने सामने जलता हुआ देखा. यह भी आरोप है कि आग लगाने में उन पुलिसवालों का हाथ हो सकता है. वे पुलिसवाले वहां पैसा ऐंठने गए थे और यह धमकी दे रहे थे कि पैसा नहीं मिला तो वे इंदरमल बाई पर चोरी का केस कर देंगे.

कोई चाहे तो कह सकता है कि यह सब बातें तो एक पक्ष के आरोप हैं. बिल्कुल ठीक. यह सिर्फ एक पक्ष की बात है. इस घटना के और भी पक्ष हो सकते हैं. लेकिन क्या उन सभी पक्षों को निष्पक्षता से सामने रखा जाएगा या रखने दिया जाएगा?

इस घटना को हुए दस दिन हो गए हैं. इंदरमल बाई की मौत को भी एक हफ्ता होने को आया. लेकिन यह लेख लिखे जाने तक इस घटना की एफआईआर तक नहीं हुई है.

पुलिस एफआईआर लिखने में टालमटोल कर रही है. पुलिस के आला अफसर कह रहे हैं कि पहले जांच करेंगे फिर एफआईआर करेंगे! जांच की ज़िम्मेदारी एक ऐसे पुलिस अफसर को दी गई है जिसने इस मामले में संबंधित थाने के सामने एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर धरना दे रहे कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी की और लोगों पर लाठी चार्ज भी कराया.

इस बीच पद्मावती फिल्म पर मुख्यमंत्री के रुख़ से खुश होकर किसी राजपूत सभा ने उनको सम्मानित किया. ख़ुद मुख्यमंत्री यह सम्मान लेने भोपाल से चलकर उज्जैन गए. वहां उन्होंने एक और घोषणा कर दी कि पद्मावती की कहानी प्रदेश के स्कूलों में पढ़ाई जाएगी.

दो-तीन साल पहले, इन्हीं मुख्यमंत्री के आवास से थोड़ी दूर शहर के प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज की छात्राएं वहां अनेक विषयों की पढ़ाई बंद कराने के एक सरकारी आदेश के विरोध में तालाबंदी व प्रदर्शन कर रहीं थीं. उन छात्राओं की बात सुनने न तो शिवराज आए न ही उनका कोई मंत्री. बल्कि लाठियों से सुसज्जित पुलिस फोर्स वहां ज़रूर आई.

तालीम के हक़ के लिए लड़ रहीं छात्राओं के लिए मुख्यमंत्री के पास चाहे समय नहीं होता हो, लेकिन राजपूत सभा के कार्यक्रम में जाने का वक्त मुख्यमंत्री के पास है. पद्मावती के नाम पर जारी तमाशे में विदूषक की भूमिका निभाने के लिए वक़्त है. यह दीगर बात है कि इस फिल्म को न तो राजपूत सभा ने देखा है न ही मुख्यमंत्री ने.

संगठित मूर्खता के लिए प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती. महज अफ़वाहों से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हो गई हैं. इस मामले में देश एक कदम आगे बढ़ गया है. पहले कुछ घटित होता था जिससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत होती थीं. अब इस आशंका से ही भावनाएं आहत हो रही हैं कि कुछ होने वाला है.

लेकिन इस तरह की संगठित मूर्खता समाज के लिए बेहद ख़तरनाक है. इसके पीछे सत्ता का खेल खेलने वाले कुटिल हाथ हैं. ‘जौहर’ हो या ‘सती’, ऐसी क्रूर व्यवस्थाओं के पीछे यही खूनी हाथ होते हैं. आपने कभी किसी राजपूत या ब्राह्मण सभा को दहेज हत्याओं के ख़िलाफ़ या औरतों की बराबरी या हक़ों के लिए इतना उद्वेलित होते देखा है?

ऐसी सभा में सम्मानित होने के लिए समय निकालने वाले मुख्यमंत्री के पास इंदरमल बाई के लिए भी समय नहीं है. बता दें कि इंदरमल न तो राजपूत थीं और न ही राजपूत सभा जैसी किसी सभा ने उनके लिए आवाज़ उठाई है. इंदरमल बाई पारधी समुदाय की महिला थीं. वे कूड़ा बीनती थीं और भोपाल की एक बस्ती में रहती थीं.

भला ऐसी महिला के लिए कोई सभा हंगामा क्यों करेगी. ऐसी महिला के लिए मुख्यमंत्री समय क्यों निकालेंगे. ऐसी महिला के लिए राष्ट्र की अंतरात्मा तार-तार होगी भी तो क्यों?

कूड़ा बीनने वाली महिला और वह भी पारधी! जिसके पक्ष में न इतिहास है और न ही वर्तमान. इस मुल्क को लूटने वाले अंग्रेज़ पारधियों को लुटेरा कहते थे और बाकायदा एक क़ानून बनाकर इस समुदाय पर अपराधी होने का ठप्पा लगाया था.

अब भले ही वह क़ानूनी मुहर न हो लेकिन पारधी समुदाय को समाज आज भी उसी निगाह से देखता है. तभी तो यहां मिथकीय पद्मावती के नाम पर भावनाएं आहत हो जाती हैं लेकिन इंदरमल बाई की मौत पर वही भावनाएं मुर्दा सन्नाटे से भर जाती हैं- चाहे वो राजपूत सभा जैसे जातिवादी समूह हों या सूबे के मुख्यमंत्री.

मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि पूरा देश एक स्वर में कह रहा है कि पद्मावती फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ किया गया है. यह सरासर झूठ है. देश के ज़्यादातर लोगों को न तो इस फिल्म से कोई मतलब है और न ही पद्मावती से.

समस्या यह है कि देश के हुक्मरान सिर्फ एक तरह की ही आवाज़ें सुनने के आदी हैं और शिवराज इसके अपवाद नहीं हैं. उनको तालीम का हक़ मांगती लड़कियों की आवाज़ें नहीं सुनाई देतीं. किसानों की आवाज़ें नहीं सुनाई देतीं. दलितों की आवाज़ें नहीं सुनाई देतीं. उनको इंदरमल बाई की आवाज़ भी नहीं सुनाई दी. मुख्यमंत्री को सिर्फ वही स्वर सुनाई दे रहे हैं जो वे सुनना चाहते हैं.

उनको सिर्फ सिरफिरों की हिंसक भीड़ की आवाज़ें सुनाई देती हैं. यही इनका राष्ट्र है- संकरा, बंद, सड़ांध से भरा हुआ. मुझे उम्मीद है कि ‘राष्ट्रमाता पद्मावती पुरस्कार’ जल्द ही उन पुलिसवालों को दिया जाएगा जो इंदरमल बाई को प्रताड़ित कर रहे थे. आपको याद होगा कि सोनी सोरी के साथ भयावह हिंसा करने वाले अफसर को भी केंद्र सरकार द्वारा पुरस्कृत किया था.

पद्मावती का आग में जलना इतिहास है या मिथक यह कहना मुश्किल है. इंदरमल बाई का जलकर मरना एक क्रूर सच्चाई है जो हमारे सामने घटी है. लेकिन इतिहास और आहत भावनाओं के नाम पर तलवारें भांजने वाले सूरमा इस हक़ीक़त से आंखें चुरा रहे हैं.

असल में, जो समाज ‘जौहर’ करने वाली पद्मावतियों को अपनी इज़्ज़त मानता हो, उस समाज में इंदरमल बाई को बार-बार जलकर मरने पर मजबूर किया जाएगा, जलाकर मारा जाएगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं और भोपाल में रहते हैं)