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10 कारण जिनकी वजह से उत्तर प्रदेश में बसपा को करारी हार मिली

कुछ विश्लेषकों का मानना था कि बसपा इस चुनाव में डार्क हॉर्स साबित होगी. पार्टी का आधार वोट बैंक दलित और मुस्लिम मतदाता मिलकर उसे भारी जीत दिलाएंगे.

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(फोटो : पीटीआई)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आ गए हैं. इस बार के जनादेश में बसपा को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा हैं.  कुछ विश्लेषक बसपा को ‘डार्क हॉर्स’ बता रहे थे. उनका दावा था कि बसपा के मतदाता चुप रहते हैं. पार्टी का आधार वोट बैंक दलित और मुस्लिम मतदाता मिलकर उसे भारी जीत दिलाएंगे. हालांकि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने ऐसे विश्लेषकों के दावे को फुस्स कर दिया और बसपा को बुरी तरह से नकार दिया.

मायावती के लिए यह जनादेश सबक देने वाला है. ऐसे में मायावती के हार के कारणों की पड़ताल के लिए हम थोड़ा पीछे देखना होगा.

नोटबंदी के बाद जब भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ लड़ाई का बिगुल बजाने का दावा मोदी सरकार की तरफ से हो रहा था तो मायावती ने इसके खिलाफ ज़बानी जंग खोल दिया. मायावती का दावा था कि गरीब आदमी को इससे परेशानी हो रही है जबकि भाजपा ने प्रचार किया कि मायावती ने बड़ी मात्रा में काला धन इकट्ठा करके रखा है. नोटबंदी से वो इसी वजह से परेशान है, जनता ने भाजपा के दावों को सच माना.

दूसरा कारण उत्तर प्रदेश की जनता अगर मायावती को कठोर शासक के रूप में याद करती थी तो उनके शासनकाल को भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान कायम करने के लिए भी याद किया जाता है.  जहां एक तरफ कानून व्यवस्था पर उनकी पकड़ मजबूत होती थी तो दूसरी ओर विकास पूरे प्रदेश के एजेंडे से गायब हो जाता था.

तीसरा कारण विपक्ष के रूप में पिछले पांच सालों के दौरान प्रदेश से बसपा गायब रही. खुद मायावती प्रदेश के बड़े से बड़े मसले पर चुप्पी साधे रहीं. उनकी पार्टी के ज्यादातर नेताओं को बोलने की आजादी नहीं होती थी. ऐसे में विपक्ष के रूप में बसपा को अपनी भूमिका के लिए लोकसभा चुनावों में सबक मिल चुका था लेकिन बसपा ने उससे कोई सीख नहीं ली.

चौथा कारण उत्तर प्रदेश की जनता अब विकास के लिए भी वोट कर रही है. बसपा के अलावा सभी पार्टियों के विकास का अपना एक एजेंडा था. उनके पास अपना एक मॉडल था लेकिन बसपा ने इस पर कभी चर्चा नहीं की.  खुद मायावती ने अपने भाषणों में विकास की बात कभी नहीं की. उनकी पार्टी के दूसरे बड़े नेता भी इस सवाल पर चुप्पी साध लेते थे.

पांचवां कारण बसपा ने खुद को जातीय राजनीति में उलझा कर रखा. मायावती ने बसपा को पूरे प्रदेश की पार्टी बनाने के बजाय कभी दलित-ब्राह्मण गठजोड़ तो कभी दलित-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे नैया पार करने की कोशिश की. इसे उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया था. यह तिलिस्म बुरी तरह से टूट गया.

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(फोटो : पीटीआई)

छठा कारण बसपा की सोशल मीडिया से दूरी रही. बसपा ने चुनाव प्रचार के नए परपंरागत तरीके से खुद को दूर रखा. जहां बड़ी संख्या में नई जनरेशन सोशल मीडिया के जरिये अपनी बात रख रही है. बसपा का इस प्लेटफॉर्म से गायब रहना नुकसानदेह साबित हुआ.

सातवां कारण यूपी की जनता मायावती के पिछले शासन को कानून-व्यवस्था के लिए याद करती थी. इस बार मायावती ने बाहुबली मुख्तार अंसारी समेत अन्य को टिकट देकर इस छवि को भी धूमिल कर लिया. पार्टी ने इस मामले में अन्य दलों की राह पकड़ ली. जनता को इससे बड़ा झटका लगा.

आठवां कारण बसपा का टिकट बंटवारा रहा. बसपा पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि पैसे लेकर टिकट दिए जाते हैं. पार्टी प्रमुख मायावती महिला होने के बावजूद भी पार्टी ने टिकट देने के मामले में महिलाओं से दूरी बना रखी. 402 प्रत्याशियों की सूची में सिर्फ 21 महिलाओं को पार्टी ने टिकट दिया.

नौवां कारण बसपा मुसलमानों का भरोसा जीतने में नाकाम रही. बसपा के साथ यह दिक्कत हमेशा से रही है कि वह सत्ता के लिए किसी भी दल से गठजोड़ कर लेती है. ऐसे में मुसलमानों के एक बड़े तबके को हमेशा से यह डर रहा कि उनके वोट लेकर बसपा कहीं भाजपा से गठजोड़ न कर ले. ऐसे में मुसलमानों का दिल जीतने का बसपा की कोशिश पूरी नहीं हुई.

दसवां कारण दलितों-गरीबों से बसपा की दूरी रही. बसपा को दलितों और गरीबों की पार्टी माना जाता है, लेकिन प्रत्याशियों की सूची में बड़ी संख्या अमीरों की रही. बसपा के बारे में कहा जाता है कि भले ही आप लंबे समय तक पार्टी के कार्यकर्ता रहें लेकिन चुनाव अटैची वाला ही लड़ेगा. ऐसे में लंबे समय से जुड़े पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह खत्म हो गया.

भले ही मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा यह कहा जाता रहा कि उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा की साख दांव पर लगी है लेकिन वास्तव में बसपा की साख इस चुनाव में दांव पर लगी थी. लोकसभा चुनाव में कोई भी सीट न जीत पाने वाली पार्टी विधानसभा में मुश्किल से दर्जन भर सीट जीत पा रही है. बसपा प्रमुख को इस चुनाव से सबक लेने की जरूरत है. उन्हें अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा. वह जनता से दूर होती जा रही है.  ईवीएम छेड़छाड़ करने के बहाने बनाने के बजाय उन्हें इस हार को स्वीकार करके गहन मंथन करने की जरूरत है.