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गुजरात विधानसभा चुनाव: जीएसटी से नाराज़गी लेकिन मोदी से नहीं

ग्राउंड रिपोर्ट: सूरत के कपड़ा व्यापारियों की सारी नाराज़गी जीएसटी लागू करने में केंद्र सरकार के घमंडी रवैये को लेकर है लेकिन उनका गुस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बजाय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर है.

A shop stacked with saris in the textile market in the port city of Surat, which produces the highest volume of synthetic fabric in India. THOMSON REUTERS FOUNDATION/Roli Srivastava

सूरत के कपड़ा बाज़ार की एक दुकान. (फोटो: रॉयटर्स)

सूरत: सिल्क सिटी के नाम से मशहूर सूरत के लोग कहते हैं कि चौबीसों घंटे उनकी नाक में कपड़े की महक और कानों को पावरलूम की आवाज़ न सुनाई दे तो उन्हें कुछ अनहोनी की आशंका होने लगती है.

पूरे शहर में सुबह से लेकर देर रात तक कपड़ा ख़रीददारों और व्यापारियों की रौनक नज़र आती है. लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद करीब 22 दिन तक सूरत का मशहूर कपड़ा बाज़ार बंद रहा.

बड़ी संख्या में कपड़ा व्यापार से जुड़े लोग अपनी दुकानें और पावरलूम छोड़कर सड़क पर सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते रहे. चुनावी साल होने के चलते लगा कि भाजपा को इसकी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ेगी.

फिलहाल सूरत में आप किसी व्यापारी से जीएसटी से उनकी ज़िंदगी और कारोबार पर पड़ने वाले असर के बारे में पूछेंगे तो वह करीब दस मिनट तक आपको अपनी दिक्कतों के बारे में बताएगा.

सूरत में कपड़ा कारोबार से जुड़े बलवंत जैन कहते हैं, ‘खेती के बाद देश में सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाला कपड़ा उद्योग है. रोटी, कपड़ा और मकान हमारी बुनियादी ज़रूरत है. गांधीजी ने खादी के ज़रिये देश में आज़ादी लाई थी लेकिन अब सरकार ने इसे भी कमाई का ज़रिया बना लिया है. ऐसा नहीं है कि जीएसटी लागू होने से पहले कपड़ा उद्योग से सरकार को टैक्स नहीं जाता था. सूत पर 18 फीसदी टैक्स लगा करता था और हम लोग कपड़े को टैक्स फ्री बेचा करते थे. यानी कि इसके बाद कारीगर, निर्माता, थोक, खुदरा व्यापारी के क्रम में खुदरा व्यापारी को ही 5 फीसदी वैट चुकाना पड़ता था. लेकिन अब सरकार ने इस क्रम में सबको शामिल कर दिया है.’

बलवंत आगे कहते हैं, ‘हम व्यापारी हैं हमें व्यापार की बुनियादी समझ है लेकिन जीएसटी का मसला जब अकाउंटेंट की समझ में नहीं आ रहा है तो हम कितना कंफर्टेबल हैं यह पूछिए ही मत. दूसरी बाद सूत से लेकर साड़ी या कपड़ा बनने तक कम से कम 17 अलग-अलग चरणों और प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. इस पूरे क्रम में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल होते हैं जो अनपढ़ हैं या फिर इतना पैसा नहीं कमा पाते हैं कि वह जीएसटी के जंजाल में घुस सकें. मसलन मान लीजिए आप साड़ी में स्टोन लगाने का काम करते हैं. आपने 100 साड़ियां दस रुपये के भाव से लीं और अपने मोहल्ले में दस महिलाओं को दस-दस साड़ियां बांट दी. इससे कितने लोग जुड़ गए. आप बस अंदाज़ा लगाइए. लेकिन सरकार को इन सबकी परवाह नहीं है.’

