भारत

कॉरपोरेट इंडिया के हाशिये पर दलित स्त्रियां

गुज़रते वक़्त के साथ भले ही कंपनियों के भीतर ‘स्त्रीवाद’ के प्रति जागरूकता बढ़ती नज़र आ रही है, लेकिन कुल मिलाकर कॉरपोरेट सेक्टर जाति की हक़ीक़त और कार्यस्थल पर पड़ने वाले इसके प्रभावों से मुंह चुराता दिखता है.

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कॉरपोरेट में महिला भागीदारी से संबंधित प्रतीकात्मक फोटो. साभार: Flickr/Paul Ancheta CC 2.0

‘मैं स्त्रियों के आंदोलन में दृढ़ता से यक़ीन करता हूं. अगर उन्हें सही अर्थों में विश्वास में लिया जाए तो वे समाज की मौजूदा बदहाल सूरत को बदल सकती हैं. अतीत में उन्होंने कमज़ोर श्रेणियों और वर्गों के हालात में सुधार लाने में अहम भूमिका निभाई है.
-डॉ. बी.आर. आंबेडकर

मैं एक दलित स्त्री हूं, जिसकी परवरिश दक्षिण भारत के एक अर्ध-शहरी माहौल में हुई. मेरे माता-पिता एक परिवर्तित ईसाई परिवार की दूसरी पीढ़ी के हैं. मैं अंग्रेज़ी बोलने वाली, विश्वविद्यालय में शिक्षित ईसाई हूं और फ़िलहाल कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरी कर रही हूं. मेरी रिहाइश शहरी है. मेरी ख़ुशनसीबी है कि अपने समुदाय की दूसरी स्त्रियों की तुलना में मिली स्वाभाविक सुविधाओं के अलावा, मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए काम करती हूं, जो कार्यस्थल पर विविधता और समावेशन (मेल-मिलाप) को काफ़ी ज़्यादा तवज्जो देती है. एक कर्मचारी होने के नाते, ऑनलाइन और ऑफ़लाइन तरीक़ों से मेरी पहुंच रोज़ाना के कॉरपोरेट जीवन में विविधता और समावेशन का अर्थ समझाने वाली टनों सामग्री तक है. यहां ट्रेनिंग, अध्ययन सत्र और ओरिएंटेशन कार्यक्रम भी होते हैं, जो हर किसी को उपलब्ध हैं. इनका मक़सद पूर्वाग्रह रहित फ़ैसले करने में लोगों की मदद करना होता है. ख़ासकर उन लोगों की जो शक्तिशाली पदों पर बैठे हैं. कई बार यह लगता है कि मुझसे या मुझसे बड़े अधिकारियों से कोई ग़लती नहीं हो सकती है.

मैं यह अवश्य मानती हूं कि समावेशी संस्कृति का विकास करने के लिए एक ढांचे या तंत्र का होना ज़रूरी है. लेकिन यह भी सही है कि सिर्फ़ ढांचे का होना ही इस बात की गारंटी नहीं देता है कि रोज़-ब-रोज़ की वास्तविक परिस्थितियों में कार्यस्थलों पर हाशिये के समुदायों को स्वीकार कर ही लिया जाएगा. हक़ीक़त में होता यह है कि भारत जैसे देश में जो कि सिर्फ़ जेंडर, भाषा या धर्म के स्तर पर ही काफ़ी विविधताओं से भरा हुआ नहीं है, बल्कि यहां जाति, रंग और क्षेत्र की भी विविधताएं पायी जाती हैं, ऐसे तंत्र कई चोर रास्ते तैयार करते हैं. इनका इस्तेमाल फ़ायदा उठाने के लिए किया जा सकता है. मेरा सफ़र, जिसमें नौ बरस तकनीकी-व्यावसायिक इंटेलीजेंस के और तीन बरस तकनीकी शोध के शामिल रहे हैं, वास्तव में मुझे ज़्यादा सख़्त बनाने वाले, साथ ही मुक्त करने वाले अनुभव के समान रहा है. इस सफ़र के दौरान मैंने यह देखने, समझने और उसे शब्द देने की कोशिश की कि व्यक्तिगत तौर पर कॉरपोरेट इंडिया में दलित स्त्री होने का मतलब क्या है?

