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भोपाल गैस त्रासदी: हर सुबह सामने खड़ा यूनियन कार्बाइड उनके ज़ख़्मों को हरा कर देता है

त्रासदी के 33 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड में दफ़न ज़हरीले कचरे के निष्पादन के लिए न तो केंद्र सरकार और न ही मध्य प्रदेश सरकार ने कोई नीति बनाई है.

भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया स्मारक. फाइल (फोटो साभार: विकिपीडिया कॉमन्स)

भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया स्मारक. फाइल (फोटो साभार: विकिपीडिया कॉमन्स)

भोपाल का जय प्रकाश नगर जिसे जेपी नगर भी कहा जाता है, ये वो इलाका है जो 33 साल पहले 2-3 दिसंबर की दरमियानी रात मौत के उस भयावह मंज़र का गवाह बना था जिसे याद करते हुए आज भी यहां रहने वालों की रूहें सिहर उठती हैं.

यही वो दिन था जब जेपी नगर के सामने बने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूका) के कारखाने में एक टैंक से अत्यधिक ज़हरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट (एमआईसी) का रिसाव हुआ था. इस घटना की वजह से भोपाल का नाम विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से जुड़ गया.

ज़हरीली गैस के असर और उस रात मची भगदड़ में हज़ारों लोग और पशु-पक्षियों की जानें गईं. साथ ही पर्यावरण को ऐसी क्षति पहुंची जिसकी भरपाई सरकारें आज तक नहीं कर पाई हैं.

उस रात हुईं मौतों के स्पष्ट आंकड़ों को लेकर आज तक मतभेद है. साथ ही मानव स्वास्थ्य पर इसका दीर्घकालीन दुष्प्रभाव हुआ है, इसके प्रमाण भी मिलते हैं.

65 वर्षीय प्रताप सिंह यूनियन कार्बाइड कारखाने के ठीक सामने स्थित उसी जेपी नगर में रहते हैं. वे देख नहीं सकते. एक छोटा सा मकान है जिसके आगे 6/4 की छोटी सी दुकान में ही वह बैठे रहते हैं. गुजरते लोग उनके पास बैठते हैं, बातें करते हैं. परिवार के अन्य लोगों की मौत हो गई है.

उनकी एक लड़की हैं जो उनके पास आकर रहने लगी हैं. जब हम उनके पास पहुंचे और उन्हें अपना परिचय दिया तो आदर के साथ उन्होंने बिठाया.

लेकिन यूनियन कार्बाइड का ज़िक्र करते ही वे लगभग रोते हुए चीखने लगे, ‘मर जाते उस रात तो भी अच्छा था. जो मर गए उनके परिवारों को 10 लाख रुपये मुआवज़ा तो मिल गया. हम तो तब से अंधे बने बैठे हैं.’

वे बताते हैं कि उस रात गैस के प्रभाव से लोग सांस तक नहीं ले पा रहे थे. आंखों में जलन मच रही थी और सूजकर वे लाल हो गई थीं. हर कोई बचने के लिए आंखें बंद करके यहां से वहां अंधाधुंध भागे जा रहा था.

प्रताप भी भागे थे और उसी अफरातफरी में प्रताप का चेहरा किसी कठोर वस्तु से टकराया. उन्होंने होश खो दिए. होश में वापस आने पर जब आंखें खुलीं तो उनकी दुनिया अंधेरी हो चुकी थी.

जेपी नगर के लगभग हर घर में ऐसी ही एक कहानी सुनने को मिलेगी. नूर हसन की उम्र उस भयावह घटना के वक़्त 14 साल थी. वह भी मौत के उस मंज़र के प्रत्यक्षदर्शी रहे.

वे बताते हैं, ‘भयावह दृश्य था. ख़तरनाक भागदौड़ मची थी. ज़हरीली गैस ने सब कुछ घेर लिया था. हालात सामान्य हुए तो देखा पेड़ के पत्ते और फल काले पड़ चुके थे. सड़कों पर जानवर मरे पड़े थे. हर घर में मातम पसरा था. तब हर घर से एक मय्यत निकली थी. हमने भी किसी अपने को खोया था. चाचा का लड़का उसी दिन मेहमानी करने आया था. वह सोया हुआ था और सोया ही रह गया.’

भोपाल गैस त्रासदी की याद में बना स्मारक.

भोपाल गैस त्रासदी की याद में बना स्मारक.

