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नोटबंदी से जुड़ी सूचना देने से पीएमओ का इनकार, सीआईसी ने किया अफ़सरों को तलब

प्रधानमंत्री कार्यालय ने नोटबंदी से संबंधित सूचना देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी आरटीआई कानून के तहत ‘सूचना’ के दायरे में नहीं आती. इससे देश के आर्थिक हित प्रभावित होंगे.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) आरके माथुर ने नोटबंदी के निर्णय से संबंधित रिकॉर्ड रखने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के अधिकारियों को उनके समक्ष पेश होने के निर्देश दिए हैं और यह बताने को कहा है कि दस्तावेजों के खुलासे से देश के आर्थिक हितों पर कैसे असर पड़ेगा?

आरटीआई आवेदक आरएल केन के मामले में माथुर ने राष्ट्रपति भवन के उस तर्क को खारिज कर दिया कि उनका सवाल सूचना की परिभाषा के तहत नहीं आता, जिसे आरटीआई कानून के तहत पूछा जाए.

केन ने सवाल पूछा था कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और एक हजार रुपये के नोटों को बंद करने और दो हजार रुपये का नया नोट जारी करने के अपने निर्णय से राष्ट्रपति को अवगत कराया था.

नोटबंदी पर उनकी याचिका में पूछे गए सवालों पर पीएमओ, राष्ट्रपति सचिवालय और वित्त मंत्रालय से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद केन ने आयोग का रुख किया था.

उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से नोटबंदी से संबंधित फाइल पर प्रधानमंत्री द्वारा स्वीकृत अनुमोदन की प्रमाणित कॉपी मांगी थी. साथ ही दो हजार के नोटों की नई श्रृंखला लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक कानून, 1934 की धारा 24 के तहत नोटों की मौजूदा प्रचलित सूची के संशोधन के लिए स्वीकृति देने वाली कॉपी की भी मांग की थी.

अपनी याचिका में केन ने 8 नवंबर 2016 को दूरदर्शन पर प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी के फैसले की घोषणा वाले भाषण की असंपादित रिकॉर्डिंग भी मांगी थी.

प्रधानमंत्री कार्यालय ने कुछ मामलों में धारा 8(1)(ए) का हवाला देते हुए पूरी सूचना याचिकाकर्ता को यह कहते हुए देने से इनकार कर दिया कि उसके द्वारा मांगी गई जानकारी आरटीआई कानून के तहत ‘सूचना’ के दायरे में नहीं आती. यह धारा उन सूचनाओं का खुलासा न करने की छूट देती है जिन सूचनाओं से देश के आर्थिक हित प्रभावित हों.

माथुर ने कहा, ‘आयोग का मत है कि प्रतिवादी (पीएमओ) को सूचना न देने के संबंध में अपने द्वारा दिए उन कारणों की व्याख्या करनी चाहिए जो उनके दावे अनुसार आरटीआई की धारा 8(1)(ए) के तहत देश के आर्थिक हितों पर प्रभाव डालते हैं. इसलिए आयोग ने पाया कि रिकॉर्ड रखने वाले संबंधित केंद्रीय जनसूचना अधिकारी (सीपीआईओ) को अगली सुनवाई में आयोग के समक्ष प्रस्तुत होना चाहिए.’

माथुर ने अपने आदेश में जिक्र किया है कि राष्ट्रपति सचिवालय को भेजी अपनी आरटीआई में केन ने जानकारी मांगी थी कि क्या प्रधानमंत्री ने नोटबंदी और 2000 रुपये के नए लोट लाने के अपने फैसले के संबंध में राष्ट्रपति से भी चर्चा की थी, उन्हें सूचित किया था? उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा न करना भारतीय रिजर्व बैंक कानून, 1934 की धारा 24 और 25 का उल्लंघन है.

केन ने कहा कि प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री या किसी भी अधिकारी द्वारा कोई भी जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. इस संबंध में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 8(A) के तहत जरूरी कोई भी सूचना राष्ट्रपति को नहीं भेजी गई थी.

माथुर ने कहा, ‘केन इस संबंध में सूचना चाहते हैं कि कब विवादित आदेश पर राष्ट्रपति को सूचित किया गया या संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार कब स्वयं प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से व्यक्तिगत तौर पर मिलने गए. भारतीय राष्ट्रपति की जरूरी प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में क्या प्रतिक्रिया थी?’

केन ने सीआईसी के सामने आरोप लगाया कि नोटबंदी के कारण सारा देश प्रभावित हुआ और 150 लोगों की जान गई, तब भी सचिवालय ने सूचना देने से मना कर दिया.

राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी प्रश्नात्मक स्वभाव की है और आरटीआई कानून प्रश्नों के जबाव देने के लिए कोई बाध्यता नहीं डालता है. इसके अलावा कहा गया है कि कैबिनेट के फैसले गुप्त दस्तावेज होते हैं जिनका खुलासा नहीं किया जा सकता है.

याचिकाकर्ता ने कहा कि राष्ट्रपति कार्यालय ने सूचना के अधिकार की धारा 2(एफ), जो पारिभाषित करती है कि कानून के तहत क्या मांगा जा सकता है, के तहत मांगी गई जानकारी देने से गलत तरीके से इनकार किया है.

माथुर ने अपने आदेश में कहा, ‘राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा दिया गया जवाब आयोग द्वारा स्वीकार्य नहीं है. आयोग का विचार है कि मांगी गई प्रश्नात्मक सूचना भी आरटीआई एक्ट की धारा 2(एफ) के तहत सूचना की परिभाषा के अंदर आती है. इसलिए प्रतिवादी या उत्तरदाता को आरटीआई आवेदन के प्रत्येक बिंदु पर याचिकाकर्ता को एक स्पष्ट जवाब देना चाहिए. हालांकि, अगर सूचना छूट प्राप्त है तो उत्तरदाता छूट पाने के लिए स्वतंत्र है.’

एक दूसरे याचिकाकर्ता की याचिका पर अपने पिछले आदेश में आयोग ने कहा था कि नोटबंदी से संबंधित सारे दस्तावेजों का खुलासा किया जाना चाहिए.

तत्कालीन सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यलु ने पिछले वर्ष मई में कहा था, ‘सभी सार्वजनिक अधिकरण की यह नैतिक, संवैधानिक, सूचना के अधिकार के तहत लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वे अगर नोटबंदी के कोई नकारात्मक प्रभाव देखे गए तो उनकी सूचना, कारण, प्रभाव, उनके उपचार के उपाय और नोटबंदी से कौन-कौन प्रभावित हुआ, यह प्रत्येक नागरिक को स्पष्ट करें.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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