कॉरपोरेट भारत में जाति आज भी एक मुद्दा है

सामान्य तौर पर कहा जाए, तो भारत के कॉरपोरेट स्थलों में आज भी दलित औरतों की उपस्थिति बेहद मामूली है. यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. सार्वजनिक क्षेत्र की तरह सकारात्मक कार्रवाई की ऐसी कोई नीति नहीं है, जो निजी क्षेत्र को दलितों या दलित स्त्री को नौकरी देने का आदेश देती हो. 2010 में नयी दिल्ली की संस्था सेंटर फॉर सोशल इक्विटी एंड इन्क्ल्यूज़न के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि हालांकि 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के बाद से प्राइवेट कंपनियों में शिक्षित दलित स्त्रियों की तादाद लगातार बढ़ती गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उन्हें अनिवार्य रूप से ऊंचा वेतन, नौकरी की सुरक्षा या बेहतर कल्याणकारी सुविधाएं भी मिली हों. अध्ययन के लिए लिये गये सैंपल में सिर्फ़ 10 फ़ीसदी कामकाजी दलित स्त्रियों का वेतन 9,000 प्रति माह से ज़्यादा था. (33 फ़ीसदी का वेतन 4,500 से 6,500 के बीच, 30 फ़ीसदी का वेतन महज 3,000 से 4,500 के बीच और 22 फ़ीसदी का वेतन तो 3,000 से भी कम था.) जब उनकी तनख़्वाह का मिलान उनकी योग्यता से किया गया, तो परिणाम चैंकाने वाले मिले. अध्ययन में योग्यता और वेतन के बीच कोई मेल नहीं पाया गया. 64 फ़ीसदी दलित महिलाएं, जो कम से कम ग्रेजुएट या उससे ज़्यादा शिक्षित थीं, साथ में जिनके पास वोकेशन डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स भी था, महज 3000 से 6500 के बीच कमा रही थीं. जब इसी तथ्य का मिलान उनके समकक्ष की ग़ैर-दलित स्त्री कर्मचारियों से किया गया, तो भेदभाव का स्तर काफ़ी ज़्यादा नज़र आया.

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प्रतीकात्मक फोटो. Credit: Flickr/BMW Guggenheim La CC 2.0

हाल ही में, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुरिंदर सिंह जोधका द्वारा किये गये एक अध्ययन में यह पाया गया कि प्राइवेट सेक्टर में 94 फ़ीसदी शीर्ष नौकरियां ब्राह्मणों और बनियों के हिस्से में गईं. इसका कारण समझने में सुखदेव थोराट और पॉल एटवेल का 2009 का अध्ययन हमारी मदद करता है. इन दोनों प्रोफेसरों ने एक सामाजिक प्रयोग के तहत यह पाया कि इंटरव्यू के लिए बुलाए गए हर दस ‘उच्च’ जाति के हिंदुओं पर सिर्फ छह दलित और महज तीन मुसलमानों को बुलाया गया था. उनका एक निष्कर्ष यह भी था कि प्राइवेट कंपनियों में उन लोगों की नौकरी पाने की गुंजाइश अपने उच्च जाति के हिंदू समकक्षों की तुलना में काफ़ी कम होती है, जिनके नाम से उनके मुस्लिम और दलित होने का पता चल जाता है. गुजरात में सेंटर फॉर सोशल स्टडीज ने भी 2010 में विभिन्न भारतीय स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टेड 1000 कंपनियों से इकट्ठा किए गए सैंपल के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि इनमें जाति आधारित विविधता लगभग नदारद थी. इसी अध्ययन में यह भी पाया गया कि कंपनियों के क़रीब 65 फ़ीसदी बोर्ड मेंबर्स उच्च जातियों से ताल्लुख रखते थे.

इन हालात में अगर कोई दलित स्त्री किसी तरह प्राइवेट कंपनी में नौकरी पाने में कामयाब भी हो हो जाए, तो एक्जीक्यूटिव की भूमिका तक उसकी तरक्की के रास्ते लगभग बंद हैं. इसके पीछे और भी वजहें हैं, जैसे- कम आय, शत्रुतापूर्ण कार्य स्थितियां, रोल मॉडल्स या प्रतिनिधित्व की कमी, अलग-थलग करना, बहिष्कार, भेदभावपूर्ण काम का बंटवारा, तरक्की के मौक़ों की कमी; लेकिन ये निर्णायक नहीं हैं.

