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क्यों छत्तीसगढ़ के एक गांव के लोग किडनी और लीवर की बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं

राज्य के गरियाबंद ज़िले के दो हज़ार की आबादी वाले सुपेबेड़ा गांव में 235 लोग किडनी रोग ग्रस्त हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि उनके गांव में हीरा खदान होने से सरकार इसे खाली कराना चाहती है. इसलिए उनके स्वास्थ्य की अनदेखी कर रही है.

सुपेबेड़ा गांव का वह इलाका जहां प्रदूषित जल के चलते बोरिंग बंद की गई और महज 10 मीटर की दूरी पर दूसरी बोरिंग करके पानी की टंकी बनाकर खानापूर्ति कर दी गई.

सुपेबेड़ा गांव का वह इलाका जहां प्रदूषित जल के चलते बोरिंग बंद की गई और महज 10 मीटर की दूरी पर दूसरी बोरिंग करके पानी की टंकी बनाकर खानापूर्ति कर दी गई.

छत्तीसगढ़ सरकार पर गरियाबंद जिले के कुछ ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि उनका गांव हीरा एवं एलेक्जेंडराइट (एक प्रकार का रत्न) खदान क्षेत्र में आता है. इस क्षेत्र से ग्रामीणों को बाहर निकालने के लिए सरकार साजिशन उनके स्वास्थ्य की उपेक्षा कर रही है. गांव में दशक भर के अंदर तकरीबन 109 लोगों की मौत किडनी और लीवर की बीमारियों के चलते हो चुकी है. लगभग दो हजार की आबादी वाले इस गांव में वर्तमान में 235 लोग किडनी और लीवर संबंधी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं. लेकिन राज्य सरकार उदासीन रुख अपनाए हुए है.

गरियाबंद जिले की देवभोग तहसील के अंतर्गत सुपेबेड़ा गांव आता है. 1986 में एक सर्वे रिपोर्ट में यहां एक हीरा खदान होने की आशंका व्यक्त की गयी. आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक डॉ. संकेत ठाकुर ‘द वायर’ से बातचीत मे बताते हैं, ‘नब्बे के दशक में तत्कालीन सरकार ने एक मल्टीनेशनल कंपनी को यह पता लगाने का काम सौंपा. जिसकी जांच में भी यहां हीरा खदान होने की पुष्टि हुई. यह पता लगते ही वहां अवैध खनन शुरू हो गया. दशक भर तक यह चला. जब यह क्षेत्र मध्य प्रदेश में आता था, तब भी. और अजीत जोगी की सरकार बनने के बाद भी. 2004 में सरकार ने पूरे खनन क्षेत्र को टेकओवर कर लिया और खदान के मुहाने को कंक्रीट व मुर्रम से पाट दिया.’

ग्रामीणों का मानना है कि तब से ही यहां अकाल मौतों का सिलसिला शुरू हो गया. किडनी फेलियर की शिकायतें आने लगीं और धीरे-धीरे मौतों का आंकड़ा बढ़ता गया. बकौल संकेत ठाकुर, पिछले दो सालों में यह सिलसिला और तेज हो गया है. बीते वर्ष एक ही परिवार के 18 लोगों की मौत किडनी फेलियर के चलते हुई है. और खास बात यह रही कि सभी मिड और यंग एज के रहे हैं.

ऐसा भी नहीं है कि ये महज सामाजिक कार्यकर्ताओं या ग्रामीणों के आरोप हैं. सरकार भी ग्रामीणों में बढ़ रहे किडनी रोग की समस्या को स्वीकारती है. इसी का नतीजा रहा कि विवाद बढ़ने पर बीते वर्ष के अंत में राजधानी रायपुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ग्रामीणों के इलाज के लिए अलग से पांच बिस्तर के सुपेबेड़ा वार्ड का गठन किया गया.

संकेत कहते हैं, ‘इस तरह सरकार स्वीकारती तो है कि समस्या है लेकिन मौत के आंकड़ों को कम बताती है. जहां ग्रामीण 2005 से अब तक 109 मौत होने का दावा कर रहे हैं, तो सरकार मानती है कि समस्या 2009 से है और सिर्फ 58 मौतें हुई हैं. वहीं इस वार्ड की स्थिति यह है कि इलाज के अभाव में ग्रामीण अस्पताल से जा रहे हैं. पिछले दिनों अस्पताल छोड़कर आठ मरीज गए. उनमें से कुछ की तो मृत्यु भी हो गई.’

