कैंपस

झारखंड: नौकरी की आस में लाखों युवा सड़क पर

झारखंड लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग की प्रारंभिक परीक्षाएं होने के बाद मुख्य परीक्षा में लगातार देरी होने, आरक्षण की मांग और स्थानीय नीति के विरोध में राज्य के युवाओं में भारी आक्रोश है.

झारखंड लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा आयोजित न करने के विरोध में युवा राज्य सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. (फाइल फोटो: नीरज सिन्हा)

झारखंड लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में आरक्षण की मांग को लेकर युवा राज्य सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. (फाइल फोटो: नीरज सिन्हा)

‘किसी परीक्षा के ठीक चार दिन पहले उसके स्थगित होने की सूचना आ जाए तो उसमें शामिल होने जा रहे लोगों की मनःस्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. एक परीक्षा के लिए तीन सालों तक कई किस्म के फेरबदल, नोटिस का सामना करना आसान नहीं होता. भरोसा हिल जाता है. गनीमत है कि घर-परिवार के लोग साथ खड़े होते हैं. क्या सरकार और भर्ती आयोग/बोर्ड के पास हमारी उम्र लौटाने की गारंटी है?’

फ़िरोज़ आलम यह कहते हुए हिम्मत दिखाने की भरसक कोशिश करते है. वह कहते हैं, वक़्त रौंदा जा रहा है पर हम झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षा पास कर साहब बनने की ज़िद पर क़ायम हैं.

हालांकि यह बानगी भर है. जमींदोज होता सिस्टम और नौकरी की आस में तबाह होती लाखों युवा ज़िंदगी का दर्द झारखंड में बेहद करीब से देखा-समझा जा सकता है.

लिहाज़ा जगह-जगह विरोध-प्रदर्शन का दौर जारी है. सड़कों पर सरकार विरोधी नारे गूंज रहे हैं. हालांकि नौकरियों और भर्ती को लेकर सरकार दावा करती रही है कि तीन सालों में रिकॉर्ड एक लाख युवाओं की नियुक्तियां की गई हैं. इनमें 95 फीसदी तक झारखंड के युवा हैं.

फ़िरोज़, झारखंड की राजधानी रांची में निकट के कांके नामक कस्बे के रहने वाले हैं. झारखंड लोक सेवा आयोग की पांचवीं परीक्षा में वे मुख्य परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू से बाहर हो गए थे. आगे की तैयारी में जुटे रहे.

साल 2015 में झारखंड लोक सेवा आयोग की छठी परीक्षा में शामिल होने के लिए उन्होंने आवेदन भरा. इसमें प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद मुख्य परीक्षा की लगातार टलती तारीख़ों से युवा बेहद परेशान हैं.

दरअसल इस साल 29 जनवरी से होने वाली मुख्य परीक्षा अगले आदेश तक के लिए स्थगित कर दी गई है. 326 पदों के लिए होने वाली मुख्य परीक्षा में 6103 उम्मीदवारों को शामिल होना था.

फ़िरोज़ बताते हैं कि लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करना ही लक्ष्य रहा, लिहाज़ा दूसरी किसी प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुआ. अब उम्र 35 हो चली है. आगे झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल होने के लिए सिर्फ़ दो ही साल बचे हैं. इन हालातों को देखते कई दफ़ा बीवी ने रोका-टोका भी है कि तौबा कीजिए इस जेपीएससी के नाम से.

18 साल में सिविल सेवा की सिर्फ़ पांच परीक्षाएं

राज्य गठन के 18 सालों में झारखंड सिविल सेवा की सिर्फ़ पांच परीक्षाएं ली जा सकी हैं. अधिकतर परीक्षाएं जांच और सवालों के घेरे में रही हैं.

झारखंड लोक सेवा आयोग की दूसरी परीक्षा परिणाम पर तो सीबीआई जांच बैठाई गई है. परीक्षाओं में कथित धांधली को लेकर आयोग के कई पूर्व सदस्य और अधिकारी जेल भी जा चुके हैं.

झारखंड सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा ने कराए जाने के विरोध में बीते 11 जनवरी को बुलाए गए रांची बंद के दौरान गिरफ़्तारी देती छात्राएं. (फोटो: नीरज सिन्हा)

झारखंड सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा ने कराए जाने के विरोध में बीते 11 जनवरी को बुलाए गए रांची बंद के दौरान गिरफ़्तारी देती छात्राएं. (फोटो: नीरज सिन्हा)

परीक्षा की तैयारी में जुटे अमित कुमार की पीड़ा है कि अब तो किसी को यह बताने पर कि जेपीएससी की तैयारी कर रहा हूं, तो शक़ की नज़रों से देखा जाता हूं. लोग टिप्पणी करने से बाज़ नहीं आते कि वही घपले-घोटाले वाली परीक्षा ना?