कॉरपोरेट भारत की स्त्रीवादी कथा में जाति की अनदेखी

जब मैंने यह समझना शुरू किया कि कार्यस्थलों (तकनीकी और व्यावसायिक) पर पितृ-सत्ता किस तरह से स्त्रियों के ख़िलाफ़ काम करती है, मैंने ख़ुद को एक गहरे रंगवाली, स्वाभाविक तौर पर दलित ईसाई स्त्री के तौर पर नहीं रखा. इस बात से बेख़बर कि लोग मेरे बारे में व्यक्तिगत तौर पर कैसी राय रखते हैं, मैंने अपना काम इस मान्यता के साथ शुरू किया कि सभी महिलाएं एक पिछड़े समूह के तौर पर देखी जाती हैं, जिन्हें कंपनी के भीतर तरक़्क़ी के लिए सकारात्मक कार्रवाई की ज़रूरत होती है. लेकिन, तोड़ देनेवाले कई अनुभवों के बाद मैं समझ पाई कि यह प्रचलित समझ कि स्त्रियां समांगी समूह हैं, जिन्हें कार्यस्थल पर बराबर की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, दरअसल सही नहीं है. कॉरपोरेट अमेरिका में अश्वेत स्त्रियों के हालात के समान ही कार्यस्थलों पर दलित स्त्रियों की चुनौती कई गुना ज़्यादा और विशिष्ट हैं.

प्राइवेट कंपनियों में दलित स्त्रियां शिक्षण और सामाजिक स्थलों पर होने वाले विभिन्न प्रकार के भेदभावों के बावजूद पहुंचती हैं. ‘कमज़ोर’ और ‘अयोग्य’ होने का तमगा उनके साथ कार्यस्थलों तक भी चला आता है. खाने की मेजों पर होनेवाली बातचीत जो घूम-फिरकर बार-बार जाति तक पहुंच जाती है, इस बहस के साथ समाप्त होती है कि आख़िर जाति आधारित सकारात्मक हस्तक्षेप की ज़रूरत क्या है? बहुमत इसे एक ग़ैर-ज़रूरी क़दम मानता है. इस हस्तक्षेप के पक्ष में होना या जाति के ख़िलाफ़ होना ख़तरनाक है. इसमें ख़तरा यह होता है कि ऐसा करने वाला ‘पहचान’ लिया जाए और बहुत मुमकिन है कि आगे उसे स्त्री और पुरुष सहकर्मियों की तरफ़ से शत्रुता भाव का सामना करना पड़े.लेकिन, छिपाने से ही किसी की जाति आधारित पहचान नहीं छिपती. हमारे यहां लोगों की जातिगत पृष्ठभूमि, धर्म, कुलनाम, त्वचा के रंग जैसे जाति सूचकों पर लापरवाह तरीक़े से बात करना एक सामान्य बात है. इससे भेद तुरंत ख़ुल जाता है.

कॉरपोरेट इंडिया की स्त्रीवादी कथा में जेंडर, लैंगिकता, अशक्तता और जातीयता के संदर्भ में विविधता की कमी की तो पर्याप्त चर्चा होती है, लेकिन इसमें जाति के आयाम को शामिल नहीं किया जाता. इसमें कोई हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि भारत में जाति पर एक मुद्दे के तौर पर खुलेआम बात नहीं की जाती. यह बस ताकतवर/उच्च जातियों से नाता रखने वाले लोगों के द्वारा गर्व के साथ पहचान के तौर पर प्रदर्शित की जाती है. लैंगिक पूर्वाग्रह, नेतृत्व के मौक़ों में कमी, जीवन और काम में असंतोषजनक संतुलन जैसे प्रचलित सवालों को कभी जाति के लेंस से नहीं देखा जाता है. स्त्री विरोधी टिप्पणी करने पर हस्तक्षेप करने की तत्परता जाति आधारित टिप्पणी करने पर नहीं दिखाई जाती. यह स्थिति इस तथ्य के कारण और ख़राब हो जाती है कि कॉरपोरेट जगत में सीनियर स्तर पर दलित नेतृत्व (स्त्री और पुरुष) बहुत कम है. दलित नेतृत्व ऐसी नीतियों को सुनिश्चित कर सकता है, जो लोगों के जाति आधारित व्यवहार की मर्ज का इलाज करे.

