राजनीति

गुजरात विधानसभा चुनाव: मोरबी में पाटीदार बिगाड़ सकते हैं भाजपा का खेल

ग्राउंड रिपोर्ट: गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के पश्चिमी सिरे पर स्थित मोरबी शहर एक 24 वर्षीय पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच राजनीतिक युद्ध का अखाड़ा बन गया है.

पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

मोरबी/गुजरात: गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के पश्चिमी सिरे पर स्थित मोरबी की चौहद्दी में दाख़िल होइए, तो सिरैमिक की धूल की मोटी परत आपका स्वागत करेगी.

यहां बड़ी संख्या में लोगों के ढके हुए चेहरे को देखकर आपका हैरत में पड़ जाना लाज़िमी है, ख़ासकर तब जब आप शांत और बेहद कम जनसंख्या वाले कच्छ से इस शहर में दाख़िल हों.

आप यह जानकर चकित होंगे कि मोरबी में भारत के 80 प्रतिशत सिरैमिक टाइलों और फर्निशिंग उत्पादों का निर्माण होता है. आपको यहां कतार में सैकड़ों टाइल फैक्टरियां और इन टाइलों की पैकिंग के लिए गत्ते के बक्सों का निर्माण करने वाली पेपर मिलें मिलेंगी.

इस तरह, मोरबी गुजरात मॉडल के तहत बड़े पैमाने पर हुए औद्योगीकीकरण के सबसे बड़े लाभार्थी के तौर पर हमारे सामने आता है.

पिछले कुछ दिनों से यह शहर एक 24 वर्षीय पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच राजनीतिक युद्ध का अखाड़ा बन गया है.

प्रधानमंत्री को सीधी चुनौती देने के लिए हार्दिक ने अपनी जनसभा इस तरह रखी कि उसकी भिड़ंत 29 नवंबर को प्रधानमंत्री की जनसभा से हो सके.

राज्य के राजनीतिक पंडित यह देखने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे कि आख़िर दोनों सभाओं में कितनी भीड़ जमा होती है. सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर कयासों का दौर जारी था.

आख़िर में, भाजपा और हार्दिक की अगुआई वाली पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास), दोनों ने सभा में आई भीड़ के मामले में एक दूसरे को पटकनी देने का दावा किया.

मोदी और हार्दिक, दोनों ने ही ट्विटर और फेसबुक पर तस्वीरें डालीं, जो उनकी सभाओं में इकट्ठा हुई भारी भीड़ को दिखा रही थीं. लेकिन, दोनों सभाओं में वास्तव में कितने लोग जमा हुए थे, इसकी गिनती करने का कोई प्रामाणिक तरीका न होने के कारण, दोनों नेताओं की तरफ से सोशल मीडिया पर चल रही बहस भी राजनीतिक वृत्तांत को अपने पक्ष में मोड़ने का एक और मौका बन गई.

इस ज़िले में पाटीदारों का दबदबा है. सिरैमिक समेत यहां के ज़्यादातर उद्योगों पर उनका ही नियंत्रण है. यहां सिरैमिक उद्योग की शुरुआत 1970 के दशक में हुई, लेकिन इसमें तेज़ी 1990 के दशक में आई जब मुक्त बाज़ार की नीति ने इसे निर्यातोन्मुख बना दिया.

मोदी के 13 वर्षों के शासनकाल में गुजरात की तरक्की के आंकड़े को ऊपर ले जाने के लिए मोरबी को काफी रियायतें दी गईं.

बीते वर्षां में मोरबी भारत की सिरैमिक राजधानी बन गई है. चूंकि इन फैक्टरियों में ज़्यादातर पाटीदारों की हैं, इसलिए, सिरैमिक उद्योग के विकास का भाजपा को राजनीतिक फायदा भी पहुंचा है.

लेकिन, 2015 से अमरेली के साथ यह ज़िला, सौराष्ट्र में सत्ताधारी भाजपा के ख़िलाफ़ पाटीदार प्रदर्शनों का केंद्र बन गया है. विशाल प्रदर्शनों ने यह दिखाया क हार्दिक यह दावा करते हैं कि पाटीदार गुस्से से भरे हुए हैं और भगवा पार्टी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए वोट डालेंगे.

दूसरी तरफ भगवा पार्टी को यह लगता है कि वह मोरबी में पाटीदारों की तरफ से उठाए गए कई मुद्दों का समाधान करने में कामयाब रही है. इसलिए, अब वह आख़िरी घड़ी की चालें चल रही हैं, जिनमें से एक है मोदी की सभा, जिसका मक़सद पाटीदारों को फिर से अपने पक्ष में करना है.

