भारत

क्या राहुल की ‘भद्रता’ उनकी कमज़ोरी को छिपाने का बहाना है?

राहुल गांधी व कांग्रेस पार्टी ने मणिशंकर अय्यर से दूरी बनाने की जितनी जल्दबाज़ी दिखाई उससे गुजरात और देश ने यह सबक नहीं लिया कि राहुल एक भद्र व्यक्ति हैं बल्कि यह संदेश गया कि राहुल में लड़ने का माद्दा नहीं है.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों का कोई भी विश्लेषण शुरू करने से पहले, एक प्रेत पर विराम लगाना जरूरी है. भारत का चुनाव आयोग 100 प्रतिशत पारदर्शिता के साथ चुनाव कराने में कामयाब होने और भविष्य में चुनाव संपन्न कराने के लिए नजीर बन जाने लायक सत्यापन प्रणाली की व्यवस्था करने के लिए बधाई का हकदार है.

पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद संभावित धांधली के आरोपों ने भारतीय लोकतंत्र को गहरे साये के सामान ढक लिया था. इसने जनता के बीच इस डर को जन्म दिया था कि अपने शासकों को उनके गलत कामों के लिए सबक सिखाने का आखिरी हथियार भी उससे छीना जा रहा है. सफल और पारदर्शी चुनाव कराके चुनाव आयोग ने इस साए को दूर कर दिया है.

ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत के कई दिन बीत जाने के बाद भी भाजपा के दिल्ली और कई क्षेत्रीय राजधानियों के मुख्यालयों में जश्न का दौर अब भी जारी है. इसके ठीक उलट कांग्रेस ने अपनी हार का ठीकरा किसी पर फोड़ने के लिए माथे की तलाश शुरू कर दी है.

कांग्रेस के पूर्व मंत्री वीरप्पा मोइली ने इस मुहिम का नेतृत्व करते हुए मणिशंकर अय्यर और कपिल सिब्बल की पहचान कांग्रेस की हार के सूत्रधार के तौर पर की है.

उन्होंने कहा कि ‘निश्चित तौर पर कपिल सिब्बल और मणिशंकर अय्यर के दो बयानों (पहले का राम मंदिर पर और दूसरे का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीच किस्म का आदमी कहना) ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया. क्योंकि इन्होंने मोदी को इनका अधिकतम फायदा उठाने का मौका दिया.

अगर ये दो बयान नहीं दिए गए होते, तो गुजरात में चुनाव प्रचार में राहुल गांधी के जबरदस्त प्रदर्शन ने पार्टी को जीत का मुंह दिखा दिया होता.

कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने हिमाचल प्रदेश में पार्टी की हार को सत्ताधारी दल के खिलाफ गुस्से की स्वाभाविक अभिव्यक्ति कहा है. उन्होंने खुद से यह सवाल पूछने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर क्यों सत्ताविरोधी यह गुस्सा पांच साल के कार्यकाल के बाद कांग्रेस के खिलाफ तो दिखाई देना चाहिए, मगर, गुजरात में लगातार 5 बार से सरकार में रहने वाली भाजपा के खिलाफ नहीं दिखना चाहिए.

इसका छोटा सा उत्तर किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने की मोदी की निर्दय इच्छा और राहुल के कमजोर और लड़खड़ाते नेतृत्व, जिसे ‘भद्रता’ का नाम दिया जा रहा है, के बीच के अफसोसजनक अंतर में है.

मोइली के सुर में सुर मिलाया है राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने. जल्दी ही दूसरे लोग भी इसमें शामिल हो जाएंगे और उनके द्वारा कहा गया हर शब्द कांग्रेस की कब्र को थोड़ा सा और गहरा खोद देगा.

वास्तव में भाजपा के प्रवक्ताओं ने मोइली और गहलोत द्वारा ‘बागी द्वय’ पर किए गए हमलों को पहले ही दोनों हाथों से लपक लिया है और इसे एक ऐसे नेता के बचाव की कोशिश करार दिया है, जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता है, इसलिए देश का नेतृत्व करने के लिए भी अयोग्य है.

जिम्मेदारी लेना

यह अंतर और ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिखाई देने वाला है, क्योंकि भारत पर अपने साढ़े तीन सालों के शासन में मोदी ने कभी भी यह स्वीकार नहीं किया है कि उन्होंने कोई गलती की है. इन सालों में उनके रोज के बयानों को देखें, तो वे बड़ी नीतिगत गलतियों और पूरे न किए गए वादों का रोजनामचा पेश करते हैं.