दूसरों की तरह, दलित महिलाएं इंदिरा नूयी जैसी नामचीन स्त्रियों में भी अपना रोल मॉडल्स नहीं देख सकतीं, क्योंकि वे समान नज़र नहीं आतीं. न ही, वे समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखती हैं. न ही वे ऐसे सवालों को उठाती हैं, जो दलित स्त्री कामगारों को हमेशा अपने सवालों की तरह लगे. इससे भी आगे, तेज़ी से बहुराष्ट्रीय हो रहे भारतीय कॉरपोरेट की बनावट में गैर-भारतीय स्त्रियों से संवाद का मौक़ा पहले से कहीं ज़्यादा मिलता है. एक हद तक यह दलित स्त्रियों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है. इससे उन्हें नेटवर्किंग का मौक़ा मिल सकता है. लेकिन, जाति, वर्ग, त्वचा के रंग और भाषा के कारण पहले से मौजूद सत्ता संरचना दलित स्त्रियों के पक्ष में काम नहीं करती.

लैंगिक विविधता के विमर्श को दुरुस्त करने की ज़रूरत

यह कहना पूरी तरह से ग़लत नहीं होगा कि पिछले कुछ सालों में दुनियाभर में जेंडर विविधता विमर्श बड़े पैमाने पर शेरिल सैंडबर्ग के ‘लीन इन मैनिफेस्टो‘ से प्रभावित रहा है. यह बात भारत पर भी फिट बैठती है. नेतृत्व, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, बदलाव की ज़िम्मेदारी स्त्रियों पर ही डालता है. वे या तो अपने आप को बदलें, या अपने आसपास की चीज़ों को. दूसरे शब्दों में, झुक कर रहें. कंपनियों के भीतर महिला दिवस पर होने वाले समारोह महिलाओं के लिए मशविरा सत्र में महदूद कर दिये जाते हैं- अच्छा बनिए, अच्छा कीजिए, अपने हाथ ऊपर कीजिए, बोलो हां, बोलो ना, मौक़ों को पकड़ो, बाहर निकलो आदि आदि. निस्संदेह इससे कुछ हद तक सशक्तीकरण होता है, लेकिन इससे चली आ रही व्यवस्थित पितृसत्ता से जुड़े सवाल हल नहीं होते.

प्रतीकात्मक फोटो. Credit: Flickr/Glen Harper CC 2.0

प्रतीकात्मक फोटो. Credit: Flickr/Glen Harper CC 2.0

किसी स्त्री को आगे बढ़ने के लिए मौक़े दिये जाएंगे या नहीं, यह अकेली औरतों, मातृत्व, स्त्री की दृढ़ता और ऐसी ही अन्य बातों को लेकर बनी-बनाई जड़ धारणाओं पर काफ़ी हद तक निर्भर करता है. अगर विविधता को लेकर लिए गये संकल्पों के कारण उन्हें मौक़ा मिल भी जाए, तो यक्ष प्रश्न उठता है कि आख़िर मौक़े पाने वाली औरतें कौन होंगी? भारतीय कॉरपोरेट परिवेश में भले योग्यता को एकमात्र पैमाना बताया जाए, मगर दलित औरतें ऐसे मौक़ों के लिए शायद ही चुनी जाती हैं. मेरा अनुभव रहा है कि जिस स्त्री कर्मचारी को प्रोत्साहन या प्रमोशन मिलता है, वह प्रायः गोरे रंग वाली ग़ैर-दलित स्त्री ही होती है, जिसे शारीरिक रूप से आकर्षक माना जाता है. वह उच्च या उच्च मध्यवर्ग से ताल्लुक रखती है और ज़्यादातर लोगों को नज़र आती है.

