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कम से कम हमारे हिंदुस्तान में तो ऐसा कुछ नहीं होता…

अफ़राज़ुल हत्याकांड: ये तीन लोगों की कहानी है. भगवान, अल्लाह, गॉड, इलाही जिसको भी आप मानते हो, वो कहता है, साउंड, कैमरा, एक्शन और एक सीन शुरू होता है.

इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त

इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त

ये तीन लोगों की कहानी है, दो आदमी फ्रेम में हैं, लेकिन यहां तीसरा कोई और भी है जो शायद फोन के कैमरे से, ये सब शूट कर रहा है. आगे खड़ा आदमी कोट-पैंट पहने है पर ये शादी में पहनने वाला कोट-पैंट नहीं है. ये वो कोट-पैंट है जो ठेलों पर मिलते हैं, जिन्हें कुछ लोग मरे हुए अंग्रेजों के कपड़े कहते हैं. उसके सर एक मंकी कैप भी है. 100 प्रतिशत गरीब आदमी है. जो भी ड्रेस डिजाइनर है उसने कमाल का काम किया है. देखते ही पता चल जाता है.

दूसरा आदमी पीछे है. उसने रानी कलर की फुल स्लीव की टीशर्ट पहनी है, सफेद पैंट है और सफेद ही जूते हैं. गले में उजला सफेद रंग का मफलर भी है. कानों में शायद मुर्कियां भी हैं. सफेद पैंट को एक काली बेल्ट संभाली है और वो रानी कलर की टीशर्ट बड़े तमीज से पैंट में घुसी है. चेहरे पर दाढ़ी और मूंछें भी हैं.

भगवान, अल्लाह, गॉड, इलाही जिसको भी आप मानते हो, वो कहता है, साउंड, कैमरा, एक्शन और एक सीन शुरू होता है. पर ये साउंड, कैमरा, एक्शन, आप वीडियो में कभी नहीं सुनोगे, ये आपके लिए नहीं है.

सिंगल टेक है, यानी कोई कट नहीं. पूरा सीन या एक्शन सिक्वेंस बिना शॉट काटे फिल्माया जायेगा. इस फिल्म का डायरेक्टर खुद भगवान है लेकिन स्क्रिप्ट रानी कलर की टीशर्ट पहने आदमी ने लिखी है. वो इस फिल्म का हीरो भी है.

एक्शन शुरू होता है: पीछे खड़ा आदमी स्कूटर के पायदान से एक सफेद प्लास्टिक की बोरी उठता है. और उसके दूसरे हाथ में एक कुदाल है. इन लोगों के सामने कुछ पेड़ और कुछ झाड़ियां हैं.

कोट पैंट वाला आदमी पूछता है ‘कांटा लगे न’. शायद ये पूछ रहा है कि कहीं इन झाड़ियों में कांटे न हों और उसके पैर में कांटा न लग जाये जाए. ये लोग चलने लगते हैं. अचानक चलते-चलते पीछे चलता रानी कलर की टीशर्ट वाला आदमी सफेद बोरी नीचे रखता है और आगे चलते आदमी की पीठ पर निशाना बांध कर कुदाल से वार करता है.

अगर आप ध्यान से सुनो तो कुदाल के पीठ से टकराने की एक आवाज आती है. आगे चलता वो गरीब आदमी इतना भौचक्का रह जाता है, कि इतनी जोर से पड़ी कुदाल के बावजूद उसके मुंह से आवाज तक नहीं निकलती. वो अपना संतुलन जरूर खो देता है. पर आप आवाज की फिक्र न करें, फिर बहुत सारी आवाजें निकलती है.

शायद आवाजें कम थीं, गुहारें ज्यादा थी – ‘अरे मर गया’ पर वीडियो का साउंड अजीब सा था, इसलिए सुनने में आ रहा था ‘अरे मार गए’. या शायद वो शख्स बंगाली था, इस वजह से उसका लहजा ऐसा रहा होगा.

मैंने 7-8 बार वीडियो देखा और गिना. करीब 1 मिनट 7 सेकंड के बीच उसे 15-18 बार कुदाल मारी गई. वो करीब 40-45 बार चिल्लाया ‘अरे मार गए’ या ‘मार गए बाबू’. और करीब 7-8 बार चिल्लाया ‘बाबू जान बचाओ!’ ये आखिरी वाली गुहार शायद उसके लिए थी जो फोन पर ये विडियो शूट कर रहा था.

पहली बार जब आप इस वीडियो को देखोगे तो कम से 10-15 बार अपनी आखें बंद कर लोगे. आपकी पीठ में अचानक एक सिहरन सी दौड़ेगी जो आपके हाथ-पैर को ठंडे कर देगी. एक-दो बार आपको लगेगा ये सारी कुदालें आपके ही शरीर पर लग रही हैं. पर फिकर न करें ये सब आपके साथ नहीं हो रहा है. आप मस्त अपने फोन या लैपटॉप के स्क्रीन के सामने बैठे हैं.