मोदी ने ज्यादा विकास वाले ‘अच्छे दिन’ का वादा किया था, लेकिन आंकड़ों की कारीगरी से उन्होंने इस तथ्य को सफलता के साथ छिपा दिया है कि इस साल अप्रैल से जून की तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 2001 से अब तक की किसी भी तिमाही की तुलना में कम रही है.

लेकिन, औद्योगिक विकास के मामले में इसे छिपाया जाना मुमकिन नहीं है, जो कि यूपीए शासन के आखिरी दो वर्षों के निचले स्तर से भी और नीचे की ओर गोता लगाए जा रहा है. आंकड़ों के जोड़-घटाव के बावजूद यह अब 3 प्रतिशत से नीचे ही है.

मोदी ने युवाओं को हर साल एक करोड़ रोजगार का वादा किया था, लेकिन वे 10 लाख रोजगार भी पैदा करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं.

2016 में 8 श्रम गहन क्षेत्रों में पैदा हुई कुल नौकरियां 2011 के 9.3 लाख की तुलना में गिरकर 1.35 लाख पर रह गईं. इसे अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों की स्थिति को समझने के लिए हांडी में पक रहे चावल के एक दाने की तरह माना जा सकता है.

मोदी ने उद्योगों को पुनर्जीवित करने का वादा किया था, मगर उन्होंने उनके दिवालिया होने की कगार तक पहुंचाने की रफ्तार को ही और तेज करने का काम किया है.

उन्होंने नोटबंदी से काले धन को समाप्त करने का वादा किया, लेकिन वे काले धन का एक प्रतिशत से भी काम बाहर निकाल पाए. इसकी जगह उन्होंने असंगठित क्षेत्र में 3 लाख छोटे उद्योगों को ही नष्ट कर दिया.

उन्होंने निर्माण क्षेत्र को लंबी बेहोशी में भेज दिया और लाखों प्रवासी मजदूरों को अचानक रोजगारविहीन शहरों से भाग जाने पर मजबूर कर दिया. ये मजदूर गांवों में अपना नाम मनरेगा के तहत लिखवाने की कोशिश करने पर मजबूर हुए.

उन्होंने केंद्र और राज्य के सभी अप्रत्यक्ष करों को एक कर के गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) में ढालने की यूपीए की योजना को आगे बढ़ाया, मगर इसका क्रियान्वयन इतने खराब तरीके से किया कि उन्होंने असंगठित उद्योग और व्यापार को दिवालिया होने के मुहाने तक धकेल दिया.

गुजरात में एक चुनावी रैली के दौरान भाजपा के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: ट्विटर/बीजेपी)

गुजरात में एक चुनावी रैली के दौरान भाजपा के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: ट्विटर/बीजेपी)

लेकिन, एक चीज है, जो मोदी ने कभी नहीं किया: उन्होंने कभी भी यह नहीं स्वीकार किया कि उन्होंने या उनकी सरकार ने कोई गलती की है. उन्होंने कभी अपना कदम वापस नहीं लिया. उन्होंने कभी किसी दूसरे पर दोष नहीं मढ़ा. उन्होंने कभी ‘माफी’ नहीं मागी.

वे काफी आसानी से खराब आर्थिक प्रदर्शन का ठीकरा अरुण जेटली के माथे पर फोड़ सकते थे. रेल हादसों में भारी वृद्धि के लिए सुरेश प्रभु को दोषी ठहरा सकते थे. कश्मीर में गृहयुद्ध के हालात की वापसी के लिए राजनाथ सिंह को जिम्मेदार करार दे सकते थे.

वे सबको यह बता सकते थे कि ‘स्वच्छ भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ की असफलता के लिए नौकरशाही जिम्मेदार है.

ईज इन डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत की स्थिति में नामालूम से सुधार के लिए वे न्यायपालिका की लेटलतीफी को दोषी बता सकते थे और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बिना पूरी हुई और छोड़ दी गई परियोजनाओं की संख्या के बढ़ने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पर दोष मढ़ सकते थे.

मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है. इसकी जगह, उन्होंने अपनी सरकार द्वारा किए गए हर काम की पूरी जिम्मेदारी ली है और लोगों को यह कहा है कि उन्होंने कड़े फैसले लिए हैं और उन्हें इस बात की पूरी जानकारी है कि इससे लोगों को कष्ट उठाना पड़ेगा, लेकिन बड़े और दूरगामी लक्ष्यों को पाने के लिए ऐसे कष्ट सहने पड़ते हैं.

