दुनिया

सवाल पाक की बदसलूकी का ही नहीं, आपकी रहबरी का भी है

क्या कारण है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नहीं बता पा रहीं कि वे और उनका मंत्रालय जाधव की मां व पत्नी को पाकिस्तान के मानवीय मुलाकात के झांसे से बचाने में क्यों विफल रहे?

इस्लामाबाद स्थित विदेश मंत्रालय के कार्यालय में कुलभूषण जाधव के साथ उनकी मां और पत्नी. (फोटो साभार: ट्विटर/@ForeignOfficePk)

इस्लामाबाद स्थित विदेश मंत्रालय के कार्यालय में कुलभूषण जाधव के साथ उनकी मां और पत्नी. (फोटो साभार: ट्विटर/@ForeignOfficePk)

लंबे अरसे से गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखे गए भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव से, जिन्हें वहां फांसी की सजा सुना दी गई है, मिलने गईं उनकी मां व पत्नी के साथ पाकिस्तानी सत्ता तंत्र की ‘बेइंतहा बदसलूकी’ के बाद हमारी संसद ने जो आक्रोश जताया है, वह बहुत स्वाभाविक है.

अलबत्ता, राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू द्वारा दी गई वह नसीहत भी कुछ कम काबिलेगौर नहीं, जो उन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बयान के बाद दी. तब, जब कई सांसद पाक के खिलाफ कड़े कदमों की मांग करते हुए ‘पाकिस्तान शर्म करो’ जैसे नारे लगाने लगे.

सभापति ने इन सांसदों से कहा कि अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए ध्यान रखें कि जाधव अभी भी पाकिस्तान की जेल में हैं और मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में विचाराधीन है.

सांसदों ने सभापति की यह नसीहत बिना हुज्जत स्वीकार कर ली और अपने इस सवाल पर ज्यादा जोर नहीं दिया कि सरकार इस कुटिलता को लेकर पाकिस्तान के खिलाफ कौन-से कदम उठाने जा रही है?

लेकिन सच पूछिये तो उनकी इस नसीहत की सांसदों से ज्यादा सरकार को जरूरत थी. तब, जब बड़े मीडिया हाइप के बीच जाधव की मां व पत्नी को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की जयंती पर मानवीय मुलाकात के आॅफर का ‘लाभ उठाने’ इस्लामाबाद भेज रही थी.

उस वक्त स्थितियों का उसका आकलन कितना गलत था, इसे यों समझ सकते हैं कि इधर वह खुश थी कि ‘सहृदय’ पड़ोसी ने मुलाकात के लिए जरूरी अनुमति व वीजा दे दिये हैं, उसके प्रवक्ता इसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में की गई मामले की मजबूत पैरवी का सुफल बता रहे थे और दूसरी ओर पड़ोसी इस बहाने अपनी उस आदमीयत का डंका पीट रहा था, जो कहीं थी ही नहीं.

एक ओर पाक सुरक्षा जांच के नाम पर जाधव की मां व पत्नी की बिंदिया, मंगलसूत्र और जूते उतरवा रहा था, उन्हें शीशे की दीवार के दूसरी ओर से भी सीधे, अकेले में या मातृभाषा में बात नहीं करने दे रहा था और वे भारतीय उपउच्चायुक्त की उपस्थिति में पाक मीडिया के अनाप-शनाप सवाल झेलने को अभिशप्त थीं और दूसरी ओर भारतीय विदेश मंत्रालय इस ‘दरियादिली’ के लिए पड़ोसी का ‘शुक्रिया’ अदा कर रहा था.

हद तो यह कि पाक ने उसे 24 घंटे से भी कम वक्त में गलत सिद्ध कर न सिर्फ अपना बयान बल्कि स्टैंड बदलने तक को मजबूर कर दिया, तो भी किसी ने इसकी शर्मिन्दगी महसूस नहीं की.

कहा जाने लगा कि चूंकि पाक ने कह दिया है कि यह अंतिम मुलाकात नहीं है, सो, अब जाधव को निकट भविष्य में फांसी दिये जाने का कोई खतरा नहीं है.

कायदे से वक्त का तकाजा यह था कि बिना देर किए पाकिस्तानी अमानवीयता की पोल-खोली जाती और अंतरराष्ट्रीय मंचों या न्यायालय में आदमीयत की संज्ञा देकर अपने पक्ष में इस्तेमाल करने से वंचित किया जाता.

उसे यह मौका भी नहीं ही दिया जाना था कि वह जाधव की पत्नी के जूते में ‘कुछ’ होने का आरोप लगाकर उसे जब्त करे और फोरेंसिक जांच के लिए भेजे. हां, बेहतर यह हुआ कि विदेश मंत्रालय की ऐसी लापरवाहियों के बावजूद जाधव की मां ने चतुराई व सतर्कता का साथ नहीं छोड़ा.

