भारत

प्रधानमंत्री का काम यह नहीं कि फेंके गए कीचड़ को उठाकर दूसरे पर फेंक दें

वाजिब तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिशंकर अय्यर के बयान की आलोचना करने का हक़ है मगर औरंगजेब राज मुबारक कहकर वो भी अय्यर के स्तर पर आ गए.

Narendra Modi Photo from twitter BJP4Gujrat (2)

फोटो: BJP4Gujrat/twitter

प्रधानमंत्री का काम यह नहीं कि फेंके गए कीचड़ को उठाकर दूसरे पर फेंक दें या कहीं कुछ कबाड़ पड़ा हो तो उसे उठाकर दूसरे पर फेंक दें. मणिशंकर अय्यर का बयान अपने आप में शर्मनाक था. उन्होंने मुग़ल बादशाही से जो तुलना की है वो ग़लत है.

भले ही उनके कहे का सार हो कि वैसे नहीं है, कांग्रेस में नेता का चुनाव होता है मगर उस लाइन के सहारे अपनी बात रख कर अय्यर ने वही ग़लती की है जो उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी को चाय वाला कह कर की थी.

लेकिन बदले में प्रधानमंत्री ने क्या किया, क्या उनका भी स्तर मणिशंकर अय्यर जैसा है? वाजिब तरीके से उन्हें अय्यर के बयान की आलोचना करने का हक है मगर औरंगजेब राज मुबारक कहकर वो भी अय्यर के स्तर पर आ गए.

परिवारवाद भारतीय लोकतंत्र की बड़ी चुनौती है और गंभीर मुद्दा है. इसे उठाने का श्रेय भाजपा को ही जाता है लेकिन जब भाजपा परिवारवाद का मुद्दा उठा रही थी तब उसके भीतर इतने सारे परिवार कैसे पनप गए? क्या परिवारवाद की बहस सिर्फ अध्यक्ष पद को लेकर होगी?

अगर यही पैमाना है तो फिर अकाली दल, शिव सेना, लोक जनशक्ति पार्टी, पीडीपी, टीडीपी में भी तो वही परिवारवाद है जो कांग्रेस में है तो क्या वहां भी औरंगज़ेब हैं?

एक तरह से यह लगता तो बड़ा स्मार्ट है कि अय्यर के बयान को कांग्रेस पर दे मारा लेकिन औरंगजेब राज क्या अब से परिवारवाद का नया नाम हो जाएगा? यह तो भाजपा और प्रधानमंत्री को ही साफ करना चाहिए वरना इसकी गूंज की लपेट में चंद्राबाबू नायडू के बेटे भी आ जाएंगे जो न सिर्फ महासचिव हैं बल्कि नायडू कैबिनेट में मंत्री भी हैं.

अभी प्रधानमंत्री तमिलनाडु गए थे. डीएमके में भी औरंगज़ेब से मिले थे क्या? क्या कैबिनेट की बैठक में रामविलास पासवान को देखते ही उन्हें मुग़ल वंश याद आता है? चिराग़ तो औरंगज़ेब नहीं लगते हैं न.

महबूबा मुफ़्ती ने इतने मुश्किलों में गठबंधन को सींचा है, अपने दल के हित से ज़्यादा निश्चित रूप से भारत का बड़ा हित होगा, क्या वहां भी उन्हें मुग़ल वंश नज़र आया, क्या उनकी तुलना औरंगज़ेब से की सकती है?

प्रधानमंत्री को अपने भीतर झांकर देखना चाहिए कि वो अपनी राजनीतिक मजबूरियों या जीत को बनाए रखने के लिए ऐसे कितने राजनीतिक परिवारों को ढो रहे हैं जिनकी तुलना मुग़ल वंश से की जा सकती है. वैसे राजशाही सिर्फ मुग़लों के यहां नहीं थी.

हिंदू राजाओं के यहां भी थी. आप उसी दिल्ली में बैठते हैं जिसे कुछ दिन पहले तक दिल्ली सल्तनत कहा करते थे. बेहतर है मुसलमानों को दाग़दार करने या किसी को मुस्लिम परस्त राजनीतिक प्रतीकों के इस्तेमाल से प्रधानमंत्री को ऊपर उठ जाना चाहिए.

