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शंभूलाल हिंदुत्व का नया चेहरा है

शंभूलाल हमारे अचेतन की पैदाइश है. हिंदुत्व का मध्यवर्गीय नायक, जो हमारे सेकुलर सपनों और बहुलतावादी चेहरे को जला देता है.

Shambhunath Raiger Afrazul Murder

12 दिसंबर को इंडियन एक्सप्रेस  में मोहम्मद अफराजुल के बारे में सईदा हमीद का लेख पढ़ते हुए मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे. इस घटना के बारे में कुछ तो अजीब और अवास्तविक था. यह घृणा के नंगे नाच को भी मात देने वाला था. अफराजुल बंगाल के मालदा से आया हुआ एक प्रवासी-मुसलमान मजदूर था. वह अपनी जीविका के लिए राजस्थान में काम करता था. एक साधारण आदमी जो बे-चेहरा, बेनाम जी लिया होता यदि शंभूलाल में उसका यह हश्र न किया होता.

शंभूलाल बे-चेहरा नहीं है. वह नफरत और भ्रम का मध्यवर्गीय अवतार है. आज हमारा देश लोगों का समूह भर नहीं रह गया है. हम नफरत और इंतकाम के लक्षणों के समूह बन गये हैं, जिसका अधिकांश हिस्सा अवास्तविक है. यह इतिहास की बीमारी पर आधारित है, जहां हमारा जेहन और हमारी स्मृतियां अब भी मुगलों को परास्त करने में लगी हुई हैं. इससे लव जिहाद, घेर कर लोगों को मारने वाली भीड़ या पद्मावती की मर्यादा की रक्षा करने पर उतारू भीड़ जैसी कई बीमारियां पैदा होती हैं.

ऐसा लगता है कि हमारा इतिहास ही एक बीमारी बन बैठा है क्योंकि अब इसके बारे में ऐतिहासिकता के आलोक में बात नहीं होती. अब इतिहास एक सनसनीखेज नाटक की पटकथा बन गया है जिसमें एक मध्यवर्गीय आदमी शिवाजी या राणाप्रताप की भूमिका में है, विदेशी आक्रान्ताओं और विधर्मियों का वध कर रहा है. उसने मान लिया है कि मुसलमान मजदूर विधर्मी मुगल है.

मुसलमान अब हमारा पड़ोसी नहीं रह गया है जिसके साथ हम रहते आये थे. इस्लाम अब हमारे लिए वह धर्म नहीं रह गया है जो सूफी संस्कृति और कबीर की कविताओं में रचनात्मक समन्वय बनाता था. मुसलमान अब दुश्मन है और हम उसका सफाया करना चाहते हैं. हिंदुत्व के इस दौर में कुछ लोगों को लगता है कि जब तक उन्होंने मुसलमान या किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के साथ नृशंसता का व्यवहार नहीं किया, उनकी मर्दानगी और नागरिकता के कर्तव्य पूरे नहीं हुए.

हमारे अंदर के राक्षस के शिकार के लिए कुछ तबके हैं जिनके बारे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है जैसे कि मुसलमान, अल्पसंख्यक, मांसाहारी, लव जिहाद करने वाले वगैरह. हर दिन की हिंसा अब एकदम सहज बना दी गई है. यह हर दिन के मौसम के समाचार जितनी ही महत्वहीन हो गई है. हर घटना को ऐसी भाषा में पेश किया जाता है कि वह हमारी याददाश्त से बहुत जल्दी मिट जाये.

दूसरी हत्या में भी उतनी ही नृशंसता है लेकिन हम पहले वाली हत्या से उसका कोई रिश्ता नहीं बैठा पाते क्योंकि स्मृति या याददाश्त बहुत कम बची रह जाती है. इस घटना को अविस्मरणीय बनाने के लिए कोई कवि, चित्रकार या नाटककार मौजूद नहीं है. कोई पिकासो गुएर्निका नहीं बना रहा, कोई विल्फ्रेड ओवेन इस नृशंसता को धिक्कारने के लिए नहीं है.

ऐसा लगता है कि स्मृति और हिंसा लगभग उपभोग की चीजें बन गई हैं. आजकल हिंसा की हर कार्रवाई अपने वीडियो के साथ आती है. चाहे अखलाक हो या अफराजुल, हिंसा के बिंबों को बार-बार देखना हिंसा की घटना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है.

एक सतर्क विश्लेषक ने सुझाया कि संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती एक अधूरी फिल्म है. ऐतिहासिक पद्मावती तो इंटरवल के पहले वाले हिस्से में है. इसका दूसरा हिस्सा आज के समय में इसकी प्रतिक्रिया है, जिसमें करणी सेना जैसे समूह का निर्माण शामिल है, जिसमें अंग्रेजीदां टीवी वालों और उस महिला के बीच की मुठभेड़ भी शामिल है जो फिल्म पर प्रतिबंध के लिए लड़ रही है.

इस पूरे नाटक को इसके मुकाम तक पहुंचाता है शंभूलाल का नये हिंदुत्व वाले भारतीय के रूप में उभार. इसके विपरीत हम देखते हैं कि उदारवादी या क्रांतिकारी लोगों के विरोध की कमजोरी यह  है कि वे अप्रभावी हो चुके हैं. अब दीपिका पादुकोण हिट नहीं हैं, नया हिट है शंभूलाल. उसकी घृणा को व्याख्या की जरूरत नहीं है.