अब, वो कोट-पैंट वाला जमीन पर मुंह के बल औंधा जमीन पे पड़ा है, आपको लग रहा है वो मर चुका है. कुदालों का सिलसिला खत्म होता होता है. वो रानी कलर की टीशर्ट वाला आदमी सफेद बोरी से एक दरांती नुमा हथियार निकलता है, उस कोट-पैंट आदमी की तरफ चलते हुए वो कैमरे के पास से निकलते हुए निर्देश देता है शूटिंग चलते रहने दो.

फिर वो जाकर उस जमीन पर पड़े हुए आदमी की गर्दन पर वार करता है. उस जमीन पर पड़े हुए आदमी के निर्जीव शरीर से एक वार से अजीब सी हरकत होती है. शायद अभी तक वो मरा नहीं था. एक कंपकपी आपके कंधों से भी छूट जाती है.

मजा नहीं आ रहा रहा ना? मैं क्या ये कोट-पैंट वाला आदमी और रानी कलर की टीशर्ट वाले आदमी की बात कर रहा हूं. इन लोगों को कुछ नाम देते हैं जिस से थोड़ा सा इमोशनल कनेक्ट आये.

तो कोट-पैंट वाले को नाम देते हैं. संदीप दास, क्योंकि उसका लहजा बंगाली है, शायद बंगाली ही होगा. और रानी कलर की टीशर्ट वाले को नाम देते हैं. अल बगदादी. अब कुछ लग रहा है कि असली फिल्म चल रही है.

अब थोड़ी पिक्चर रिवाइंड करते हैं. तो बगदादी जाता है और संदीप की गर्दन पर दरांती नुमा हथियार से वार करता है. और फिर बगदादी पलट कर कैमरे में देखता है और अरबी में बकना शुरू करता है. तब हमें पता चलता है की ये तो आईएसआईएस का वीडियो है.

शायद सीरिया या इराक में बना है. वो जो अरबी में बक रहा है उसके नीचे सबटाइटल आ रहे हैं. वो किसी जिहाद की बात कर रहा है. जिसके लिए वो दुनिया के सारे कुफ्फारों को जान से मरने की धमकी दे रहा है.

मुसलमानों को जिहाद के लिए उकसा रहा है. फिर वो वापस पलटता है और एक और वार संदीप की गुद्दी पर करता है, इस बार संदीप के शरीर में शायद कोई जान नहीं बची है.

बगदादी की अब सांस फूलने लगी थी. फिर वो चलता हुआ स्कूटर की तरफ गया पीछे तीतर के बोलने की आवाज आ रही थी. पर तभी कैमरा पलटता है और संदीप के शरीर पर आता है, वो तो अभी भी जिंदा है.

उसके कराहने की अभी आवाज आ रही है. पर तभी वो मनहूस बगदादी वापस फ्रेम में आता है वो पेट्रोल से भरी एक बोतल साथ लेकर आया है और वो पेट्रोल संदीप के ऊपर छिड़क देता है. अब आपका खून जमने लगता है.

फिर बगदादी बड़े ध्यान से झुक कर संदीप के शरीर में आग लगा देता है. वो ये काम इतने ध्यान से करता है कि कहीं पेट्रोल की लपट उस तक ना आ जाये. संदीप का शरीर एक आग का गोला बन जाता है और आपकी सांस जैसे आपके गले में फंस जाती है. आप अपने सीने में जोर लगा कर सांस भरते हैं.

फिर वापस बगदादी कुछ अरबी में बकता है. पर अब तक आपका दिमाग उसकी किसी बात को सुनने को तैयार नहीं है. आपके दिमाग में सिर्फ संदीप के परिवार का नक्शा घूम रहा है.

उसकी अगर बीवी है तो उसका क्या होगा? उसके बच्चों का इसमें क्या कसूर था. वो हिंदू था क्या सिर्फ इसलिए इस वहशी बगदादी ने उसे मार दिया? क्या फायदा ऐसे धरम का जो आपको किसी निर्दोष की जान लेने के लिए उतारू कर दे?

ऐसे न जाने कितने ही सवाल आपके दिमाग में चल रहे होते हैं. गुस्सा आ रहा होता है अपनी मजबूरी पर कि आप कुछ नहीं कर सकते हो. कभी आप मजहब को दोष देते हो तो कभी लोगों को.

कभी आप सोचते हो कि दुनिया विनाश की तरफ बढ़ रही है. तो कभी आप सोचते हो, कुछ लोग सिर्फ दुनिया को जलते हुए देखना चाहते हैं.

पर फिर तभी एक ऐसा ख्याल आता है और दिल में थोड़ी सी ठंडक हो जाती है. आप ये सोच कर खुश हो जाते हो कि कम से कम हमारे हिंदुस्तान में तो ऐसा कुछ नहीं होता है…

जय हिन्द.

(दाराब फ़ारूक़ी पटकथा लेखक हैं और फिल्म डेढ़ इश्किया की कहानी लिख चुके हैं.)