ऐसे हो रही जेपीएससी की परीक्षा

  • साल 2015 में विज्ञापन जारी हुआ
  • उसी साल प्रारंभिक परीक्षा के लिए फॉर्म भरवाए गए
  • 2016 के अगस्त महीने में पाठ्यक्रम में संशोधन हुआ
  • पहला विज्ञापन रद्द, नए सिरे से फॉर्म भरने के आदेश
  • 28 नवंबर 2016 को प्रारंभिक परीक्षा आयोजित
  • फरवरी 2017 में प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम जारी
  • इस रिजल्ट पर आरक्षित श्रेणी के छात्रों का विरोध
  • 11 अगस्त 2017 को जारी होता है संशोधित रिजल्ट
  • फिर 7 नवंबर 2017 से मुख्य परीक्षा की घोषणा
  • बाद में परीक्षा की तिथि बढ़ाकर 29 जनवरी 2018
  • फिर 24 जनवरी को परीक्षा स्थगन की सूचना जारी

इधर, सड़कों पर युवाओं के लगातार आंदोलन और विधानसभा के बजट सत्र में विपक्ष के विधायकों के विरोध के बीच सरकार के कार्मिक प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग की सचिव निधि खरे ने 24 जनवरी को झारखंड लोक सेवा आयोग के सचिव को पत्र लिखते हुए बताया कि आरक्षित श्रेणी के कुछ अभ्यर्थियों ने प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम में आरक्षण एवं प्रावधानों के अनुपालन नहीं किए जाने का मामला उठाया गया है.

कई विधायकों ने भी आरक्षण के उपबंधों के अनुपालन कराने का अनुरोध किया है. इन तथ्यों के संज्ञान में आने के बाद सरकार इस मामले में गहनता से विचार कर रही है.

अतः अंतिम निर्णय लिए जाने तक परीक्षा स्थगित करने पर आयोग विचार करना चाहेगा. कार्मिक सचिव के पत्र के आलोक में इसी दिन यानी 24 जनवरी को आयोग ने अगले आदेश तक परीक्षा स्थगित करने की सूचना जारी कर दी.

गौरतलब है कि इसी मसले पर सत्ता पक्ष के कई विधायकों ने भी कार्मिक सचिव से मिलकर ध्यान दिलाया था.

कट आॅफ मार्क घटाने का फैसला

परीक्षा स्थगित किए जाने के बाद सात फरवरी 2018 को सरकार ने मंत्रिमंडल (कैबिनेट) की बैठक में मुख्य परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रारंभिक परीक्षा के कट ऑफ मार्क घटाने का फैसला लिया.

इस फैसले के तहत प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य वर्ग में 40 फीसदी, पिछड़ा वर्ग में 36.5 फीसदी, अति पिछड़ा वर्ग में 34 प्रतिशत तथा अनुसूचित जन जाति अनुसूचित जाति (एसटी/एसी) में 32 प्रतिशत अंक लाने वाले अभ्यर्थी अब मुख्य परीक्षा में शामिल हो सकेंगे. सरकार के इस फैसले से लगभग 34 हज़ार अभ्यर्थियों के मुख्य परीक्षा में शामिल हो पाने के आसार हैं. जबकि पहले इनकी संख्या 6103 होती.

नए सिरे से विरोध शुरू

अब कैबिनेट के इस फैसले के विरोध में पहले से आंदोलित आदिवासी छात्रों-संगठनों का ग़ुस्सा फूट पड़ा है. 16 फरवरी को राजधानी में बिरसा मुंडा की समाधि स्थल तक युवाओं ने विरोध जुलूस निकाला.

विरोध प्रदर्शन में शामिल अजय टोप्पो सरकार पर तंज़ कसते हुए कहते हैं कि वे लोग आरक्षण के अनुपालन के साथ अधिकार, पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं और सरकार हमारी उलझनें बढ़ाने में जुटी है. कैबिनेट का यह फैसला उन लोगों को कतई मंज़ूर नहीं है.

बीते 18 फरवरी को भी हज़ारों की संख्या में युवाओं ने हजारीबाग में जुलूस निकाला. (फोटो: नीरज सिन्हा)

बीते 18 फरवरी को भी हज़ारों की संख्या में युवाओं ने हजारीबाग में जुलूस निकाला. (फोटो: नीरज सिन्हा)

अजय के सवाल भी है, एक परीक्षा में चार साल, आख़िर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कौन कर रहा है. अगर आरक्षण नीति के प्रावधान का पालन होता तो आरक्षित वर्ग के वैसे अभ्यर्थी जो अनारक्षित वर्ग के समान या ज़्यादा अंक लाते हैं और उम्र सीमा का लाभ नहीं लेते हैं तो उन्हें अनारक्षित वर्ग भेजकर उत्तीर्ण किया जाता.

