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मोदी के कार्यकाल को देखें तो यह आर्थिक मोर्चे पर नाकामी की कहानी है: यशवंत सिन्हा

विशेष साक्षात्कार: पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा से मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों, कृषि संकट और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु.

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु. (फोटो: द वायर)

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु. (फोटो: द वायर)

एमके वेणु: नमस्कार. द वायर की इस खास बातचीत में आप सबका स्वागत है. हमारे साथ हैं पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा. वे हमारे साथ अर्थव्यवस्था की स्थिति और आने वाले बजट के बारे में बात करेंगे. यह संभवतः मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा और इसके पेश होने में लगभग एक महीने का समय बाकी है. तो चलिए यशवंत सिन्हा से जानते हैं कि वित्त मंत्री और इस सरकार के सामने चुनौतियां कौन सी हैं? साथ ही हम उनसे राजनीतिक आर्थिक चुनौतियों के बारे में भी बात करेंगे.

यशवंत जी, हमारे कार्यक्रम में आपका स्वागत है. पहली बात, अर्थव्यवस्था को लेकर आपका आकलन क्या है? आपकी दृष्टि में इस सरकार के सामने कौन सी चुनौतियां हैं, खासतौर पर यह देखते हुए कि जीएसटी जिस तरह से सामने आ रहा है, जिस तरह से पूरे उत्तरी और पश्चिमी भारत में किसान विद्रोह का झंडा बुलंद कर रहे हैं, जो गुजरात चुनाव में भी दिखाई दिया. आपके हिसाब से इसे किस चीज का संकेत माना जाए? चुनौती के तौर पर इसे किस तरह से देखा जाए? और यह सरकार इन चुनौतियों का मुकाबला किस तरह से कर सकती है, यह देखते हुए कि 2019 के चुनावों में काफी कम समय बचा हुआ है?

यशवंत सिन्हा: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. मेरे जेहन में आने वाला पहला ख्याल यही है कि इस सरकार का समय पूरा हो चुका है. मेरे यह कहने का मतलब ये है कि 2019 तक के कार्यकाल में अब उनके पास कुछ खास करने का मौका नहीं है. वे 1 फरवरी को बजट पेश करेंगे, लेकिन जैसा कि हम और आप जानते हैं, बजट प्रस्तावों को परिणाम देने में वक्त लगता है. इसलिए जिस संकट के बारे में आप बात कर रहे हैं, जैसे कि कृषि संकट, बेरोजगारी का संकट, ये वैसे संकट नहीं हैं, जिसका समाधन एक बजट के सहारे जल्दी-जल्दी हो सकता है. इसलिए इन बड़ी समस्याओं का हल निकालने का समय हाथ से निकल चुका है. यह अतीत की चीज बन गया है.

वेणु: तो आपके हिसाब से यह मौका गंवा देने के समान है?

सिन्हा: हां, यह मौका गंवा देने का मामला है. मेरे कहने का मतलब है कि जब हम पीछे मुड़कर मोदी सरकार के कार्यकाल के पांच वर्षों को देखेंगे, तो आर्थिक मोर्चे पर यह एक नाकामी की कहानी होगी. और मेरे मन में ऐसा कहने के पीछे की वजहें बिल्कुल स्पष्ट हैं.

मेरा मानना है कि हर सरकार का आकलन उसके द्वारा किए गए वादों के पैमाने पर करना होगा. इसलिए चाहे सवाल कृषि या ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हो, जिनको लेकर उन्होंने कई वादे किए थे, चाहे सवाल बेरोजगारी का हो, जिसको लेकर भी उन्होंने बड़े-बड़े वादे किए थे, मेरा मानना है कि इन सारे मोर्चों पर वे लक्ष्यों को पूरा करने के मामले में पूरी तरह से नाकाम रहे हैं. तथ्य यह है कि सुधार होने की जगह गिरावट आई है.

वेणु: जीडीपी में गिरावट के हिसाब से?

सिन्हा: और रोजगार के मौकों में कमी के हिसाब से. आप, जीएसटी और उससे पहले नोटबंदी की बात करते हैं. नोटबंदी और जीएसटी के असर को सरकारी आंकड़ों में सही तरह से पकड़ा नहीं जा सका है, क्योंकि जैसा कि आपको पता है कि जीडीपी की गणना करते वक्त, सांख्यिकी विभाग और सीएसओ (सेंट्रल स्टैटिस्टिकल आॅर्गनाइजेशन) संगठित क्षेत्र के आंकड़ों को आधार बनाते हैं.

वेणु: खासतौर पर सूचीबद्ध कंपनियां. इसलिए यहां तक कि अनौपचारिक क्षेत्र का भी इससे पता नहीं चलता.

सिन्हा: हां, अनौपचारिक क्षेत्र भी इसमें शामिल है. इनके प्रदर्शन को संगठित क्षेत्र और जैसा कि आपने कहा, सूचीबद्ध कंपनियों के प्रदर्शन के आधार पर मापा जाता है. इसलिए इन दोनों के प्रदर्शन में काफी अंतर है. अनुभव किए गए और लोगों की जुबानी सुने गए को अगर सबूत माना जाए, तो ऐसा लगता है कि मझोले और छोटे उद्यमों पर इसका काफी बुरा असर पड़ा है.

वेणु: जो गुजरात में भी देखा गया…

सिन्हा: हां, जो हमने गुजरात में देखा है और जो नुकसान हुआ है, वह स्थायी नुकसान है. इन दोनों के नतीजे के तौर पर किसानों को नुकसान उठाना पड़ा और उनके इस नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती है. नोटबंदी के कारण और यहां तक कि जीएसटी के कारण भी उनको जो नुकसान उठाना पड़ा, उसकी भरपाई कोई नहीं करने वाला है.

