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भुखमरी से मौत के मामलों में मुआवज़ा देने पर सुप्रीम कोर्ट से विचार करने का अनुरोध

कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि झारखंड और कुछ अन्य राज्यों में आधार से जुड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ख़ामियों की वजह से भुखमरी से मौत के कई मामले सामने आए हैं.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि आधार से जुड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ख़ामियों के चलते भुखमरी की वजह से कई लोगों की मौत के मामले सामने आए हैं और अदालत को उन्हें मुआवज़ा दिए जाने पर विचार करना चाहिए.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष न्यायमूर्ति केएस पुत्तास्वामी ने कहा कि कल्याणकारी योजनाओं के सीमित इस्तेमाल के शीर्ष अदालत के निर्देश का उल्लंघन करते हुए सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से आधार को अनेक योजनाओं से जोड़ा गया है. न्यायमूर्ति पुत्तास्वामी आधार और इससे संबंधित कानून को चुनौती देने वाले कुछ मामलों में प्रमुख याचिकाकर्ता हैं.

पीठ में न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण भी हैं.

सेवानिवृत्त न्यायाधीश की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने पीठ से कहा कि झारखंड और कुछ अन्य राज्यों में आधार वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खामियों की वजह से भुखमरी से मौत के कई मामले सामने आए क्योंकि परिवारों को राशन नहीं दिया गया.

उन्होंने पीठ से आधार की वजह से लाभ नहीं मिल पाने के कारण प्रभावित हुए लोगों, ख़ासकर भुखमरी से मरने वाले लोगों के परिजन को मुआवज़ा दिए जाने पर विचार करने का अनुरोध किया.

वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपनी दलीलें पेश करते हुए अदालत से यह अनुरोध भी किया कि आधार को बैंक खातों, मोबाइल फोन नंबर और अन्य सेवाओं से अनिवार्य रूप से जोड़ने के लिए उसके द्वारा निर्धारित 31 मार्च की समयसीमा को आधार क़ानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती का मामला लंबित होने के मद्देनज़र बढ़ाया जाए.

उन्होंने कहा कि आधार अधिनियम अवैध है और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है. आधार को चुनौती देने के मामले में शीर्ष अदालत छह मार्च को आगे की दलीलें सुनेगी.

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