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व्यापमं घोटाले में सीबीआई जांच पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

विशेष रिपोर्ट: व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच कछुआ गति से चल रही है. रसूखदार आरोपी एक के बाद एक छूटते जा रहे हैं. बावजूद इसके जांच अधिकारियों की संख्या घटाई जा रही है. आरोप है कि सब केंद्र और राज्य सरकार के इशारे पर हो रहा है.

फोटो: फोटो: ncsexam.in/पीटीआई/विकिपीडिया

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रहस्यमयी परिस्थितियों में 48 मौतें, 2500 से ज़्यादा आरोपी, 2000 से ज्यादा गिरफ्तारियां, मामले में अफसर-अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक की संलिप्तता. बात मध्य प्रदेश के बहुचर्चित मध्य प्रदेश व्यवसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) घोटाले की हो रही है.

2012 में उजागर हुए इस महाघोटाले में जब एक के बाद मामले से जुड़े लोगों की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौतें होने लगीं, तो 15 जुलाई 2015 को इसकी जांच स्पेशल टास्क फोर्स से छीनकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई.

आज लगभग 32 महीने बीतने के बाद भी देश के इस सबसे बड़े शिक्षा घोटाले में सीबीआई की जांच किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई है.

बल्कि इसके विपरीत सीबीआई द्वारा जांच अपने हाथ में लेने के बाद से एसटीएफ द्वारा आरोपी बनाए गए बड़े-बड़े रसूखदार एक के बाद जमानत पाते जा रहे हैं, जिसके चलते सीबीआई जांच की निष्पक्षता पर मामले का खुलासा करने वाले व्हिसल ब्लोअर लगातार संदेह प्रकट करते रहे हैं.

हाल ही में, सीबीआई द्वारा व्यापमं की जांच के लिए गठित की गई विशेष शाखा से 20 अधिकारियों का तबादला दिल्ली में सीबीआई की एंटी-करप्शन शाखा में कर दिया गया है. पिछले छह महीनों में सीबीआई की भोपाल की विशेष व्यापमं घोटाला जांच शाखा से 70 फीसदी स्टाफ कम कर दिया गया है.

हालांकि स्टाफ में कमी करने को सीबीआई द्वारा रूटीन के तहत की गई कार्रवाई बताया जा रहा है. लेकिन मामले में सीधा दखल रखने वाले लोगों का मानना है कि यह सब सरकार के इशारे पर जांच को प्रभावित करने और लंबा खींचने की एक कवायद है.

व्यापमं घोटाला भले ही 2012 में सामने आया, लेकिन व्यापमं में चल रही धांधलियों के खिलाफ पूर्व विधायक डॉ. पारस सकलेचा 2009 से ही मुखर रहे. 2009 में मध्य प्रदेश विधानसभा में उन्होंने ही व्यापमं में चल रही धांधलियों पर सवाल खड़ा किया था.

जब मामले की जांच एसटीएफ कर रही थी तो जांच की धीमी प्रगति को देखते हुए पारस सकलेचा ने भी अन्य व्हिसल ब्लोअर के साथ मिलकर व्यापमं के गहराते रहस्य की जांच सीबीआई से कराने पर जोर दिया था.

व्यापमं शाखा से अधिकारियों के तबादले और स्टाफ में कमी करने के पीछे की पटकथा को समझाते हुए सकलेचा बताते हैं, ‘ये सारी उठापटक नवंबर 2017 में व्यापमं से जुड़े वर्ष 2013 के मामलों का आरोप-पत्र भोपाल की विशेष अदालत में पेश करने के बाद हुई है.’

गौरतलब है कि सीबीआई व्यापमं से जुड़े मामलों में अब तक चार आरोप-पत्र अदालत में दाखिल कर चुकी है जो 2012, 2013, संविदा शिक्षक वर्ग दो और संविदा शिक्षक वर्ग 3 की परीक्षाओं के मामलों से जुड़े हुए हैं.