मोरबी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में उमड़ी भीड़. (फोटो साभार: ट्विटर/नरेंद्र मोदी)

मोरबी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में उमड़ी भीड़. (फोटो साभार: ट्विटर/नरेंद्र मोदी)

मोदी ने लोगों को याद दिलाया कि उनके कार्यकाल में मोरबी का उभार सिरैमिक उत्पादन के बड़े केंद्र के तौर पर हुआ और यह उनके ‘विकास के गुजरात मॉडल’ का परिणाम है.

लेकिन, उनके भाषण का ज़्यादातर हिस्सा गरीबों को संबोधित था. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार पानी और पर्याप्त बिजली लेकर आई, जिसने इस क्षेत्र को फायदा पहुंचाया.

इससे यह संकेत मिलता है कि मोदी कृषि संकट का दंश झेल रहे उन पाटीदार किसानों को मनाने की कोशिश कर रहे थे, जो हार्दिक के सैनिक बन गए हैं और भगवा पार्टी के प्रति नकारात्मक भाव रखते हैं.

अमीर और गरीब पाटीदारों के बीच दरार

मोरबी के हालात जितने नज़र आते हैं, उससे कहीं ज़्यादा जटिल हैं. भाजपा शासन के एक लंबे दौर के कारण एक मजबूत सत्ता विरोधी रुझान को महसूस किया जा सकता है, जो हाल ही में नोटबंदी जैसी कठोर सरकारी नीतियों के कारण और स्पष्ट तरीके से फूट पड़ा है.

लेकिन, जीएसटी जैसी नीतियों को लेकर भाजपा की आलोचना करने वाले समृद्ध और मध्यवर्गीय पाटीदार अपने राजनीतिक विकल्प को लेकर भ्रमित नज़र आए.

भाजपा, पार्टी के ख़िलाफ़ इस नाराज़गी से भली-भांति वाकिफ है. इसलिए उसकी तरफ से उद्योगों के उन ताकतवर मालिकों को मनाने की भरसक कोशिश की जा रही है, जो जीएसटी के जटिल ढांचे और सिरैमिक टाइलों पर टैक्स पहले के 18 प्रतिशत के वैट से बढ़ाकर नई व्यवस्था में 28 प्रतिशत करने के कारण दबाव में हैं.

हालांकि, गुजरात भाजपा से जुड़े सूत्रों का दावा है कि पार्टी बड़ी संख्या में फैक्टरी मालिकों को अपने पाले में वापस लाने में कामयाब रही है, लेकिन, जिन कुछ पाटीदार उद्यमियों से द वायर ने बातचीत की, उनका कहना है कि पैसेवाले पाटीदारों के भीतर भी एक विभाजन हो सकता है.

मोरबी के सिरैमिक उद्योग के एक प्रभावशाली खिलाड़ी केजी कुडरिया ने द वायर को बताया…

‘सिरैमिक उद्योग के मालिकों की तीन प्रमुख मांगें थीं. एक, जीएसटी को घटाकर 18 प्रतिशत किया जाए. दो, निर्यात पर नए जोड़े गए टैक्स को हटाया जाए और तीन, टाइल कारखानों की स्थापना करने के लिए कम कीमत पर मशीनरी का आयात करने में मददगार एक्सपोर्ट प्रमोशन कैपिटल गुड्स लाइसेंस पर लगाए गए 18 फीसदी जीएसटी को ख़त्म किया जाए. सरकार ने हमारी सारी मांगें मान ली हैं.’

उन्होंने यह भी जोड़ा कि उद्योग के लिए हालात एक बार फिर अनुकूल हो गए हैं.

हार्दिक और मोदी के बीच राजनीतिक भिड़ंत पर उन्होंने कहा, ‘अब स्थिति अच्छी नज़र आती है. हम यह उम्मीद करते हैं कि अगले साल हमारा निर्यात बढ़कर 10,000 करोड़ रुपये हो जाएगा. इसलिए फिलहाल मुझे औद्योगिक जगत में ज़्यादा नकारात्मकता नज़र नहीं आती. ग्रामीण इलाकों में, कुछ नाराज़गी है, मगर हम उसे भी दूर करने में कामयाब रहेंगे.’

उनका कहना था, ‘इस इलाके के आसपास हर गांव से करीब 20-30 लोग करीब 840 टाइल फैक्टरियों में काम करते हैं. इनके मालिक भी अपने गांवों से जुड़े हुए हैं. अगर हम यह मानें कि हर फैक्टरी में करीब 100 स्थानीय लोग काम करते हैं, तो इसका मतलब यह हुआ कि 84,000 लोग इस इलाके की कम से कम चार सीटों पर चुनाव के नतीजे को प्रभावित करने के लिए काम करेंगे. इसमें कोई शक नहीं कांग्रेस को एक प्रतियोगी बढ़त मिली है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि भाजपा के ख़िलाफ़ पाटीदारों का वोट 5 प्रतिशत से ज़्यादा बंटेगा.’