वो अच्छा करते हैं अजान के वक्त भाषण रोक देते हैं और अच्छा होगा अगर वे अपने भाषण में ऐसे प्रतीकों के ख़तरनाक इस्तमाल को भी रोक दें.

प्रधानमंत्री का अपना अलग स्तर होना चाहिए. उन्हें परंपरा भंजक के नाम पर हर बार मर्यादा भंजन की छूट मिल जाती है, मिलती रहेगी. मगर जनता ने इन सब के बाद भी उन्हें प्रधानमंत्री बनाया है, क्या प्रधानमंत्री का कर्तव्य नहीं बनता कि वे उस जनता को एक अच्छी राजनीतिक संस्कृति और मर्यादा देकर जाएं?

क्या प्रधानमंत्री का भी वही स्तर होगा जो मणिशंकर अय्यर का होगा? इतना ही है तो राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों में कई सवाल उठाए हैं, उसी का जवाब दे देते.

राहुल के सवालों पर चुप्पी से लगता नहीं कि प्रधानमंत्री जवाब देने के लायक भी समझते हैं या उन तक राहुल के सवाल पहुंचते भी हैं मगर मणिशंकर अय्यर के फालतू बयान तो तुरंत पहुंच जाते हैं. क्या वे किसी न्यूज़ चैनल के एंकर हैं कि हर बयान पर बहस या सुपर एजेंडा करेंगे? क्या वे सिर्फ एक शाम के प्रधानमंत्री हैं?

हमारी राजनीति में स्तरहीन बयान एक सच्चाई है लेकिन इस पैमाने पर जब प्रधानमंत्री फेल होते हैं तब दुख होता है. जब नित्यानंद राय ने मोदी के विरोधियों का हाथ काटने की बात की तब तो प्रधानमंत्री चुप रह गए.

क्या वो मौका नहीं था कि वे बोलें कि ऐसी बात ठीक नहीं हैं, हम लोकतंत्र में हैं और हमारा विरोध जायज़ है. लेकिन कितनी जल्दी वे मणिशंकर अय्यर के फालतू बयान के सहारे राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने पर औरंगज़ेब राज का तमगा चिपका देते हैं.

प्रधानमंत्री को राजनीतिक रूप से असुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए. चुनावी जीत महत्वपूर्ण है और उन्हीं की ज़िम्मेदारी है मगर उसी के साथ मर्यादा कायम करने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की है.

क्या प्रधानमंत्री सिर्फ चुनावी मजबूरियों के तहत बयान देंगे? बेशक प्रधानमंत्री के बारे में बहुत लोग अमर्यादित बातें कहते रहें हैं, मगर क्या प्रधानमंत्री को भी अपने विरोधियों के प्रति अमर्यादित बातें कहनी चाहिए? आख़िर यह सिलसिला कौन रोकेगा?

आप ही थे न बिहार में डीएनए ख़राब बता रहे थे? क्या आपकी नाक के नीचे तीन साल से प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के ख़िलाफ़ शर्मनाक अभियान नहीं चला? आपके आईटी सेल के मुखिया ने नेहरू की भतीजी और बहन के साथ की तस्वीर को किस संदर्भ में ट्वीट किया था?

लोकसभा चुनावों के समय प्रधानमंत्री को चाय वाला कह कर मज़ाक उड़ाया गया, उसका उन्होंने उचित तरीके से प्रतिकार किया और जनता ने भी किया. मगर बदले में वे क्या कर रहे थे? क्या वे राहुल गांधी को शहज़ादा और दिल्ली की सरकार को दिल्ली सल्तनत नहीं कह रहे थे?

क्या वे एक चुनी हुई सरकार का मज़ाक उड़ाने के साथ-साथ उसकी पहचान का सांप्रदायीकरण नहीं कर रहे थे? क्या मनमोहन सिंह का अतीत एक गरीब परिवार के पुत्र होने का अतीत नहीं है?

हमने तो कभी नहीं सुना, मगर उस ग़रीबी को हराते हुए वे कहां तक पहुंचे, प्रधानमंत्री बनने से पहले दुनिया के जाने-माने विश्वविद्यालयों तक पहुंचे. हमने तो नहीं सुना कि प्रधानमंत्री ने कभी मनमोहन सिंह के इस अतीत को सराहा हो.

