राजनीति

शास्त्री का संघ से वैमनस्य नहीं था, गोलवलकर से विचार-विमर्श करते थे: आडवाणी

आरएसएस के मुखपत्र आॅर्गनाइज़र के 70 साल पूरा होने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी संपादकीय.

गोलवलकर और लाल बहादुर शास्त्री. फोटो साभार: विकिपीडिया)

गोलवलकर और लाल बहादुर शास्त्री. फोटो साभार: विकिपीडिया)

नई दिल्ली: भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ वैचारिक रूप से कोई वैमनस्य नहीं रखते थे और प्रधानमंत्री रहते हुए वह गुरु गोलवलकर को अक्सर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया करते थे.

शास्त्री को ‘समर्पित कांग्रेसी’ क़रार देते हुए आडवाणी ने कहा कि अपने निजी गुणों की वजह से उन्होंने देश का विश्वास जीता. उन्होंने आरएसएस के मुखपत्र ‘आॅर्गनाइज़र’ के 70 साल पूरा होने के अवसर पर आए संस्करण में छपे एक संपादकीय यह बात की है.

इस लेख में आडवाणी ने कहा, ‘नेहरू से उलट, शास्त्री ने जनसंघ और आरएसएस को लेकर किसी तरह का वैमनस्य नहीं रखा. वह श्री गुरुजी को राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए बुलाया करते थे.’

आडवाणी का यह लेख उनकी जीवनी ‘माई कंट्री माई लाइफ’ से लिया गया है.

‘आॅर्गनाइज़र’ से 1960 में बतौर सहायक संपादक जुड़ने वाले आडवाणी ने कहा कि वह इस साप्ताहिक के प्रतिनिधि के तौर पर शास्त्री से कई बार मिले. उन्होंने कहा, ‘हर मुलाक़ात में मुझ पर इस छोटे क़द, लेकिन बड़े हृदय वाले प्रधानमंत्री की सकारात्मक छाप पड़ी.’

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘धोती-कुर्ता एक नेता का पहनावा है. यह पत्रकारों को नहीं भाता. मेरे साथियों ने मुझसे यह बात कही थी. मैंने अपने साथियों की ओर से दी गई सलाह में कुछ उचित पाया और फिर से पतलून पहनने लगा.’

आडवाणी ने लिखा है कि 1977 में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए वह ख़्वाज़ा अहमद अब्बास और पृथ्वीराज कपूर से मिले और वे दोनों यह जानकर हैरान रह गए कि ‘हमारे यहां एक मंत्री है जो पहले फिल्म आलोचक हुआ करता था.’

शास्त्री 1964 से 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी पिछले साल शास्त्री की तारीफ़ की थी.

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