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छह दिसंबर हिंदुओं के लिए पश्चाताप, क्षमायाचना और आत्मचिंतन का दिन होना चाहिए

पच्चीस साल पहले आज ही के दिन स्वयं को रामभक्तों की सेना कहने वालों ने एक ऐसा जघन्य कृत्य किया था जिसके कारण पूरी दुनिया के सामने हिंदू धर्म का सिर हमेशा के लिए कुछ नीचे हो गया.

अयोध्या के नया घाट स्थित सरयूतट. (फोटो: कृष्णकांत)

अयोध्या के नया घाट स्थित सरयूतट. (फोटो: कृष्णकांत)

छह दिसंबर हिंदुओं के लिए पश्चाताप, क्षमायाचना, आत्मचिंतन और अनुशोच का दिन होना चाहिए. न कि गर्व और शौर्य का. खासकर उनके लिए जो स्वयं को राम का भक्त कहते हैं. क्योंकि आज ही के दिन पच्चीस साल पहले उनके नाम पर उनकी तरफ से स्वयं को रामभक्तों की सेना कहने वालों ने एक ऐसा जघन्य कृत्य किया था जिसके कारण पूरी दुनिया के सामने हिंदू धर्म का सिर हमेशा के लिए कुछ नीचे हो गया. वह कृत्य कायरता का था, धोखेबाजी का था और उससे भी बढ़कर अपने पड़ोसियों के विरुद्ध मन में जमी घृणात्मक हिंसा का था.

6 दिसंबर, 1992 को क्या हुआ था, हम याद कर लें. पूरे भारत से लाखों की तादाद में हिंदू अयोध्या में इकट्ठा हुए थे. उन्हें जमा किया था लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, भारतीय जनता पार्टी ने. हिंदुओं को बताया गया था कि उनके आराध्य राम का जन्म जिस स्थल पर हुआ था उसपर विधर्मियों ने कब्जा कर लिया था और उसपर एक मस्जिद बना ली थी. विधर्मियों के कब्जे से भगवान के जन्मस्थल को मुक्त कराना प्रत्येक हिंदू का धार्मिक कर्तव्य है, यह हमें बताया गया.

उसके पहले घर घर से ईंट एकत्र की गई और अयोध्या ले जाई गई थी. कहा गया था कि आपकी ईंटों से भगवान का राम का भव्य मंदिर बनेगा. मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा जो दे रहे थे वे उसी सांस में कह रहे थे कि मस्जिद को कुछ नहीं किया जाएगा. हमने उनसे यह न पूछा कि वहीं मंदिर कैसे बन सकता था जब अभी वहां मस्जिद है! तो क्या हमारे नेता अर्धसत्य बोल रहे थे जिसे असत्य से भी बड़ा पाप कहा गया है?

क्या अर्धसत्य बोलने के कारण सत्यमूर्ति युधिष्ठिर को दंड नहीं भोगना पड़ा था? क्या हम सब भी जानते थे हमारी तरफ से अदालतों को, राष्ट्रीय एकता परिषद को और बाकी सबको जो यह कहा जा रहा था कि 6 दिसंबर को तो मात्र सांकेतिक कारसेवा होगी, वह असत्य था और असल इरादा कुछ और था?

1992 की छह दिसंबर को जो लाखों हिंदू अयोध्या में इकठ्ठा हुए, वे क्या अचानक ही एक हिंसक भीड़ में बदल गए? क्या अचानक ही उनके भीतर उबाल आ गया और उन्होंने मस्जिद ढहा दी? क्या यह क्षणिक उन्माद था? पचीस साल बाद हमारे भीतर यह साहस होना चाहिए कि हम कह सकें कि यह सब कुछ अर्धसत्य था, कि हमारे नेताओं ने तैयारी कर रखी थी कि मस्जिद ढहा दी जाए. यह भी कि हममें से जो अयोध्या में इकठ्ठा हुए उनके मन में रामभक्ति उतनी न थी, जितनी मुसलमानों के खिलाफ नफरत थी.

हम राम के प्रति अपनी भक्ति के कारण उतना नहीं इकट्ठा हुए थे बल्कि मुसलमानों को अपमानित करने और उन्हें सबक सिखाने के लिए जमा हुए थे. यह सबकुछ दबा ढंका न था. लालकृष्ण आडवाणी जो टोयोटा गाड़ी को रामरथ का रूप देकर पूरा देश घूम रहे थे, उनके काफिले और उनकी सभाओं में लगने वाले नारे राम की भक्ति के जितने न थे, उतने मुसलमानों को गाली देने वाले थे.

हम यह भी जानते हैं और तब भी जानते थे कि जिसे राम की जन्मभूमि कहा जा रहा है, वह हमारे पूर्वजों के लिए कभी तीर्थस्थल न था. बल्कि इस आंदोलन के पहले हममें से ज़्यादातर ने इसका नाम भी न सुना था. हमने एक असत्य का निर्माण किया और उसमें खुद को विश्वास दिलाया.

यह असत्य यह था कि 1949 की नवंबर की एक रात अचानक उस मस्जिद में जिसे बाबरी मस्जिद कहते हैं, भगवान रामलला की मूर्ति प्रकट हुई. ऐसे असत्य हम छोटे-छोटे स्तर पर अपने गांव-घर में होते देखते आए हैं. अचानक किसी जगह किसी देवता की मूर्ति का प्रकट होना, किसी के घर पीपल का बिरवा देख उसे पवित्र स्थल घोषित कर देना. हम जानते हैं कि यह सबकुछ संपत्ति, भूमि हड़पने के तरीके हैं.