अतीत के संघर्ष महत्वपूर्ण होते हैं मगर इसका इस्तेमाल बदला लेने के लिए नहीं होना चाहिए न ही भावुकता पैदा करने के लिए. यह सब प्रेरणादायी चीज़ें हैं और प्रधानमंत्री ने चाय बेची है तो यह निश्चित रूप से हर भारतीय के लिए गौरव की बात है.

हालांकि इसे भी लेकर विवाद हो जाता है कि चाय बेची या न बेची. न भी बेची तो क्या इसमें कोई शक है कि प्रधानमंत्री किसी साधारण परिवार से नहीं आते हैं. बिल्कुल आते हैं. राजनीति में वही साधारण परिवार से नहीं आते हैं, ऐसा करिश्मा बहुतों ने किया है. कर्पूरी ठाकुर से लेकर कांशीराम तक. प्रधानमंत्री की कामयाबी उसी सिलसिले में एक और गुलाब जोड़ती है.

मगर हम यह भी तो देखेंगे कि तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद आगे की यात्रा में धन और तकनीक के जिस स्तर का इस्तेमाल हुआ, उसका आधार क्या था? क्या एक ग़रीब परिवार से आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी राजनीति में किसी सादगी का प्रतिनिधित्व करते हैं या वैभव का? उस वैभव का आधार क्या है, उसके संसाधन के आधार क्या हैं? और क्या यही आधार सभी भारतीय राजनीति दलों की सच्चाई नहीं है?

एक नेता का मूल्यांकन इस बात से किया जाना चाहिए कि वह अपने विरोधियों का सम्मान कैसे करता है. लोकसभा चुनाव के दौरान वे राहुल गांधी को शहज़ादा कहते रहे, अमित शाह राहुल बाबा.

मुझे नहीं लगता राहुल गांधी ने कभी प्रधानमंत्री जी या मोदी जी से कम पर उन्हें संबोधित किया होगा बल्कि राहुल गांधी को कई बार मोदी मुर्दाबाद के नारे पर अपने कार्यकर्ताओं को टोकते सुना है. क्या यह सही नहीं है? जब आपका विरोधी आपका नाम आदर से ले रहा है तो क्या आपका लोकतांत्रिक फर्ज़ नहीं बनता कि आप भी आदर से लें?

परिवारवाद का मुद्दा पारदर्शिता से शुरू होता है. इस पर सभी दलों के संदर्भ में बहस होनी चाहिए. क्या कोई भी दल पारदर्शिता के पैमाने पर आदर्श है? राजनीतिक दलों को जो चंदे मिलते हैं, उसकी पारदर्शिता के लिए प्रधानमंत्री ने क्या किया है?

इस मामले में वे भी वही करते हैं जो बाकी करते हैं. परिवारवाद एक समस्या है तो फिर यूपी चुनाव के समय जीतने के लिए अपनी पार्टी के भीतर परिवारों को क्यों गले लगा रहे थे? वसुंधरा राजे परिवारवाद नहीं हैं तो क्या हैं? क्या प्रधानमंत्री ने इस मसले को लेकर अपनी पार्टी के भीतर कोई ईमानदार और साहसिक बहस या प्रयास किया है?

कांग्रेस से उनका सवाल सही है, कांग्रेस का भी भाजपा से सवाल सही है कि आपके यहां भी तो मनोनयन होता है. जवाब कोई एक-दूसरे को नहीं देता है. भाजपा को पता है कि उनके यहां का आतंरिक लोकतंत्र कैसा है.

क्या भाजपा में चुनाव होता है, क्या कांग्रेस में चुनाव होता है? इस सवाल को सिर्फ राहुल गांधी के लिए रिज़र्व नहीं रखना चाहिए वरना यह सवाल भी अपने आप में परिवारवादी बन जाएगा, इसे सबके लिए उठाना चाहिए. एक अंतिम राय आनी चाहिए न कि औरंगज़ेब राज जैसे बयान.

(यह लेख मूलत: रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा पर प्रकाशित हुआ है)