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क्या गुजरात में मोदी की चमक फीकी पड़ गई ​है?

गुजरात में अपनी कमज़ोरियों के कारण कांग्रेस भले ही बाज़ी नहीं पलट पायी, लेकिन मतदाताओं ने पिछली बार से डेढ़ दर्जन ज़्यादा सीटें देकर साफ कर दिया है कि वे ‘अपने’ प्रधानमंत्री के ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के आह्वान को कान नहीं दे रहे.

India's Prime Minister Narendra Modi looks on before launching a digital payment app linked with a nationwide biometric database during the "DigiDhan" fair, in New Delhi, India, December 30, 2016. REUTERS/Adnan Abidi

फाइल फोटो: रॉयटर्स

जनादेशों को हमेशा सरल रेखा में नहीं समझा जा सकता. प्रतिद्वंद्वी पार्टियां हर हाल में जीतने को आतुर हों और किसी भी लोकतांत्रिक मूल्य के सिर पर पाद-प्रहार से परहेज न कर रही हों, तब तो और भी नहीं.

लेकिन न्यूज चैनलों ने नेताओं को इन्हें सरल रेखा में ही समझने व समझाने की ऐसी लत लगा दी है कि गुजरात व हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों के भाजपा के पक्ष में नजर आते ही, कई महानुभाव इस निष्कर्ष पर पहुंच गये हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू बरकरार है और राहुल गांधी की पदोन्नति भी कांग्रेस की हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम रही है.

बेहतर होता कि वे नतीजों के पक्ष-विपक्ष का सम्यक विश्लेषण करते और मतदाताओं के उन संकेतों को संयत होकर समझते, जो उन्होंने इन चुनावों में भिड़ी दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को एक जैसे भाव से दिए हैं.

हिमाचल प्रदेश में, हम जानते हैं कि 1985 से ही मतदाता हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन करते और भाजपा के बाद कांग्रेस तो कांग्रेस के बाद भाजपा को अपनाते रहे हैं. शायद इसीलिए कांग्रेस ने यह मानकर भाजपा को वाकओवर-सा दे रखा था कि यह उसकी बारी और सारी शक्ति गुजरात में झोंक रही थी.

इस लिहाज से देखें तो हिमाचल से इस बार की उसकी बेदखली रूटीन है, प्रधानमंत्री के पराक्रम, लहर या जादू का नतीजा नहीं. ऐसा होता तो भाजपा राज्य में 2014 के लोकसभा चुनाव में हासिल उपलब्धि को दोहरा देती, जब उसने 53.85 प्रतिशत मत हासिल कर राज्य की चारों सीटें अपने नाम कर ली थीं.

प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का पराक्रम तो उनके गृहराज्य गुजरात में भी कोई चमत्कार नहीं कर पाया है, लोकसभा चुनाव के उनके करिश्मे में जिसके तथाकथित माॅडल के प्रचार का भी कुछ कम रोल नहीं था.

वहां कांग्रेस को खत्म मानकर उन्होंने अपनी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के साथ मिलकर डेढ़ सौ से ज्यादा विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा था. लेकिन वह ‘मोदी लहर’ का मिथ गढ़े जाने से पहले 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में हासिल सीटों की संख्या भी नहीं छू पायी.

ठीक है कि वह अपना किला, सरकार या कि लाज बचाने में कामयाब रही, लेकिन किसे नहीं पता कि इसके पीछे प्रधानमंत्री का लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा नहीं, विकास के महानायक के ऊंचे आसन से नीचे उतरकर, दूसरे शब्दों में कहें तो ‘पुनर्मूषकोभव’ की गति को प्राप्त होकर, फिर से हिंदुत्व के उसी कीचड़ में लथपथ होना और ‘इस्लामोफोबिया’ फैलाने पर उतरना है, अपने प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती बरसों में जिससे वे सायास परहेज बरत रहे थे.

जमीनी हकीकत पर जायें तो गुजरात में कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में 26 की 26 सीटें भाजपा के हाथों गंवाकर एकदम खाली हाथ रह गयी थी. थोड़े दिनों पहले हुए राज्यसभा चुनाव तक अपने ही कारणों से भूलुंठित और शंकरसिंह बाघेला जैसे नेताओं की भगदड़ से इस कदर पीड़ित कि उसे अपने विधायकों को बचाये रखने के लिए उन्हें लेकर अपने द्वारा शासित कर्नाटक भागना पड़ा था.

अपनी कमजोरियों के कारण वह भले ही बाजी नहीं पलट पायी, मतदाताओं ने उसे 2012 के मुकाबले कोई डेढ़ दर्जन ज्यादा सीटें देकर साफ कर दिया है कि वे ‘अपने’ प्रधानमंत्री के ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के आह्वान को कान नहीं दे रहे.

सच पूछिये तो यह प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के लिए आनंद का नहीं, जैसा कि उनके अध्यक्ष अमित शाह कह रहे हैं, खतरे की घंटी सुनने का अवसर है. क्योंकि मतदाताओं ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि उन्होंने अपनी रीति-नीति नहीं बदली तो वे उन्हें उस ‘विकल्पहीनता’ का मजा नहीं लेने देंगे, जिसके बूते वे लंबी पारी खेलने के मूड में हैं.

नेता विकल्प देने की जिम्मेदारी नहीं निभायेंगे, तो ये मतदाता खुद उपयुक्त विकल्प तलाश कर उसे आगे लायेंगे और धूल झाड़कर खड़ा कर देंगे.