इसलिए जब रामलला को मस्जिद के भीतर प्रकट करवाया गया तो हमें मालूम होना चाहिए था कि यह उस मस्जिद को हड़पने के लिए किया गया छल है. जिन्होंने किया था, उन्हें यह पता था और बाद में बड़ी शान ने उन सबने यह ऐलान भी किया.

हमें मालूम था कि हम फैजाबाद और अयोध्या के उस इलाके के मुसलमानों के उपासनास्थल को हड़प रहे हैं. वह भी इस नाम पर कि हम राम को उनका जन्मस्थल वापस दिला रहे हैं!

यह एक बड़ा झूठ था और पाप था. क्योंकि हम किसी और के पवित्रस्थल पर धोखे से कब्जा कर रहे थे. क्या किसी और के पवित्रस्थल से उन्हें बेदखल करना धर्म है? क्या यह हिंदूपन है? क्या यह रामभक्त का आचरण है कपट, झूठ का सहारा लेना?

दूसरी बात यह कि राम के जन्मस्थल को मुक्त करने का अहंकार क्या अपने आप में पाप नहीं है? क्या हम किसी तीर्थस्थल पर किसी आक्रमण या हिंसा की भावना से जाते हैं या भक्ति की भावना से? कुंभ हो या बैद्यनाथ धाम, पहुंचकर हमारे मन में विनय और श्रद्धा जागती है या विजय का अहंकार और हिंसा?

जो 6 दिसंबर को अयोध्या में लालकृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगियों के कहने पर इकठ्ठा हुए थे, वे एक बार आत्मसमीक्षा करें: किस भावना से गए थे वहां?

क्या उनमें वीरता थी? फिर 6 दिसंबर के बाद उनमें से ज़्यादातर ने मुक्त कराए गए स्थल की रक्षा के लिए वहां रुकने का साहस क्यों न दिखाया? क्यों सारे नेता पहले हंसे, एक दूसरे को गले लगाया, शाबाशी दी और बाद में रोनी सूरत बनाकर कहने लगे कि यह उनके जीवन का सबसे बुरा दिन था? और झूठ कौन बोल रहा था? और कौन झूठ पर विश्वास कर रहा था?

जो हो, यह तय है कि 6 दिसंबर के बाद से हम यह कहने की हालत में नहीं रह गए कि हम उस धर्म को मानने वाले हैं जिसने गांधी को पैदा किया था, एक ऐसा गर्वीला हिंदू जिसे दुनिया के सभी धर्मों के बड़े-बड़े लोगों ने आश्चर्य और कुछ ईर्ष्या से देखा था. ईसाई हों या मुसलमान, सबने उस हिंदू को अपने वक्त का सबसे बड़ा ईसाई और मुसलमान माना. जिसने सारी कमियों के बावजूद अपने धर्म को छोड़ने से इन्कार किया. जिसने कहा कि उसके लिए राम नाम से बड़ी कोई औषधि नहीं है.

गांधी का हिंदू धर्म वीरों का था. उसमें छल, कपट, धोखे और कायरता की कोई जगह न थी. इसीलिए जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भी वहां की सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया तो अपना हर कदम, हर निर्णय खुलेआम घोषित किया. अपने आंदोलन के एक-एक चरण को उन्होंने प्रकाशित किया और सरकार को पहले से बताकर ही उसकी मुखालिफत शुरू की.

गांधी ने कहा कि मुझे किसी से भय नहीं जबतक मेरे पास राम नाम है. यही संदेश उन्होंने अपने देशवासियों को दिया. हथियार नहीं, हिंसा नहीं, राम नाम ही तुम्हारा अस्त्र होगा और राम नाम ही तुम्हारा कवच होगा.

गांधी का राम किसी भूगोल का बंदी न था. वह कोई दो हाथों, दो पैरों वाला न था. वह सर्वव्यापी भावना है. तुलसी ने राम को जिस ईश्वर का अवतार कहा है, जिसे पुत्र रूप में प्राप्त करने को राजा और रानी ने सहस्रों वर्षों का ताप किया, उसके बारे में वे लिखते हैं:

नेति नेति जेहि बेद निरूपा, निजानंद निरुपाधि अनूपा.
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना, उपजहिं जासु अंस ते जाना.

जो निजानंद को परपीड़ा का बहाना बनाता है, जो राम के नाम पर वस्तुतः खुद सत्ता हथियाना चाहता है, उसकी दुर्दशा भी लालकृष्ण आडवाणी जैसी ही होती है. अभी भी उनके लिए समय है कि वे सच बोलने का साहस जुटा सकें.

आडवाणी जो करें वह उनका मामला है. उन्होंने जो हम हिंदुओं की मति हर ली थी, आज चौथाई सदी बीत जाने के बाद हम अपनी इस कमजोरी का कारण समझने का प्रयास करें. अगर पराए की संपत्ति से हम समृद्ध होते हैं तो इसमें हमारा क्या पराक्रम है? हमने अपने राम को अपनी क्षुद्रता के लिए जो आड़ बनाया, उसका क्या प्रायश्चित है, इस पर विचार करें.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं.)