इस देश के छोटे से प्रबुद्ध वर्ग ने, जो इस प्रपंच के पीछे के सच को जानता है, उसने मोदी के हवाई वादों को नाटक कहकर खारिज कर दिया है. उनकी लोकप्रियता के बरकरार रहने से चकित होकर उन्होंने उस पुरानी कहावत की शरण ली है:

‘आप सभी लोगों को कुछ समय के लिए मूर्ख बना सकते हैं, कुछ लोगों को हमेशा मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन सभी लोगों को हमेशा मूर्ख नहीं बना सकते हैं.’

लेकिन लोगों ने उन पर यकीन करने का फैसला किया है. इसका कारण यह नहीं है कि मोदी के वागाडंबर ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है. बल्कि इसका यह है कि उन्होंने उन्हें माफ कर देने का विकल्प चुना है. वे उनमें जो चीज देख रहे हैं, वह है अपने मातहत लोगों के प्रति न डिगने वाली वफादारी. और वे एक नेता की सबसे बड़ी निशानी मानते हैं.

लड़ने का माद्दा नहीं है राहुल में

अब इसकी तुलना राहुल और कांग्रेस पार्टी द्वारा अय्यर और सिब्बल के साथ किए गए व्यवहार से कीजिए. ये दोनों मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री थे. जब मोदी ने अय्यर के बयान को तोड़ मरोड़ कर जाति के साथ जोड़ दिया, उन्होंने मोदी की गलतबयानी का पर्दाफाश करते हए उन पर जवाबी हमला नहीं बोला.

न ही उन्होंने गुजरातियों को यह बात याद दिलाई कि बीआर आंबेडकर और जगजीवन राम, दोनों ही कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे. उन्होंने यह भी नहीं बताया कि कांग्रेस ने ही अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण को संविधान का हिस्सा बनाया था.

और कांग्रेस ही थी, जिसने जून में एक दलित मीरा कुमार को भारत के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था. इसकी जगह वे आंखों पर पट्टी बंधी हुई घबराहट की स्थिति में चले गए और उन्होंने खुद व कांग्रेस पार्टी की अय्यर से दूरी बनाने की जल्दबाजी दिखाई और इसके बाद उन्हें मोदी से माफी मांगने को कहा.

मुझे लगता है कि गुजरात और भारत ने इससे यह सबक नहीं लिया कि राहुल एक भद्र व्यक्ति हैं, बल्कि यह संदेश गया कि राहुल में लड़ने का माद्दा नहीं है. इससे यह संदेश गया कि युद्ध के मैदान में राहुल अपने जवानों की रक्षा तो नहीं ही करेंगे, बल्कि मामूली सा आक्रमण होने पर भाग खड़ होंगे. मोदी और राहुल के बीच अंतर इसलिए इससे ज्यादा स्पष्ट नहीं हो सकता था.

इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि इस बात को सबसे पहले समझने वाले पहले व्यक्ति खुद मोदी थे. इसलिए उन्होंने इसके बाद के चुनाव प्रचार के सभी भाषणों में सिर्फ और सिर्फ अय्यर पर निशाना साधा और उन पर पाकिस्तान जाकर मोदी की हत्या के लिए ‘सुपारी’ लेने का आरोप लगाया.

उन्होंने अय्यर पर पाकिस्तानी अधिकारियों के लिए एक गुप्त रात्रिभोज आयोजित करने का आरोप लगाया, जिसमें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति समेत देश के बड़े-बड़े नेता शामिल थे. इसका अलावा भी कई घृणास्पद बातें उन्होंने कहीं.

Bharuch: Congress vice-president Rahul Gandhi being greeted by a young supporter during his road show in Bharuch on Wednesday. PTI Photo (PTI11_1_2017_000100B)

(फाइल फोटो: पीटीआई)

उन्होंने ऐसा किया, क्योंकि वे जानते थे कि अय्यर को भेड़ियों के सामने फेंक देने पर भी कांग्रेस सिर्फ बैठ कर तमाशा देखने का ही काम कर सकती थी और वे और दूसरे भाजपा नेता आराम से उनकी बोटी-बोटी नोच सकते थे.

मोदी को इसके अलावा यह भी पता था कि हर बार जब वे अय्यर का नाम लेंगे, उनके श्रोता यह सोचेंगे: कांग्रेस, यानी पाकिस्तान का तुष्टीकरण यानी सामान्य तौर पर मुस्लिमों का तुष्टीकरण.

इसलिए उन्होंने सत्य, शिष्टाचार और संवैधानिक मर्यादा को तिलांजलि दे दी और बेखौफ होकर कांग्रेस के गर्दन को दबोच लिया और राहुल और उनके चाटुकार सलाहकार किनारे खड़े होकर यह सब चुपचाप देखते रहे.

