भारत

शंभूलाल रैगर हमारे ‘युग का नायक’ है!

निरपराधों के ख़िलाफ़, विरोध में हिंसा के महिमामंडन का बढ़ता सामान्यीकरण हमारे समाज के नैतिकता के ताने-बाने को उजागर करता है.

उदयपुर की अदालत की छत पर भगवा झंडा फहराता युवक. (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

उदयपुर की अदालत की छत पर भगवा झंडा फहराता युवक. (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

‘… हमारे युग का नायक, सज्जनों, यह दरअसल एक चित्र है, किसी एक व्यक्ति का नहीं, वह एक समूची पीढ़ी के दुर्गुणों का समुच्चय है जो पूरे शबाब पर है.’

(‘ए हीरो आफ अवर टाईम’ लेरमेन्तोव के प्राक्कथन से, जिसे अल्बेयर कामू ने अपने उपन्यास ‘द फाॅल’ के शुरू में उद्धृत किया है.)

शंभूलाल रैगर ‘हमारे युग का नया नायक’ है. किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए यह जानना सुन्न करने वाला हो सकता है कि सैकड़ों की तादाद में लोग- जो किसी दक्षिणपंथी तंजीम से ताल्लुक रखते थे- न केवल इस हत्यारे की हिमायत में सड़कों पर उतरे बल्कि उन्होंने उसके मानवद्रोही कारनामे को सही ठहराया, जहां वह एक निरपराध व्यक्ति को अपनी कुल्हाड़ी से मारता दिखता है और उसका वीडियो भी जारी करता है और किस तरह पांच सौ से अधिक लोगों ने ‘उसके परिवार की सहायता के नाम पर’ उसके बैंक खाते में लगभग 2.5 लाख रुपये भेजे.

शंभूलाल का यह महिमामंडन हमें लगभग दो दशक पहले के एक अन्य प्रसंग की याद दिलाता है जब कुष्ठरोग निवारण में मुब्तला एक पादरी ग्राहम स्टीन्स एवं उसके दो बच्चों- फिलिप और टिमोथी- को ओडिशा के मनोहरपुर में नींद में ही पचास से अधिक लोगाों के समूह ने जिंदा जला दिया गया था, जिस हत्यारे गिरोह की अगुआई रविंदर पाल सिंह उर्फ दारा सिंह कर रहा था.

इस हत्यारे पर एक मुस्लिम व्यापारी शेख रहमान और अन्य ईसाई पादरी अरूल दास की हत्या करने के भी आरोप लगे थे. ग्राहम स्टीन्स एवं उसके बच्चों की हत्या के जुर्म में उसे उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी.

अगर शंभू द्वारा अफराजुल की हत्या को ‘लव जिहाद’ का मुद्दा उठा कर ‘औचित्य’ प्रदान किया जा रहा है तो स्टीन्स की हत्या को ‘धर्मांतरण’ के नाम पर ‘सही’ ठहराया जा रहा था. यह याद नहीं कि दारा सिंह एवं उसके गिरोह के सदस्यों को बचाने के लिए ओडिशा में प्रदर्शन हुए थे या नहीं- जैसा नज़ारा इस बार राजसमंद, उदयपुर आदि इलाकों में देखने को मिल रहा है, जब दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पुलिस से जम कर लोहा लिया जिसमें दोनों तरफ से लोग जख्मी भी हुए.

साथ ही इन्हीं आततायियों में से किसी ने उदयपुर की अदालत पर चढ़ कर तिरंगे के स्थान पर भगवा झंडा भी फहराया- मगर यह बात तो सर्वविदित है कि दारा के समर्थन में कई ‘सेनाओं’ एवं ‘मंचों’ का निर्माण हुआ था, जिन्होंने दारा की रिहाई की मांग बुलंद की थी. इनमें से कुछ समूहों ने तो अपने प्रभावक्षेत्र में उन दिनों जमकर आतंक मचा रखा था.

