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‘हेडमास्टर साहब ने कहा होगा, कालिखो! तुम यहां भी जल्दी आ गए हो’

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल के स्कूली दिनों के साथी धीरज सिन्हा ने उनके जीवन के कुछ अनदेखे पहलू साझा किए हैं.

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ये 80 के दशक के मध्य की बात है. पुल उस समय अरुणाचल प्रदेश के लोहित में हवाई मिडिल स्कूल में पढ़ा करते थे. वे अपनी क्लास के बाकी बच्चों से उम्र में काफी बड़े थे. उस समय अंदाजा भी नहीं था कि ये शर्मीला-सकुचाता विद्यार्थी, जो हर हफ्ते हमारे घर आया करता है, हमारे घर के पिछले दालान में खेला करता है, हमारी बैठक में अपना होमवर्क किया करता है, एक दिन वह राज्य के सबसे ज्यादा समय तक सेवारत रहे वित्त मंत्रियों में से एक होगा और भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्रियों में अपनी जगह बनाएगा.

पुल का शुरुआती जीवन भी उतना ही नाटकीय था जितना कि उनका अंत.

20 जुलाई, 1969 को कालिखो का जन्म हवाई के पास वाल्ला बस्ती नाम के गांव में हुआ था. ये वो समय था जब साल के अधिकांश समय हवाई देश के बाकी हिस्सों से कटा रहता था. यहां का ऐसा हाल 80 के दशक तक रहा. यहां आने का एकमात्र जरिया ट्रैकिंग ही था. ट्रैकिंग यानी हायुलियांग से पहाड़ों के रास्ते पैदल आना. तेज बहाव वाली लोहित नदी के किनारे-किनारे चलकर आने के बाद आप दो से चार दिन में हवाई पहुंचते थे.

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारतीय सेना के कैंप के अलावा यहां सीआरपीएफ की भी एक स्थायी चौकी बना दी गई थी. गर्मियों में जब मौसम ठीक रहता तब सेना के साथ-साथ आम जनता के लिए भी प्लेन की मदद से खाने की सामग्री गिराई जाती. अगर कभी कोई इमरजेंसी होती, तब मरीज को प्लेन से ही अस्पताल पहुंचाया जाता.

और अगर कभी मौसम खराब होने की वजह से प्लेन नहीं आ पाता, तब उस बेचारे मरीज के हिस्से इलाज की बजाय मौत ही आती. आए दिन ‘कहीं बादल फटा, कई गांव बहे’ जैसी खबरें आती रहतीं. ऐसे माहौल में अपनी जिंदगी बचा लेना ही सबसे बड़ा संघर्ष था. पुल के माता-पिता भी उन बदकिस्मतों में से थे जो कुदरत से इस लड़ाई में अपनी जिंदगी की बाजी हार गए. पीछे रह गया बिल्कुल अकेला मासूम पुल.

हवाई देश के सबसे कम आबादी वाली जगहों में से एक है. उस वक्त तो यह भीषण गरीबी की चपेट में था. उस पर भी पुल अपने जिन रिश्तेदारों के यहां रहते थे, वो बेहद मुफलिसी में जिंदगी गुजार रहे थे. उनकी एक आंटी थीं, जिनके घर के लिए पुल दिन भर वाल्ला बस्ती की ऊंची पहाड़ियों पर जलाने के लिए लकड़ी ढूंढा करते थे. पर फिर एक दिन वो इस सब से उकता के घर से भाग गए और कुछ मील दूर शहर के एक बढ़ई की दुकान पर काम करने लगे.

एक दिन हवाई मिडिल स्कूल के हेडमास्टर राम नरेश प्रसाद सिन्हा ने स्कूल में मरम्मत के किसी काम के लिए बढ़ई को बुलवाया और काम करने के लिए पुल वहां आए. उस छोटे-से काम में भी पुल का कौशल और तल्लीनता देखकर हेडमास्टर काफी प्रभावित हुए.

हेडमास्टर उस समय रात को प्रौढ़ शिक्षा केंद्र चलाया करते थे, उन्होंने पुल से रात को वहां पढ़ने आने को कहा. मुझे आज भी याद है, कैसे मास्टर साहब लालटेन या टॉर्च की रोशनी में क्लास लेते थे और इस क्लास में 14 से लेकर 70 साल तक की उम्र के जोश और उत्साह से भरे विद्यार्थी पढ़ने आते थे. वहां पुल अपनी पढ़ाई में अव्वल रहे. वो सब कुछ ध्यान से सीखते थे. जल्द ही मास्टर साहब को लगने लगा कि पुल को अपना बढ़ई का काम छोड़कर किसी नियमित स्कूल में दाखिला ले लेना चाहिए.

