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‘यह सड़क भी एक किस्म की क्लास है, भले ही सिलेबस के बाहर हो’

हिंसा में दो पक्ष ज़रूर होते हैं, लेकिन बराबर नहीं. हिटलर की जर्मनी में भी दो पक्ष थे और गुजरात में भी दो पक्ष थे. जेएनयू में भी दो पक्ष थे और रामजस कॉलेज में भी दो पक्ष हैं. उनमें से एक हमलावर है, और दूसरा जिस पर हमला हुआ, यह कहने में हमारी संतुलनवादी ज़बान लड़खड़ा जाती है.

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दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं ने कैंपसों में शांति बनाए रखने की अपील के साथ बीते दिनों एक रैली निकाली. (फाइल फोटो: पीटीआई)

फिर चले हम. वही बाराखंबा रोड का मुहाना. नेपाल दूतावास. मंडी हाउस का एक कोना. पहचाने चेहरे. शुरुआती मार्च की धूप जो गर्म भी है और नर्म भी. और वही पत्तियां बिखेरता नीम. वसंत या पतझड़?

और मुझे हजारी प्रसाद द्विवेदी याद आ जाते हैं. वसंत इस देश में एकबारगी हर किसी पर नहीं आता. दो पेड़ों को देखो, एक पर बहार आई है तो दूसरा पत्तियों की पोशाक उतार रहा है. कोई तनाव नहीं, बगल के टूसे फेंकते पड़ोसी से कोई ईर्ष्या नहीं. उसे अपना वक्त मालूम हो जैसे!

नारे उठ रहे हैं और हवा पर तैर रहे हैं. एक धुन सी है, जिद्दी आज़ादी की जो बजे ही जा रही है. डफली है और गिटार भी, नौजवान मुस्कुराहटें हैं और गले की तनी हुई नाजुक नसें: और छोटे-छोटे पोस्टर हैं: हिंसा नहीं, वाद-विवाद और विचार की मांग करते हुए.

कौन पढ़ता हैं इन्हें? और एक ललाट दमक जाता है, हरे रंग से आज़ादी की सुर्ख़ के साथ. होंठ एक निश्चय में भिंचे हुए.

कैमरे हैं, कैमरे ही कैमरे… ओबी वैन और उत्तेजित रिपोर्टर हालांकि कुछ घटित नहीं हो रहा यहां. बरसों से इसी तरह के जुलूस में मिलने वाले बगलगीर हो रहे हैं. और एक नौजवान आता है. ‘आपसे कुछ बात कर लें, सर?’

हम आईआईएमसी से हैं, एक एसाईनमेंट है. ‘जो हिंसा हुई, उसका जिम्मा एक ही पक्ष का तो नहीं होगा न? यह तो दो पक्षों में मारपीट थी, वर्चस्व की लड़ाई.’ और मैं सोचता हूं, हिंसा में दो पक्ष ज़रूर होते हैं, लेकिन बराबर नहीं.

हिटलर की जर्मनी में भी दो पक्ष थे और गुजरात में भी दो पक्ष थे. जेएनयू में भी दो पक्ष थे और रामजस कॉलेज में भी दो पक्ष हैं. उनमें से एक हमलावर है, और दूसरा जिस पर हमला हुआ, यह कहने में हमारी संतुलनवादी ज़बान लड़खड़ा जाती है.

अचानक एक तरह एक छोटा सा झुंड आता है और हमारे एक मित्र सतर्क हो जाते हैं. कहीं फिर ‘वे’ तो नहीं घुसपैठ कर रहे जुलूस को डिस्टर्ब करने? थोड़ी भाग-दौड़ के बाद मालूम होता है, आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन के सदस्य हैं और तनाव ढीला होता है.

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फाइल फोटो: पीटीआई

‘यह सब जो हो रहा है, इससे पढ़ाई का हर्ज़ तो हो रहा है न?’ ‘उसी वजह से तो आना पड़ा यहां. हमारी क्लास, सेमिनार हाल बंद किए जा रहे हैं, वे ही तो हमारी जगहें हैं.’ ‘कौन है जो उदयपुर, जोधपुर, हरियाणा, झारखंड, पुणे, हर जगह सेमिनारों पर हमले कर रहा है? ‘कब बंद होगा यह सिलसिला?’

‘जब हमले बंद हो जाएंगे.’ जवाब सीधा है, विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक ज़ुल्म जारी है. बंद करने का ज़िम्मा जालिम पर है जिस पर हमला हो रहा है, उससे यह कहना कि तुम खामोश रहो कि यह बेकार का सिलसिला बंद हो जाए, उलटबांसी है, लेकिन कबीर की नहीं.

जो ऊब गए हैं इससे उन्हें आगे बढ़कर गालियां देने वालों और पत्थर चलाने वालों से कहना होगा कि वे अपने हाथ पत्थर की जगह किताब और कलम लें.

परसों भी नौजवानों को देखा था, पट्टे बांधे, जूते, चप्पल लहराते हुए, उंगली और ज़बान काट लेने की धमकी देते हुए. यहां समां कुछ और है: गाने हैं और तालियां हैं, आखिरकार कामयाब होने के यकीन का हमेशा ताज़ा रहने वाला गीत है.