शंभू के इस कारनामे- जो एक किस्म की हिंदुत्व आतंक की कार्रवाई था, मगर ऐसी बात कही नहीं जा रही है; जबकि पड़ोसी मुल्क में किसी तालिबानी ने ऐसी कार्रवाई की होती तो कोई उसे ‘इस्लामिस्ट आतंकवाद’ कहने से नहीं चूकता- को लेकर हिंदुत्व की जमातों की तरफ से तरह-तरह की बातें प्रसारित की जा रही हैं ताकि उसकी इस हरकत की आपराधिकता से नज़र हटे.

उसे ‘दिमागी तौर पर विक्षिप्त’ कहने से लेकर ‘हिंदू गुस्से का प्रतीक’ कहा जा रहा है. याद करें कि किस तरह स्टीन्स की हत्या के बाद इन्हीं संगठनों के कर्णधारों की तरफ से ‘धर्मांतरण पर राष्ट्रीय बहस की मांग’ की गई थी, जो एक किस्म की तिरछी कोशिश थी कि इन हत्याओं को उचित ठहराया जा सके.

यह उसी किस्म की बात है कि आप आज़ाद भारत के पहले आतंकवादी कहे गए नाथूराम गोडसे की औपचारिक तौर पर आलोचना करें मगर उसी सुर में कहें कि उसकी कुछ ‘जायज शिकायतें’ थीं.

कोई भी व्यक्ति जो दक्षिण एशिया के परिदृश्य पर निगाह रखे हुए है, बता सकता है कि ‘अतिवादी हत्यारों’ का इस किस्म का महिमामंडन यहां अपवाद नहीं है. हाल के समयों में कई सारे तर्कवादी, पत्रकार, विभिन्न आंदोलनों के कार्यकर्ता व किसी जिम्मेदारी के पद पर बैठे व्यक्तियों की ऐसे लोगों ने हत्या की है, जिसे दक्षिणपंथी दायरों में सेलिब्रेट किया गया है.

पाकिस्तान में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर- जो वहां के ईशनिंदा कानून के खिलाफ थे तथा उसको हटाने की मांग कर चुके थे- के हत्यारे उनके अंगरक्षक मुमताज कादरी की कब्र के तीर्थस्थान में रूपांतरण हमारे सबके सामने है.

हजारों की तादाद में लोग हर सप्ताह वहां पहुंच कर ‘धर्मरक्षक’ कादरी के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं. लगभग 16 लाख आबादी के इस्लामाबाद शहर में जहां पहले से 827 मस्जिदें हैं जिनमें से कइयों के साथ मदरसे और तीर्थस्थान जुड़े है, वहां कादरी की यह कब्र आकर्षण का नया ठिकाना है.

ईशनिंदा कानून का विरोध करने वाले- जिसके चलते पाकिस्तान के हजारों लोगों की जिंदगियां तबाह हुई हैं – व्यक्ति के हत्यारे का यह महिमामंडन या आप पेशावर के मिलिट्री स्कूल में घुस कर इस्लामिस्टों द्वारा की गई 150 से अधिक बच्चों की हत्या के कारनामे को देखें या बांग्लादेश में अविजित राॅय जैसे कई ब्लाॅगरों की इस्लामिस्टों द्वारा की गई हत्या को देखें, म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों का नस्लीय शुद्धिकरण पर गौर करें या श्रीलंका में बौद्ध अतिवादियों द्वारा वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों- ईसाइयों, मुसलमानों और हिंदूओं- का किया जा रहा उत्पीड़न देखें, आप बार-बार पाएंगे कि निशाना बनाकर की जा रही इस हिंसा को जनसमर्थन हासिल है.

