प्रासंगिक

आज रंग है ऐ मां रंग है, मेरे महबूब के घर रंग है री…

सूफ़िया-ए-किराम हों या पीर-फ़क़ीर, दरवेश हों या साधू-संत सब अपने-अपने पीर-ओ-मुर्शिद और ख़ुदा से रिश्ता क़ायम करने के लिए इश्क़ पर ज़ोर देते हैं. इश्क़ के अनेक रंगों में एक रंग होली का है.

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(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

फाग, फगुआ और फागुन की मस्ती से हम सब वाक़िफ़ हैं. फाग-गीत के संग होली की मस्ती का आलम हर जगह कम-ओ-बेश एक सा होता है. चेहरे और मन की इस रंगीनी को ख़ास नज़र से देखिए तो महसूस होगा कि इंसान हर तरह के भेदभाव और ऊंच-नीच से अलग इंसानी अज़मत के तराने पर रक़्स करने वाला मासूम-सा बच्चा है.

मुझे रंगों के इस पर्व से इश्क़ है लेकिन हमारे चरित्र की तरह रंगों का ज़ायक़ा भी तब्दील होता रहता है, इसलिए रंगों की मस्ती में कुछ ऐसा भी हो जाता है जो इसके मिज़ाज के ख़िलाफ़ है. होली की मस्ती के बहाने हमारे अपने चरित्र का छोटापन जब भी सामने आता है, मुझे दुख होता है कि ये पर्व धर्म और मज़हब से कहीं आगे हमें इश्क़-ओ-आशिक़ी और उल्फ़त-ओ-मोहब्बत के धागे में बांधता है.

फाग और फगुआ की अपनी-अपनी रिवायत है. मेरी बस्ती में भी फाग-गीत का जादू सर चढ़ कर बोलता है. मैथिली ज़बान की मिठास और विद्यापति के बारामासा से शायद आप भी वाक़िफ़ हों, हालांकि बिहार में फाग-गीत के लिए बेतिया-राज के महाराज नवल किशोर को एक ख़ास तरह की शोहरत हासिल है.

असल में ईद की तरह होली भी मुझे बस्ती की याद दिलाती है, तो उसी वक़्त ये याद आता है कि बस्ती के शिव जी भाई, उनकी पत्नी और निर्मल बहन जो अब इस दुनिया में नहीं रही, उन सब को अपने बचपन में कैसे हसरत भरी निगाह से होली खेलते देखता था और बड़े-बुज़ुर्गों की इस नसीहत से कांप जाता था कि अगर कहीं रंग लग गया तो अल्लाह मियां जिस्म का वो हिस्सा काट लेंगें.

लेकिन आसमानी जन्नत के लालच से जी कब बहलता था सो रू-ए-ज़मीन ही जन्नत हो जाती थी और ज़रा सी डांट-फटकार के बाद हम अपने अल्लाह मियां को राज़ी करने में जुट जाते थे.

जी में आता है कि यादों की इस होली में आप सब को शरीक करूं लेकिन आज मुझे उस होली पर बात करनी है जो उर्दू साहित्य और उर्दू कल्चर का हिस्सा है सो यादों की होली को अगले वक़्तों के लिए उठा रखता हूं.

उर्दू शाइरी और होली के बारे में जब भी कहीं कुछ पढ़ने का मौक़ा मिला, हर जगह यही बात नज़र आई कि होली हिंदुओं का पर्व है. बात सही भी है लेकिन मुझे इस में कुछ कमी महसूस होती थी.

फिर बराह-ए-रास्त उर्दू शाइरी को पढ़ा तो एहसास हुआ कि भले ये मज़हबी तौर पर हिंदुओं का पर्व है लेकिन ये अपनी मज़हबी पहचान में बंद नहीं है. हो भी क्यों कि इश्क़ ही इस का मज़हब है.

सूफ़िया-ए-किराम हों या पीर-फ़क़ीर, दरवेश हों या साधू-संत सब अपने-अपने पीर-ओ-मुर्शिद और ख़ुदा से रिश्ता क़ायम करने के लिए इश्क़ पर ज़ोर देते हैं. इश्क़ के अनेक रंगों में एक रंग होली का है.