वेणु: हाल ही में इसी संदर्भ में आप महाराष्ट्र के अकोला में थे. आप वहां किसानों को बेहतर दाम देने की मांग करते हुए धरने पर भी बैठे. यहां तक कि आपको कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार भी किया गया. अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूं, तो बाद में आपकी कुछ मांगों को सरकार ने मान लिया.

सिन्हा: वास्तव में सारी मांगें. मैं आपको इसकी वजह बताऊंगा. वहां पर कुछ स्थानीय मुद्दे थे, जैसे बिजली की आपूर्ति, बकाया रकम का भुगतान और बिजली काट देना और ऐसे ही दूसरे मुद्दे. इस तरह हमारे पास करीब सात-आठ मांगें थीं, जिनके बारे में लिखित रूप में सरकार को मेरे अकोला पहुंचने से पहले ही अवगत करा दिया गया था. लेकिन, इन पर सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया, तब हमने जिलाधिकारी के आॅफिस तक एक जुलूस निकाला. तब हमारी छह मांगों को मान लिया गया, लेकिन हमारी दो मांगों को नहीं माना गया, इसलिए हमें अपनी गिरफ्तारी देनी पड़ी और धरने पर बैठना पड़ा.

अब सवाल है कि ये मांगें आखिर थीं क्या? इन दो मांगों पर चर्चा करना काफी महत्वपूर्ण है.

वेणु: ये दो मांगें पूरे सभी राज्यों पर लागू होती हैं?

सिन्हा: बिल्कुल. दूसरे सभी राज्यों पर और पूरे महाराष्ट्र पर. इसमें एक मांग न्यूनततम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की थी. आप एक न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते हैं. उसके बाद आप किसानों को कहते हैं कि, ‘ठीक है, हम आपकी पूरी उपज की जगह आधी या सिर्फ एक तिहाई उपज को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य की दर पर खरीदेंगे.’

इसके कारण किसान को अपनी उपज को औने-पौने दामों पर खुले बाजार में बेचने पर मजबूत होना पड़ता है, क्योंकि इस साल इन उत्पादों में से कुछ उत्पादों की कीमत काफी कम रही, जिसके कारण किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा.

वेणु: कुछ जगहों पर कीमतें 30 से 40 फीसदी तक गिर गईं…

सिन्हा: हां. कहने का मतलब है कि अपनी फसल को खुले बाजार में बेचने पर उसे घाटा उठाना पड़ता है. अगर खुले बाजार की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा हैं, तो किसान अपनी उपज को खुले बाजार में बेचेगा. वह नैफेड या राज्य सरकार पर आश्रित नहीं रहेगा. इसलिए यह कह कर कि आप सारी उपज की (न्यूनतम समर्थन मूल्य पर) खरीद नहीं करेंगे, न्यूनतम समर्थन मूल्य के उद्देश्य को ही बेमानी बनाया जा रहा है. इसलिए एक मुद्दा यह था.

हमने इस बात का आग्रह किया कि सरकार या नैफेड को सारी उपज की खरीद करनी चाहिए. हमारा दूसरा मुद्दा यह था कि कि अगर इस बीच में किसान को अपनी उपज को बेचने पर मजबूर होना पड़ा हो, क्योंकि वह अनिश्चित समय तक इंतजार नहीं कर सकता… इसलिए हमने यह मांग रखी कि अगर किसान इस बात का पुख्ता सबूत पेश करे कि उसने कम कीमत पर व्यापारी के हाथों अपनी उपज बेची है, तो सरकार को उसे हुए नुकसान की भरपाई करनी चाहिए.

न्यूनतम समर्थन मूल्य और खुले बाजार की कीमत में अंतर के बराबर पैसा उसे दिया जाना चाहिए. ये दो मांगें थीं. उन्होंने इन दोनों को स्वीकार नहीं किया. आखिरकार जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुझसे बात की, तब मैंने उन्हें बताया कि ये दो साधारण मांगें हैं और किसानों की मांगें उचित हैं.

वेणु: वास्तव में यह काम सारे राज्यों में किया जाना चाहिए.

सिन्हा: हां, यह सभी दूसरे राज्यों में किया जाना चाहिए. उन्होंने फोन पर तुरंत इन मांगों को स्वीकार कर लिया, उसके बाद जिलाधिकारी और किसानों के संगठन के बीच एक लिखित समझौता हुआ कि इसे इस तरह से किया जाएगा. यह एक मुद्दा था. दूसरा मुद्दा, जैसा कि आप जानते हैं, कपास की फसल का था. कपास की सारी फसल और यह बीटी कॉटन की फसल थी, बॉलवर्म से प्रभावित हुई थी, जो फसल को पूरी तरह से नष्ट कर देती है. मैंने स्थिति का जायजा लेने के लिए खुद खेतों का मुआयना किया और अपनी आंखों से देखा कि फसल को नुकसान हुआ है.

इसलिए यहां एक सवाल किसानों को हुए नुकसान के मुआवजे का था और दूसरा सवाल बीज के सप्लायर को सजा देने का था, क्योंकि कीड़े बीज के साथ ही आए थे. इन दोनों मांगों को भी मान लिया गया है और वे खेतों का मुआयना करने के लिए गए हैं और मुझे मिली जानकारी के मुताबिक वे इन तीनों मुद्दों पर पंचनामा तैयार कर रहे हैं.

वेणु: आखिर इसकी नौबत क्यों आई कि आपके जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता को एक ऐसे मुद्दे पर विरोध में धरने पर बैठना पड़ा, जो इस सरकार को खुद से करना चाहिए था क्योंकि इस सरकार ने इसका वादा 2014 के अपने घोषणापत्र में किया था. यह वादा मुख्यतौर पर यह था कि किसानों को सभी फसलों पर लागत मूल्य से 50 प्रतिशत ज्यादा मिलेगा.

