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क्या आम आदमी की आख़िरी उम्मीद न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के ​कीटाणु प्रवेश कर चुके हैं?

ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका में जारी गड़बड़ियों से आम आदमी बेख़बर हो, लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार आमतौर पर अवमानना के डर से कभी भी सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बन सका.

पिछले दिनों चार वरिष्ठ जजों ने सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक से न चलने को लेकर देश के इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

पिछले दिनों चार वरिष्ठ जजों ने सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक से न चलने को लेकर देश के इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

पिछली शताब्दी के 80 के दशक की बात है- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इंदौर नगर निगम के छह इंजीनियरों को भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित कर उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया था. सभी छह इंजीनियर जेल में थे.

उनकी ज़मानत के आवेदन पर कई दिनों तक सुनवाई चली. सुनवाई के दौरान उन इंजीनियरों को अदालत लाया जाता था. सुनवाई करने वाली पीठ के दोनों जजों ने एक सप्ताह से भी ज़्यादा समय तक चली सुनवाई के दौरान महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, कीट्स, वर्ड्सवर्थ, शेक्सपीयर, मार्क ट्वेन, वॉल्टेयर आदि दुनियाभर के तमाम साहित्यकारों, दार्शनिकों, विचारकों के उद्धरण देकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ प्रवचन देते हुए आरोपी इंजीनियरों को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई.

स्थानीय अख़बारों में इस मामले की ख़बरों को ख़ूब जगह मिली. दोनों जजों ने भी ख़ूब वाहवाही बटोरी. दिलचस्प अंदाज़ में मामले का अंत यह हुआ कि दोनों जजों ने अपनी सेवानिवृत्ति के चंद दिनों पहले मुक़दमे का निपटारा करते हुए सभी आरोपी इंजीनियरों को ‘ठोस सबूतों के अभाव में’ बरी कर दिया तथा सरकार की जांच एजेंसी को जमकर लताड़ा.

सभी छह इंजीनियरों की सेवाएं फिर से बहाल हो गईं और वे एक फिर पहले की तरह सीना तानकर ‘लोकसेवा’ में जुट गए. अदालत के फैसले पर कौन उठाता सवाल? उठाता तो अवमानना का मामला बन जाता.

हमारी न्यायपालिका की संदेहास्पद कार्यशैली की यह बानगी तीन दशक से भी ज़्यादा पुरानी हो चुकी है लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था की स्थिति में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया है. बल्कि यूं कहे कि हालात और ज़्यादा संगीन होते गए हैं.

इस सिलसिले में ताज़ा और पुख़्ता प्रमाण है सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों द्वारा पिछले दिनों उठाए गए सवाल और दिए गए बयान. चारों जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिये व्यवस्थागत बुनियादी सवाल उठाए हैं.

उन्होंने प्रधान न्यायाधीश पर स्थापित व्यवस्था को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया है, लेकिन उनके मोटिव पर कुछ नहीं कहा. सरकार को लेकर भी इन जजों ने कोई टिप्पणी नहीं की.

इसके बावजूद सरकारी प्रवक्ता और सरकार समर्थकों ने इन जजों के बयान पर जिस तरह आक्रामकता के साथ प्रतिक्रिया जताई और प्रधान न्यायाधीश का बचाव किया, उससे न्यायपालिका की पूरी कलंक-कथा समझी जा सकती है.

हालांकि अदालतों में होने वाली गड़बड़ियों को लेकर सर्वोच्च अदालत के भीतर से ही पहले भी मामलों की सुनवाई के दौरान आवाज़ें उठती रही हैं और पीठासीन जजों ने अपनी मातहत अदालतों को कई बार फटकार भी लगाई है.

लेकिन आज़ाद भारत में यह पहला मौका रहा जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने अप्रत्याशित रूप से मीडिया के माध्यम से देश से मुख़ातिब होते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुखिया को ही सवालों के कठघरे में खड़ा करते हुए देश के लोकतंत्र को ख़तरे में बताया.

ऐसे समय में जब भ्रष्टाचार का कैंसर हमारे सामाजिक-सार्वजनिक जीवन की रग-रग में फैल चुका हो, जिसके कारण सहज नागरिक जीवन बिताना बेहद मुश्किल हो गया हो और हमारी समूची शासन व्यवस्था की वैधता सवालों के घेरे में हो, तब आम आदमी के लिए न्यायपालिका ही एक ऐसी संस्था हो सकती है जो उसकी उम्मीदों का सहारा बन सके.

लेकिन हमारा राष्ट्रीय दुर्भाग्य है कि यह उम्मीदों का सहारा भी भ्रष्टाचार की इस बीमारी से नहीं बच पाया है. उसके शरीर के कई अंगों में इस बीमारी के कीटाणु प्रवेश कर गए हैं.

