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हम अति-राष्ट्रवाद के समय में जी रहे हैं: इतिहासकार

अपनी नई किताब में इतिहासकार एस. इरफान हबीब ने भारत में राष्ट्रवाद के उदय और विकास पर चर्चा की है.

(फोटो: पीटीआई)

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: इतिहासकार एस. इरफ़ान हबीब ने कहा है कि राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी के तौर पर लोगों की पहचान, राज्य और उसकी राजनीति के प्रति उनके रवैये से हो रही है.

एस. इरफान ने ये निष्कर्ष एक ऐसे संकलन के संपादन के बाद निकाले हैं जो भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव और विकास की पड़ताल करता है.

‘इंडियन नेशनलिज़्म: द एसेंशियल राइटिंग्स’ में इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण विचारों को एक जगह रखा गया है. इनमें महत्वपूर्ण नेताओं और विचारकों जैसे- महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सी. राजगोपालाचारी, भगत सिंह, बाल गंगाधर तिलक, सरोजनी नायडू, बीआर आंबेडकर, रवींद्रनाथ टैगोर, मौलाना आज़ाद, जयप्रकाश नारायण तथा अन्य के विचार शामिल किए गए हैं.

इस पुस्तक में 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों के बाद से राष्ट्रवाद के उदय और विकास को विभिन्न चरणों जैसे उदारवादी, धर्म-केंद्रित, क्रांतिकारी, सर्वव्यापी, समन्वयात्मक, असंकीर्ण, दक्षिण उदारवाद के ज़रिये बताने का प्रयास किया गया है.

हबीब ने कहा, ‘सांस्कृतिक एकरूपता की पुकार के बीच हम अति-राष्ट्रवाद के समय में जी रहे हैं. स्वघोषित राष्ट्रवादियों और एक-संस्कृति का उन्माद हमारी सामाजिक बनावट को टुकड़ों में बांटने का ख़तरा पैदा कर रहा है. एक दोहरेपन ने हमें घेर लिया है- राज्य और उसकी राजनीति के प्रति आपके नज़रिये के आधार पर तय किया जा रहा है कि आप एक राष्ट्रवादी हैं या राष्ट्रविरोधी.’

अलेफ की ओर प्रकाशित की गई इस किताब में उन्होंने लिखा है, ‘एक भारतीय के तौर पर इस तरह का राष्ट्रवाद हमारे लिए दूसरे ग्रह के प्राणी के जैसा है क्योंकि सालों में हम बहुलतावादी, समावेशी और उन्माद रहित राष्ट्रवाद को बनाया है जो कुछ निश्चित मूलभूत मूल्यों के आधार पर आज़ादी के समय विकसित हुआ है.’

उन्होंने कहा, ‘इन अति-राष्ट्रवादियों ने मुस्लिमों, वामपंथियों और विदेशी (ख़ासकर पश्चिम से आए हुए) लोगों को अपना दुश्मन मान लिया है.’ उन्होंने कहा कि आज के दौर में इस सूची में धर्मनिरपेक्ष उदारवादियों को भी शामिल कर लिया गया है.

इरफान हबीब के अनुसार, यह अति-राष्ट्रवाद वैश्विक चलन में आ गया है. ट्रंप से लेकर ब्रेक्ज़िट और यूरोप के अधिकांश अतिवादी दक्षिणपंथी समूह ‘दूसरों’ के लिए घृणा को बढ़ावा दे रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘80 के दशक तक राष्ट्रवाद उन्माद रहित था. यह न तो आक्रामक था और न ही विरोधात्मक. तमाम लेखों को पढ़ने पर पता चलता है राष्ट्रवाद न तो सार्वभौम है और न ही एकआयामी.’

अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि गांधी का राष्ट्रवाद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और नेहरू के राष्ट्रवाद से अलग था.

इतिहासकार एस. इरफान हबीब ने कहा, ‘इनमें एक लक्ष्य होने के अलावा और कोई समानता नहीं थी. इनमें वाद-विवाद भी होता था, लेकिन एक-दूसरे पर इन लोगों ने कभी देशद्रोही होने का आरोप नहीं लगाया. गांधी, नेहरू, आंबेडकर, पटेल, आज़ाद ने राष्ट्रीयता की भारतीय विचारधारा को लोकतंत्र, बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और और सामाजिक न्याय के चार स्तंभों पर स्पष्ट रूप से रेखांकित है.’

वे कहते हैं कि सालों से यह स्तंभ कमज़ोर हो रहे हैं और अब तो ये ढहने के कगार पर पहुंच चुके हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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