सिन्हा: मैं खुद इस बात से चकित हूं. मुझे यह कहते हुए काफी हैरानी हो रही है कि इस अक्टूबर में मैं शेतकारी संगठन के निमंत्रण पर अकोला गया था. उस वक्त भी मैंने इन समस्याओं का जिक्र किया था और मैंने यह सार्वजनिक तौर पर कहा था कि नैफेड को पूरी फसल की खरीद करनी चाहिए.

किसानों को मजबूरी में औने-पौने दामों पर अपनी फसल को बेचने पर मजबूर नहीं करना चाहिए. लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि तीन महीने गुजर जाने के बाद भी उन्होंने इस दिशा में कुछ नहीं किया.

वेणु: तो जिस कृषि संकट की बात कर रहे हैं, क्या आपको लगता है कि क्या यह जंगल की आग की तरह फेल रहा है? क्या आपको लगता है कि गुजरात के सौराष्ट्र में भाजपा की हार की वजहें वे ही थीं, जिन वजहों से आप महाराष्ट्र गए और आपको धरने पर बैठना पड़ा?

सिन्हा: आपको पता है कि कृषि संकट ने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. इसलिए आप राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में किसानों के विरोध प्रदर्शनों देख रहे हैं… मंदसौर अभी भी हमारे जेहन में ताजा है.

वेणु: किसानों के सारे संगठन एकजुट हो रहे हैं.

सिन्हा: हां, मैंने महाराष्ट्र का जिक्र किया. फिर तमिलनाडु है. इन सारी जगहों पर अशांति है. मैं आपको बताता हूं कि समस्या क्या है? समस्या ये है कि दिल्ली के मीडिया में किसान बहस का विषय नहीं हैं. इसलिए किसान क्या कह रहे हैं या क्या कर रहे हैं, इस ओर कोई ध्यान नहीं देता है.

वेणु: किसानों को प्रधानमंत्री द्वारा किए गए वादे क्या थे? अलग से किए गए वादे?

सिन्हा: चुनावी घोषणापत्र में अलग से वादे किए गए थे. प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों में भी अलग से वादे किए गए थे. उदाहरण के लिए, चुनाव घोषणापत्र ये कहता है कि किसानों को फसल की लागत से 50 प्रतिशत से ज्यादा दिया जाएगा. किसान यही मांग कर रहे हैं.

वेणु: आपका अपना आकलन क्या है? आज एक औसत किसान को अपनी मेहनत के बदले में क्या मिल रहा है? और जैसा कि उनसे वादा किया गया था उसके हिसाब से…

सिन्हा: भारत का किसान आज बस किसी तरह से जिंदा रहने का संघर्ष कर रहा है.

वेणु: क्या आपके कहने का मतलब है कि वास्तव में उसे अपनी मेहनत के बदले में लागत मूल्य के बराबर भी नहीं मिल रहा है?

सिन्हा: हां.

वेणु: महंगाई के हिसाब से भी मूल्य नहीं मिल रहा?

सिन्हा: हां, इतना भी नहीं हो रहा है. महंगाई के हिसाब से भी कीमत नहीं मिल रही है. कई बार तो खेती की लागत के बराबर मूल्य भी नहीं मिल रहा है. और विदर्भ जहां के किसान सबसे ज्यादा संख्या में आत्महत्या करते हैं, मैं वहां गया था.

वेणु: और आपके अपने राज्यों- बिहार और झारखंड में स्थिति कैसी है?

सिन्हा: बिहार और झारखंड की स्थिति काफी अलग है. विदर्भ में किसान नकदी फसल की खेती करता है. मसलन वह सोयाबीन की खेती कर रहा है.

वेणु: यानी उन पर ज्यादा जोखिम है. नकदी फसलों की खेती करने वाले किसानों पर जोखिम ज्यादा है.

सिन्हा: नकदी फसलों की खेती करना ज्यादा खर्चीला काम है.

वेणु: इसमें लगने वाले आगत (इनपुट) ज्यादा खर्चीले हैं.

सिन्हा: हां, इसकी खेती में लगने वाले आगत ज्यादा खर्चीले हैं. इसलिए अगर फसल को नुकसान पहुंचता है या किसान को फसल को बाजार में बेचने पर घाटा उठाना पड़ता है, तो वह कर्ज नहीं चुका पाता और इसलिए उसे आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ता है.

वेणु: आंध्र प्रदेश में भी यही हुआ?

सिन्हा: हां, आंध्र प्रदेश में भी यही हुआ. बिहार और झारखंड में किसान मुख्यतौर पर धान या गेहूं या सब्जियों की खेती कर रहा है. ज्यादा कीमत वाली नकदी फसलों की ओर वहां इतना झुकाव नहीं है.

वेणु: वहां कम आत्महत्या होने का कारण यही है?

सिन्हा: हां, कम आत्महत्याएं. मगर अब हम बिहार और झारखंड में भी किसानों की आत्महत्याओं और कृषि संकट के मामले देख रहे हैं. ऐसा पहली बार हुआ है. ऐसा दस साल पहले नहीं हुआ. यानी पिछले तीन-चार सालों में कृषि संकट और गहराया है. गुजरात समेत पूरे देश में किसानों के असंतोष का यही कारण है.

वेणु: और आने वाला बजट इस दिशा में क्या कर सकता है?

सिन्हा: देश के 50 प्रतिशत लोग आज भी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं. और अकेले भारत सरकार इस दिशा में कुछ भी नहीं कर पाएगी, क्योंकि कृषि राज्य सूची का विषय है और इसलिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करना होगा. ऐसा नहीं करने पर कोई भी योजना कामयाब नहीं होगी. मैंने किसान क्रेडिट कार्ड की योजना शुरू की थी, क्योंकि इसे लागू करना आसान था. लेकिन अगर हम मान लीजिए कि सिंचाई योजना शुरू करना चाहते हैं, तो हमें राज्यों के साथ मिलकर काम करना होगा.