पाकिस्तानी अधिकारियों के दबाव में जाधव ने कथित रूप से अपना गुनाह कुबूल करना शुरू किया तो इस मां ने कहा कि वे उन्हें सच्ची बात बताएं. इस कारण पाक जाधव के कथन को इकबालिया बयान की तरह इस्तेमाल नहीं कर सका.

प्रसंगवश, इस पड़ोसी के साथ हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि बंटवारे के बाद के सात दशकों में भी लोकतांत्रिक देश के रूप में हम न उसे अपनी जमीन पर ला पाये हैं, न उसकी जमीन पर जाना कुबूल कर पाये हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा अपने प्रधानमंत्रीकाल में इस कड़वी सच्चाई के स्वीकार के बावजूद कि आप दोस्त चुन सकते हैं, लेकिन पड़ोसी जो भी और जैसा भी हो, उसे बदल नहीं सकते. इसलिए जैसे भी बन पड़े, उसी के साथ निभाना पड़ता है.

सवाल है कि हमारे सत्ताधीश यह निभाना कब सीख पायेंगे? अभी तो वे कभी किसी बात पर, जनता को भरमाने के लिए ही सही, सब कुछ भूलकर आर-पार की बात करने लगते हैं और कभी खासे नरमदिल होकर बिना किसी तय कार्यक्रम के वहां जाने और घरेलू रिश्ते निभाने लगते हैं.

समझते नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों व राजनय में इन दोनों ही चीजों के लिए ज्यादा अवकाश नहीं होता. ऐसी चीजें माहौल को कुछ देर के लिए भले ही नरम या गरम कर सकती हों, उनके बाद स्पष्ट दिशा, नीति और कार्यक्रम पर निर्भर करना पड़ता है.

इसका बेहतर रास्ता यह है कि आप देश को उद्वेलनों के हवाले करने के बजाय अपनी शक्ति में इतना आश्वस्त रखें कि आर-पार की बात कहने के लिए मुंह और होठ न खोलने की जहमत उठानी ही न पड़े. देश के बल का दर्प ही आपकी सारी बात बयां कर दे. घरेलू रिश्ते निभाने जायें तो भी याद रखें कि राजनय की राहें सर्पीली हुआ करती हैं.

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथग्रहण समारोह में पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर जो संकेत दिये, उनके बाद उम्मीद बंधी थी कि ऐसे नीतिगत परिवर्तन होंगे जो हमारी विदेश नीति में निर्णायक मोड़ लायेंगे और पड़ोसी देश आगे हमें हलके में लेने की गलती नहीं दोहरा पायेंगे.

इससे स्वाभाविक ही उनसे रिश्ते सुधरेंगे और भारतीय उपमहाद्वीप में सुख-शांति की दीर्घकालिक परिस्थितियां सृजित होंगी. लेकिन यह उम्मीद समय के साथ नाउम्मीदी में बदल गयीं और आज पाक तो पाक, चीन, नेपाल, बंगलादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसियों में किसी से भी हमारे संबंध सहज नहीं हैं.

उनमें से कोई भी मौका पाने पर हमारे राष्ट्रीय हितों की अवहेलना से बाज नहीं आता.

क्या आश्चर्य कि ‘राष्ट्रवादी’ प्रधानमंत्री के जो समर्थक कभी उनके 56 इंच के सीने की बेहद दर्पपूर्वक चर्चा किया करते थे, अब उनके पास इस सवाल का जवाब तक नहीं कि यह उनका कैसा राष्ट्रवाद है, जिसे वे राजनीति का हथियार तो खूब बनाते हैं, लेकिन सरकारी तौर पर उसे दृढ़तापूर्वक प्रमाणित करने की जरूरत हो तो पीछे हट जाते हैं?

क्या कारण है कि उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नहीं बता पा रहीं कि वे और उनका मंत्रालय जाधव की मां व पत्नी को पाकिस्तान के मानवीय मुलाकात के झांसे से बचाने में क्यों विफल रहे?

ठीक है कि पाकिस्तान ने भरोसा तोड़ा और धोखा किया, लेकिन समाजवादी पृष्ठभूमि से आने के बावजूद वे क्यों भूल गयी हैं कि डाॅ. राममनोहर लोहिया बहुत पहले कह गये हैं कि जो शासक कहे कि वह परिस्थिति को समझ नहीं सका और धोखे का शिकार हो गया, उसे एक भी पल सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है.

बेहतर हो कि सुषमा अपनी मदर टेरेसा वाली छवि से बाहर निकलें और बार-बार उद्धत किया जाने वाला यह शेर एक बार फिर याद करें-तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि कारवां क्यों लुटा, हमें रहजनों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है-और विदेशमंत्री के तौर पर अपनी रहबरी के हित में देश को बतायें कि वे या उनकी सरकार पड़ोसी की कुटिलता को यथासमय क्यों नहीं पहचान पाईं?

इस सवाल का जवाब इसलिए जरूरी है कि वे पहचान जातीं तो जाधव की मां व बेटी अलानाहक एक और त्रास से गुजरने को अभिशप्त न होतीं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फैज़ाबाद में रहते हैं.)