बीते दिनों इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने अपनी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की कि पानी में फ्लोराइड घुला हुआ है. वहीं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने मिट्टी की जांच की, जिसमें कैडमियम, क्रोमियम, आर्सेनिक जैसे भारी और हानिकारक तत्व पाए गए. ये सभी सीधे किडनी को नुकसान पहुंचाते हैं.

गांव के निवासी त्रिलोचन सोनावनी कहते हैं, ‘सरकार का कहना है कि उनके गांव का पानी खराब है. जिसमें आर्सेनिक-फ्लोराइड का मिश्रण ज्यादा है. जो किडनी संबंधित रोगों के लिए उत्तरदायी है. उन्होंने यहां बोरिंग को बंद करा दिया और नया बोरिंग खोद दिया. वो भी महज 10 मीटर की दूरी पर ही. और अजीब बात है कि इसे वे सुरक्षित ठहरा रहे हैं. इसमें शोधन यंत्र तक लगाना उन्होंने जरूरी नहीं समझा.’

वे आगे सवाल उठाते हैं, ‘2005 के पहले तो ऐसी अस्वाभाविक मौतें होती नहीं थीं. जो हुआ इसी दौरान हुआ है. गांव में किसी परिवार में बुजुर्ग नहीं बचे हैं. 10-12 वर्ष के बच्चों तक की किडनी खराब हो रही हैं. 45 फीसद महिलाएं विधवा हो चुकी हैं.’

उपेंद्र सोनवानी की उम्र महज 12 वर्ष है. डॉक्टरों ने कहा है कि उनकी भी किडनी में खराबी है.

उपेंद्र सोनवानी की उम्र महज 12 वर्ष है. डॉक्टरों ने कहा है कि उनकी भी किडनी में खराबी है.

ग्रामीणों का कहना है कि गांव में ट्यूबवेल और हैंडपंप 1991 में चालू हुए थे. अगर पानी में तब से ही खराबी रही होती तो पहले भी लोगों में किडनी संबंधी समस्याएं देखी जातीं. लेकिन यह सब 2005 के बाद ही हुआ.

यहां सवाल उठता है कि 2005 में ऐसा क्या हुआ कि क्षेत्र का पानी प्रदूषित हो गया? इस पर ग्रामीणों का मानना है कि जब मल्टीनेशनल कंपनी ने यहां अपने कदम रखे, उसी दौरान कोई बड़ा षड्यंत्र हुआ है. ताकि लोग गांव छोड़कर चले जाएं. शक इस बात का भी है कि उस दौरान वहां धमाके भी किए गए थे, तभी कोई रसायन छोड़ा गया जो भूजल में चला गया और अब धीमे ज़हर की तरह लोगों पर असर कर रहा है.

संकेत कहते हैं, ‘लोगों का पलायन होने पर स्थिति ये बनेगी कि क्षेत्र नो मैंस लैंड (मानवरहित) हो जाएगा और खनन कार्य आराम से हो सकेगा. कोई भी सरकार रही हो, उसने यहां खूब अवैध खनन होने दिया है. 2014 तक यहां से अवैध खनन की छिटपुट घटनाएं सामने आती रही हैं. इस अवैध खनन का ग्रामीणों ने विरोध भी किया है. इसलिए जब डरकर ग्रामीण ही वहां से पलायन कर जाएंगे तो रोक-टोक वाला कोई नहीं होगा. और सरकार के चहेतों को अवैध तौर पर हीरा लूटने की छूट मिल जाएगी.’

संकेत के अनुसार, केवल सुपेबेड़ा गांव ही नहीं, खनन क्षेत्र से लगे आसपास के अन्य तीन गांवों के भी यही हाल हैं. वे कहते हैं, ‘खाली किडनी खराब होने का मामला नहीं है. इनका लीवर भी क्षतिग्रस्त है. गांव वालों की पीली आंखें बयान करती हैं कि मामला तमाम अंगों के ख़राब होने का है.’

इस संबंध में करीब दर्जनभर ग्रामीणों ने राजभवन पहुंचकर इसकी शिकायत भी की है. उनका यह भी कहना है कि इलाज कराने में उनकी जमीनें तक बिक चुकी हैं. तो वहीं सरकार में स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने लोगों को धोखे में रखकर उनकी मेडिकल रिपोर्ट तक अपने पास रख ली हैं.

बीते सोमवार को आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने आरोप लगाया, ‘गांव में स्वास्थ्य शिविर लगा था जिसमें स्वास्थ्य मंत्री भी आए थे. उन्होंने जांच का आश्वासन देकर ग्रामीणों से मेडिकल रिपोर्ट ले ली. उसके बाद न तो वे आए और न ही वे रिपोर्ट लौटाई गई.’

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