अगर हम किसानों को उचित रिटर्न देना चाहते हैं, तो हमें राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करना होगा. इसी तरह दूसरे क्षेत्र भी हैं, जैसे विस्तार सेवाओं का मामला है. मैं आपको विस्तार सेवाओं के बारे में बताता हूं. बोरलॉग (नॉर्मन बोरलॉग- हरित क्रांति के जनक माने जाते हैं) आज किसी को ये याद नहीं कि उन्होंने विस्तार सेवाओं को लेकर क्या किया? आज जिला कृषि केंद्रों के बावजूद किसानों को उचित सलाह नहीं मिल पा रही है.

वेणु: सॉयल हेल्थ कार्ड का क्या हुआ, जिसे बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया जा रहा था?

सिन्हा: नहीं नहीं. यह सिर्फ टुकड़ों में हुआ है. मैं हजारीबाग के ग्रामीण इलाके में रहता हूं और मुझे पता है कि किसान आज भी पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर हैं. वे आज भी वैसे ही खेती कर रहे हैं, जैसे वे 2000 साल पहले किया करते थे.

वेणु: हाल ही में नीति आयोग ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें कहा गया था कि अगर वास्तव में किसानों की हालत में सुधार लाना है, तो आपको सिंचाई के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना होगा. साथ ही इसमें अन्य बातें भी कही गई थीं. कृषि में निजी और सरकारी निवेश दोनों की अगर एक साथ बात की जाए, तो इसमें 6,32,000 हजार करोड़ रुपये निवेश की जरूरत है. इसलिए कई बार ऐसा लगता है कि हम कृषि में निवेश के सवाल पर सिर्फ जुबानी जमाखर्च ही कर रहे हैं और बजट में कृषि के लिए जितना पैसा आवंटित किया जाता है, वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही है. और अगर आप चुनाव घोषणापत्र को याद करें तो सत्ता में आने पर इस सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना ‘हर खेत को पानी’ की थी. और अगर कोई इस पर गंभीरता के साथ अमल करना चाहे तो इसके लिए पांच साल तक हर साल 30,000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी.

सिन्हा: इस मामले से जुड़ी हुई एक रोचक कहानी है. आपको याद होगा कि मैंने अपने 1999 के बजट में या शायद 2000 के बजट में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना कार्यक्रम की शुरुआत की थी. अब, इस योजना के सफल होने के बाद मेरा यह विश्वास पक्का हो गया है कि सिंचाई के क्षेत्र में भी हमें ऐसी ही योजना की जरूरत है. क्योंकि ज्यादातर सिंचाई परियोजनाएं छोटी या बड़ी होंगी. वे बहुत बड़ी नहीं होंगी. क्योंकि बड़ी योजनाओं के लिए आपको बड़े बांध बनाने पड़ेंगे और किसानों को इससे अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ेगा और आज यह संभव नहीं है. यह उस समय संभव था, जब जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे.

इसलिए मैंने इस बात पर जोर दिया…2014 में मैं भाजपा की चुनाव घोषणापत्र समिति का एक सदस्य था.. कि घोषणापत्र में कृषि सिंचाई योजना को शामिल किया जाना चाहिए. यह (योजना) वहां थी, क्योंकि मुझे कहा गया था कि आप इसे लिख सकते हैं और उन्हें दे सकते हैं…

वेणु: और हर खेत को पानी, इसका ही विस्तार था.

सिन्हा: हां, हमने कृषि सिंचाई योजना की बात हर खेत को पानी के सपने को साकार करने के लिए की. अब वित्त मंत्री ने बड़ी चालाकी के साथ क्या कि उन्होंने सारी योजनाओं को, सारी पहले से चली आ रही योजनाओं को एक में मिला दिया.

वेणु: यानी आवंटन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई थी?

सिन्हा: हां और उन्होंने कहा कि हम सिंचाई पर 40,000-50,000 और 70,000 खर्च करने जा रहे हैं. लेकिन वास्तव में यह पैसा जमीन पर उलब्ध नहीं था. दूसरी बात, सिंचाई योजना को बहुत ब्यौरेवार ढंग से तैयार नहीं किया गया, जैसे हमने ग्राम सड़क योजना को किया था, जिससे पैसे का सही तरह से इस्तेमाल हो सका और परियोजना को सही ढंग से क्रियान्वित किया जा सका. लेकिन अभी इस तरह की कोई चीज दिखाई नहीं दे रही है.

अभी आलम ढाक के तीन पात वाला है. इसलिए भले आंकड़ों के सहारे यह दिखाया जाए कि हजारों एकड़ जमीन नई सिंचाई परियोजनाओं के के दायरे में आई है, लेकिन हकीकत ये है कि जमीन पर कुछ भी नहीं हुआ है.

मैं इसे बहुत बड़े मौके को हाथ से गंवा देने के समान मानता हूं. बल्कि यह सिर्फ मौका गंवाने की भी बात नहीं है…

वेणु: आपने गिरावट- पीछे की ओर जाना कहा था.

सिन्हा: हां यह पीछे जाने के समान और एक तरह का विश्वासघात है. हमने एक वादा किया और उस वादे को पूरा नहीं किया.

वेणु: क्या आपको लगता है कि यह राजनीतिक रूप से गुस्से को जन्म दे रहा है?

सिन्हा: हां, ऐसा है. मैंने इसे खुद देखा है. मैंने इसका अनुभव झारखंड में किया. इसका अनुभव महाराष्ट्र और दूसरी जगहों पर किया. अगर राजस्थान में किसान कलेक्टर आॅफिस का घेराव करते हैं, तो यह दिल्ली में ब्रेकिंग खबर नहीं बनती. लेकिन जिस जगह पर ऐसा हो रहा है, वहां के लिए यह बेहद अहम घटना है.

