भारत

लोकसभा में भी पास हुआ मैटरनिटी बिल

मातृत्व अवकाश 12 हफ़्ते से बढ़ाकर 26 हफ़्ते करने वाले इस बिल का फ़ायदा बच्चा गोद लेने वाली मांओं को भी मिलेगा.

maternityDFID

प्रतीकात्मक फोटो (साभार : DFID/Flickr CC 2.0)

घर, करियर और बच्चों की परवरिश के बीच संतुलन बैठाने की कोशिश करती भारतीय महिलाओं के लिए ख़ुशख़बरी है. मातृत्व अवकाश (संशोधन) बिल 2016 पर आज लोकसभा में भी मुहर लगा दी गई है. राज्यसभा में यह बिल पिछले साल अगस्त में ही पास हो गया था.

इसके अनुसार अब नौकरीपेशा महिलाओं को दो बच्चों के जन्म के समय 12 हफ़्तों की बजाय 26 हफ़्तों का मातृत्व अवकाश मिल सकेगा. हालांकि, दो बच्चों के बाद लिए जाने वाले ऐसे अवकाश की मियाद 12 हफ़्ते ही होगी. इसके अलावा महिलाओं को इस पूरे समय मातृत्व निधि अधिनियम,1961 के अनुसार उनकी पूरी तनख़्वाह दी जाएगी, साथ ही उन्हें इस दौरान काम से नहीं निकाला जा सकता.

इस बिल का लाभ उन महिलाओं को भी मिलेगा, जिन्होंने 3 माह से कम उम्र का बच्चा गोद लिया हो. ऐसे मामलों में मातृत्व अवकाश की तारीख़ उस दिन से गिनी जाएगी, जिस दिन मां को बच्चा दिया जाएगा. बिल के अनुसार किसी भी संस्थान जहां न्यूनतम 10 कर्मचारी काम करते हों, उन्हें बिल के इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा. संस्था को 50 से अधिक कर्मचारी होने पर बताई गई दूरी के अंदर क्रेच की सुविधा देनी होगी. मांओं को काम के दौरान चार बार क्रेच में जाने की छूट रहेगी.

इस बिल का लाभ देश की तक़रीबन 18 लाख कामकाजी महिलाओं को मिलेगा. श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने ने साल 2016 में इस विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा था कि कामकाजी महिलाओं के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि उन्हें बच्चों की देखभाल के लिए पर्याप्त अवकाश मिले. लोकसभा में यह बिल पास होने पर महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने ट्वीट करके सांसदों को इस बिल को समर्थन देने के लिए शुक्रिया कहा है, साथ ही देश की महिलाओं को बधाई देते हुए यह भरोसा दिलाया है कि उनका मंत्रालय इसी तरह स्त्री सशक्तिकरण के लिए काम करता रहेगा.

 

  • Vinay Sheel

    भारत में 90 फ़ीसदी नौकरियां निजी क्षेत्र की हैं और शेष सरकारी । निजी क्षेत्र पूरी तरह से लाभ पर आधारित है ऐसे में यदि कंपनियों को सामान योग्यता रखने वाले स्त्री या पुरुष में से किसी एक को नौकरी देनी हो , तो वह पुरुष को ही प्राथमिकता देगा क्योंकि एक महिला कर्मचारी को 26 या 52 हफ्ते (यदि दूसरा बच्चा भी हो) बिना काम के तनख्वाह देना होगा और पुरुष कर्मचारी को रखने से ऐसी कोई बाध्यता नहीं होगी इसलिए आने वाले समय में इस बिल से महिला कर्मचारियों को नुकसान पहुँच सकता है और क्यों ऐसी समस्या पश्चिम के देशों में हो चुकी है हमें उनसे सिख लेते हुए मातृत्व अवकाश के साथ-साथ पितृत्व अवकाश का प्रावधान भी करना चाहिए । ताकि पिता भी अपने बच्चों की परवरिश में योगदान दे जिससे पितृसत्तात्मक व्यस्था में परिवर्तन की शुरुवात हो और साथ ही महिलाओं की इस बिल की अपूर्णता की वजह से फिर से भेदभाव का शिकार न होना पड़े