हालात की इसी गंभीरता को भांपते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के ख़िलाफ़ सुनवाई करते हुए कुछ जजों की ईमानदारी और नीयत पर बेहद मुखर अंदाज़ में सीधे-सीधे सवाल उठाते हुए काफी तल्ख़ टिप्पणियां की थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने देश के इस सबसे बड़े हाईकोर्ट से निकलने वाली भ्रष्टाचार की सड़ांध पर आगबबूला होते हुए कहा था, ‘शेक्सपीयर ने अपने मशहूर नाटक हेमलेट में कहा है कि डेनमार्क राज्य में कुछ सड़ा हुआ है. यही बात इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में भी कही जा सकती है. यहां के कुछ न्यायाधीश ‘अंकल जज सिंड्रोम’ से पीडित है.’

सुप्रीम कोर्ट के इस आक्रोश की वजह यह थी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाते हुए बहराइच के वक़्फ़ बोर्ड के ख़िलाफ़ एक सर्कस कंपनी के मालिक के पक्ष में एक अनुचित आदेश पारित कर दिया था, जबकि यह मामला इस हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के अंतर्गत आता था.

इस मामले के पहले से भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में सुप्रीम कोर्ट के पास कई गंभीर शिकायतें थीं, जिनको लेकर उसने अपना आक्रोश ज़ाहिर करने में कोई कोताही नहीं की.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘इस हाईकोर्ट के कई न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार वहीं वकालत कर रहे हैं और वकालत शुरू करने के कुछ ही वर्षों के भीतर वे करोड़पति हो गए हैं, उनके आलीशान मकान बन गए हैं, उनके पास लकदक गाड़ियां आ गईं हैं और वे ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी जी रहे हैं.’

सुप्रीम कोर्ट की इन्हीं टिप्पणियों से आहत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी छवि और गरिमा की दुहाई देते हुए एक समीक्षा याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से इन टिप्पणियों को हटाने की गुज़ारिश की थी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2010 को न सिर्फ इस याचिका को निर्ममतापूर्वक ठुकरा दिया था, बल्कि उसने और ज़्यादा तल्ख़ अंदाज़ में कहा था, ‘देश की जनता बुद्धिमान है, वह सब जानती है कि कौन जज भ्रष्ट है और कौन ईमानदार.’

अपनी पूर्व में की गई टिप्पणियों को हटाने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ कर दिया था कि उसकी ये टिप्पणियां सभी जजों पर लागू नहीं होती हैं, बल्कि इस हाईकोर्ट के कई जज काफी अच्छे हैं, जो अपनी ईमानदारी व निष्ठा के ज़रिये इलाहाबाद हाईकोर्ट का झंडा ऊंचा किए हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट यह भी कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट को उसकी टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया जताने के बजाय आत्मचिंतन करना चाहिए.

हालांकि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का यह कोई नया मामला नहीं था. बीती शताब्दी के आख़िरी दशक में न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी से लेकर अभी हाल ही में कर्नाटक और सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरण और कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सौमित्र सेन तक कई उदाहरण हैं, जिनमें निचली अदालतों से लेकर उच्च अदालतों तक के न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.

इस सिलसिले में नवंबर 2010 में गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय ने तो अपने ही मातहत कुछ जजों के भ्रष्टाचरण पर बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘गुजरात में न्यायपालिका का भविष्य संकट में है, जहां पैसे के बल पर कोई भी फैसला ख़रीदा जा सकता है.’

इसी दौरान मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ के कुछ जजों के बारे में भी कुछ ऐसी ही शिकायतें ग्वालियर अभिभाषक संघ के अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट को भेजी थी.

इससे पहले देश के पूर्व क़ानून मंत्री शांतिभूषण ने तो सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल कर देश के आठ पूर्व प्रधान न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन उस पर विचार करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने उलटे शांतिभूषण पर दबाव डाला था कि वे अपने इस हलफ़नामे को वापस ले लें.

न्यायपालिका में लगी भ्रष्टाचार की दीमक और न्यायतंत्र पर मंडरा रहे विश्वसनीयता के संकट ने ही कुछ साल पहले देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाड़िया को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया था कि जजों को आत्मसंयम बरतते हुए राजनेताओं, मंत्रियों और वकीलों के संपर्क में रहने और निचली अदालतों के प्रशासनिक कामकाज में दख़लअंदाज़ी से बचना चाहिए.

16 अप्रैल 2011 को एमसी सीतलवाड़ स्मृति व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति कपाड़िया ने कहा था कि जजों को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति के लोभ से भी बचना चाहिए, क्योंकि नियुक्ति देने वाला बदले में उनसे अपने फायदे के लिए निश्चित ही कोई काम करवाना चाहेगा.