अब अमीर ख़ुसरो हों या सैयद अब्दुल्ला शाह क़ादरी (बुल्ले शाह) उन सब के कलाम में होली का रंग ख़ूब नुमायां और गहरा है. होली को यूं तो मौसम के बदलने का प्रतीक भी माना जाता है, लेकिन ये इश्क़ और इश्क़-रंग में डूब जाने की कैफ़ियत का नाम है.

क्या बादशाह और क्या फ़क़ीर सब के दिलों में इश्क़ और सिर्फ़ इश्क़ का जाप होता है. होली की मस्ती और इश्क़ की कैफ़ियत से उर्दू शाइरी की हर किताब रौशन है. आप कहीं से कोई किताब उठा लीजिए आंखों में रंगीन नज़ारे तुलूअ’ हो जाएंगे.

मिसाल के तौर पर आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र का मशहूर-ए-ज़माना कलाम देखिए,

क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी

देखो कुंवर जी दूंगी गारी

बादशाह के कलाम से नज़र हटा कर सूफ़ी शाइर शाह नियाज़ का कलाम भी सुनिए कि,

होली होए रही है अहमद जिया के द्वार

हज़रत अली का रंग बनो है हसन-हुसैन खिलार

ऐसो होली की धूम मची है…

और अपने बुल्ले शाह का क्या कहना कि वो अपने पीर-ओ-मुर्शिद के साथ इस तरह होली खेलते नज़र आते हैं कि,

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी इल्लल्लाह

रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना-फ़ी-अल्लाह 

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

ये है सूफ़िया-ए-किराम की होली, जहां इश्क़ ही मज़हब है और इश्क़ ही दीन-ओ-ईमान है.

वैसे ये बातें यूं ही बरा-ए-बैत हैं. असल में कहना ये है कि होली की अपनी धार्मिक मान्यताओं से अलग भी होली के रंगों का एक प्रेम-इतिहास है और शायद ये सूफ़ी-संतो की इश्क़-रंग होली का फ़ैज़ ही हो कि हिंदुस्तान में एक-दूसरे के पर्व-त्योहार और मेलों-ठेलों में शिरकत की ख़ूबसूरत कहानियां जा-ब-जा मिल जाती हैं.

हिंदुस्तान में मुग़लिया-होली का प्रेम-इतिहास भी रोमांचित करता है और ये महसूस होता है कि हम अपने सपनों के जहां की सैर कर रहे हैं.

कहते हैं अपने समय का मुग़लिया-हिंदुस्तान दिवाली में जश्न-ए-चराग़ां करता था और होली में अबीर-ओ-गुलाल से लालों-लाल हो जाता था . इसी तरह राखी और सलोनो की ख़ूबसूरत और ख़ूबसीरत कहानियां मिल जाती हैं. दिल्ली के ही एक मुसलमान शाइर के बारे में किताबों में लिखा है कि वो होली के दिन गली-गली फिरते थे और दफ़ बजा कर अपना कलाम पढ़ते थे.

किताबों की बात चली है तो शायद आप ने भी ये पढ़ा हो कि जहां अकबर-ए-आज़म रंगों के तालाब में डुबकी लगा कर होली मनाते थे, वहीं जहांगीर अपनी किताब तुज़्क-ए-जहांगीरी में न सिर्फ़ होली की महफ़िलों का ज़िक्र करता है बल्कि रंगों की मस्ती से भी सरशार नज़र आता है.

गोवर्धन जैसे महान मुग़लिया चित्रकारों की चित्र-कला में भी जहांगीर अपनी मलिका नूरजहां के साथ होली खेलता नज़र आता है. गोवर्धन की कला के कुछ नमूने हमारे सामने हैं, लेकिन दुनिया भर के क़ुतुबख़ानों और म्यूज़ियम के अलावा रामपुर रज़ा पुस्तकालय में भी गोवर्धन-कला के वो पन्ने महफ़ूज हैं जो हमारे प्रेम-इतिहास और उस की साझी विरासत का हवाला हैं.