अजय टोप्पो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नियोजन नीति की नए सिरे से समीक्षा के लिए बनी विधानसभा की कमेटी की रिपोर्ट आने तक सभी नियुक्तियां रोकी जाए.

आख़िर ये आंदोलन कब तक, इस सवाल पर आदिवासी छात्र संघ के संजय महली और आदिवासी युवा मोर्चा के संजय पन्ना कहते हैं कि यह सरकार को समझना है. उनकी मांग है प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण के प्रावधान को लागू करते हुए प्रारंभिक परीक्षा में पास पंद्रह गुणा अभ्यर्थियों को ही सिविल सेवा की छठी मुख्य परीक्षा में बैठने की इज़ाज़त दी जाए.

दिन में आंदोलन, रात में पढ़ाई

सोनाहातू गांव में साधारण किसान परिवार से आने वाले खिरोद महतो दस सालों से डिप्टी कलक्टर बनने की सपने संजोए हैं. खिरोद कहते हैं कि जेपीएससी की दूसरी–तीसरी की प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद हौसला बढ़ा. कोशिशें जारी रखी. छठी की मुख्य परीक्षा के स्थगित होने से निराश हैं. दरअसल उम्र पार होती दिखती है. लिहाज़ा रातों में नींद नहीं आती. वे कहते हैं, यह झारखंड की बेबसी है. दिन में आंदोलन रात में पढ़ाई.

प्रारंभिक परीक्षा परिणाम के बाद विरोध इतना तूल क्यों पकड़ा, इस सवाल पर वे कहते हैं कि आरक्षण और कोटिवार कट ऑफ मार्क को लेकर लेकर सवाल उठते रहे हैं. क्योंकि पिछड़ा वर्ग का अभ्यर्थी 232 अंक लाकर प्रारंभिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है, जबकि अनारक्षित (सामान्य) श्रेणी के अभ्यर्थी 206 अंक लाकर पास कर रहे हैं.

जेपीएससी का स्पष्टीकरण

हालांकि पिछले साल ही दो मार्च को झारखंड लोक सेवा आयोग ने एक विज्ञप्ति जारी कर स्पष्ट किया गया था प्रारंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ देय नहीं है तथा विभिन्न कोटियों के 326 रिक्तिय़ों के विरूद्ध 15 गुना संख्या और समान अंक वाले 5138 अभ्यर्थियों का चयन किया गया है.

आयोग ने कोटिवार न्यूनतम अर्हतांक सूचित नहीं किया है. जिन कोटियों में रिक्तियां कम थीं उन रिक्तियों के विरूद्ध कम अभ्यर्थी ही चयनित किए गए हैं. जिसके कारण कतिपय कोटियों के अभ्यर्थियों के प्राप्तांक अधिक होने की संभावना है. संवैधानिक संस्था होने के नाते आयोग द्वारा परीक्षाफल तैयार करने से प्रकाशित करने तक पूरी सावधानी बरती जाती है.

कर्मचारी चयन आयोग पर भी सवाल

कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित संयुक्त स्तरीय स्नातक परीक्षा में शामिल रंजीत कुमार गुप्ता, जीवन प्रकाश और आकाश हांसदा कहते हैं कि सरकारी नौकरी की आस में सिस्टम ने हमें उस मोड़ पर ला खड़ा किया है कि जहां से बेहतर भविष्य की राह तलाशना बेहद कठिन प्रतीत होने लगा है.

गौरतलब है कि कर्मचारी चयन आयोग ने संयुक्त स्तरीय स्नातक परीक्षा के लिए 2015 में विज्ञापन जारी किया गया था. रंजीत बताते हैं कि परीक्षा को लेकर कई दफ़ा अलग-अलग पदों को जोड़ा जाता रहा और इस प्रक्रिया में लगभग छह महीने गुज़र गए.

इस साल के जनवरी के महीने में झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान विपक्षी दल के विधायकों ने झारखंड लोक सेवा आयोग में परीक्षाओं को लेकर जारी अनियमितताओं का जताया विरोध. (फोटो: नीरज सिन्हा)

इस साल के जनवरी के महीने में झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान विपक्षी दल के विधायकों ने झारखंड लोक सेवा आयोग में परीक्षाओं को लेकर जारी अनियमितताओं का जताया विरोध. (फोटो: नीरज सिन्हा)

1150 पदों को लिए 21 अगस्त 2016 को प्रारंभिक परीक्षा आयोजित हुई. तकरीबन पौने दो लाख अभ्यर्थी इसमें शामिल थे. 25 अक्टूबर 2016 को प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम निकला. साथ ही जानकारी दी गई कि 27 नवंबर 2016 से मुख्य परीक्षा होगी.