वेणु: मोदी सरकार का कहना है कि वे ढांचागत सुधार कर रहे हैं, जिसका परिणाम लंबी अवधि में दिखाई देगा. इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? क्योंकि सरकार को यह एहसास है कि निकट भविष्य में वह कोई वादा पूरा नहीं करने जा रही. ऐसा आंकड़ों से पता चल रहा है. सारे आंकड़े नीचे की ओर जा रहे हैं. क्योंकि 2017 एक ऐसा साल था, जब दुनिया की तीन चैथाई अर्थव्यवस्थाओं ने बेहतर जीडीपी वृद्धि, कम बेरोजगारी, निर्यात में बेहतर बढोतरी दर्ज की है. लेकिन भारत इससे बाहर है. भारत उन एक चैथाई देशों में शामिल है, जिन्होंने इनमें से किसी भी पैमाने पर बेहतर प्रदर्शन नहीं किया है.

सिन्हा: आप पूरी तरह से सही हैं. सबसे ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि सकल पूंजी निर्माण, निश्चित पूंजी निर्माण अपने 38 फीसदी के सर्वश्रेष्ठ से गिरकर 27 प्रतिशत पर आ गया है. इसके बूते आप 8 प्रतिशत की वृद्धि दर कैसे बनाए रखेंगे? यह एक असंभव काम है. मेरे कहने का मतलब है कि आज जो सपने बुने जा रहे हैं और जिन्हें बजट में दिखाया भी जा सकता है, वे सब पूरी तरह से गलत हैं, क्योंकि महल ढह गया है.

वेणु: और निजी निवेश के क्षेत्र में सुधार नहीं हो रहा है.

सिन्हा: निजी निवेश के क्षेत्र में सुधार नहीं है. तथ्य यह है कि यह नीचे की ओर जा रहा है. इस सरकार के चार साल पूरे होने वाले हैं. बैंकों की गैर-निष्पादन परिसंपत्तियों (एनपीए) के मामले में कुछ नहीं हुआ है.

इस सरकार के राज में साल दर साल बैंकों के एनपीए में बढ़ोतरी हो रही है और आज यह 8,00,000-10,00,000 करोड़ रुपये के आसपास है. यह आंकड़ा इस बात पर निर्भर करता है कि आप आंकड़ों को किस तरह से जोड़ते हैं.

वेणु: मैं आपके सामने एक खास बिंदु उठाना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कि आप इसका जवाब दें. सरकार यह कह रही है कि ये एनपीए यूपीए सरकार की विरासत हैं और उस दौर में अपने करीबी पूंजीपतियों को बिना सोचे-समझे कर्ज दिए गए. लेकिन ये सारे करीबी पूंजीपति आज भी परिदृश्य में दिखाई दे रहे हैं और इस सरकार के साथ उनकी अच्छी-खासी छन भी रही है. अब तो निजी बैंकों का एनपीए भी बढ़कर तीन गुना हो गया है. आप इस पर क्या कहना चाहेंगे क्योंकि मैं इस बात को लेकर निश्चिंत हूं कि कई कारोबारियों को कर्ज दिलाने के लिए सरकार ने बैंकों को प्रभावित किया.

सिन्हा: यह बिल्कुल स्पष्ट है. देखिए, अगर अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा नहीं होगा, तो एनपीए बढ़ता जाएगा. हालात को सुधारने का रामबाण यही होता कि अर्थव्यवस्था में सामान्य तौर पर सुधार हो और उसमें तेजी आए. ऐसा नहीं हो सकता है कि आपकी अर्थव्यवस्था नीचे की ओर जाती रहे और आप यह भी उम्मीद करते रहें कि बैंकों के कर्जे वापस होते रहेंगे और कोई एनपीए नहीं होगा. लेकिन, यह निश्चित तौर पर यह विरासत में मिली समस्या है, इसके बारे में कोई शक नहीं है.

वेणु: जिस ओर ध्यान नहीं दिया गया.

सिन्हा: इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए था. आप चार साल या पांच साल के बाद उठकर यह नहीं कह सकते हैं कि यह विरासत में मिली समस्या है.

वेणु: और यह री-कैपिटलाइजेशन बॉन्ड भी साढ़े तीन साल बाद आया है…

सिन्हा: और हां, इन बॉन्डों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है. इनको अभी आखिरी रूप नहीं दिया गया है. और जिस तरह से या जब यह जाएगा, यह एक तरह से प्रतिभूतिकरण की तरह होगा. यानी बैंक बॉन्ड जारी करेंगे और सरकार इसकी गारंटी लेगी. लेकिन, बात ये है कि इनको प्रदर्शन करने में, कोई परिणाम देने में वक्त लगेगा. और सबसे महत्वपूर्ण चीज है मांग. मेरे कहने का मतलब ये है कि निजी क्षेत्र निवेश में रुचि क्यों लेगा, अगर पहले से मौजूद क्षमता का ही पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है.

वेणु: वे फिलहाल 70 प्रतिशत क्षमता पर काम कर रहे हैं, जिसमें काफी समय से थोड़ा सा भी बदलाव नहीं आया है.

सिन्हा: हां. जो काम किया जाना सबसे महत्वपूर्ण है, वह है अर्थव्यवस्था में निवेश वस्तुओं (इंवेस्टमेंट गुड्स) और उपभोग वस्तुओं (कंजम्पशन गुड्स), दोनों की मांग को बढ़ाना. यह इस सरकार द्वारा उठाया जाने वाला पहला कदम होना चाहिए था, जिसमें वे नाकाम रहे हैं. मेरे कहने का मतलब है कि ऐसा लगता है कि जब वे सत्ता में आए, तब उन्होंने तुरंत काम करना शुरू नहीं किया और उन्हें इस बात की कोई समझ नहीं थी कि चीजों को कैसे सुधारना है.