साथ ही, कॉरपोरेट संदर्भ में सोशल नेटवर्किंग को अपने कॅरियर को आगे बढ़ाने के लिए एक सफल रणनीति माना जाता है. इसका मतलब है कि वैसी स्थिति में जहां जेंडर असरहीन हो जाता है, विशेष जाति से जुड़ाव ग़ैर-दलित महिलाओं की मदद करता है. यह योग्यता आधारित प्राइवेट कंपनियों में दलित महिलाओं को असहाय-सी स्थिति में छोड़ देता है. अश्वेत स्त्रियों की ही तरह, दलित स्त्रियां, झुक कर, भारतीयों और गैर-भारतीयों द्वारा दी गई हर सलाह को समान रूप से मानकर भी कहीं नहीं पहुंच पातीं.

आज के समय में जेंडर विविधता के विमर्श में आमूलचूल बदलाव लाए जाने की ज़रूरत है.
• यह कहना कि ‘स्त्रियां आधार रेखा के लिए उपयुक्त हैं’, भले सही हो, लेकिन कार्यस्थलों पर स्त्रियों की भर्ती और उनकी प्रोन्नति का यही एक मात्र कारण नहीं होना चाहिए. बल्कि, हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि आख़िर हमें एक बिज़नेस केस क्यों मुहैया कराना चाहिए.
• दूसरी बात, समय आ गया है कि हम बदलाव की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ स्त्रियों पर डालना बंद करें. पुरुष नेतृत्व, मित्रजन और अन्य सहकर्मियों के साथ संवाद क़ायम किया जाए और आपत्तिजनक व्यवहार से निपटने के लिए बनाये गये प्रोटोकॉल का पालन गंभीरता से किया जाए.
• तीसरी बात, स्त्रियों के बीच विविधता को क़ीमती माना जाए और उसे बचाए रखने की हर संभव कोशिश की जाए. नेतृत्व, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, अगर ईमानदारी के साथ यह समझे कि सभी औरतें इंसान हैं और अलग-अलग विशेषता, पहचान और पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं (इनमें हाशिये पर रखे समुदाय भी शामिल हैं, जिन्हें जाति से परिभाषित किया जाता है), तब शायद सभी औरतें बराबरी के स्तर पर मुक़ाबला कर सकती हैं. न सिर्फ़ एक-दूसरे से बल्कि उन सबसे जो योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का सपना देखते हैं.

उन दलित स्त्रियों के लिए जो इस यथार्थ की जटिलता को देखती और समझती हैं, हर मुमकिन कोशिश करने के बाद भी पीछे रह जाना बेहद हताशा भरा हो सकता है. ज़रूरत सिर्फ़ प्रायोजक और समर्थन की नहीं है. ज़रूरत है कि तत्काल भारतीय कॉरपोरेट स्थलों से जुड़े सवालों से टकराया जाए, जो आज भी जातिवादी और स्त्री विरोधी बने हुए हैं.

(क्रिस्टीना थॉमस धनराज बतौर बिजनेस एनालिस्ट काम करती हैं. वे दलित हिस्ट्री मंथ कलेक्टिव की सह-संस्थापक भी हैं. साथ ही वे #dalitwomenfight की स्वयंसेवी भी हैं. यह सबसे पहले genderit.org में प्रकाशित लेख के संपादित अंश का हिंदी अनुवाद है.)

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    कॉरपोरेट स्थलों में आज भी दलित औरतों की उपस्थिति बेहद मामूली है. यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. सार्वजनिक क्षेत्र की तरह सकारात्मक कार्रवाई की ऐसी कोई नीति नहीं है, जो निजी क्षेत्र को दलितों या दलित स्त्री को नौकरी देने का आदेश देती हो.

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    भारतीय कॉरपोरेट परिवेश में भले योग्यता को एकमात्र पैमाना बताया जाए, मगर दलित औरतें ऐसे मौक़ों के लिए शायद ही चुनी जाती हैं. मेरा अनुभव रहा है कि जिस स्त्री कर्मचारी को प्रोत्साहन या प्रमोशन मिलता है, वह प्रायः गोरे रंग वाली ग़ैर-दलित स्त्री ही होती है, जिसे शारीरिक रूप से आकर्षक माना जाता है. Hahaha hasyaspd hai ye baat jo apne article me likhi hai. apki soch bias hai … Or sexist bhi.