हम जुझारू पत्रकार एवं सांप्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ती गौरी लंकेश की अपने घर के दरवाजे पर की गई हत्या को देख सकते हैं, जिसने समूचे मुल्क में उबाल पैदा किया था और इस हत्या का विरोध करने के लिए जगह जगह प्रदर्शन हुए थे, मगर सबसे अधिक विचलित करने वाली बात थी कि कइयों ने इस बर्बर हत्या पर ‘खुशी प्रकट की थी.’

अपने ट्वीट में जी न्यूज की पूर्व पत्रकार जाग्रति शुक्ला ने जो कहा वह इसी ‘खुशी’ का एक नमूना था,

तो कम्युनिस्ट गौरी लंकेश की निर्ममतापूर्वक हत्या हुई. कहा जाता है कि आपके किए का फल आप को भुगतना पड़ता है. आमीन.

jagriti shukla tweet
इस मामले में सबसे विवादास्पद ट्वीट सूरत, गुजरात के एक व्यापारी निखिल दधीच का था जिसमें उसने गौरी को ‘कुतिया’ कह दिया था. यह व्यापारी उन लोगों में शुमार था जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी फाॅलो करते हैं जिसका जिक्र उसने पेज पर किया था.

Gauri-Lankesh tweet

दधीच के अन्य ‘फालोअर्स’ में शुमार थे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और भाजपा के उत्तर गुजरात के मीडिया सेल प्रभारी पराग सेठ.

कुछ समय पहले आॅल्ट न्यूज़ ने नाथूराम गोडसे पर एक स्टोरी की थी जहां गोडसे के हिमायतियों की बड़ी तादाद को उजागर किया था. लोग यह कहते हुए नज़र आए थे:

‘गोडसे को ईश्वर ने भेजा था’, ‘गांधी को फांसी दी जानी चाहिए थी’, ‘गांधी को मारने के गोडसे के वाजिब कारण थे.’ ‘मैं इस बात को दोहराता हूं कि मैं गोडसे का फैन हूं, फिर क्या हुआ ?’

हिंदुत्व अतिवादी नाथूराम गोडसे- जो उस आतंकी मॉड्यूल का अगुआ था जिसने महात्मा गांधी की हत्या की- का बढ़ता सार्वजनिक महिमामंडन हमारे समय की एक नोट करने लायक परिघटना है. याद करें उसके हिमायतियों की तरफ से इस ‘महान देशभक्त’ के मंदिरों का देश भर में निर्माण करने की योजना भी बनी है.

वैसे यह बात चुपचाप तरीके से लंबे समय से चल रही है. शेष भारत में इस बात का खुलासा उस वक्त़ अचानक हुआ जब नांदेड़ बम धमाके हुए (अप्रैल 2006) जब हिंदू वर्चस्ववादी जमात के दो कार्यकर्ता ‘हिमांशु पानसे और नरेश राजकोण्डवार बम बनाते वक्त मारे गए.

पुलिस द्वारा आगे जांच करने पर पता चला कि यही गिरोह सूबे के अन्य स्थानों में हुई आतंकी घटनाओं में शामिल था. इतना ही नहीं यह आतंकी समूह गोडसे का ‘शहादत दिवस’ भी मनाता था, जिसमें भाषण देने के लिए हिंदू राष्ट्रवादी तंज़ीमों के नेता पहुंचते थे. और यह सिलसिला विभिन्न शहरों में चल रहा था.

सूबा महाराष्ट्र में एक नाटक लंबे समय से चलता रहा है ‘मी नाथूराम बोलतोय’ (मैं नाथूराम बोल रहा हूं) जिसमें नाथूराम के नज़र से गांधी हत्या को देखा गया है और औचित्य प्रदान किया गया है. निश्चित ही नायक ‘गढ़ने’ की हिंदुत्ववादियों की अंतहीन सी लगने वाली कवायद में गोडसे कोई अपवाद नहीं है.

