भारत

कॉरपोरेट की क़र्ज़माफ़ी से विकास होता है, किसानों की क़र्ज़माफ़ी विकास-विरोधी है

भाषणों में पूरी राजनीति और सरकार किसानों-ग़रीबों को समर्पित है लेकिन किसान अपनी उपज समर्थन मूल्य से भी कम पर बेचने को मजबूर है.

दिल्ली के संसद मार्ग पर 20-21 नवंबर को देश भर के 184 किसान संगठनों की ओर से दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद लगाई गई. (फोटो: कृष्णकांत/द वायर)

दिल्ली के संसद मार्ग पर 20-21 नवंबर को देश भर के 184 किसान संगठनों की ओर से दो दिवसीय किसान मुक्ति संसद लगाई गई. (फोटो: कृष्णकांत/द वायर)

देश के राजनेता अक्सर भारत की सकल आबादी के साठ प्रतिशत हिस्से यानी किसानों के प्रति अपने संबोधनों में किसान हितकारी बातों के पुल बांधते रहते हैं, लेकिन इन किसानों के हितों में किए जाने वाले संबोधनों की हकीकत कुछ और ही होती है. जिसकी असलियत देश के किसानों द्वारा अनवरत जारी खुदकुशी के साथ ही सरकारी निर्णयों में लगातार खारिज होती किसान समस्याओं के रूप में रोज ही सामने आती रहती है.

ताजा हालात के अनुसार किसानों के खून-पसीने से तैयार हुई खरीफ उपज की मंडियों के समर्थन और बोनस मूल्य से भी कम दाम मिलने के चलते साफ हो जाती है. सितंबर माह के आखिरी हफ्ते में देश भर की मंडियों में किसानों के उत्पादों को लेकर देश के चर्चित मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की कुछ मंडियों में किसानों के ऊपज की मिलने वाली कीमतों का लेखा-जोखा कुछ इस प्रकार रहा-

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उपरोक्त विवरणों से स्पष्ट है कि आज किसानों को समर्थन और बोनस मूल्य से भी कम दामों पर अपनी उपज को बेचना पड़ रहा है, समस्त सरकारी घोषणा और व्यवस्था उनके लिए नाकाफी साबित हो रही हैं. ध्यान रहे हमारे देश का किसान जी-तोड़ मेहनत कर अपने पसीने से सींच कर कृषि उत्पादनों के मामले में देश को लगातार आत्मनिर्भर बनाने में लगा है.

वह साल दर-साल भारी पैदावार से देश के अन्न भंडारों के साथ गरीबों, अमीरों सबकी थाली को पर्याप्त भोजन से भरने के लिए अपना पसीना बहा है. लेकिन जब वही किसान अपनी उपज लेकर मंडी पहुंचता है तब उसे पता चलता है कि वह घाटे के काम के लिए खून-पसीना एक करने में लगा है.

इस प्रकार घाटा-दर-घाटा झेलता भारतीय किसान अन्ततः साहूकार और बैंक के कर्ज में फंसकर असमय मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो रहा है. ध्यान रहे कि हाल में ही अंरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्था (आईएफपीआरआई) ने अपनी जो वार्षिक रिपोर्ट जारी की है, उसके अनुसार भारत भूख सूचकांक में तीन सीढ़ी और नीचे खिसक गया है.

आज हम भूख के मामले में बांग्लादेश, श्रीलंका और उत्तर कोरिया से भी बद्तर हालत में पहुंच गए हैं जबकि हमारे नेता, मंत्री रोज वक्तव्य देकर भारत को विश्व शक्ति का दर्जा देते रहते हैं. अच्छे दिनों के वादे के साथ आई वर्तमान केंद्र सरकार भी केवल कॉरपोरेट घरानों के हितों को साधने में लगी है. उसे न तो किसानों की चिंता है न तो आधा पेट खाकर जीने वाले हाशिये के कुपोषण ग्रस्त गरीबों की.