प्रधान न्यायाधीश ने जजों के समक्ष उनके रिश्तेदार वकीलों के पेश होने की प्रवृत्ति पर भी प्रहार किया और कहा कि इससे जनता में ग़लत संदेश जाता है और न्यायपालिका जैसे सत्यनिष्ठ संस्थान की छवि मलिन होती है. न्यायमूर्ति कपाड़िया ने राजनेताओं की बिरादरी से भी कहा था कि वे भ्रष्ट और बेईमान जजों को संरक्षण न दे.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा के इस सिलसिले में मद्रास और कलकत्ता हाईकोर्ट के जज रहे सीएस कर्णन को भी नहीं भूला जा सकता. जस्टिस सीएस कर्णन ने एक साल पहले यानी 23 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री को लिखे एक पत्र में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए जांच कराने का अनुरोध किया था.

उनके इस पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की अवमानना क़रार देते हुए जस्टिस कर्णन की न्यायिक शक्तियां छीनकर उनके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी. जब कर्णन ने इस कार्रवाई को चुनौती दी तो सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने उनकी मानसिक हालत की जांच करने का आदेश दे दिया और फिर अंतत: उन्हें अवमानना का दोषी मानते हुए छह महीने के लिए जेल भेज दिया.

किसी पदासीन जज को जेल की सज़ा सुनाए जाने का यह अपने आप में पहला मौका था. होना तो यह चाहिए था कि प्रधानमंत्री को लिखे जस्टिस कर्णन के पत्र का सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेता और बीस जजों पर कर्णन के लगाए आरोपों की जांच कराता लेकिन उसने ऐसा करने के बजाय अवमानना कानून के डंडे से जस्टिस कर्णन को जेल पहुंचा दिया.

डरे हुए और बिके हुए मीडिया तथा नागरिक समाज ने भी जस्टिस कर्णण के मामले में अपनी भूमिका का ठीक से निर्वाह नहीं किया. ऐसे में कहा जा सकता है कि इस सबके पीछे जातीय पूर्वाग्रह की भी अहम भूमिका रही.

जस्टिस कर्णन ख़ुद भी मद्रास हाईकोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान मुख्य न्यायाधीश और अन्य साथी जजों पर अपने को दलित होने की वजह से प्रताड़ित करने के आरोप लगाते रहे थे.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रहे वीएन खरे ने तो बड़े ही सपाट अंदाज़ में स्वीकार किया था.

2002 से 2004 के दौरान सर्वोच्च अदालत के मुखिया रहे जस्टिस खरे ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘जो लोग यह दावा करते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है, मैं उनसे सहमत नहीं हूं. मेरा मानना है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का यह नासूर ऐसा है जिसे छिपाने से काम नहीं चलेगा, इसकी तुरंत सर्जरी करने की आवश्यकता है.’

जस्टिस खरे ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए महाभियोग जैसे प्रावधान और उसकी प्रक्रिया को भी नाकाफी बताया था.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा प्रधान न्यायाधीश की विवादास्पद संदेहास्पद कार्यशैली को लेकर उठाए गए सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व न्यायाधीश पीवी सावंत ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में जो कहा है, वह गौरतलब है.

जस्टिस सावंत ने कहा है कि मीडिया के माध्यम से देश से मुख़ातिब होने वाले चारों जजों की विश्वसनीयता असंदिग्ध है, लिहाज़ा माना जा सकता है कि समस्या बहुत गंभीर है, तभी उन्हें इस तरह का क़दम उठाना पड़ा है. चारों जजों का यह कदम देशहित में है और इससे नागरिकों को जानकारी मिली है कि देश की न्याय व्यवस्था किस तरह चल रही है.

जस्टिस सावंत ने सबसे अहम बात यह कही, ‘देश की जनता को यह समझ लेना चाहिए कि कोई भी न्यायाधीश भगवान नहीं होता. अदालतों में अब आमतौर पर फैसले होते हैं, यह ज़रूरी नहीं कि वहां न्याय हो.’

ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका में जारी गड़बड़ियों से आम आदमी बेख़बर हो, लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था में गड़बड़ियां होने की जो बात आमतौर पर अवमानना के डर के चलते कभी भी सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बन सकी.

अब इस मुद्दे को देश की शीर्ष अदालत के चार जजों ने बड़े सलीके से उठाकर न सिर्फ़ देशभर में हलचल मचा दी है, बल्कि उस समूचे न्यायिक तंत्र को अपने गिरेबान मे झांकने पर मजबूर कर दिया है, जो अपनी तमाम विसंगतियों और गड़बड़ियों के बावजूद आज भी हमारे लोकतंत्र का सबसे असरदार स्तंभ है और हर तरफ से आहत और हताश-लाचार देशवासियों की उम्मीदों का आख़िरी आसरा भी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.) 

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