आज 33 सालों बाद भी अगर जेपी नगर के लोगों के ज़ेहन में वह हादसा ज़िंदा हैं तो इसका एक कारण तो यह भी है कि हर सुबह जब उनकी आंखें खुलती हैं तो सामने खड़ा कार्बाइड का कारखाना फिर से उन ज़ख़्मों को हरा कर देता है. तो दूसरा कारण अधिक गंभीर, डरावना और चिंतनीय है. जिसने वर्तमान में सिर्फ तब की मौजूदा पीढ़ी ही नहीं, उसके आगे की नस्लों को भी उस हादसे का अप्रत्यक्ष शिकार बना दिया है.

भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सतीनाथ षड़ंगी जो इलाके में गैस पीड़ितों के नि:शुल्क इलाज के लिए संभावना क्लीनिक भी चलाते हैं, कहते हैं, ‘मिथाइल आइसोसाइनेट की प्रवृति है कि इसके प्रभाव में आने वाले व्यक्ति में इलाज के बाद भी यह अपने अवशेष छोड़ देती है. अवशिष्ट चोटें जीवन भर उसके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं.’

ख़ुद यूनियन कार्बाइन की सेफ्टी रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है. 16 दिसंबर 1974 को तैयार उस रिपोर्ट में उल्लेख है, ‘मिथाइल आइसोसाइनेट एक जाना-पहचाना ख़तरनाक जहर है जो आंख या त्वचा के संपर्क में आने पर घातक प्रभाव छोड़ता है. साथ ही सूंघने पर सांसों में रुकावट पैदा करता है. निगले जाने पर भी घातक असर दिखाता है. अगर पूरी तरह से इलाज भी करा लिया जाए तब भी यह बड़ी अवशिष्ट चोटें शरीर में छोड़ देता है.’

यही कारण है कि 33 सालों बाद भी वह हादसा गैस पीड़ितों के ज़ेहन में ताज़ा बना हुआ है. क्योंकि एमआईसी गैस के दिए ज़ख़्म कभी भरे ही नहीं थे. वह उन अवशिष्ट चोटों के रूप में अब तक ज़िंदा हैं.

इस तरह उन ज़ख़्मों की पीड़ा तब हादसे में शिकार लोगों ने तो झेली ही और वर्तमान में झेल भी रहे हैं. लेकिन उनके साथ-साथ हादसे के बाद पैदा हुई उनकी नई पीढ़ी भी इसके चपेट में है और कोई नहीं जानता कि आगे और कितनी पीढ़ियां उस हादसे की भेंट चढ़ेंगी?

Pictures of residents who died in the 1984 disaster are seen at the forensic department of a hospital in Bhopal Danish Siddiqui/Reuters

1984 में घटित गैस त्रासदी में मारे गए लोगों की तस्वीर, जो कि भोपाल के एक अस्पताल के फॉरेंसिक विभाग में लगी है. (फोटो: रॉयटर्स)

गैस पीड़ित संजय बताते हैं, ‘हुआ यूं कि जिन्होंने उस गैस को तब भोगा, वे तो पीड़ित हैं ही. उनकी शादी के बाद उनके जो बच्चे हो रहे हैं, वो भी अपंग हो रहे हैं. किसी के हाथ-पैर नहीं हैं तो किसी की कोहनी उभरी हुई है. खून के साथ उस गैस का असर आगे बढ़ रहा है.’

प्रताप सिंह कहते हैं, ‘लंगड़े-लूले, अपंग बच्चे पैदा हो रहे हैं. कम उम्र में ही दिल की बीमारी लग रही है.’

गैस पीड़ितों के विकलांग बच्चों को नि:शुल्क इलाज मुहैया कराने वाले चिंगारी ट्रस्ट की संस्थापक रशीदा बी कहती हैं, ‘एक ही समय में एक ही क्षेत्र से 70 विकलांग बच्चों का सामने आना इत्तेफाक़ नहीं होता. जेपी नगर के 70 विकलांग बच्चों को हमने इलाज दिया है.’

इस बात की आशंका गैस पीड़ितों के लिए बनाए गए भोपाल मेमोरियल अस्पताल और अनुसंधान केंद्र (बीएमएचआरसी) की वेबसाइट पर भी व्यक्त की गई है. यहां लिखा है, ‘कोई नहीं कह सकता कि पीड़ितों की आने वाली पीढ़ियों पर इस गैस का दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा.’

एक अन्य गैस पीड़ित विजय कहते हैं, ‘जो गैस कांड के प्रत्यक्ष भोगी रहे, यहां वो खांस-खांसकर जी रहे हैं. खांसी, सीने में दर्द, आंखों में जलन, हाथ-पैर में दर्द, हमारे लिए आम हो गए हैं. सांस लेने में भी सबको दिक्कत होती है. चलने पर सांस फूलती है. ज़्यादा मेहनत का काम नहीं कर सकते, थकान हो जाती है. उस हादसे के बाद शरीर में वो ताकत नहीं रही जो पहले थी.’

