भारत

शंभूलाल जैसे मानव बम राजनीति और मीडिया ने ही पैदा किए हैं

बीसियों साल से जिस तरह की विभाजनकारी राजनीति हो रही है, मीडिया के सहयोग से जिस तरह समाज में ज़हर बोया जा रहा है, उसकी फसल अब लहलहाने लगी है.

राजस्थान के राजसमंद के एक मुस्लिम श्रमिक की हत्या कर शव को जलाने वाला शंभुलाल रैगर.

राजस्थान के राजसमंद में एक मुस्लिम श्रमिक की हत्या कर शव को जलाने वाला शंभूलाल रैगर.

पिछले हफ्ते छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं बरसी मनाई गई. मीडिया के कैलेंडर में 25 वर्षों से इस तारीख़ का ख़ासा महत्व रहा है. इस दिन के लिए मीडिया हाउस अपनी ख़ास पेशकश लेकर हाज़िर होते हैं.

इसके लिए कथित साधु-संतों और मुल्ला-मौलवियों का इंतज़ाम किया जाता है. इस ख़ास तारीख़ पर उनके मुखारबिंदु से निकले हर एक शब्द की कीमत होती है.

यह अलग बात है कि पत्रकारीय सिद्धांतों के तराज़ू पर उनके शब्दों को अगर तौला जाए तो शायद ही कुछ छापने/दिखाने लायक हो.

वैसे मीडिया में ये कथित साधु-संत, मुल्ला-मौलवी अथवा धर्म के नाम पर दुकानें सजाने वाले अब केवल मंदिर-मस्जिद और धार्मिक मसलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. मोदी सरकार बनने के बाद से इनका दायरा बढ़ता गया है.

अचानक वह सभी विषयों के ज्ञाता हो गए हैं तभी तो मीडिया में उन्हें हर विषय पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए बुलाया जाता है.

विधानसभाएं तक उनका ज्ञान प्राप्त करने लगी हैं. वह बहस में इतने निपुण हैं कि भाजपा प्रवक्ताओं की तरह हर विषय को हिंदू-मुस्लिम में बदल देते हैं.

अयोध्या विवाद को लेकर जितना सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ उतना किसी दूसरे मसले पर नहीं हुआ. इसके बहाने देश के अनेक हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे हुए. समाज में अविश्वास की खाई बढ़ी. साथ ही भाजपा जैसे दल को अपार मज़बूती मिली.

इतनी मज़बूती कि आज वह केंद्र से लेकर 18 राज्यों में सत्ता का सुख भोग रही है. यही वजह है कि अयोध्या विवाद लगातार चुनावी मुद्दा बना हुआ है.

उसका लाभ उठाने में किसी तरह की कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है. इसी परिप्रेक्ष्य में दिल्ली में मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है और उसे मीडिया में महत्व मिल रहा है, वह ख़तरनाक है.

पिछले कुछ समय से एक जुमला उछाला जा रहा है, ‘केंद्र में मोदी, प्रदेश में योगी, प्रदेश से 71 सांसद, 18 राज्यों में हमारी सरकारें, ऐसे में अब मंदिर नहीं बनेगा तो कब बनेगा.’

इस जुमले को मीडिया में ख़ूब प्रमुखता मिल रही है.

गत छह दिसंबर की विशेष कवरेज में भी इसे महत्व दिया गया. कारसेवा में हिस्सा लेने वालों को अख़बारों ने गौरवान्वित करते हुए छापा. उन्हें शहीद तक बताया जाता है.

ऐसा करते हुए जहां हिंदू धर्म को गौरवान्वित किया जाता है वहीं मुस्लिम धर्म के प्रति नकारात्मक भाव होता है. इस हरकत से संतुलित पत्रकारिता वाली नैतिकता को तिलांजलि दी जाती है तो हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच विद्वेष फैलाया जाता है.

पिछले वर्षों की अपेक्षा इस बार छह दिसंबर की तारीख़ थोड़ी अलग थी. अलग इस संदर्भ में कि एक दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल के मालिकाना हक संबंधी विवाद में सुनवाई होनी थी. लेकिन मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त वाली कहावत पर अमल करते हुए अख़बार ख़बर पर ख़बर उड़ेल रहे थे तो चैनलों पर शो की दुकानें सजी थीं.