पारस सकलेचा कहते हैं, ‘अगर 2013 वाले आरोप-पत्र का गौर से अध्ययन करें और उसकी तुलना 2012 वाले आरोप-पत्र से करें तो पाएंगे कि सीबीआई ने आरोप-पत्र पेश करने में काफी हेर-फेर और जोड़-तोड़ की है. 2012 के आरोप-पत्र में इन्होंने जिन बिंदुओं के आधार पर निजी कॉलेजों को दोषी माना और उनके ऊपर प्रकरण दर्ज किया, वही बिंदु 2013 में भी थे, लेकिन 2013 के आरोप-पत्र में सीबीआई ने उन बिंदुओं को छुआ तक नहीं. जबकि हमारी ये मांग आज की नहीं है, इस मांग के लिए तो हम हाई कोर्ट में भी लड़े हैं कि निजी कॉलेजों के अंदर जो स्टेट कोटे की सीटों पर भर्ती हुई हैं, इनमें घोटाला हुआ है. हमारी मांग पर कमेटी बनी. प्रवेश एवं फीस विनियामक कमेटी (एएफआरसी) के पूर्व मुखिया पीके दास ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2010 से 2013 के बीच निजी कॉलेजों में 700 से ज्यादा सीटें गलत तरीके से भरी गई हैं.’

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फाइल फोटो: पीटीआई

वे आगे कहते हैं, ‘सीबीआई ने इसके साथ हेर-फेर किया, फिर जो संविदा शिक्षक वर्ग दो और तीन के आरोप-पत्र भी दाखिल हुए, उनमें एसटीएफ ने जिन लोगों को पार्टी बनाया था, उनमें से कई लोगों का नाम तो चार्जशीट में शामिल ही नहीं किया गया है. इसलिए लगता है कि बड़ा लंबा हेर-फेर चल रहा है और सीबीआई के अंदर हो रही यह उठापटक भी उसी का हिस्सा है.’

वहीं, एक अन्य व्हिसल ब्लोअर आशीष चतुर्वेदी मानते हैं कि सरकार इस जांच में बुरी तरह फंसी हुई है और ये जांच को लंबा खींचने और दबाने के लिए किए जा रहे उसके प्रयासों का ही एक हिस्सा है.

वे कहते हैं, ‘सीबीआई में अधिकारियों की कमी पहले से ही थी. उसके बावजूद अधिकारियों का तबादला करना, उनकी इस मंशा को दर्शाता है कि वो जांच को दबाना और उसे लंबा खींचना चाहते हैं.’

वे आगे केंद्र और राज्य सरकार को निशाने पर लेते हुए कहते हैं, ‘चूंकि राज्य और केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार है, इसलिए केंद्र सरकार अपनी समवैचारिक पार्टी की सरकार के लोगों को बचाने के लिए षड्यंत्रपूर्वक इस तरीके से अधिकारियों का स्थानांतरण कर रही है. जिससे कि कम संख्या के चलते अधिकारियों पर दबाव बनाया जा सके और जो निष्पक्ष जांच चल रही है, उसे निष्पक्षता से नहीं होने दिया जाए.’

गौरतलब है कि जहां एक ओर जांच में लगे अधिकारियों की संख्या में कमी की जा रही है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने व्यापमं घोटाले के आरोपियों की बढ़ी हुई संख्या को देखते हुए पिछले दिनों भोपाल एवं ग्वालियर में आरोपियों की ट्रायल के लिए गठित विशेष न्यायालयों का क्षेत्राधिकार बढ़ाया है.

हाईकोर्ट ने भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में घोटाले से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों की पदस्थापना की है. यह विरोधाभास की एक अजीब स्थिति पैदा करता है.

लगभग दशक भर से सक्रियता से व्यापमं की लड़ाई लड़ रहे व्हिसल ब्लोअर डॉ. आनंद राय मानते हैं कि सीबीआई के 70 फीसद अधिकारियों को कम करना सरकार की रणनीति है अभियोजन पक्ष को परेशान करने की. अगर वो इनके हिसाब से काम नहीं करेंगे तो उनको परेशान करेंगे.