जेपी नगर में सड़क के किनारे फुटपाथ पर मोची की दुकान चलाने वाले सेवाराम जो जेपी नगर से ही सटे गैस प्रभावित एक अन्य बस्ती छोला नाका में रहते हैं, बताते हैं, ‘आदमी जी रहा है. पर मर-मर कर जी रहा है.’

शर्ट के अंदर अपनी छाती पर बंधी चिकित्सीय बेल्ट दिखाते हुए वे कहते हैं, ‘ऐसे पट्टों को लगा-लगाकर लोग जी रहे हैं यहां. तब मेरी उम्र 25 साल थी. अब ज़ख़्मों को कुरेदने से क्या फायदा है. रात गई बात गई. सबकी बीमारी लगभग वही है. सांस लेने में तकलीफ, फेफड़े ख़राब और आंखों में जलन.’

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ सोशल वर्क करने वाले प्रतीक शर्मा लामिचन्ने द्वारा वर्ष 2014 में तैयार रिसर्च रिपोर्ट ‘परसीव्ड नीड्स ऑफ द गैस अफेक्टेड पर्सन्स विद रिफरेंस टू पीपल लिविंग इन जय प्रकाश नगर’ बताती है कि सर्वे में शामिल जेपी नगर के सभी लोगों में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या पाई गई.

इन समस्याओं में सांस फूलना, खांसी, सीने में दर्द, थकान, बदन दर्द, पेट दर्द, अंग सुन्न होना, हाथ-पैर में झुरझुरी, उच्च रक्तचाप, घबराहट, मानसिक अस्वस्थता मुख्य थीं.

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड का कारखाना (फोटो: रॉयटर्स)

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड का कारखाना (फोटो: रॉयटर्स)

वहीं महिलाओं में असमय माहवारी और अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या भी देखी गई. वहीं नवजातों और हादसे के बाद जन्म लेने वालों में शारीरिक और मानसिक वृद्धि में रुकावट देखी गई.

रिसर्च में यह भी सामने आया कि इन बीमारियों ने उनके रोज़गार और रोज़गार क्षमता को भी प्रभावित किया. नियमित अस्पताल जाने के चलते वे काम पर ध्यान नहीं दे पाते इसलिए उन्हें कंपनी/कारखानों में काम पर नहीं रखा जाता.

रिसर्च यह भी बताती है कि सांस फूलने के चलते 85 प्रतिशत पीड़ित एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में भी दिक्कत महसूस करते हैं. इसलिए अधिकांश गैस पीड़ित आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. वे या तो भूख से मर रहे हैं या फिर क़र्ज़ में डूब रहे हैं. अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं.

और ऐसे हालात सिर्फ जेपी नगर में नहीं बने. गैस प्रभावित सभी क्षेत्रों में गैस पीड़ित समान समस्याओं से जूझ रहे हैं. भोपाल जंक्शन रेलवे स्टेशन के समीप रहने वाले हिदायत अली कहते हैं, ‘जीना है तो इलाज कराना होगा. इलाज के लिए अस्पताल आओ तो काम से हाथ धो बैठते हैं.’

तीन दशक बाद भी कार्बाइड के ज़हर के कहर की भयावहता को मध्य प्रदेश शासन के उपक्रम ‘भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग’ के वार्षिक प्रशासकीय प्रतिवेदन 2016-2017 में दर्ज आंकड़े बखूबी प्रदर्शित करते हैं.

प्रतिवेदन में ‘मुआवज़ा संबंधी निर्णय’ नामक बिंदु में दर्शाया गया है कि मुआवज़ा राशि में वृद्धि होने पर प्रस्तुत कुल 63,819 दावा प्रकरणों में कैंसर ग्रस्त गैस पीड़ितों की संख्या 10,251 थी, किडनी रोगी 5250 थे. वहीं स्थाई विकलांगता 4902 लोगों में पाई गई.

इस तरह कैंसर और किडनी जैसे गंभीर रोगों से ग्रस्त रोगियों की संख्या कुल प्रकरणों के 25 फीसदी के बराबर रही. जिससे गैस पीड़ितों में कैंसर और किडनी रोग होने का औसत सामान्य मरीज़ों की तुलना में कई गुना अधिक हो जाता है.

