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किसानों के मुक़ाबले उद्योग जगत पर नौ गुना ज़्यादा एनपीए: आरटीआई

सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार, किसानों का एनपीए 66,176 करोड़ है, तो उद्योगों का एनपीए 5,67,148 करोड़ रुपये है. कुल एनपीए में निजी बैंकों के मुक़ाबले सार्वजनिक बैंकों का एनपीए आठ गुना ज़्यादा है.

Farmers Draught India Reuters 1

(फोटो: रॉयटर्स)

एक तरफ देश का किसान कर्ज से बेहाल है, तो दूसरी ओर उद्योगपतियों की कर्ज से ही पौ बारह हो रही है. विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे उद्योगपति बैंक से हजारों करोड़ों का कर्ज लेकर फरार हो जाते हैं, वहीं छोटा कर्ज लेकर किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाते हैं.

एक ओर जहां किसान बैंक का कर्ज न चुकाने के चलते आत्महत्या करने को मजबूर है तो दूसरी ओर देश के बड़े-बड़े उद्योगपति बैंकों से लिया लाखों करोड़ का कर्ज डकारे बैठे हैं.

सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी से खुलासा हुआ है कि बैंकों का एनपीए किसानों के मुकाबले उद्योगपतियों पर 9 गुना ज्यादा है.

समाचार एजेंसी आईएएनएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘देश के किसानों का जीएनपीए (सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) 66,176 करोड़ है, तो उद्योगों का एनपीए 5,67,148 करोड़ है. देश के संपूर्ण एनपीए (जीएनपीए) पर नजर दौड़ाएं, तो यह 7,76,067 करोड़ रुपये है. इसमें से 6,89,806 करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों के हैं, तो 86,281 करोड़ रुपये निजी बैंकों के हैं. इस तरह निजी बैंकों के मुकाबले सार्वजनिक बैंकों का एनपीए आठ गुना से अधिक  है.

मध्य प्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है, वह इस बात का खुलासा करती है कि किसानों और खेती से जुड़े लोगों का एनपीए कुल जमा 66,176 करोड़ है.

इसमें से सार्वजनिक बैंकों का एनपीए 59,177 करोड़ और निजी बैंकों का 6,999 करोड़ रुपये है. किसानों और खेती के काम से जुड़े लोगों के एनपीए के मुकाबले उद्योग जगत का जीएनपीए 5,67,148 करोड़ रुपये है. इसमें से सार्वजनिक बैंकों का 5,12,359 करोड़ और निजी बैंकों का 54,789 करोड़ रुपये है.

भारतीय रिजर्व बैंक से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, सेवा क्षेत्र का एनपीए 1,00,128 करोड़ रुपये है. इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 83,856 और निजी बैंकों का 16,272 करोड़ रुपये है.

गौरतलब है कि एनपीए वह राशि होती है जिसकी वसूली बैंकों के लिए आसान नहीं होती है. एक हिसाब से यह डूबत खाते की रकम की श्रेणी में आती है. इस राशि को बैंक राइट ऑफ घोषित करके अपनी बैलेंस शीट को साफ -सुथरा कर सकता है. बीते पांच सालों में बैंकों ने 3,67,765 करोड़ रुपये की रकम आपसी समझौते के तहत डूबत खाते में डाली है.

बैंक के जानकार बताते हैं कि बैंकों की खस्ता हालत का एक कारण एनपीए है, तो दूसरा लंबित कर्ज है. बैंक के द्वारा जो रकम डूबत खाते में डाली जाती है, वह आम उपभोक्ता के ही खातों से वसूली जाती है. एनपीए सीधे तौर पर वह रकम है, जो बैंक वसूल करने में असफल नजर आता है.

गौरतलब है कि यह जानकारी तब सामने आई है, जब पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में उद्योगपति नीरव मोदी बैंक का 11,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज बिना चुकाए विदेश भाग गए हैं.

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