गुजरात विधानसभा चुनाव अपने चरम पर था, सो सोने पर सुहागा. यानी एक बार फिर अयोध्या चुनावी चकल्लस के केंद्र में आ गया. फिर इसकी किसे परवाह कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है.

खैर, इसकी परवाह राजनीतिक दलों से लेकर मीडिया तक ने कभी नहीं की. अगर की होती तो देश में जगह-जगह दंगे न हुए होते और न ही हिंदू और मुस्लिमों के बीच विश्वास की डोर इतनी कमज़ोर पड़ी होती.

इस तरह छह दिसंबर के इस बार अलग होने का पहला कारण अयोध्या मामले की सुनवाई था. दूसरा कारण, राजस्थान के राजसमंद में पश्चिम बंगाल निवासी मुस्लिम मज़दूर अफ़राज़ुल की हत्या.

तीसरा, दिल्ली के नरेला इलाके में नशे के ख़िलाफ़ काम कर रही दिल्ली महिला आयोग की एक महिला वॉलंटियर को शराब माफियाओं की शह पर पीटा जाना, उसे बीच सड़क पर कपड़े फाड़ते हुए नंगा करके घुमाया जाना और चौथा कारण था हरियाणा के यमुनानगर जनपद में पुलिसिया गिरोह द्वारा दौलतपुर निवासी वृद्ध मोहम्मद की पीट-पीटकर हत्या.

ये चारों घटनाएं छह से सात दिसंबर के बीच घटीं. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसी से सरोकार नहीं रहा. उन्होंने भाजपा की विचारधारा पर मुहर लगाने वाली अयोध्या मामले की सुनवाई वाली घटना को चुना, जिसमें एक पक्षकार की ओर से अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायालय से 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव तक सुनवाई टालने की अपील की थी.

उन्होंने गुजरात में चुनाव प्रचार करते हुए सवालिया लहज़े में पूछा, क्या वक़्फ़ बोर्ड चुनाव लड़ता है? क्या चुनाव के लिए सुनवाई टालने के विचार वक़्फ़ बोर्ड के हैं? आप (कपिल सिब्बल) वकील के रूप में न्यायालय में थे या कांग्रेस नेता की हैसियत से?

इस तरह मोदी ने इस मामले को हिंदू बनाम मुसलमान वाली लाइन पर ले जाने का प्रयास किया. उनके कहे हर शब्द को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मानने वाले मीडिया में वही ख़बर ट्रेंड करने लगी और न्यूज़ चैनलों से लेकर अख़बारों तक के पहले पन्ने पर उसने कब्ज़ा जमा लिया.

इसकी बानगी सबसे तेज़ होने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल के एक शो की शीर्षक लाइन ‘कांग्रेसी रोड़े हैं राम मंदिर की राह में!’ से मिलती है.

अयोध्या विवाद में मीडिया (उस समय प्रिंट मीडिया ने यह काम किया था तो मौजूदा समय में टीवी न्यूज़ चैनल उससे कई क़दम आगे निकल कर यह भूमिका निभा रहे हैं) इस तरह की नकारात्मक भूमिका शुरू से निभाता रहा है, जिसके लिए वर्ष 1991-92 में प्रेस परिषद ने उसकी कड़े शब्दों में निंदा की थी तो लिब्रहान आयोग ने भी अपनी 999 पेज की जांच रिपोर्ट में उसके इस कुकृत्य (पृष्ठ 890 से 914 तक) को रेखांकित किया है.

ऐसा नहीं है कि यह केवल हिंदी मीडिया में हो रहा है. इसके जवाब में कमोबेश उर्दू पत्रकारिता का भी यही हाल है.

अगले दिन यानी 7 दिसंबर को कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर (अब निलंबित) ने ‘नीच’ शब्द का इस्तेमाल कर मोदी को सुनहरा अवसर मुहैया करा दिया.

फिर क्या था मोदी गुजरात की प्रचार रैलियों में नीच-नीच का गाना गाने लगे. उनके गाने पर मीडिया भी कथक करने लगा सो अगले दिन के अख़बारों में नीचता का बोलबाला हो गया.

चैनलों में नीच शब्द की परिभाषाएं बताई जाने लगीं. इसकी आड़ में राजसमंद, दिल्ली और यमुनानगर की बेरहम घटनाओं को मुख्यधारा के मीडिया ने महत्व नहीं दिया.

