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‘राहुल के सवालों का ही नतीजा है कि मोदी केवल हिंदू-मुस्लिम एवं पाकिस्तान की बात कर रहे हैं’

विपक्षी नेताओं को उम्मीद, गुजरात चुनाव के नतीजे अनुकूल हुए तो विपक्षी एकता में नई जान फूंक सकेंगे राहुल गांधी.

गुजरात में प्रचार के दौरान लोगों से मिलते राहुल गांधी. (फोटो साभार: @INCIndia)

गुजरात में प्रचार के दौरान लोगों से मिलते राहुल गांधी. (फोटो साभार: @INCIndia)

नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की ताजपोशी लगभग तय होने के बीच अनेक विपक्षी दलों का मानना है कि वह भाजपा को केंद्र की राजनीति में कड़ी टक्कर देने और क्षेत्रीय दलों की आपसी विसंगतियों को साधकर उन्हें साथ लेकर चलने में अपनी मां और मौजूदा पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की तरह ही कारगर साबित होंगे. इन दलों का मानना है कि गुजरात चुनाव में यदि कांग्रेस के पक्ष में अच्छे परिणाम आए तो वह विपक्ष की एकता में नए प्राण फूंकेंगे.

कुछ विपक्षी नेताओं का यह मानना है कि विपक्षी दलों पर इस बात का दबाव है कि यदि वे मिलजुल कर चुनाव नहीं लड़ेंगे तो उनके अस्तित्व पर खतरा आ सकता है. इसलिए राहुल को विपक्ष की एकता कायम करने में अधिक दिक्कत नहीं आनी चाहिए.

राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए एकमात्र उम्मीदवार रह गए हैं. 11 दिसंबर को पार्टी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि है. पार्टी संविधान के अनुसार, इसके बाद ही नये अध्यक्ष के निर्वाचित होने की घोषणा की जाएगी.

राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की औपचारिक घोषणा से पहले ही राजद प्रमुख लालू प्रसाद एवं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने घोषणा कर दी है कि उन्हें राहुल के साथ काम करने में कोई कठिनाई नहीं है.

विपक्षी एकता कायम रखने में राहुल कितने कारगर होंगे. इस सवाल पर द्रमुक नेता तिरुचि शिवा ने कहा, राहुल गांधी एक होनहार युवा नेता हैं. वह कांग्रेस के लिए मूल्यवान साबित होंगे. सोनिया गांधी की ही तरह राहुल गांधी के भी उनकी पार्टी और उसके नेतृत्व के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं.

सपा नेता नरेश अग्रवाल का मानना है कि किसी के बारे में पहले से ही आकलन करना गलत है. उन्होंने कहा जब आदमी किसी पद पर बैठता है तो कुर्सी आदमी को खुद ही लायक बना देती है. इस काम में मुझे नहीं लगता कि कोई दिक्कत आनी चाहिए. जब सभी विपक्षी दलों का लक्ष्य है कि भाजपा को हराओ तो इसमें दिक्कत क्या आएगी.

राज्यसभा सदस्य शिवा ने कहा कि राहुल गांधी की अगुवाई में यदि गुजरात में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहता है तो निश्चित तौर पर इससे विपक्षी एकता को मजबूती मिलेगी. उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता की मजबूती के लिए अन्य गैर भाजपा दलों के साथ साथ कांग्रेस का मजबूत होना भी बहुत जरूरी है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता तारिक अनवर ने कहा, सभी विपक्षी दलों के साथ राहुल के पहले से अच्छे संबंध हैं. इसको वह आगे और मजबूत बनाएंगे.

सोनिया के मुकाबले राहुल के सामने अधिक चुनौतियां होने के बारे में पूछने पर सपा नेता नरेश अग्रवाल ने कहा, चुनौती स्वीकार करेंगे तो आगे और परिपक्व होंगे. जो आदमी लड़कर सत्ता पाता है उसका महत्व उतना ही बढ़ता है.

राजद नेता शिवानंद तिवारी का भी मानना है कि राहुल को विपक्षी दलों को साथ लेकर चलने में कोई परेशानी नहीं आनी चाहिए. उन्होंने कहा, कांग्रेस आज कमजोर नजर आ रही है, बावजूद इसके भाजपा के बाद वही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसका अखिल भारतीय स्तर पर आधार है. हर राज्य में उसके कुछ न कुछ लोग हैं. इसे सब महसूस कर रहे हैं. अन्य पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियां हैं और इसका उनको अहसास भी है.

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने जिस तरह गुजरात में चुनाव प्रचार किया है, इससे उनको जरूर फायदा मिलेगा. राहुल गांधी के प्रचार और उनके द्वारा पूछे जा रहे सवालों का ही नतीजा है कि प्रधानमंत्री केवल हिंदू-मुस्लिम एवं पाकिस्तान की बात कर रहे हैं.

तिवारी ने कहा कि आज सभी विपक्षी दलों पर इस बात का दबाव है कि यदि वे मिलजुल कर नहीं लड़ेगें तो उनके अस्तित्व पर खतरा आ सकता है. गुजरात में यदि कांग्रेस को कुछ भी सफलता मिली तो विपक्ष का मनोबल बढ़ेगा.

गुजरात चुनाव में कांग्रेस पर नरम हिंदुत्व की राह पर चलने के आरोपों से क्या राहुल को धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखने वाले कई विपक्षी दलों को साथ में लाने में कठिनाई होगी. इस पर तिवारी और तारिक दोनों ने कहा कि मंदिरों में जाना नरम हिंदुत्व नहीं है.

तारिक ने कहा, मंदिरों में जाना कोई एकाधिकार की बात नहीं है. हमें याद है कि इंदिराजी जब किसी राज्य का दौरा करती थीं तो वह भी मंदिरों में जाती थीं. मैं भी उनके साथ कई मंदिरों में गया था. लेकिन कांग्रेस ने उसका राजनीतिकरण नहीं किया. पूजा-इबादत व्यक्तिगत मामला है. सब की अपनी अपनी आस्था है.

तिवारी ने कहा कि कांग्रेस विचारधारा के स्तर पर आज भी धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्ध है. हमारे यहां धर्मनिरपेक्षता का मतलब धर्म का विरोध नहीं है. महात्मा गांधी हमेशा अपने को सनातन हिंदू कहते थे किंतु क्या कोई उनसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष हो सकता है.

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