वेणु: और उनके पास तेल की कम होती कीमतों की फायदेमंद स्थिति थी. राजकोषीय दृष्टि से उनके लिए स्थिति काफी सकारात्मक थी. क्या आपको लगता है कि इस सकारात्मक स्थिति का लाभ उठाने में सरकार नाकाम रही है, क्योंकि अभी एक-दो दिन पहले ही वित्त मंत्री ने 50,000 करोड़ और उधार लेने की घोषणा की है और इसका एक कारण जीएसटी को लागू करने के तरीके में छिपा है. जीएसटी के संग्रहण में बड़ी गिरावट आई है. आपको क्या लगता है, हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं? क्या आपको लगता है कि यह आखिरी बजट भी आंकड़ों को जाने बिना अंधेरे में ही बनाया जाएगा?

सिन्हा: सरकार इस इस साल या अगले साल राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को पूरा कर पाएगी, इस बात पर मुझे गहरा संदेह है. इसका आसान सा कारण यह है कि जब जीएसटी के तहत करीब 200 वस्तुओं पर लगने वाले कर को 28 प्रतिशत से घटाकर सीधे 12 प्रतिशत किया गया, उस समय वित्त मंत्री ने हमें यह नहीं बताया कि इससे राजस्व को कितना नुकसान होगा? मेरे कहने का मतलब ये है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरे जीएसटी की दरों का निर्धारण एक सिद्धांत पर किया गया था, और वह सिद्धांत रिवेन्यू न्यूट्रलिटी का था.

इस बीच मुझे मीडिया में पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा का एक बेहद दिलचस्प बयान पढ़ने को मिला. उन्होंने कहा कि राज्य को 30,000 करोड़ का नुकसान होगा और दरों में की गई इस कमी से केंद्र को 60,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा. और इन नुकसानों को मिला दिया जाए तो कुल नुकसान 90,000 करोड़ रुपये का होगा, क्योंकि सारा नुकसान भारत सरकार के खाते में जाएगा, क्योंकि सरकार राज्यों को होने वाले किसी भी नुकसान की भरपाई करने के लिए वचनबद्ध है. यह 90,000 करोड़ रुपये जीडीपी के लगभग 1 प्रतिशत के बराबर है. और अब हम इसे आंकड़ों में देख रहे हैं, महीने दर महीने यह (जीएसटी संग्रहण) 80-82,000 करोड़ रुपये पर आ गया है.

वेणु: तो क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि अगने छह महीने में वास्तविक उधारी इससे कहीं ज्यादा हो सकती है?

सिन्हा: हमने राजकोषीय विकल्पों को पहले ही गंवा दिया है. इसलिए सरकार को अब ज्यादा उधारी लेनी होगी. राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा सकेगा. और मैंने अखबारों की रपटें और संपादकीय देखे हैं, जो ये कहते हैं कि अगर यह लक्ष्य कुछ अंकों से आगे-पीछे हो भी जाए, तो इससे क्या फर्क पड़ता है? लेकिन मसला यह नहीं है. मसला यह है कि यह सरकार की विश्वसनीयता को सामने लाता है.

ऐसा नहीं हो सकता कि आप रेटिंग एजेंसियों को तो यह कहें कि आप राजकोषीय अनुशासन को लेकर गंभीर हैं, लेकिन खुद उसका उल्लंघन करें. एक मसला यह है. दूसरा मसला, जैसा कि आपने उठाया, कच्चे पेट्रोलियम की कीमत का है. यह इस सरकार के लिए एक बहुत-बहुत बड़ी सौगात की तरह था. 40 डाॅलर प्रति बैरल कीमत पर सरकार हर साल लाखों करोड़ों रुपये बचा रही थी. उस पैसे का इस्तेमाल किस तरह से हुआ है?

इस सरकार के पास जैसे राजकोषीय विकल्प थे, वे हाल के इतिहास में किसी भी सरकार के पास नहीं थे. ये राजकोषीय विकल्प तेल की गिरती कीमतों के कारण पैदा हुए थे.

वेणु: निश्चित तौर पर. उन्होंने तेल की खुदरा कीमतों या तेल की घरेलू कीमतों को कम नहीं किया. वे हमेशा उसी स्तर पर बनी रहीं, जिस स्तर पर वे तब थीं, जब तेल की कीमत 115 डाॅलर प्रति बैरल थी.

सिन्हा: हां, तेल की कीमत के कम होने का फायदा उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाया गया. वे बजट में बुनियादी ढांचे की नई परियोजनाएं या नई कल्याणकारी योजनाएं लेेकर भी नहीं आए. उन्होंने इस फायदे का कोई उपयोग नहीं किया, कोई असाधारण उपलब्धि इससे हासिल नहीं की गई. इसलिए खर्च का प्रबंधन एक ऐसा मोर्चा है, जिस पर इस सरकार ने गंभीर गलतियां की हैं. जहां तक खर्च के प्रबंधन का सवाल है, इस सरकार में किसी किस्म का अनुशासन दिखाई नहीं देता.

वेणु: आपने मेरे एक सवाल का जवाब नहीं दिया जो सरकार के उस दावे से जुड़ा था, जिसके तहत यह कहा जा रहा है कि ढांचागत सुधारों को असर दिखाने में कुछ नहीं तो दो साल का समय लग सकता है. क्या यह समस्या को टालने जैसा नहीं है?

सिन्हा: नहीं, नहीं. अगर नोटबंदी को ढांचागत सुधार के तौर पर पेश किया जा रहा है, तो मैं यह कहूंगा कि जिन कानूनों के तहत आप आज कार्रवाई कर रहे हैं, वे सारे कानून कई सालों से वजूद में हैं. वास्तव में, मनी लाउंड्रिंग बिल को मैंने ही संसद के सामने रखा गया था और उसे पारित करवाया था. यानी यह कानून नया नहीं है. इसी तरह से इनकम टैक्स संबंधित कानून भी पहले से था. यानी आपके पास काला धन पर कार्रवाई करने के लिए कानून पहले से ही थे.