आज की हमारी प्रतिक्रिया एकदम उल्टी है. हम महसूस करते हैं कि शंभूलाल एक नाटक है और हम इस शाहकार के दर्शक हैं. उसे किसी पटकथा की जरूरत नहीं है. लव जिहाद या बाबरी मस्जिद जैसे कुछ शब्द जो किसी के खिलाफ हों पटकथा के लिए काफी हैं.

जैसे-जैसे हम बंद दिमाग और बंद अल्पसंख्यक समूहों से दो चार होते हैं हमें पता चलता है कि श्रेणियों की एक समानान्तर दुनिया गढ़ ली गई है, जिसके सामने लोकतंत्र और मानवाधिकार जैसे शब्द अपना अर्थ खो देते हैं. शंभूलाल महान भारतीय सिनेमा बन गया है. जिसके पास इतनी दृढ़ता और ताकत है कि वह महान क्लासिक फिल्म सिटिजन केन को हाशिये पर धकेल देता है.

शंभूलाल भाजपा युग का ही दूसरा चेहरा है. जब तक शंभूलाल जैसे लोग बहुमत में हैं, मोदी सरकार स्थिर रहेगी. वास्तव में शंभूलाल से एक भक्ति टपकती है, जिसे वे देशभक्ति कहते हैं. इस परियोजना में मर्दानगी का मतलब है घेरकर मारने के लिए मौजूद भीड़ जो किसी भी राह चलते को अपना शिकार बना लेती है.

शंभूलाल हमारे अचेतन की पैदाइश है. हिंदुत्व का मध्यवर्गीय नायक, जो हमारे सेकुलर सपनों और बहुलतावादी चेहरे को जला देता है. पद्मावती उन वॉल पेंटिंगों की तरह है, जिसमें ऊपर की सतह हटा देने पर एक दूसरा चित्र उभर आता है जहां पादुकोण की जगह शंभूलाल ने ले ली है.

आधुनिक भारतीय अब परिपक्व हो गया है. वह कल्पित इतिहासों और साफ सुथरी नैतिकता का पहरुआ है. वह इतिहास को प्रेतमुक्त करना चाहता है ताकि स्वयं के कल्पित आत्म के लिए जगह बन सके.

शंभूलाल नया नहीं है. वह कई अवतारों में आता है. पिछले साल उसकी हिट फिल्म अफराजुल नहीं अखलाक थी. शंभूलाल बहुसंख्यकवादी लोकतंत्र द्वारा बनाये गये रामराज्य में निर्भय होकर रहता है. उसका जवाब न तो आधुनिक मानवाधिकारों से दिया जा सकता है और न ही क्रांतिकारी समाज विज्ञान से.

उसका मुकाबला करने के लिए एक विसंगतिपूर्ण नाटक चाहिए, थोड़ा काफ्का जैसा कुछ. वह नया आम नागरिक है जिसका आत्म जनसंहार से निर्मित है. यह भारत का नया विचार जिसे भारत ने अपने लिए गढ़ा है.

हम सब नागरिक शंभूलाल हैं. उसमें हर दिन संक्रामक होने का गुण है. जब कोई उसका विरोध करने खड़ा होता है, या फिर अफराजुल के बारे में उसकी नृशंसता के बारे में लिखने की शुरुआत करता है तो उसकी मिथकीय और लोकनायक जैसी ताकतों को सामना करना पड़ता है. यह ताकत सिर्फ उससे पैदा नहीं होती. यह ताकत उन करोडों घृणाओं से पैदा होती है जिसे हमने एक समूह के बतौर पाल रखा है.

शंभूलाल का मुकाबला कैसे करें? इस शंभूलाल युग में मानवाधिकार वाला रवैया अपनाना, अल्पसंख्यकवादी भाषा में बोलना, मुआवजा मांगना आदि बेमतलब है. गांधीवादी लोग और ज्यादा अप्रासंगिक लगते हैं क्योंकि गोडसे की तरह ही शंभूलाल भी इतिहास को गांधी की प्रेतबाधा से मुक्त करना चाहता है.

शंभूलाल को एहसास है कि उसे किये का दंड नहीं मिलेगा. वह नया देशभक्त है जो मानता है कि किसी असहाय मुसलमान को मारकर वह आम आदमी का राणा प्रताप बन गया है. कार्यकर्ताओं को लड़ाई जारी रखनी होगी. आधुनिक समाज के कारखाने में शंभूलाल कैसे पैदा हो रहे हैं इसे समझने के लिए एक नयी नैतिक और राजनीतिक कल्पना की जरूरत है. नये तरीके की कथा की जरूरत है जिसमें कलाकार और कवि शंभूलाल का मजाक उड़ायें.

कथाकार को मोदी से शुरू करना होगा क्योंकि मोदी और अमित शाह ने ही शंभूलाल को संभव बनाया है. यदि इस कड़ी को साफ कर दिया जाये तो शायद हमारे सरोकारों की ताकत नागरिकता के नये सपने को जन्म दे, जहां अखलाक और अफराजुल की रक्षा के बिना हमारा लोकतंत्र अधूरा होगा.

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