होली और मुग़लिया-हिंदुस्तान की बात हो रही हो तो शाहजहां का ज़िक्र भी ज़रूरी हो जाता है कि शाहजहांनी दौर में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-पाशी के नाम से भी जाना जाता था. इन बातों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैसे कोई उत्सव और पर्व-त्योहार मज़हब से ज़्यादा इंसान के इश्क़-ओ-मोहब्बत के जज़्बे को बेदार करता है.

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गोवर्धन की पेंटिंग में मुग़ल बादशाह जहांगीर अपनी मलिका नूरजहां के साथ होली खेलते नज़र आते हैं

उर्दू जर्नल तहज़ीब-उल-अख़लाक़ (1855) के एक अंक के पेश-ए-नज़र कई लोगों ने लिखा है कि बहादुर शाह ज़फ़र होली में अपनी पेशानी पर अबीर-ओ-गुलाल लगवाते थे, और उनकी ये रचना दिल्ली की गलियों में गाई जाती थी,

क्यों मो पे मारी रंग की पिचकारी

देखो कुंवर जी दूंगी गारी

इसी बात को कुछ लोगों ने इस तरह भी लिखा है कि बहादुर शाह ज़फ़र अपने हिंदू वज़ीरों से पेशानी पर अबीर-ओ-गुलाल लगवाते थे और ख़ास तरह से दरबार सजवाते थे.

उर्दू के पहले अख़बार जाम-ए-जहां-नुमा के एक अंक के मुताबिक़ ज़फ़र के ज़माने में होली के लिए ख़ुसूसी इंतिज़ाम इस तरह किए जाते थे कि टेसू/तीसू के फूल से तैयार ज़र्द यानी पीला रंग एक-दूसरे को लगाया जाता था. इसके लिए धात, शीशा और लकड़ी की पिचकारियां इस्तेमाल की जाती थीं.

होली की इस तहज़ीब पर कौन अश-अश नहीं करेगा कि बादशाह सलामत पर भी लाल और ज़र्द रंग डाला जाता  था. मोहम्मद शाह रंगीला के हवाले से कई जगहों पर इस बात की चर्चा की गई है कि उस समय की चित्रकला में उन को अपनी मलिका के साथ होली खेलते दिखाया गया है.

कुल मिलाकर उस वक़्त की होली का आलम ये था कि जब गहनों से लदी-फंदी लड़कियां रक़्स करती थीं और होली-गीत गाते हुए लाल-क़िले के क़रीब से गुज़रती थीं तो पर्दानशीं शहज़ादियों पर भी होली की मस्ती का रंग चढ़ने लगता था.

मुग़ल बादशाह शाह आलम सानी की होली के रंग को उनकी किताब नादिरात-ए-शाही में देखा जा सकता है . इस किताब से अंदाज़ा होता है कि क़िला-ए-मोअल्ला में फाग गाने और खेलने का चलन कितना मज़बूत था. ये वही शाह आलम हैं जिन की आंखों में सलाइयां फेरी गई थीं और अंधा कर दिया गया था .

शाह आलम ने अपनी किताब में होली-गीत और दोहरे का ख़ास एहतिमाम किया है . क़ाबिल-ए-ज़िक्र बात ये है कि वो उर्दू और फ़ारसी के अलावा हिंदी भी जानते थे . उनकी किताब नादिरात-ए-शाही उर्दू के साथ हिंदी स्क्रिप्ट में है और इस का एक नुस्ख़ा किताब-ख़ाना आलिया रामपुर में मौजूद है.

यहां इस बात की चर्चा की जानी चाहिए कि सानी के हुक्म पर ही ये किताब 1797 में उर्दू और हिंदी दोनों रस्म-उल-ख़त लिखी गई थी. मुग़लों के हिंदी प्रेम की कहानी सुनाने का ये मौक़ा नहीं है लेकिन ऐसे नामों की कोई कमी नहीं जो भाषा और कल्चर के शैदाई थे.