हाल ही में हमारे देश के पोषण निगरानी ब्यूरो (एनएनएमबी) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में यह भयावह वास्तविकता उद्घाटित हुई है कि आज हमारे देश के ग्रामीणों के भोजन की थाली चालीस साल पहले से भी पीछे छूट गई है.

वर्तमान में गांव के लोगों को चालीस साल पहले से भी कम पोषणयुक्त खाना मिल पा रहा है. एनएनएमबी की इस रपट के अनुसार आज देश के ग्रामीण जन 1975-79 की तुलना में औसत रूप में 550 कैलोरी में 13 ग्राम प्रोटीन, 5 मिग्रा. लौह तत्व, 250 मिग्रा कैल्शियम तथा लगभग 500 मिग्रा विटामिन की कमी की भार झेलते हुए जी रहा है.

ध्यान रहे कि हमारी वर्तमान सरकार और उसकी समर्थक मीडिया लगातार इस सच को झुठलाने में ही अपनी सारी ताकत को झोंके हुए हैं, जिसके चलते देश की कुपोषण झेलने के लिए लाचार सत्तर फीसदी ग्रामीण आबादी का कोई पुरसाहाल नहीं हैं.

यही नहीं हालात कितने भयावह हैं इसे निम्न विवरणों से और भी अच्छी तरह जाना-समझा जा सकता है. आज तीन साल से कम उम्र वाला बच्चा प्रतिदिन मात्र 80 मिली. दूध ही ले पा रहा है, जबकि उसे रोज 300 मिली. दूध मिलना चाहिए.

आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश के गांवों के 35 प्रतिशत मर्द और औरतें अल्पपोषित हैं, तथा 42 प्रतिशत ग्रामीण बच्चों का वजन कम पाया गया. इसी क्रम में किए गए एक अन्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि आज हमारे देश की 80 प्रतिशत शहरी और 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी रोजाना की जरूरत की बुनियादी चौबीस सौ कैलोरी पोषण तत्वों से महरूम होकर गुजर-बसर करने के लिए बाध्य है.

ध्यान रहे देश के विकास को गति देने के नाम पर हाल ही में वित्त मंत्री माननीय अरुण जेटली के द्वारा की गई घोषणा के समय कृषि शब्द का प्रयोग एक बार भी नहीं हुआ. संभवतः उनकी डिक्शनरी में विकास के नाम पर किसान शब्द है ही नहीं. वित्त मंत्री महोदय ने अपनी घोषणा में 83,677 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने के लिए 6.92 लाख करोड़ रुपये देने की बात कही. साथ में बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपये के पैकेज देने की भी बात कही.

हमें इस भारी-भरकम पैकेज की असलियत को भी अच्छी तरह समझना चाहिए. वास्तव में इसके मूल में यह सोच सामने आती है कि बैंकों को दी जाने वाली इस भारी-भरकम धनराशि से कॉरपोरेट को बांटे गए भुगतान न होने वाले बट्टे खाते में जा चुके कर्ज को पाट दिया जाय. वहीं कृषि पर आधारित 60 प्रतिशत आबादी के लिए माननीय वित्त मंत्री जी के पास अनुदान तो दूर, एक शब्द भी नहीं है.

मौजूदा सरकार देश के विकास के नाम पर एशिया के तमाम देशों से भी ज्यादा टैक्स वसूल रही है. किसानों और आम जनता को गैर जीएसटी वाले महंगे पेट्रोल और डीजल बेचे जा रहे हैं. पूर्ववर्ती सरकार द्वारा 14 प्रतिशत जीएसटी प्रस्तावित था, उसके बजाय सरकार 28 प्रतिशत का अव्यवहारिक और परेशानी भरा जीएसटी लगाकर गरीबों और आम जनता के खून-पसीने से जुटाये पैसे से कॉरपोरेट पर चढ़े कर्ज को पाटने में लगी है.