यकीनन, अभी लगता नहीं कि अपनी ‘जीत के अनवरत सिलसिले’ को लेकर आत्ममुग्ध भाजपा या प्रधानमंत्री इस घंटी को सुनना चाहेंगे. सत्तारूढ़ पार्टियों में वैसे भी ऐसी घंटियां सुनने का रिवाज कम होता है.

उनका सौभाग्य कि उन्हीं की तरह प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी, सारे दुर्दिन के बावजूद, अपनी चूकों व गलतियों को पहचानकर उनकी पुनरावृत्ति से बचने या आत्मावलोकन करने की आदत नहीं है. होती तो चुनाव अभियान में ‘विकास पागल हो गया है’ जैसी बेहतर शुरुआत के बाद वह भाजपा को उसी के हथियारों से मात देने के चक्कर में आकर उसके टैप में जा नहीं फंसती.

उसे इतना तो समझना ही चाहिए था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या भाजपा के अन्य छुटभैये-बड़भैये, अपनी सरकारों के कामकाज के मुद्दे पर घिरेंगे, तो ‘औरंगजेब’ या ‘औरंगजेब राज’ जैसी फुटानियों पर उतरेंगे ही और बदले में किसी मणिशंकर अय्यर ने ‘नीच’, ‘पागल’, ‘बददिमाग’ या ‘गंदी नाली का कीड़ा’ जैसी शब्दावली इस्तेमाल कर दी तो इसे ‘गुजराती अस्मिता’ का मामला बनाकर ‘पाकिस्तानी’, ‘गद्दार’, ‘मीरजाफर’, ‘जयचंद’ और ‘पाक को सुपारी देने वाला’ तक खींच ले जायेंगे. लेकिन उसने नहीं समझा और अय्यरकांड के बाद जब तक राहुल अपराधभाव से डैमेज कंट्रोल पर उतरते, बात हाथ से निकल चुकी थी.

लेकिन बात महज अय्यर की ही नहीं है. आत्मावलोकन करते और आगा-पीछा देखते तो विकास के मुद्दे पर बढ़त बना चुके राहुल ही अचानक 2012 की सोनिया जैसे नरम हिंदुत्व के एजेंडे पर क्यों उतर आते?

उससे सबक लेते और समझते कि देश में कहीं भी चुनावी लड़ाई को हिंदुत्व के नरम व गरम दो रूपों के बीच सीमित कर धर्मनिरपेक्षता को मैदान से गैरहाजिर कर दिया जाता है तो जीत गरम हिंदुत्व की ही होती है.

साफ है कि न राहुल मंदिर-मंदिर घूमने और खुद को जनेऊधारी हिंदू सिद्ध करने में लगते, न वित्तमंत्री अरुण जेटली को यह कहने का मौका हाथ लगता कि जब असली हिंदू पार्टी मौजूद है तो लोग क्लोन पर क्योंकर भरोसा करने लगे?

तिस पर कोढ़ में खाज यह कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पाटीदारों को पटाने के चक्कर में दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के अपने पुराने आधार को सहेजने में ज्यादा रुचि नहीं ली. मान लिया कि वे तो हर हाल में साथ देंगे ही.

अपने खिलाफ हिंदू ध्रुवीकरण से आशंकित होकर उसने पूरे चुनाव अभियान में अल्पसंख्यकों की शुभचिंतक दिखने से इस हद तक परहेज किया कि उन बेचारों के समक्ष ‘कोई भी जीते, हमें क्या’ जैसी स्थिति पैदा हो गयी.

उसने उन कारणों का भी समय रहते विश्लेषण नहीं किया कि अब ऐसे प्रदेशों में, जहां उसके व भाजपा के बीच सीधी भिड़ंत नहीं है यानी कोई तीसरी शक्ति भी है, तीसरी शक्तियां भाजपा को आसानी से हरा देती हं, लेकिन वह जी-जान लगाकर भी उससे क्यों पार नहीं पाती?

बहरहाल, देशवासियों को 2019 के फाइनल से पहले भाजपा व कांग्रेस की ऐसी कई और भिड़ंतें देखने को मिलेंगी, जिनमें ‘हर हाल में जीत’ के उनके ऐसे और कितने ही गुल खिलेंगे. इसलिए जो भी देशवासी लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की वास्तविक चिंताओं से किंचित भी जुड़ाव महसूस करते हैं, उनको याद रखना होगा कि गुजरात में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने इन मूल्यों की कैसी ऐसी-तैसी की है.

यह भी कि इसके चलते चुनाव आयोग को भी रेफरी के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा का बड़ा हिस्सा खोना पड़ा है. अच्छी बात है कि उसने आचार संहिता तोड़ने के एक जैसे कुसूर में राहुल को नोटिस देने और प्रधानमंत्री को बख्श देने की अपनी गलती सुधारते हुए राहुल को दिया गया नोटिस वापस ले लिया है. अगर यह उसका आत्मावलोकन है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

प्रसंगवश, बाबा नागार्जुन ने 1972 में अपनी एक कविता में चुनावों के ‘लोकतंत्र के प्रहसन’ में बदल जाने पर चिंता जताई थी. अब इन प्रहसनों में भी लोकतंत्र की क्षीण होती उपस्थिति डरावनी होती जा रही है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फैज़ाबाद में रहते हैं.)

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