शायद उस ज़माने में तअ’स्सुब नहीं था . लोगों के दिल मिले हुए थे. गोपी चंद नारंग ने एक जगह लिखा है कि शाह आलम सानी हिंदू मां के बेटे थे इस लिए भी उनके यहां किसी तरह की शिद्दत-पसंदी नहीं थी. सानी तमाम मुग़ल बादशाहों से अलग हिन्दुस्तानी तहज़ीब का जश्न मनाता हुआ नज़र आते हैं,

तुम तो बड़ी हो चातुर खिलार, लालन तुन सूं खेल मचाऊं, रंग भिजाऊं

दफ़, ताल, मिरदंग, मुहचंग बजाऊं, फाग सुनाऊं, अनेक भांत के भाव बताऊं

फ़ाएज़ देहलवी (1690-1737) के यहां दिल्ली की होली का चित्रण इस तरह किया गया है कि सखियां इत्र और अबीर छिड़कती हैं. रंग उड़ाती हैं. गुलाल से उन का गाल आतिशफ़िशां यानी ज्वालामुखी की तरह हो जाता है. आंखें कंवल की पत्तियों की तरह झपकती और खुलती हैं. घर-घर ढोलक बजते हैं और पिचकारी चलती है,

जोश-ए-इशरत घर-ब-घर है हर तरफ़

नाचती हैं सब तकल्लुफ़ बर तरफ़

गोपी चंद नारंग ने लिखा है कि हातिम के समकालीन हिदायत अली ख़ान ज़मीर ने होली पर जो नज़्म लिखी थी, गारसां दतासी ने उस की बड़ी तारीफ़ की है और फ्रांसीसी में अनुवाद भी किया है. ये नज़्म तारीख़-ए-अदबियात-ए-हिंदी में मौजूद है.

होली का ज़िक्र मोहम्मद रफ़ी सौदा (1713-1780) के यहां भी मिलता है,

ब्रज में है धूम होरी की व लेकिन तुझ बग़ैर

ये गुलाल उड़ता नहीं भड़के है अब ये तन में आग

ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर (1722-23-1810) के यहां होली पर दो मसनवी मिलती है. उन में से एक ‘दर जश्न-ए-होली-ओ-कत-ख़ुदाई’ जो आसिफ़ुद्दौला की शादी के मौक़े पर लिखी गई,

आओ साक़ी बहार फिर आई

होली में कितनी शादियां लाई

जश्न-ए-नौ-रोज़-ए-हिंद होली है

राग रंग और बोली ठोली है

अब की बहार क्या क्या दरिया पे रंग लाई

यक शहर निकले लाला फिर उस में होली आई

अपनी दूसरी मसनवी ‘दर बयान-ए-होली’ में कहते हैं,

होली खेला आसिफ़ुद्दौला वज़ीर…

क़ुमक़ुमे जो मारते भर कर गुलाल

जिस के लगता आन कर फिर मुँह है लाल

क़ाएम चांदपुरी (1725-1794)  ने 144 शेर की मसनवी ‘दर तौसिफ़-ए-होली’ यानी होली की तारीफ़ में लिखा,

किसी पर कोई छुप के फेंके है रंग

कोई क़ुमक़ुमों से है सरगर्म-ए-जंग

है डूबा कोई रंग में सर-ब-सर

फ़क़त आब में है कोई तर-ब-तर

उर्दू तहज़ीब की बात हो तो लखनऊ की बात भी ज़रूरी हो जाती है. किताबों से अलग हमारे कुछ लखनवी दोस्त बताते हैं कि यहां आज भी ईद ही की तरह होली पर गले मिलने और मुसाफ़हा करने की रस्म है.

