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अर्थशास्त्रियों ने वित्त मंत्री से की सामाजिक सुरक्षा पेंशन और मातृत्व भत्ता बढ़ाने की मांग

अर्थशास्त्रियों ने कहा कि बीते साल प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गयी घोषणा के बावजूद मातृत्व भत्ता देने के लिए बनी प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना अब तक लागू नहीं हुई है.

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प्रतीकात्मक फोटो (साभार : DFID/Flickr CC 2.0)

भारत के साठ अर्थशास्त्रियों ने बुधवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर सामाजिक सुरक्षा पेंशन और मातृत्व भत्ता के लिए आने वाले बजट आवंटन में वृद्धि की मांग की है.

इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार साल 2006 से भारत सरकार का राष्ट्रीय वृद्धा पेंशन योजना के तहत मिलने वाली वृद्धा पेंशन में योगदान केवल 200 रुपये ही रहा है जो कि बहुत ही कम है.

इन्होंने यह भी सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को तुरंत अपना योगदान बढ़ाकर कम से कम 500 रुपये और अगर मुमकिन हो तो उससे भी अधिक करने का प्रयास करना चाहिए. इस योजना में आने वाले वर्तमान पेंशनधारियों की संख्या लगभग 2.4 करोड़ रुपये हैं जिसके अनुसार 8,640 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा.

इन अर्थशास्त्रियों ने विधवा पेंशन की राशि भी 300 रुपये से बढ़ाकर कम से कम 500 रुपये करने का सुझाव दिया है जिसके लिए 1,680 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा.

इनके अनुसार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 के तहत हर भारतीय महिला (संगठित क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को छोड़कर) को प्रति बच्चा 6,000 रुपये के मातृत्व भत्ते का अधिकार हैतीन साल से अधिक समय पूरा हो जाने के बाद भी केंद्र सरकार ने इसके लिए लगभग कुछ नहीं किया.

अर्थशास्त्रियों ने बताया कि प्रधानमंत्री ने 31 दिसंबर 2016 को घोषित किया था कि बहुत जल्द ही मातृत्व भत्ता दिया जाएगा पर एक साल बाद इस प्रावधान के लिए बनी नई योजना (प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना) अभी तक लागू नहीं हुई है.

इन अर्थशास्त्रियों ने पत्र में लिखा है, ‘2017-18 के केंद्र बजट में इसके लिए आवंटित राशि (2,700 करोड़ रुपये) खाद्य सुरक्षा कानून के मानकों के अनुसार आवश्यक राशि का केवल एक तिहाई है जो कि कानून का खुला उलंघन है. प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के अनुसार महिलाओं को केवल एक बच्चे के लिए ही मात्र 5,000 रुपये का भुगतान मिलेगा.’

इन्होंने मांग की है कि 2018-19 के बजट में खाद्य सुरक्षा कानून के प्रावधानों के अनुसार पूरी तरह से मातृत्व भत्ता लागू करने के लिए आवंटन होना चाहिए.अगर खर्च केंद्र और राज्य के बीच 60:40 के अनुपात में बांटा जाता है तो लगभग 8,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी.

अंत में इन अर्थशास्त्रियों ने लिखा, ‘भुगतान प्रणाली को सुधारना भी बहुत आवश्यक है जिससे पेंशन और मातृत भत्ते की राशि समय पर लोगों को मिले. जैसाकि सर्वोच्च न्यायालय ने 28 नवंबर, 2001 के आदेश में दिया था जैसे महीने के 7वें दिन तक. हमें आशा है कि ये सुझाव उपयोगी होंगे.’

इस पत्र पर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर आदित्य भट्टाचार्य, अश्विनी देशपांडे, दीप्ति गोयल, ज्यां द्रेज, गोवा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर  सी. राममनोहर रेड्डी, बोस्टन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दिलीप मुखर्जी, जवाहरलाल नेहरू के प्रोफेसर हिमांशु, जयति घोष, इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट स्टडीज़ के प्रोफेसर आर नागराज, एस. महेंद्र देव, सुधा नारायण समेत अन्य 60 अर्थशास्त्रियों ने भी अपने हस्ताक्षर किए हैं.