लेकिन, एक दूसरा नज़रिया भी है. सिरैमिक इंडस्ट्री एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भावेश पटेल के मुताबिक कई दूसरे मसलों का समाधान नहीं किया गया है.

उन्होंने तीन बिंदुओं को उठाया:

पहला, पहले की प्रणाली में हम जो कर चुकाया करते थे वह सरकारी कटौतियों और प्रोत्साहनों के बाद प्रभावशाली ढंग से 14 प्रतिशत के आसपास ठहरता था. रिटर्न फाइल करने का सिर्फ एक सिस्टम था. लेकिन, जीएसटी, जिसके बारे में दावा किया इसने टैक्स प्रणाली को आसान कर दिया है, दरअसल, पहले की प्रणाली से कहीं ज़्यादा जटिल है.

मोरबी में एक चुनावी रैली के दौरान हार्दिक पटेल. (फोटो साभार: ट्विटर/हार्दिक पटेल)

मोरबी में एक चुनावी रैली के दौरान हार्दिक पटेल. (फोटो साभार: ट्विटर/हार्दिक पटेल)

हम कर चुकाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसे या तो व्यापारियों से वसूला जाना चाहिए या उत्पादकों से, न कि दोनों से. सरकार को यह समझना चाहिए कि हम उधार पर काम करते हैं. कारोबारी हमें सामान खरीदने के छह-छह महीने के बाद भुगतान करता है. जीएसटी ने उनकी कमर तोड़ दी है, इसलिए अभी मांग ऐतिहासिक रूप से कम स्तर पर है.

पिछली प्रणाली में, केंद्र सरकार 12.5 प्रतिशत कर लगाती थी और राज्य सरकार द्वारा 15 प्रतिशत वैट लगाया जाता था. लेकिन, संभवतः चुनाव को ध्यान में रखकर लिए गए फैसले में राज्य सरकार ने अपने हिस्से में से सिरैमिक इंडस्ट्री को 10 प्रतिशत की छूट दी है.

भावेश ने दूसरा बिंदू उठाया:

‘नई नीति का कथित मक़सद निर्यात को बढ़ावा देना था, लेकिन इसने हालात को और ख़राब कर दिया है. पहले 100 रुपये के हर निर्यात पर हमें 10 रुपये वापस मिल जाते थे. लेकिन, अब नई नीति के अनुसार हमें सिर्फ 1.50 रुपये मिलते हैं, जबकि चीन के निर्यातक को 17 रुपये मिलते हैं. ऐसे में सरकार यह उम्मीद कैसे करती है कि हम वैश्विक बाज़ार में चीन से मुकाबला कर पाएंगे?’

उन्होंने आगे जोड़ा,

‘सरकार स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को आर्थिक प्रोत्साहन दे रही है, इसलिए उच्च लागत के बावजूद हम में से कइयों ने आंशिक तौर पर प्राकृतिक गैस को ऊर्जा के स्रोत के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. लेकिन अब प्राकृतिक गैस को जीएसटी से छूट दे दी गई है (और अब भी इस पर ऊंचा अप्रत्यक्ष कर लगाया जा रहा है). ऐसे में हममें से ज़्यादातर लोगों ने फिर से कोयला आधारित ऊर्जा की ओर रुख़ कर लिया है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘बात यह है कि हम काफी ज़्यादा कर चुकाते हैं, लेकिन सेवाओं और शहरी बुनियादी ढांचे के रूप में हमें इसके बदले में शायद ही कुछ मिला है. मोरबी न ट्रेन से जुड़ा है, न हवाई जहाज से. यहां तक कि यहां एक अच्छा अस्पताल भी नहीं है. गुजरात में कोई लोकशाही नहीं है, यहां बस अफसरशाही है. वे बस हमसे समय पर अपना रिटर्न जमा करा देने की उम्मीद करते हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर लोग अपने घरों के लिए बिना बिल के टाइलें चाहते हैं. और वे दावा करते हैं कि हम सब चोर हैं.’

चार विधानसभा क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था सिरैमिक उद्योग से चल रही है- इनमें से तीन मोरबी में हैं (मोरबी, टनकारा, वांकानेर) और एक पास के सुरेंद्रनगर ज़िले में (धरनगधरा).

वांकानेर के कुछ इलाकों को छोड़ दें, तो इन जगहों पर कांग्रेस का अस्तित्व न के बराबर था. अच्छे और बुरे, हर वक़्त में भाजपा के साथ खड़े रहने वाले पाटीदारों ने इस इलाके के चुनावी परिणामों को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है.

हालांकि, यह तो बाद में पता चलेगा कि 9 दिसंबर को इनका बहुमत कहां वोट करता है, मगर इनके भीतर बढ़ रही नाराज़गी का अनुमान लगाया जा सकता है.

अगर शहरी पाटीदार भी अपने ग्रामीण भाइयों से हाथ मिला लें, तो भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है.

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