क्या यही हैं अच्छे दिन? नोटबंदी और जीएसटी की मार के चलते आई आर्थिक मंदी को आने वाले दिनों के लिए खुशहाली का संकेत बताने वाली हमारी वर्तमान सरकार किसी भी हालत में गरीबों की भूख और बेहाली को किसी तरह की परेशानी मानने को तैयार नहीं है.

शायद अन्नदाता किसानों की रोज-रोज होने वाली आत्महत्याएं वर्तमान सरकार के अर्थ-नियंताओं की नजर में कहीं से परेशानी का सबब नहीं बनतीं. उनकी नजर में लंबी चौड़ी सड़कें, उन पर फर्राटे भरने वाली एसी कारें, इन सड़कों के किनारे बनने वाले आलीशान होटल, उनमें मस्ती करने वाले अमीरों और अफसरशाहों एवं नेताओं की भारी-भरकम खर्चीली बैठकें ही विकास का जरिया होंगी.

क्या गांव गरीब और किसान के विकास के लिए ये चीजें ही जरूरी हैं? संभवत: आज के हुक्मरानों के आर्थिक विकास की परिकल्पना का माॅडल भी यही है. इन सरकारी अर्थशास्त्रियों ने संभवत: हॉवर्ड विश्वविद्यालय के उस सर्वेक्षण को पढ़ने की जहमत नहीं उठाई है जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि ‘गरीबी और भूख से निजात पाने के लिए आधारभूत संरचना से ज्यादा प्रभावकारी उपाय कृषि क्षेत्र का निवेश ही है.’

यहां ध्यान देने योग्य बात तो यह है कि 83,677 किमी लंबी सड़कों के लिए 6.92 लाख करोड़ रुपये के पैकेज को यदि हाइवे की जगह कृषि क्षेत्र में किसानों की बेहतरी के लिए खर्च किया जाता तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को खासा पोषण मिलता और लाखों जरूरतमंदों के जीवनस्तर में सुधार होता और किसानों की आत्महत्या में कमी की संभावना बढ़ जाती.

यदि हमारे वित्त मंत्री महोदय के द्वारा बड़े कॉरपोरेट के कर्ज से डूबते बैंकों को 2.99 करोड़ का पैकेज देकर उनकी माली हालत को दुरुस्त करने के बजाय कृषि क्षेत्र को यह पैकेज दिया जाता तो सुस्त गति से चली आ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में नई जान आ जाती और बहुसंख्यक गरीब इससे लाभान्वित होते.

ध्यान रहे कि यदि केवल उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के किसानों पर बकाया कर्ज को खत्म कर दिया जाए तो खेती वाले 1.8 करोड़ परिवारों को स्पष्ट लाभ मिलेगा.

इस सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम का ये कहना है कि कॉरपोरेट घराने की कर्जमुक्ति आर्थिक विकास के लिए जरूरी है. रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि किसानों की कर्जमाफी से देश की बैलेंस सीट गड़बड़ हो जाएगी. यह बातें इसका स्पष्ट प्रमाण है कि देश के शीर्षस्थ लोग किसानों से ज्यादा कॉरपोरेट घरानों के फायदे के बारे में सोच रहे हैं.

कुछ ही वर्ष पहले दुनिया के तमाम अमीर देशों के बैंक दिवालिया हो गए थे और उनकी आर्थिक स्थिति गड़बड़ हो गई थी. उस समय हमारे देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कारण ऐसा कुछ नहीं हुआ था और हम विश्वव्यापी आर्थिक मार से बच गए थे. ध्यान रहे कि पश्चिमी व्यवस्था की नकल से पनपी सोच हमारी कृषिपरक अर्थव्यवस्था को नकारने के परिणामों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रही है.

(बनारस में रहने वाले पत्रकार जगनारायण कृषि एवं ग्रामीण मामलों पर लिखते हैं.)