आपको एक मक्खी को भगाने के लिए हथौड़े की चोट करने की जरूरत नहीं थी. नोटबंदी ने दरअसल यही किया है. और जैसा कि अकोला में मुझे एक किसान ने कहा, ‘मैं अपने नारंगी के बागान को तीन लाख रुपये में बेचने वाला था. नोटबंदी के बाद मुझे इसके बस डेढ़ लाख रुपये ही मिले.’ यानी उसे डेढ़ लाख रुपये का नुकसान हो गया. क्या कोई उसको हुए उस नुकसान की भरपाई कर सकता है. नहीं.

उसको जो नुकसान उठाना पड़ा वह स्थायी है. इससे जो नुकसान हुए, उससे हम सब भली-भांति वाकिफ हैं, लेकिन इससे होने वाले फायदे कथित तौर पर दूर भविष्य के गर्भ में छिपे हैं… और जैसा कि मैंने कहा, काला धन पर कार्रवाई करने के लिए नोटबंदी की कोई जरूरत नहीं थी.

वेणु: और अब मुझे लगता है कि सरकार सिर्फ एक दलील देती है, जिस पर आपने पहले भी प्रतिक्रिया दी है, और वह यह है कि लोगों के द्वारा काफी पैसा बैंक में आया है और कुछ नौ या दस लाख लोगों को टैक्स नोटिस भेजे गए हैं.

सिन्हा: 18 लाख.

वेणु: हां, पहले यह 18 था, लेकिन अब उन्होंने नौ या दस लाख लोगों को छांटा है, जिन्होंने 3,00,000 करोड़ रुपये जमा कराए हैं. बाकी लोग सरकार को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि उनके द्वारा जमा कराया गया पैसा, वह पैसा था, जिस पर कर अदा किया जा चुका था. सरकार का कहना है कि बाकी मामलों की जांच इनकार टैक्स विभाग द्वारा की जाएगी. क्या आपको लगता है कि इनकम टैक्स विभाग जांच करने और काला धन का पता लगाने में कामयाब हो पाएगी? इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में कितना वक्त लगेगा? आपको क्या लगता है? आखिर, आंकड़ों के मुताबिक प्रत्यक्ष कर संग्रह भी बजट अनुमानों से कम है.

सिन्हा: देखिए, इनकम टैक्स विभाग इनकम टैक्स कानूनों के तहत काम करेगा. और वे समुचित प्रक्रियाओं के हिसाब से ही आगे बढेंगे. यानी आखिरकार सेशन आॅफिसर द्वार आकलन किया जाएगा. उसके बाद अपेलेट ट्रिब्यूनल है, अगर आप असेसिंग आॅफिसर के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं. आप उससे भी आगे जा सकते हैं. अपेलेट ट्रिब्यूनल से आप हाई कोर्ट में जाते हैं. हाई कोर्ट से आप सुप्रीम कोर्ट मे जाते हैं. हमारी न्यायिक प्रणाली की लेटलतीफी को देखते हुए कोई भी इसका अंदाजा लगा सकता है कि 9-10 लाख मामलों की जांच और निपटारा करने में कितना वक्त लगेगा.

यह एक मजाक है. मैं आपको कह रहा हूं कि यह एक मजाक है. हाल ही में मैंने वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री का एक बयान देखा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि नोटबंदी के बाद 25,000 करोड़ के बराबर की अघोषित आय का पता चला. अब ये आय घोषित थी या अघोषित ये दूसरा सवाल है, लेकिन सच्चाई ये है कि ये वे मामले हैं, जिन पर अभी तक आखिरी फैसला नहीं आया है. और जिन मामलों में फैसला नहीं आया है, उनके आधार पर यह दावा करना कि हमने इतने काले धन का पता लगा लिया है, पूरी तरह से गलत है.

वेणु: इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है कि बैंकों के लिए कर्ज देने में इसलिए दिक्कत आ रही है, क्योंकि 40-50 कॉरपोरेट समूहों ने 10 लाख करोड़ रुपये के आसपास का कर्ज लिया हुआ है. इनमें से तीन या चार समूहों ने ही 3 से 4 लाख रुपये का कर्ज ले रखा है. क्या एनपीए की इस समस्या का कोई समाधान होते हुए आप देख रहे हैं?

सिन्हा: नहीं, इसका समाधान इस अर्थ में हो रहा है कि बैंकरप्सी कोड (दिवालिया कानून) के तहत कंपनियों को दिवालिया घोषित करना होता है. इसके बाद उन्हें उन्हें बेचना होता है. उनकी परिसंपत्तियों को बेचना होता है. अब, आपको पता है कि वे सुप्रीम कोर्ट जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करता है. इसलिए भारतीय रिजर्व बैंक किसी कंपनी को दिवालिया घोषित करता है, तो इसके साथ कई कानूनी पचड़े भी सामने आते हैं.

वेणु: और कुछ मामलों में तो, जिनमें इसे सुलझा लिया गया, उनमें भी बैंक सिर्फ लेनदारी का महज 25 प्रतिशत ही वसूल कर पाए.

सिन्हा: हां. क्योंकि वहां परिसंपत्तियां (असेट्स) नहीं हैं.

वेणु: हां और वे 70 से 75 प्रतिशत को राइट ऑफ (बही खाते से हटाना) कर रहे हैं…

सिन्हा: हां. बिल्कुल. और उन परिसंपत्तियों या खराब कर्जे की गिनती नहीं की जा रही है, जिन्हें खुद बैंकों द्वारा असेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनियों को हस्तांतरित किया गया है. इसलिए जब आॅडिट किया जाएगा, तो अगर डूबे हुए कर्जों के कारण बैंकों को हुए सारे घाटों को अगर जोड़ा जाए, तो यह एक बहुत ही बड़ा आंकड़ा होगा.