राजसमंद वाली घटना को अंदर के पृष्ठों पर कुछ जगह मिली भी, लेकिन दिल्ली और यमुनानगर की घटना को तो पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

बात-बात पर ट्वीट करने वाले मोदी और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को ऐसी घटनाओं पर ट्वीट करने की फुरसत नहीं मिली.

ख़ैर, वसुंधरा राजे से उम्मीद क्या की जाए… उन्होंने तो पिछले आम चुनाव के दौरान ही मुसलमानों के लिए अपने विचार ज़ाहिर कर दिए थे कि चुनाव के बाद पता चलेगा कि किसके टुकड़े होंगे.

यह बयान उन्होंने सहारनपुर से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद के उस पुराने बयान के उत्तर में दिया था जिसमें उन्होंने मोदी के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कही थी.

हालांकि इमरान का वह वीडियो पुराना था, लेकिन टीवी मीडिया ने जान-बूझकर उसे उस समय प्रसारित किया था.

भले ही वो वीडियो पुराना था लेकिन उसकी भी उतनी ही निंदा होनी चाहिए जितनी कि वसुंधरा राजे के बयान की. वैसे इस बयान के लिए इमरान को जेल जाने से लेकर क़ानूनी प्रक्रिया तक का सामना करना पड़ा था.

देश की समस्याओं और शरीर को जमा देने वाली घटनाओं को ताक पर रखकर केवल और केवल चुनाव लड़ने और जीतने के उद्देश्य के तहत काम करने वाले मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं.

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि प्रधानमंत्री का चुनाव प्रचार करना उचित नहीं है, लेकिन देश को दरकिनार कर एक राज्य के विधानसभा चुनाव प्रचार में पागलपन की हद तक डूब जाने को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.

ऐसा संभव नहीं है कि उन्हें इन घटनाओं के बारे में पता न हो. लेकिन वह अपनी रणनीति के तहत हो रही मुस्लिमों की हत्याओं पर चुप्पी साधे रहते हैं और अगर कभी होंठ खुलते भी हैं तो उस समय तक भीड़ रूपी गिरोह ‘काम को अंजाम’ देकर अपने अगले लक्ष्य को फतह करने में लग जाता है.

इसकी गवाही अख़लाक़ से लेकर गोहत्या के नाम पर आए दिन हो रही घटनाएं देती हैं.

राजसमंद में घटना को अंजाम देने वाला अपराधी ख़ुद को हिंदुत्व के लिए ऐसा करने को उचित बताता है. लव जेहाद के विरोध में ऐसा करने को सही ठहराता है.

उसने एक तीसरी बात भी कही है, जिस पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया. उसने घटना के लिए बाबरी विध्वंस वाली तारीख चुनी है.

इसके लिए वह कहता भी है कि आज के ही दिन 25 साल पहले हमारे भाइयों ने बाबरी मस्जिद को तोड़ा था. आज 25 साल बाद भी हमारा कुछ नहीं हुआ.

उसकी इस बात से समझा जा सकता है कि राजनीतिक लाभ के लिए लंबे समय से किए जा रहे धर्म के इस्तेमाल का समाज पर कैसा असर पड़ रहा है. ऐसी राजनीति करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि अगर वह इसी तरह की राजनीति करते रहे तो इस देश में सुरक्षित कौन रहेगा.

ध्यान रखिए अफ़राज़ुल को महज़ एक व्यक्ति ने नहीं मारा बल्कि उसकी हत्या हर उस नेता और संगठन ने की है जो लंबे समय से लव जेहाद के नाम पर ज़हर उगल रहे हैं.

उसकी हत्या में वह मीडिया भी बराबर का भागीदार है जिसने ऐसे जाहिल नेताओं के भाषणों और बयानों को बिना कोई सवाल उठाए हूबहू परोसने का काम किया है.

इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हत्यारे से पहले उन ज़हर उगलने वाले नेताओं, संगठनों और उनका प्रसार करने वाले उन मीडिया समूहों से दूरी बनाई जाए, जिनके कारण शंभूलाल जैसे लोग दिमागी तौर पर गुलाम बन रहे हैं.