छोला निवासी गैस पीड़ित मोहम्मद सरवर एक अहम सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘गैस 33 साल पहले रिसी. पर आज गैस पीड़ित परिवारों में 18-19 साल के बच्चों की किडनी ख़राब हो रही हैं, अस्थमा हो रहा है, कैंसर हो रहा है, क्यों हो रहा है?’

वे आगे कहते हैं, ‘आप सर्वे करो तो भोपाल क्षेत्र में जितने भी किडनी, कैंसर और अस्थमा के मरीज़ मिलेंगे, 90 प्रतिशत गैस पीड़ितों में ही मिलेंगे. यही औसत विकलांग बच्चों पर भी लागू कर सकते हैं.’

हालांकि कैंसर, किडनी रोग और विकलांगता की समस्या उस रात रिसी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के कारण हो रहे हैं, ऐसे प्रमाण तो नहीं हैं. पर हां इनके पीछे कारण यूनियन कार्बाइड के ज़हरीले रसायन ही हैं.

भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित न्याय की मांग को लेकर अक्सर प्रदर्शन करते हैं. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित न्याय की मांग को लेकर अक्सर प्रदर्शन करते हैं. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

सतीनाथ बताते हैं, ‘1984 में हुए उस हादसे से पहले तक यूनियन कार्बाइड द्वारा संयंत्र में निकलने वाले ज़हरीले रासायनिक कचरे को संयंत्र परिसर में ही बनाए गए सोलर इवैपोरेशन पॉन्ड (सैप) में डंप कर दिया जाता था. इस तरह 10 हज़ार मीट्रिक टन कचरा इन तालाबों में डाल दिया गया. लेकिन ये तालाब तकनीकी रूप से असुरक्षित थे और रसायन वहां से लीक होते थे. उसी कचरे के चलते यूनियन कार्बाइड के आसपास का 3 से 4 किलोमीटर क्षेत्र का भूजल प्रदूषित हो गया है. इसमें डायक्लोरोबेंजीन, पॉलीन्यूक्लियर एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन्स, मरकरी जैसे लगभग 20 रसायन हैं जो फेफड़े, लीवर, किडनी के लिए बहुत ही घातक होते हैं और कैंसर के कारक रसायन माने जाते हैं.’

इस संदर्भ में 1989 से अब तक 16 परीक्षण विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किए जा चुके हैं. सिर्फ एक संस्था को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी के परीक्षण में भूजल प्रदूषण की पुष्टि हुई है. जिसका दायरा समय के साथ बढ़ता जा रहा है.

सरकार का इस पूरे मामले में रुख़ संवेदनहीन ही रहा है. कई रिपोर्ट में भूजल प्रदूषण की पुष्टि होने के बाद भी न तो केंद्र सरकार ने और न ही राज्य सरकार ने सैप में दफन उस ज़हरीले कचरे के निष्पादन की कोई नीति बनाई है.

नतीजतन, गैस प्रभावित क्षेत्र फिर से एक रासायनिक त्रासदी झेलने के मुहाने पर हैं. यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास की 32 बस्तियों का भूजल प्रदूषित हो चुका है. इसे सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि वर्ष 2014 तक गैस पीड़ित इसी प्रदूषित भूजल को पीते रहे.

गैर सरकारी संस्थानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रदर्शनों के बाद आख़िरकार 2014 में इन क्षेत्रों में पानी की पाइप लाइन डाली गई. लेकिन तब तक वे रसायन लोगों के शरीर में गहराई तक घुल चुके थे. आज भी पानी की कमी होने पर लोग इस जल का उपयोग कर लेते हैं.

बहरहाल, जेपी नगर की पहचान ही अब उस औद्योगिक त्रासदी और हिरोशिमा की तर्ज पर इस त्रासदी की याद में बनाया गया स्मारक बन गया है. जेपी नगर वासियों के ज़ेहन में बार-बार उस हादसे की याद कराने वाले सामने ही खड़े यूनियन कार्बाइड को तो सरकार अब तक हटा नहीं सकी. लेकिन उस काली रात को याद कराने वाली एक और निशानी स्मारक के रूप में वहां जरूर लगा दी है.

सेवाराम कहते हैं, ‘रोज़-रोज़ इस फैक्ट्री को सामने देखकर ज़ख़्म तो ऐसे ताज़ा होते हैं कि दिल करता है कि बस कुछ भी कर दें.’ इस बीच जेपी नगर और गैस पीड़ितों का भविष्य अनिश्चितताओं से भरा है. न जाने कब तक उस रात की यादें, शरीर में गैस का असर और कार्बाइड का ज़हर उनके जीवन में घुले रहेंगे?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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