वेणु: यानी, आप एक तरह से यह कह रहे हैं कि यह एक मौके को गंवा देने के समान है और अब सरकार यह दावा नहीं कर सकती या सारी चीजों का दोष पिछली सरकार पर नहीं मढ़ सकती है. उनके पास इन मसलों का समाधान ढूंढ़ने के लिए काफी वक्त था.

सिन्हा: निश्चित तौर पर. हर सरकार विरासत में कुछ अच्छी, तो कुछ बुरी चीजें प्राप्त करती है. मेरा कहना है कि लोकतंत्र में आप यह नहीं कह सकते कि आपको बिल्कुल साफ सुथरी स्लेट मिले. आपको कभी भी ऐसी साफ-सुथरी स्लेट नहीं मिलती. आपको पिछली सरकार से एक मिली-जुली तस्वीर (अच्छी विरासत या खराब विरासत) मिलती है. आपको समस्याओं का सामना करना पड़ता है और आगे बढ़ना होता है. पांच साल तक रोते रहने का कोई तुक नहीं है. सबकुछ को विरासत में मिला हुआ कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता.

वेणु: अंत में, मुझे यह बताइए कि आपको क्या लगता है, हम राजनीतिक रूप से किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. आपने अगले बजट के बाद इस सरकार की बात की. यह मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा. उनके पास खूब मौके थे, जिसकी शुरुआत तेल की कम कीमतों से हुई, जिसने उन्हें राजकोषीय मोर्चे पर काफी विकल्प दिए. चालू खाते के मामले में इसने सरकार की राह आसान की. अब हम यह आर्थिक संकट देख रहे हैं, जैसा कि आपने कहा या इसे आर्थिक गिरावट या गंवा दिया गया मौका कहा जाए… चाहे जिस तरह से भी आप इसे कहें. आपको क्या लगता है कि इसका असर राजनीतिक तौर पर किस तरह से दिखाई देगा?

सिन्हा: जहां तक 2014 के जनादेश का सवाल है, मेरे मन में इस बात को लेकर कोई शंका नहीं है कि इस जनादेश को पानी में बहा दिया गया है. और अब जो समय बचा हुआ है, उसमें खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करना काफी मुश्किल है. यह पहली बात है.

दूसरी बात,

यहां तक कि विरासत में मिले मुद्दों को भी सुलझाया नहीं जा सका. आपको पता है कि वे जस के तस कायम हैं, बल्कि वे और खराब हुए हैं. और इन सबका परिणाम, जैसा कि मैंने पहले कहा, शहरों से दूर ग्रामीण इलाकों में भीषण कृषि संकट के तौर पर सामने आया है, जिस ओर मीडिया का ध्यान नहीं है. और रोजगार के मौके न होने के कारण युवाओं में काफी असंतोष है.

वेणु: ये राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली मुद्दे हैं.

सिन्हा: जहां तक राजनीति का सवाल है, वैसे मुद्दे कौन से हैं, जो चुनावी दृष्टि से मायने रखते हैं. एक है, महंगाई. इस मोर्चे पर कहना होगा कि तेल की कीमतों के कम रहने के कारण, वे इस मोर्चे पर काफी किस्मत वाले रहे हैं. इसलिए टमाटर और सब्जियों की बढ़ती कीमतें बड़ा मुद्दा नहीं बन पाई हैं. लेकिन, बेरोजगारी और कृषि संकट और छोटे और मझोले उद्यमों और मध्यवर्ग में में फैली निराशा, बड़ा मुद्दा बनेंगी.

काफी बड़ी संख्या में छोटे कारोबारी, अगर आप बात करके देखें, तो वे भीषण संकट में मिलेंगे. इसी तरह से कृषि संकट है. और जहां तक मझोले और छोटे उद्यमों का सवाल है, तो उनकी हालत भी ऐसी ही है. रोजगार के मौके न होने के कारण युवाओं में असंतोष है. ये वे मुद्दे हैं, जो चुनाव के लिए मन बनाते वक्त अपना असर डालेंगे.

वेणु: अगर राजनीति के लिहाज से बात की जाए, तो निश्चित तौर पर ये वे मुद्दे हैं, जो 2019 की ओर बढ़ने पर भाजपा को राजनीतिक तौर पर चुनौती देंगे. लेकिन, एक दूसरा पक्ष भी है, जो यह कहता है कि नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकार लोगों का ध्यान दूसरे मुद्दों, गैर-आर्थिक मसलों की ओर भटका सकते हैं, जैसा कि गुजरात चुनाव में हमने देखा. वे बांटने वाले किसी मुद्दे को उठा सकते हैं. हिंदुओं के समूहीकरण की परियोजना को आगे बढ़ा सकते हैं. क्या आपको लगता है कि ये चीजें उनके लिए फायदेमंद साबित होंगी? आपको क्या लगता है?

सिन्हा: अगर ऐसा राष्ट्रीय स्तर पर किया गया, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

वेणु: हमने एक केंद्रीय मंत्री को यह कहते सुना कि ‘हम यहां संविधान को बदलने के लिए हैं’- ये सारी चीजें आपके मुताबिक हमें कहां लेकर जाएंगी?

सिन्हा: ये सारी चीजें सामाजिक ताने-बाने में दरार पैदा कर रही हैं, इसको लेकर कोई शक नहीं है. लेकिन, ये सारी चीजें एक बिंदु तक ही काम करती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर जब लोकसभा के आम चुनाव होंगे, मुझे नहीं लगता है कि ये सारे मुद्दे उस तरह से कारगर सबित होंगे, जिस तरह से वे एक राज्य में हुए.

वेणु: वे स्थानीय स्तर पर कारगर हो सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्रीय चुनाव में…

सिन्हा: रोजी और रोटी का सवाल, इन सारे विभाजनकारी मुद्दों पर छाया रहेगा.

वेणु: यशवंत सिन्हा जी, हमसे बात करने का बहुत-बहुत आभार. अभी तक के लिए इतना ही. इस कार्यक्रम को देखने के लिए आप सबका शुक्रिया.

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