इन युवाओं के मुताबिक वे परीक्षा की तैयारी में जुटे थे और इस बीच 13 नवंबर 2016 को सूचना जारी की गई कि अपरिहार्य कारणों से मुख्य परीक्षा स्थगित की जाती है. इससे परेशान हज़ारों छात्रों ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर न्याय की गुहार भी लगाई.

रंजीत कहते हैं कि चार फरवरी को अख़बारों में छपी ख़बरों से पता चला कि सरकार ने वेकैंसी संबंधी अधिसूचना वापस ले ली है. इसके बाद वे हाइकोर्ट की शरण में गए. रंजीत और उनके साथियों के भी सवाल हैं कि सरकार ने वेकैंसी ही क्यों निकाली थी, जब पहले से नीति और प्रक्रिया स्पष्ट नहीं थी.

सुनील कुमार चौधरी और उमेश महतो बताते हैं कि पिछले साल झारखंड कर्मचारी चयन आयोग द्वारा 3019 पदों के लिए दारोगा नियुक्ति प्रक्रिया में उम्र सीमा घटाए जाने का विरोध भी अब तक जारी है, लेकिन इस मामले में सरकार सुनने को तैयार नहीं है. आनन-फानन में प्रारंभिक परीक्षा भी ले ली गई.

इन नियुक्तियों के लिए अनारक्षित (सामान्य) वर्ग के लिए अधिकतम उम्र सीमा 26, पिछड़ा वर्ग के लिए 28 और अनुसूचित जनजाति के लिए 30 साल तय किए जाने से हज़ारों लोगो को प्रतियोगिता में शामिल होने का अवसर नहीं मिला.

नियोजन नीति पर सवाल

छात्रों और शिक्षा के विषयों पर पैनी नज़र रखने वाले ऑल मुस्लिम यूथ एसोसिएशन (आमया) के केंद्रीय अध्यक्ष एस. अली बताते हैं कि सिविल सेवा समेत अधिकतर नियुक्तियों में कई किस्म के अड़चन, उलझी प्रक्रिया और स्पष्ट नीति नहीं होने की वजह से युवाओं के करिअर के बेशकीमती साल तिल-तिल कर मारे जा रहे हैं.

गौरतलब है कि स्थानीय और नियोजन नीति को लेकर भी राज्य में विरोध का दायरा बढ़ता जा रहा है. विभिन्न स्तरों पर ये मांग ज़ोर पकड़ती रही है कि तृतीय-चतुर्थ वर्ग की सरकारी नौकरियों में झारखंड के आदिवासी-मूलवासी की भागीदारी सुनिश्चित किए जाएं. हालात के मद्देनज़र सरकार ने नियोजन नीति की नए सिरे से समीक्षा के लिए हाल ही में विधानसभा की एक कमेटी गठित की है.

प्रमुख विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक कुणाल षाडंगी कहते हैं सरकार ने इस राज्य में छात्रों-युवाओं को पढ़ने नहीं लड़ते रहने के मोड़ पर ला खड़ा किया है. झारखंड लोक सेवा आयोग या कर्मचारी चयन आयोग. दोनों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं. अफ़सरों की नाकामियां सरकारी नीतियों में स्पष्ट दिखती है, तभी ये ये तस्वीरें सामने है. इसी साल 12 जनवरी को तामझाम से बीजेपी सरकार द्वारा आयोजित स्किल समिट में 26 हज़ार युवाओं को रोज़गार देने के दावे पर भी वे सवाल खड़े करते हैं. उनका कहना है कि सरकारी विभागों में डेढ़ लाख से ज़्यादा पद खाली हैं.

जबकि सरकार ने विधानसभा के बजट सत्र में यह जानकारी दी है कि तीन सालों में रिकॉर्ड एक लाख लोगों की नियुक्तियां की गई हैं जिसमें 95 फीसदी झारखंड के लोगों को शामिल किया गया है.

सरकार ने ये भी दावा किया है कि अगले कुछ महीनों में हाईस्कूल के टीचर, दारोगा समेत करीब तीस हज़ार पदों पर नियुक्तियां की प्रक्रिया पूरी की जानी है. और रोज़गार के अवसर बढ़ाने के लिए कई ठोस क़दम उठाए जा रहे हैं, जो पहले झारखंड में कभी नहीं हुआ.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं.)

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