गुजरात में कांग्रेस की हार का असली कारण राहुल में नेतृत्व क्षमता का न होना है. 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात में भाजपा का वोट प्रतिशत इसलिए बढ़कर दो साल पहले के 48 प्रतिशत की तुलना में 60 प्रतिशत तक पहुंच गया था, क्योंकि कांग्रेस के मतदाताओं ने वोट ही नहीं डाला. इसका नतीजा यह हुआ कि 2014 में गुजरात में पांचवां सबसे कम 63.7 प्रतिशत मतदान हुआ. यह 2012 की तुलना में 7.6 प्रतिशत कम था.

इस बार कांग्रेस और भाजपा का वोट प्रतिशत पलटकर वही हो गया, जो वह कमोबेश 2012 में था. लेकिन, इसके वितरण में काफी अंतर है. मतदान के पैटर्न को देखें, तो पता चलता है कि सौराष्ट्र में सत्ताविरोधी बड़ी लहर थी. ऐसी ही छोटी लहरें उत्तरी और मध्य गुजरात में थी. सिर्फ भुज और दक्षिणी गुजरात वे इलाके थे, जहां भाजपा का मत चट्टान की तरह अडिग रहा.

लेकिन वोटिंग पैटर्न से यह भी पता चलता है कि कांग्रेस की ओर वोटों के लौटने की प्रक्रिया अधूरी थी. क्योंकि जीत और हार के पैटर्न से सामने आने वाली सत्ता विरोधी बड़ी लहर के बावजूद 2014 में चुनाव का बहिष्कार करने वाले 7.6 प्रतिशत मतदाता में से सिर्फ 4.7 प्रतिशत ही वोट डालने के लिए वापस लौटे.

अगर बचे हुए वोट का एक छोटा सा प्रतिशत भी वोट डालता तो यह मुमकिन है कि भाजपा राज्य में बहुमत गंवा देती, क्योंकि उत्तरी और मध्य गुजरात में 9 विधानसभा क्षेत्रों में, और सौराष्ट्र में 7 क्षेत्रों में भाजपा महज 5,000 या उससे कम मतों से जीत का स्वाद चख सकी.

इनमें से 9 सीटों पर तो जीत का अंतर 2000 से भी कम था. ये वो सीटें थीं, जो कांग्रेस को मिल सकती थीं, अगर मतदाता के मन में कांग्रेस के प्रति विश्वास पूरी तरह से जाग पाता.

अय्यर पर चुनाव प्रचार के अंतिम पड़ाव में निशाना साधा गया- जब पहले चरण का मतदान पहले ही हो चुका था. इसलिए यह कहना नामुमकिन है कि इसने भाजपा विरोधी वोटरों की भावनाओं को कितना प्रभावित किया और उन्हें बाहर निकल कर वोट डालने से हतोत्साहित करने काम किया.

लेकिन, यह तो जरूर है कि इस प्रकरण से यह प्रतिशत बढ़ा नहीं होगा, न ही इसने देश का नेतृत्व करने की राहुल की क्षमता में ही लोगों के विश्वास को पुख्ता किया होगा.

यही कारण है कि राहुल की ‘भद्रता’ का बचाव करने के लिए मोइली और गहलोत जैसे पुराने नेताओं को मालघर से बाहर निकाल लिया जाता है. लेकिन ये वैसे लोग हैं, जिनका नाम भी पिछले साल नहीं सुना गया था.

राहुल गांधी को उन नेताओं की चुप्पी से सबसे ज्यादा सीखने की जरूरत है, जो कांग्रेस को मीडिया के केंद्र में लाने में सबसे ज्यादा सक्रिय रहे हैं. मसलन, पी चिदंबरम, सिब्बल, मनीष तिवारी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और शशि थरूर.

उनको मालूम है कि राहुल और उनके चाटुकारों ने आत्महत्या के बराबर का यह नुकसान सिर्फ कांग्रेस को नहीं, बल्कि देश को कराया है. क्योंकि मोदी द्वारा अय्यर के बहाने से जिस तरह से राहुल को बुरी तरह से ध्वस्त किया गया है, उसके बाद ‘सेकुलर क्षितिज’ पर ऐसा कोई नेता नहीं दिखाई देता है जो आम भारतीयों में उसी तरह की सुरक्षा की भावना जगा सके, जिस तरह से मोदी ने करके दिखाया है.

(प्रेमशंकर झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्होंने ‘क्राउंचिंग ड्रैगन, हिडेन टाइगर: कैन चाइना एंड इंडिया डोमिनेट द वेस्ट’ सहित कई किताबें लिखी हैं.)

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