यह सिन्हा साहब की खासियत थी कि उन्हें जो भी पढ़ने-सीखने के कुछ काबिल लगता, वे उसे स्कूल में दाखिला लेने को कहते, भले ही उस व्यक्ति की उम्र कितनी ही हो. कई बार होता कि इतवार की सुबह पांच साल के बच्चे से लेकर 18 साल तक के युवा, जो पहली क्लास से अपनी पढ़ाई शुरू करना चाहते थे, उनके यहां जमा हो जाते.

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उस वक्त तो ये मालूम करना भी मुश्किल होता कि इन विद्यार्थियों में कौन बच्चा है और कौन अभिभावक. ऐसे में पुल ने सिन्हा साहब से जब आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर की तब वे तुरंत तैयार हो गए. हालांकि सिन्हा साहब तैयार तो हो गए थे पर यहां एक बड़ी मुश्किल थी. पहली क्लास में दाखिला लेने के लिहाज से पुल की उम्र काफी ज्यादा थी और छठे या सातवें दर्जे में उन्हें दाखिला देना मुश्किल था क्योंकि ये अवैध होता और साथ ही हेडमास्टर साहब की नौकरी भी जोखिम में पड़ जाती.

मुझे याद पड़ता है कि उस वक्त शिक्षा मंत्री और डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर स्कूल आने वाले थे. सिन्हा साहब अंग्रेजी के शिक्षक थे. उन्होंने पुल को घर बुलाया. एक छोटा-सा भाषण लिखकर दिया और कहा कि अगर वो शिक्षा मंत्री के सामने इसे अच्छे-से पढ़ेगा तो उसे स्कूल में दाखिल कर लिया जाएगा. पुल ने खूब मेहनत से तैयारी करके मंत्री जी के सामने भाषण दिया.

मंत्री जी काफी प्रभावित हुए, तब सिन्हा साहब ने पुल की पढ़ाई की बात उनसे छेड़ी. सिन्हा साहब ने मंत्री जी से निवेदन किया कि सरकार को कुछ नई नीतियां बनानी चाहिए जिससे नाइट स्कूल के विद्यार्थियों को बिना पिछले स्कूल या कक्षा के प्रमाण पत्रों के नियमित स्कूल में दाखिला मिल सके.

अगले कुछ महीनों में पुल को हवाई मिडिल स्कूल की छठी कक्षा में दाखिला मिल गया. साथ ही उसे स्कूल के हॉस्टल की सुविधा मिली जहां खाना-रहना और कपड़े आदि सब सरकार की ओर से मुहैया कराए जाते थे. पर पुल की मुश्किलों का अंत इतना आसान नहीं था.

उसके परिजन उसकी आय पर ही निर्भर थे, तब पुल ने स्कूल छोड़ने की सोची. पर सिन्हा साहब ने यहां भी उसकी मुश्किल का हल ढूंढ निकाला. उन्होंने उस इलाके के सर्किल ऑफिसर से बात की और पुल को रात में चौकीदारी करने की नौकरी मिल गई.

हेडमास्टर साहब का मानना था कि हर छात्र को सार्वजनिक रूप से बोलना जरूर आना चाहिए. शायद इसी माहौल का असर था कि पुल को बोलने, अपनी बात रखने की कला हासिल हुई. जब तक पुल आठवीं क्लास में पहुंचे, तब तक हेडमास्टर साहब ने उन्हें स्कूल का जनरल सेक्रेटरी बना दिया था.

स्कूल में आयोजित होने वाले कई कार्यक्रमों की जिम्मेदारी उन्हीं पर रहती. यहां तक कि जनरल स्टोर से हॉस्टल का राशन लाने का दायित्व भी पुल को दिया गया था.

एक बार कई महीनों तक मौसम खराब रहा और राशन नहीं आ पाया. आखिरकार एक दिन जब राशन और केरोसिन मिल पाया तब पुल ने ही विद्याथियों के लिए इसका ज्यादा हिस्सा देने की बात कही. उस समय इस बात को लेकर सिन्हा साहब से पुल की थोड़ी कहासुनी भी हुई थी.

कितने ही साल गुजर गए पर पुल की स्कूली यादें मेरे जेहन में अब तक ताजा हैं. मुझे याद है एक बार स्कूल में कोई बैडमिंटन मैच था, जिसमें वो हार रहे थे. वो बिल्कुल रुआंसे हो गए थे. उनके लिए जीतना जीने के लिए बेहद ही जरूरी था. उनके व्यक्तित्व में एक अजीब-सी उदासी थी, ऐसी गंभीरता जो अमूमन तब ही आती है जब आपने जीवन में बहुत कष्ट देखे हों.