A man rests on a pile of fabric in the textile market of Surat, a key textile hub of India and the largest manufacturer of synthetic fabric in the country. India exports $6 billion worth of synthetic fabric annually. THOMSON REUTERS FOUNDATION/Roli Srivastava

सूरत का कपड़ा बाज़ार. (फोटो: रॉयटर्स)

जीएसटी से व्यापारियों को हो रही परेशानी का असर मतदान पर कितना पड़ेगा यह सवाल पूछे जाने पर बलवंत कहते हैं, ‘एक लाख व्यापारी सड़क पर आ गए थे. इतना बड़ा आंदोलन हुआ था. 22 दिन तक कपड़ा मार्केट बंद रहा था. उस समय सरकार इतने अहंकार में थी कि उसने बात करना तक मुनासिब नहीं समझा था. उस समय मंत्री मिलते नहीं थे. आज चुनाव में सरकार को जीएसटी को लेकर इतना डर है कि गुजरात में इतने केंद्रीय मंत्री घूम रहे हैं. उस समय दिल्ली में भी नहीं मिलते थे आज सारे मंत्री गुजरात में घूम रहे हैं.’

फिलहाल सूरत के व्यापारियों को जीएसटी से तो नाराज़गी है लेकिन उनका गुस्सा इससे ज़्यादा जीएसटी को लागू करने के तरीके से है. ज़्यादातर व्यापारी इस बात से भी ख़फ़ा हैं कि जीएसटी लागू करने के दौरान सरकार इतने अहंकार में थी कि उसने उनसे बात तक नहीं की थी.

सूरत में पावरलूम चलाने वाले मनीष कहते हैं, ‘जीएसटी से सिर्फ इतनी दिक्कत है कि सरकार ने इसे जल्दबाजी में लागू किया. बिना प्लानिंग और बिना सही सर्वेक्षण के सरकार ने पूरे कपड़ा उद्योग को डिस्टर्ब करके छोड़ दिया. यही इससे पहले सरकार ने नोटबंदी को लेकर किया था. हमें नोटबंदी से शिकायत नहीं थी लेकिन अब एक साल बीत जाने के बाद सरकार को यह बताना चाहिए कि कितने लोगों का काला धन सरकार ने बाहर निकाला. पिछले बीस साल से हम सूरत में कपड़े का व्यापार कर रहे हैं लेकिन पिछले एक साल में सरकार की तरफ से जितनी परेशानी आई यह पहले कभी नहीं आई थी.’

फिलहाल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात में पार्टी के चुनाव प्रचार का बीड़ा उठाए हुए हैं. सूरत में भी उन्होंने एक चुनावी रैली को कुछ दिनों पहले ही संबोधित किया था.

अपने लगभग हर चुनावी भाषण में वह जीएसटी की चर्चा करते हैं. उन्होंने जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ बताकर भाजपा सरकार की खिल्ली भी उड़ाई है.

सरकार की तरफ से परेशानी को जब चुनाव से जोड़कर मनीष से यह सवाल पूछा गया कि कांग्रेस से उन्हें क्या उम्मीद है. तब वे कहते हैं, ‘इस बार हम भाजपा को हराने के लिए वोट करेंगे. इसका कारण कांग्रेस से उम्मीद होना नहीं है. हमारा मानना है कि एक बार इस सरकार को सबक तो मिलना ही चाहिए. यहां 20-22 सालों से भाजपा की सरकार है तो उसे अहंकार हो गया है. यहां की आबोहवा जिस तरह व्यापार को सहयोग करती है वैसी अगर सरकार भी करती तो सूरत अभी बहुत आगे होता. आज के तीन-चार साल पहले तक ऐसा ही था लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं है.’

Vijay Pradhan, 45, attends to the 12 power looms that he operates at a synthetic textile unit in Surat, India’s largest manufacturer of manmade fabric. THOMSON REUTERS FOUNDATION/Roli Srivastava

सूरत का एक पावरलूम. (फोटो: रॉयटर्स)

मनीष का कहना है कि उन्हें पावरलूम से लोगों को नौकरी से निकालना पड़ा है. जीएसटी लागू होने से पहले उनके पावरलूम में 10 लोग काम कर रहे थे अब वहां पर अब करीब पांच लोग हैं.

ऐसा करने वाले मनीष अकेले नहीं है. ज़्यादातर पावरलूम में अब उतने मज़दूर काम नहीं करते है जितना कि जीएसटी और नोटबंदी के पहले किया करते थे. इसके चलते बड़ी संख्या में सूरत से लोगों ने पलायन किया है.

फिलहाल केंद्र सरकार ने भी कुछ चुनावी डर और कुछ कपड़ा व्यापारियों के प्रदर्शन के बाद जीएसटी की दर में बदलाव किया है. जहां पहले सूत और धागों पर 18 फीसदी की दर से टैक्स तय किया गया था. वह बाद में घटाकर 12 फीसदी कर दिया गया है.