मीर साहब ने लखनऊ में ही होली पर दो मसनवी लिखी और उस में लखनऊ को दिल्ली से बेहतर क़रार दिया,

लखनऊ दिल्ली से भी बेहतर है

कि किसू दिल की लाग ईधर है

शायद इसलिए भी लखनऊ के बारे में कहा जाता है कि यहां होली के मौक़े पर हिंदुस्तानी कल्चर की गंगा-जमुनी तहज़ीब का आम नज़ारा होता है. यहां होली एक पर्व से ज़्यादा कुछ है इसलिए हिंदू-मुसलमान में फ़र्क़ करना मुश्किल होता है.

कुछ लोगों के मुताबिक़ पुराने लखनऊ में एक चौक होली-बारात के नाम से मशहूर है. कमाल की बात ये है कि यहां 1947 से ही होली एक मज़हबी उत्सव से ज़्यादा हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है.

कहते हैं जब यहां रंगों के शैदाई होली मनाते हुए अकबरी गेट और राजा बाज़ार से गुज़रते हैं, तब लोग न सिर्फ़ एक दूसरे को रंगों से रंगते हैं बल्कि अपने-अपने घरों के छज्जे से फूलों की बारिश करते हैं और एक-दूसरे का इस्तिक़बाल करते हैं.

यहां मुसलमान होली के ठीक बाद नौरोज़ के अवसर पर भी रंग खेलते हैं. रही लखनऊ की उर्दू शाइरी तो इस में भी  हिंदू-मुस्लिम एकता जश्न ख़ूब मनाया गया है. और फिर दिल्ली के मीर ने लखनऊ में यूं ही नहीं कहा होगा,

आओ साक़ी बहार फिर आई

होली में कितनी शादियां लाई

जिस तरफ़ देखो मारका सा है

शहर है या कोई तमाशा है

ख़्वान भर-भर अबीर लाते हैं

गुल की पत्ती मिला उड़ाते हैं

लखनऊ की बात अवध के आख़िरी नवाब और भारतीय संगीत, नृत्य एवं नाटक के संरक्षक वाजिद अली शाह अख़्तर (1822-1887) के बिना कैसे पूरी हो सकती है. वो न सिर्फ़ होली खेलते थे बल्कि उनकी शाइरी भी होली के रंगों को पेश करती है,

मोरे कान्हा जो आए पलट के

अब के होली मैं खेलूंगी डट के

उनके पीछे मैं चुप के से जा के

ये गुलाल अपने तन से लगा के

रंग दूंगी उन्हें भी लिपट के

उर्दू में होली के रंगों का एक लंबा सिलसिला है इसलिए यहा कुछ ख़ास रंगों को पेश किया जा रहा है. इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य, इंक़िलाब ज़िंदाबाद का नारा देने वाले और अपनी कृष्ण भक्ति के लिए मशहूर मौलाना हसरत मोहानी (1875-1951) हैं जो हिंदुस्तानी कल्चर के एक बड़े और सच्चे मुहाफ़िज़ थे. उन की होली देखिए,

मोहे छेड़ करत नंद लाल

लिए ठाड़े अबीर गुलाल

ढीठ भई जिन की बरजोरी

औरां पर रंग डाल डाल

Radha Krishna

होली खेलते राधा कृष्ण की पेंटिंग (1775-1780). पेंटर अज्ञात © Victoria and Albert Museum, London. (फोटो साभार: http://www.vam.ac.uk)

उर्दू शाइरी में हिंदुस्तानी कल्चर और तहज़ीब का सफ़्हा उलट रहे हों तो पहली नज़र नज़ीर अकबराबादी (1740-1830) पर पड़ती है. नज़ीर की शाइरी में हिंदुस्तान बोलता और चलता-फिरता नज़र आता है.