हिंदुत्व ब्रिगेड में ऐसे तमाम लोगों को चिन्हित किया जा सकता है, जो जनता के खिलाफ अपराध करने के मामलों में अपने आपको सलाखों के पीछे पा सकते थे- बशर्ते देश की कानूनी प्रक्रिया को सही ढंग से आगे बढ़ने दिया जाता. यह अलग बात है कि वह अभी भी न केवल सम्मानित नागरिक बने हुए हैं बल्कि महिमामंडित भी होते आए हैं.

हम याद कर सकते हैं पच्चीस साल पुराना वह उथल-पुथल भरा दौर जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया गया था और आज़ादी के बाद पहली दफा समूचे देश के पैमाने पर सांप्रदायिकता का दावानल फैला था. तब इस मुहिम के एक शिल्पकार’ ‘को देश की राजधानी में ‘हिंदू हदय सम्राट’ के तौर पर नवाज़ा गया था.

हम कैसे भूल सकते हैं कि हिंदुत्व के हिमायती एक स्थापित गुजराती लेखक की जन्मशती का भव्य आयोजन जिसमें कई मुख्यमंत्रियों एवं केसरिया पलटन के अग्रणी नेताओं ने शिरकत की थी, जिस शख्स ने एक साक्षात्कार में कहा था कि किस तरह 2002 की संगठित हिंसा को उन्होंने सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया था.

इतना ही नहीं वर्ष 2008 में जब मालेगांव बम धमाकों के आतंकियों को- जिनके आतंकी मॉड्यूल का खुलासा जांबाज कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अफसर हेमन्त करकरे ने किया था- नाशिक एवं पुणे की अदालत में पेश किया गया था तब किस तरह हिंदुत्ववादी जमातों के कार्यकर्ताओं ने इन अभियुक्तों पर गुलाब की पंखुड़ियां बरसायी थीं, जो सिलसिला फिर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी दोहराया गया था जब इस्लामिक आतंकी मुमताज कादरी को लाहौर अदालत में पेश किया गया था.

निरपराधों के खिलाफ, ‘अन्यों’ के विरोध में हिंसा के महिमामंडन का बढ़ता सामान्यीकरण हमारे जैसे समाजों के नैतिकता के ताने बाने को उजागर करता है. अब वक्त़ आ गया है कि ऐसे हत्यारों को या ऐसी घटनाओं को हम व्यक्ति तक सीमित न रखें, अलग-थलग करके न देखें बल्कि उसे एक समग्र रूप में समझने की कोशिश करें. यह एक ऐसा मसला है जिस पर गहरे विचार विमर्श की जरूरत है.

जर्मन नात्सी अधिकारी आइशमैन (19 मार्च 1906- 1 जून 1962) जिस पर यहूदियों के कत्लेआम में सहभागिता आदि मुद्दों पर इजराइल में मुकदमा चला था और जिसे बाद में मौत की सज़ा सुनाई गई थी- के बारे में लिखते हुए हन्ना आरेन्डट लिखती है:

आइशमैन प्रसंग की सबसे बड़ी उलझन यह है कि कितने सारे लोग उसके जैसे थे, और वे तमाम लोग न परपीड़क थे और न ही विकृत मस्तिष्क, वह उस वक्त़ भी और आज भी जबरदस्त रूप में सामान्य लोग थे. अपनी कानूनी संस्थाओं के नज़रिये से देखें और अपने फैसलों के अपने नैतिक पैमानों को टटोलें तो उन तमाम अत्याचारों के समक्ष भी यह सामान्य स्थिति बहुत बहुत डरावनी थी.
(The trouble with Eichmann was precisely that so many were like him, and that the many were neither perverted nor sadistic, that they were, and still are, terribly and terrifyingly normal. From the viewpoint of our legal institutions and of our moral standards of judgment, this normality was much more terrifying than all the atrocities put together.)

हमारे युग के ‘नए हीरो के आविर्भाव’ से हम इस स्थिति से शायद पहली बार रूबरू हो रहे है. प्रश्न उठता है कि क्या हम सभी इसे देख पा रहे हैं?

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)