इसके अलावा जीएसटी काउंसिल हर तिमाही टैक्स अदा करने वाले उन कपड़ा व्यापारियों को राहत देने पर विचार कर रही है, जिनका सालाना टर्नओवर 1.5 रुपये तक है. लेकिन व्यापारी इसे पूरा नहीं मानते हैं.

व्यापारियों का कहना है कि सरकार सिर्फ लॉलीपाप दे रही है. सालाना डेढ़ करोड़ के टर्नओवर का पैमाना बहुत कम है. बहुत सारे छोटे व्यापारी इससे ज्यादा का काम साल भर में आसानी से कर जाते हैं.

कपड़ा मार्केट में ही काम करने वाले जय नारायण कहते हैं, ‘मोदी सरकार से जीएसटी में ऐसी कोई छूट नहीं दी है जिससे व्यापारी राहत महसूस करें. सिर्फ जीएसटी काउंसिल की बैठकें हो रही हैं. छूट कोई नहीं मिल रही है. मेरे हिसाब से जीएसटी के इतने स्लैब नहीं होने चाहिए. दूसरी बात इतना पेंचीदा कानून नहीं होना चाहिए. व्यापारी चोरी करने के लिए बाज़ार में नहीं बैठा है. वह सरकार से सिर्फ इतना चाहता है कि आप टैक्स लीजिए हमें व्यापार करने दीजिए. इतना दबाव मत बनाए कि हम बस कानूनी उलझनों में रहें. अगर हम व्यापार नहीं कर पाएंगे तो देश और समाज का भला कैसे कर पाएंगे.’

कुछ ऐसा ही कहना सूरत के सेंट्रल मार्केट में कपड़े का कारोबार करने वाले राजेश का है. वे कहते हैं, ‘गुजरात में बरसों से कपड़ों का कारोबार करते आ रहे हैं. यही नरेंद्र मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब तक कारोबार के लिए सभी तरह की सहूलियतें देते थे लेकिन अब केंद्र सरकार की जीएसटी ने हमारे व्यापार को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है. मोदी को सूरत की क्षमता और कमज़ोरी बखूबी पता है लेकिन हमारे वित्त मंत्री अरुण जेटली के बारे में ऐसी राय हमारी नहीं है. हमारी समझ में यह नहीं आता कि हमारे वित्त मंत्री हमसे किसी भी तरह का संवाद करने से डर क्यों रहे हैं.’

राजेश के साथ सेंट्रल मार्केट के और भी कई व्यापारी थे. सबका यही कहना था कि वो इस बार कांग्रेस को वोट करेंगे. इससे पहले वो भाजपा को वोट करते आए थे.

जब उनसे यह सवाल पूछा कि कांग्रेस को वोट क्यों दे रहे हैं तो उनका जवाब था कि उन्हें राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार को अपना गुस्सा दिखाना है. लेकिन नरेंद्र मोदी के विकल्प कांग्रेस या राहुल गांधी नहीं है. कईयों का कहना था कि उन्हें नरेंद्र मोदी से नाराज़गी नहीं है. वित्त मंत्री अरुण जेटली और भाजपा से गुस्सा है इसलिए राहुल गांधी को वोट कर रहे हैं.

फिलहाल सूरत में जीएसटी को लेकर भारी उथल-पुथल मची हुई है. इसलिए यहां आपको तमाम राय भी मिल जाएगी. कुछ बड़े व्यापारी जीएसटी से खुश नज़र आए. सेंट्रल मार्केट में ही मिले व्यापारी महेश झावेरी का कहना था कि जीएसटी के आने के बाद सूरत का कपड़ा व्यापार व्यवस्थित हो जाएगा. अभी यह बहुत अव्यवस्थित है.

झावेरी का मानना था कि थोड़े समय के बाद सूरत के व्यापारियों को इसके फायदे समझ में आएंगे. अभी जितने लोग विरोध कर रहे हैं उसमें से तमाम इसके बहाने अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं. उन्हें लगता है यह मौका है ख़ुद को व्यापारियों का नेता बना लो. कुछ को विपक्षी पार्टियों का समर्थन हासिल है.