राजसमंद की घटना के बाद राजनीतिक दलों ने हमेशा की तरह हिंसा की निंदा की, लेकिन असलियत यह है कि वही हिंसा को पालने का काम करते हैं.

उसी का इस्तेमाल कर देश की मिली-जुली संस्कृति को तहस-नहस करने वालों को बचाने का प्रयास किया जाता है.

इस घटना में भी यही देखा गया जब सोशल मीडिया पर लोग बड़ी संख्या में उसे सही ठहराने लगे. केरल और कर्नाटक का उदाहरण देते हुए उसे शाबाशी देने लगे. उसे हीरो बनाने लगे.

बताने लगे कि मुसलमानों के साथ ऐसा ही होना चाहिए. उनकी नज़र में इतना ही काफी था कि मारने वाला ‘हिंदू’ है और मरने वाला मुसलमान. फिर उसने तो मारते हुए हिंदुत्व, लव जेहाद और बाबरी मस्जिद जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया है.

हत्या का वीडियो देखकर खुश होने वाली यह भीड़ दिमागी तौर पर खाली है. वह यह नहीं समझती कि हैवानियत के लिए कोई अपना और पराया नहीं होता.

हत्या का जश्न अगर इसी तरह से मनाया जाने लगा तो कोई सुरक्षित नहीं रहेगा. इस जश्न की बानगी देखने के लिए ‘स्वच्छ राजसमंद-स्वच्छ भारत’ नामक वॉट्सऐप ग्रुप को देखना ज़रूरी है, जिससे राजसमंद भाजपा के सांसद हरिओम सिंह राठौर व विधायक किरण माहेश्वरी भी जुड़े हैं.

ग्रुप पर मैसेज प्रसारित हो रहे हैं, ‘लव जेहादियों सावधान जाग उठा है शंभूलाल-जय श्री राम.’ ‘शंभू का केस सुखदेव लड़ेगा और शंभू को न्याय दिलाएगा.’ ‘वकील हो तो आप जैसा, जय मेवाड़-जय मावली.’ ‘निःशुल्क लड़ेंगे-वकील सुखदेव सिंह उज्ज्वल मावली.’

साभार : इंडियन एक्सप्रेस ई पेपर

साभार : इंडियन एक्सप्रेस ई पेपर

हालांकि द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मावली-उदयपुर निवासी वकील सुखदेव सिंह उज्ज्वल ने ऐसी किसी भी योजना से इनकार किया है. साथ ही अपने नाम से फैलाए जा रहे इन संदेशों का भी खंडन किया है.

फिलहाल बूथ स्तर तक के भाजपा कार्यकर्ताओं को जोड़ने का दावा करने वाले इस ग्रुप को प्रेमजी माली ने बनाया है, जिस पर ऊपर गिनाए गए संदेश प्रसारित किए गए.

ग्रुप पर लिखा भी है, ‘शेयर, कट, कॉपी, पेस्ट कुछ भी कर सकते हैं, बस बात दूर तक जानी चाहिए.’

इस तरह के संदेश बड़े पैमाने पर फेसबुक से लेकर ट्विटर तक फैलाए जा रहे हैं. इस माध्यम पर चलने वाले ग्रुपों में सत्ताधारी दल से जुड़े लोग भी शामिल हैं.

इसके लिए महज़ भाजपा विधायक और सांसद की क्या बात की जाए जब कुछ महीने पहले कर्नाटक में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को लेकर प्रगतिशील ताकतों ने विरोध किया तो एक मोदी समर्थक ने उन्हें कुतिया कहकर संबोधित किया.

उसने ट्वीट किया कि एक कुतिया कुत्ते की मौत क्या मरी सारे पिल्ले एक सुर में बिलबिला रहे हैं. ऐसे ट्वीट करने वाले शख़्स को प्रधानमंत्री मोदी फॉलो करते थे.

ऐसा नहीं है कि यह एक तरफ से ही हो रहा है. इसके जवाब में दूसरी तरफ से भी इसी तरह की नफ़रत भरी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है.

दरअसल पिछले वर्षों में सत्ता पाने व उसे बचाए रखने के लिए जितना झूठ फैलाया गया और नफ़रत के बीज बोए गए हैं या बोए जा रहे हैं वो राजसमंद जैसी घटनाओं के रूप में सामने आ रहे हैं.

वैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तो दिली ख्वाहिश यही रही है कि हिंदू हमला करने वाली मनःस्थिति में पहुंच जाएं सो मोदी सरकार के दौरान उन्हें यह अवसर मिल गया है.

यही कारण है कि मोदी शासनकाल में मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है और वह रणनीतिक चुप्पी साधे रहते हैं. वह गुजरात चुनाव को पाकिस्तान के बहाने हिंदू और मुसलमान में तब्दील करने में लगे हैं.

विश्लेषक परेशान हैं कि गुजरात चुनाव में पाकिस्तान की क्या भूमिका है. वह क्यों हस्तक्षेप करेगा. असल में यहां पाकिस्तान का नाम लेने की वजह मुसलमान हैं.

चुनाव में पाकिस्तान का नाम लेने का मतलब है, मुसलमानों में डर पैदा करना. साथ ही हिंदुओं के बीच संदेश देना कि मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए भाजपा को वोट देना ज़रूरी है.

अपने समर्थकों और मीडिया के ज़रिये समाज में ज़हर फैलाने वाले नेता यह समझना नहीं चाहते कि जो ज़हर वह बो रहे हैं उसकी भरपाई आने वाली पीढ़ियां भी नहीं कर पाएंगी.

वह यह समझने को तैयार नहीं कि सरकारें आएंगी और चली जाएंगी, लेकिन एक बार मनुष्य के अंदर से अगर मनुष्यता चली जाएगी, उसको वह कैसे वापस लाएगी.

ध्यान रखिए बीसियों साल से जिस तरह की विभाजनकारी राजनीति हो रही है, मीडिया के सहयोग से जिस तरह समाज में ज़हर बोया जा रहा है, उसकी फसल लहलहाने लगी है.

उदाहरण के लिए दो हिंदी न्यूज़ चैनलों के विशेष शो ‘दंगल’ और ‘ताल ठोंक के’ के पिछले एक महीने के विषय देखे जा सकते हैं, जिनसे आसानी से पता चल जाएगा कि किस तरह से वह समाज में आग लगाने का काम कर रहे हैं.

यह ज़हर रूपी फसल ही लोगों को मानव बम में तब्दील कर रही है. उसी का प्रतिफल है कि लोग हिंसा पर उतारू हैं. शंभूलाल जैसे लोग समाज के हर नुक्कड़ पर तैयार खड़े हैं. वह अपना शिकार खोज रहे हैं.

वह अपना दिमाग नहीं लगा रहे कि उनका लाभ उठाकर चंद लोग सत्ता के सिंहासन पर बैठेंगे. उन्हें क्या मिलेगा. उनका तो महज़ इस्तेमाल किया जा रहा है.

बहुत संभव है कि राजसमंद जैसी घटनाएं विधानसभा व आगामी लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि का हिस्सा हों. ऐसी हरकत करने वाले चंद दिन भले मीडिया की नज़र में हीरो बनें.

कुछ लोग उन्हें हीरो बताएं, लेकिन समय बीतने के साथ वह उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देंगे. उनके परिवार को अंधेरी कोठरी वाली गुफा में पहुंचा देंगे, जहां से बाहर आने का रास्ता नहीं होगा.

विश्वास न हो तो अयोध्या में अपनी जान देने वाले लोगों के परिवारों की पड़ताल कर लीजिए.

मोदी सरकार दिन-रात गुजरात मॉडल और विकास की बात करती है. सवाल उठता है कि अगर वह वास्तव में साढ़े तीन साल में विकास की राह पर चलती तो मुस्लिमों को निशाना बनाने वाली भीड़ सड़कों पर छुट्टा सांड़ की तरह न घूमती.

शायद शंभूलाल भी इस मानसिक दशा में नहीं पहुंचता और ख़ुद मोदी सरकार और भाजपा को भी चुनाव जीतने के लिए इतनी ज़हरबुझी भाषा का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता.

ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी ज़हरबुझी राजनीति और भाषा का इस्तेमाल करने वालों से नाता तोड़ा जाए.

समाज को तहस-नहस करने वाली घटनाओं को सही ठहराने वालों से दूरी बनाई जाए. ऐसा करने वाले अपने परिवार, बच्चों, इंसानियत और मुल्क़ में से किसी के सगे नहीं हो सकते.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)