और जुलूस चल पड़ता है. सड़क पर हिंदी और उर्दू में इबारतें दर्ज करते एक दोस्त चल रहे हैं. उर्दू जो ग़ालिब और मीर की और प्रेमचंद और रतन नाथ सरशार की जुबान है लेकिन अब जिसे देशद्रोह की भाषा बताया जा रहा है.

कहा जा रहा है कि उर्दू में बैनर लेकर नारा लगाने वालों से होशियार रहने की ज़रूरत है. यह उसका जवाब है. खुशखत, यह लफ्ज़ उर्दू का है और उस सड़क पर पांव बचाकर चलें, कहने को जी करता है, जिस पर इक़बाल दर्ज हैं, और फैज़ भी, ‘निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन, के चली है रस्म जहां कि कोई न सर उठा के चले.’

‘आज बाज़ार में पा बजौला चलो’, यह भी फैज़ हैं और; वो इतंजार था ये वो सहर तो नहीं, यह भी फैज़ हैं. लेकिन अब हम उर्दू से इतनी दूर चले गए हैं कि अगली सुबह अख़बारों में इस सहर को शहर लिखा देख ताज्जुब नहीं होता, हालांकि सहर अब भी लड़कियों का एक लोकप्रिय नाम है.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

बांग्ला भी है सड़क पर और पोस्टरों में. यह भाषा की संस्कृति है, भाषा ही भाषा, यह नफरत नहीं है, सब कुछ को समेट लेने की ख़ुशी है.

और दो छात्र आते हैं. सर, भारतीय भाषाओं के छात्रों को उच्च शिक्षा संस्थानों में जिस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, उसे लेकर हम एक गोष्ठी करा रहे हैं. जो सर्वे किया था, फिर भेज देंगे आपको. चिंता शैक्षणिक है जो इस जुलूस में भी सक्रिय है. भी या ही? शैक्षणिक चिंता ही!

यहां विरोध है, लेकिन नफरत नहीं. पांव चले जा रहे हैं, पहचाने रास्तों पर और तोल्स्तोय मार्ग से होते हुए जंतर मंतर की सड़क पार कर संसद मार्ग. संसद खामोश है. सड़क पर नारे हैं और उमर ख़ालिद कहता है, पिछले साल जेएनयू पर हमला था लेकिन बहार आई और इस साल डीयू पर हमला है लेकिन देखिए फिर क्या बहार आई है!

और नजीब की अम्मां आती हैं जो पिछले पांच महीने से इस राष्ट्र में लापता हो गया है. शेहला राशिद स्टेज पर आती हैं और गाती हैं. जी हां! इन छात्रों के गले में और होठों पर गीत पहले हैं. आप क्यों नारा लगवाने पर मजबूर करते हैं?

और एक युवती मुस्कुरा कर अंग्रेज़ी में पूछती है, क्या आप इस जुलूस में हैं? किसी फ्रेंच टीवी चैनल से है. ‘कितनी बार साल में इस तरह जुलूस निकलते हैं?’ वह हैरानी से पूछती है. ‘क्या भारत में इसका रिवाज़ है?’

और मैं सोचता हूं, क्या जवाब दूं कि भारत की छवि खराब न हो! रिवाज़ तो लेखों, किताबों पर हमलों का है, सेमिनारों पर पत्थरबाजी का है, लेखकों, छात्रों, शिक्षकों पर मुक़दमेबाजी का, उनकी बर्खास्तगी का है.

और मैं कहता हूं, हां! हमारी परंपरा है क्लास से निकलने की, सड़क पर आने की, कुछ पुरानी ही है. लेकिन यह जो सड़क है, वह भी एक किस्म की क्लास है, भले ही सिलेबस के बाहर हो. सब ख़ुश हैं. यह साथ की ख़ुशी है. सब अलग हैं, फिर भी सब साथ हैं.

जामिया के छात्र हैं जिसे दहशतगर्दों की पनाहगाह बताया जाता है और जेएनयू के छात्र और शिक्षक भी हैं जिसे देश तोड़नेवालों का गढ़ बताया जा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के मां-पिता हैं. आंबेडकर यूनिवर्सिटी के छात्र और शिक्षक हैं.

कितने लोग होंगे? पांच सौ? मैं पूछने के अंदाज़ में कहता हूं. अरे! प्रेसवाले तो हज़ार से ऊपर बता रहे हैं! मैं सिर हिला देता हूं, हो सकता है! लेकिन जमावड़ा उससे कम है जो दो रोज़ पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में थे. आ सकते थे और लोग, आएंगे! अभी तो कई-कई बार आना होगा यहां!
शाम ढल गई है. लोग विदा हो रहे हैं. पूर्वा भी आ गई हैं. क्या कुछ थकान-सी नहीं हो गई है? कुछ कॉफ़ी क्यों न हो जाए? नए चेहरे गहराती शाम के बीच चमकते जाते हैं. और मैं कहना चाहता हूं, शुक्रिया, नौजवान दोस्तो! जिंदाबाद, बाहोश नौजवानी!

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