आप अपनी तहज़ीब के किसी भी रंग को देखना चाहें, नज़ीर उस का जश्न मनाता नज़र आएगा. सिर्फ़ होली की ही बात कर लीजिए तो नज़ीर ने लोगों के होली खेलेने के तौर-तरीक़ों, उनके उमंगों और तामम साज़-ओ-सामान का ज़िक्र जिस तरह से किया है किसी और शाइर के यहां नज़र नहीं आता,

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की

और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की

परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की

ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हों तब देख बहारें होली की

महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की

होली की ख़ास बात ये है कि जहां तमाम उर्दू शाइरों ने रंगों का जश्न मनाया है वहीं रंगों को नए-नए रूपक में भी ढाल दिया है . अब अपने सीमाब अकबराबादी (1880-1951) को ही लीजिए कि उन्हों ने ‘मेरी होली’ के शीर्षक से होली को एक नया अर्थ दे दिया. गोया होली इश्क़ है प्रेम है और इंक़िलाब भी,

इर्तिक़ा के रंग से लबरेज़ झोली हो मिरी

इंक़िलाब ऐसा कोई हो ले तो होली हो मिरी

उर्दू के मुस्लिम शाइरों को जाने दीजिए उर्दू के एक इंग्लिश शाइर जोर्ज पेश शोर के यहां रंग देखिए,

ख़ुशी से फूल के बुलबुल भी होली गाती है

उठी है चार तरफ़ से पुकार होली है

गुलाल-ओ-अबीर के बादल हैं सर-ब-सर छाए

खिला है चर्ख़ पे बाग़-ओ-बहार होली है

होली और उर्दू के कुछ रंगों को पेश करने के बाद अफ़ज़ल और उन की बिकट कहानी का ज़िक्र भी ज़रूरी हो जाता है कि हिंदी-उर्दू साहित्य में इस किताब को ख़ास अहमियत हासिल है. यूं तो अफ़ज़ल की अपनी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं, लेकिन यहां उनकी होली का रंग देखिए कि इस की चर्चा कम-कम की जाती है :

सलोनी,सांवरी और सब्ज़ गोरी

सभी खेलें पिया अपने सीं होरी

भरे रंगों ले मटके साथ सब के

अच्छी पिचकारियां हैं हाथ सब के

गुलाल अंदर भईं हैं लाल सारी

बजावें दफ़ पिया के नाल सारी

इस तरह होली के प्रेम-रंग का इतिहास उर्दू शाइरी और हिंदुस्तानी तहज़ीब का इतिहास है. यहां तमाम रंगों का ज़िक्र मुश्किल है, लेकिन हां, आप उर्दू शाइरी और होली के कुछ और ख़ास रंगों को यहां पढ़ सकते हैं.

होली में रंगों की तहज़ीब बड़ी चीज़ होती है. ये बात मैं ने इस लिए कही कि बहुत पहले ज़ाहिदा हिना ने होली और मज़हबी शिद्दत पसंदी के खिलाफ़ एक लेख लिखा था. आप भी उस का एक ख़ास हिस्सा मुलाहिज़ा कीजिए,

गुज़रे हुए साल की ना-ख़ुशगवार यादों की बिना पर इस बार भी लोग सहमे हुए थे. उन्हें याद था कि पिछले बरस कई मंदिरों पर हमले हुए थे लेकिन इस मर्तबा बहुत से मुसलमानों ने तय कर लिया था कि वो इस तरह की ग़ुंडा-गर्दी नहीं होने देंगे. इसी लिए कराची के श्री स्वामीनारायण मंदिर के पीछे एक बड़े मैदान में जब कराची और सिंध के दूसरे शहरों और देहातों से आए हुए लोग होली मना रहे थे, तो बहुत से मुसलमान लड़कों और लड़कियों ने एक दूसरे का हाथ थामकर मंदिर के गिर्द इंसानी ज़ंजीर बनाई. ये इस बात का इशारा था कि इस मर्तबा किसी को भी मंदिर में घुसने और इस का तक़द्दुस पामाल करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी कि ये इस्लामी तालीमात के क़तअन बरअक्स है .

जी होली की तहज़ीब हमें यही सिखाती है कि हम इश्क़ और प्रेम के रंगों को पहचानें. तअ’स्सुब और नफ़रत से पाक-साफ़ होली मनाएं कि ब-क़ौल-ए-ख़ुसरो आज रंग है…

आप सब को होली और ईद-ए-गुलाबी की बहुत-बहुत मुबारकबाद.