इसके इतर उनमें एक दृढ़ता और विश्वसनीयता भी थी. शायद यही वो गुण थे जिनके सहारे वे कॉलेज के दिनों में छात्र राजनीति में इतने आगे गए. बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद वे यूनियन के उपाध्यक्ष पद तक पहुंचे. बाकी छात्र नेताओं की ताकतवर छवि से इतर पुल के व्यक्तित्व में उनके ज्ञान और प्रतिभा की चमक थी.

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1995 में पुल ने विधानसभा चुनावों में पूर्व शिक्षा मंत्री खाप्रिसो क्रोंग को हराया. क्रोंग वही मंत्री थे जिनके सामने पुल ने 12 साल पहले स्कूल में भाषण सुनाया था. उन चुनावों के बाद से पुल सभी चुनावों में जीतते गए. उन्होंने कई क्षेत्रों में काम किया, वित्त, टैक्स और एक्साइज, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग जैसे कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली.

उनका सबसे बड़ा योगदान तो यही रहा कि उन्होंने हवाई जैसे छोटे-से गांव, जहां मुश्किल से दो-तीन दुकानें हुआ करती थीं, को भारत-चीन सीमा के पास स्थित एक मुख्य व्यापारिक केंद्र में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हवाई का यह इलाका अब एक अलग जिला है जिसे अंजॉ के नाम से जाना जाता है, जिसका मुख्यालय हवाई को ही बनाया गया है.

अपनी जिंदगी की व्यस्तताओं में उलझे पुल का हेडमास्टर सिन्हा साहब से संपर्क टूट-सा गया था. सिन्हा साहब स्कूलों में स्थानीय नेताओं की राजनीति का विरोध किया करते थे, जिस कारण उनका तबादला एक के बाद एक दूर-दराज के गांवों में होता रहता था.

संयोग ही था कि सिन्हा साहब की तनातनी जिन नेताओं से हुई उनमें ज्यादातर उनके ही पुराने छात्र थे, जो अब विधायक बन गए थे. ये विधायक उन क्षेत्रों में भी अपना दखल चाहते थे जो सिर्फ शिक्षकों के अधिकार क्षेत्र में होते हैं. ये शायद 90 के दशक के आखिरी सालों की बात है कि पुल को अचानक अरुणाचल प्रदेश के सचिवालय में सिन्हा साहब मिले. वे तुरंत उन्हें अपने ऑफिस में लेकर गए और वहां शिक्षा सचिव को बुलाकर सिन्हा साहब को परेशान करने के लिए डांटा.

महज 27 की उम्र में मंत्री बनने वाले पुल ने अपने करिअर में काफी उतर-चढ़ाव देखे. वे अरुणाचल के लोकप्रिय नेता माने जाते थे, पर यहां के नवनियुक्त मुख्यमंत्री उन्हें हमेशा अपने लिए खतरे के रूप में देखते रहे. ऐसे माहौल में पुल निश्चित ही अरुणाचल की पल-पल रंग बदलती राजनीति से प्रभावित हुए होंगे.

2004 में मैंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग विभाग में ‘एक्सप्लोसिव डिटेक्शन टेक्नोलॉजी’ पर शोध शुरू किया था. जब केंद्र सरकार ने मुझे मदद देने से इनकार कर दिया, मैंने पुल को फोन किया, जो तुरंत ही मेरी सहायता करने के लिए तैयार हो गए. पर बदकिस्मती से अगले दिन ही सरकार गिर गई.

इसके लगभग एक दशक बाद जब वो मुख्यमंत्री बने, तब ये हमारे यानी हवाई मिडिल स्कूल के छात्रों के लिए बहुत गर्व का दिन था. पर दुखद है कि हमारी खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई, सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया.

9 अगस्त के दिन मेरी पत्नी ने जब मुझे बताया कि किसी मुख्यमंत्री ने खुदकुशी कर ली है, मेरा दिल बैठ गया. न जाने क्यों मुझे यकीन था कि ये पुल ही होंगे. स्कूल में भी कई बार वो जज्बाती तौर पर बहुत कमजोर पड़ जाते थे पर वो कभी इतना बड़ा कदम भी उठा सकते हैं, ये कभी नहीं सोचा था.

स्कूल के अपने शुरूआती दिनों में पुल कई बार बहुत जल्दी स्कूल पहुंच जाया करते थे. तब हेडमास्टर उन्हें हल्के-से डांटते थे, ‘कालिखो, तुम जल्दी आ गए हो.’ हेडमास्टर साहब 25 जुलाई, 2009 को गुजरे थे. सात साल 15 दिन बाद शायद किसी दूसरी दुनिया में जब वे पुल से मिले होंगे और उन्हें फिर वही मीठी झिड़की देते हुए कहा होगा, ‘कालिखो! तुम फिर जल्दी आ गए हो.’

(लेखक हवाई मिडिल स्कूल में कालिखो पुल के साथ पढ़ते थे और रेडिएशन को लेकर की गई अपनी खोज के लिए जाने जाते हैं)