आनंद राय कहते हैं, ‘अभियोजन पक्ष का एक भाग होता है, जांच अधिकारी (आईओ). आईओ आप अपना आदमी रखो या जो आपके हिसाब से न चले उसे हटा दो, इससे वह ऐसी जांच करेगा कि आरोपी छूट जाएं. इससे पहले सीबीआई के एक एसपी का जबरन तबादला करके जांच से हटा दिया गया था. उन्हें हटाने के पीछे कारण था कि वे सरकार के हिसाब से काम नहीं कर रहे थे.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसी तरह न्याय दिलवाता है अभियोजन पक्ष का वकील. सीबीआई ने विशेष पब्लिक प्रोसीक्यूटर नियुक्त किए थे जो अदालत में व्यापमं के केस लड़ते हैं. वे सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा के लोग थे. अभियोजन पक्ष को इसी तरह कमजोर करने का नतीजा है कि मामले में आरोपी सारे रसूखदार लोगों के केस सीबीआई अदालत में हार रही है और वे छूट रहे हैं.’

(फाइल फोटो: पीटीआई)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (फाइल फोटो: पीटीआई)

सीबीआई जांच की प्रगति पर सकलेचा कहते हैं, ‘हमारा बहुत सारा भ्रम टूटा है, हम समझते थे कि एसटीएफ की जांच ज्यादा ढीली है, इसलिए हम लोगों ने सीबीआई जांच की मांग की, लेकिन सीबीआई जांच की मांग से हमें काफी निराशा हुई. पौने तीन साल बाद भी हम जांच में किसी गंभीर नतीजे पर नहीं पहुंचे और उस कारण को आज तक उजागर ही नहीं कर पाए कि इतना बड़ा घोटाला साल दर साल 2006 से 2017 तक होता रहा, तो आखिर किसके कारण हो रहा है? कौन इन घोटालों को संरक्षण दे रहा है?’

उनका मानना है कि ये एक सामान्य घोटाला नहीं है. बिना किसी राजनीतिक संरक्षण या सत्ता के संरक्षण के चार क्लर्क और बाबू मिलकर इस तरह का घोटाला नहीं कर सकते हैं जिसका पर्दाफाश सीबीआई भी नहीं कर पाई.

वे कहते हैं, ‘आश्चर्य इस बात का है कि सीबीआई जांच के दौरान भी शिक्षा घोटाला प्रदेश में चल रहा है. 2017 का एनआरआई घोटाला सबके सामने है. निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा एनआरआई कोटे के तहत मेडिकल सीटों पर जिन 114 लोगों को प्रवेश दिया गया, उनमें से 107 फर्जी निकले, जिनके सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रवेश निरस्त किए गए हैं.’

इस मामले के परिप्रेक्ष्य में सकलेचा प्रदेश में शिक्षा घोटालों की चल रही जांच और सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘जब फर्जीवाड़े के जरिये उन्होंने प्रवेश लिया, उनके प्रवेश निरस्त कर दिए गए, तो उन पर प्रकरण दर्ज होना चाहिए. लेकिन बात ये है कि एनआरआई के नाम पर जिन्होंने दाखिला लिया, उनमें अधिकांश भाजपा और आरएसएस के नेताओं के बच्चे हैं, बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के बच्चे हैं और यह सब सीबीआई जांच के दौरान हो रहा है.

वहीं, सरकार ने तो फर्जियों को लाभ पहुंचाने के लिए एनआरआई की परिभाषा ही बदल दी. जिस परिभाषा को केंद्र सरकार और आयकर विभाग मानता है और जिसके आधार पर किसी व्यक्ति को एनआरआई घोषित करता है, मध्यप्रदेश सरकार ने फर्जी तरीके से मेडिकल कॉलेज में प्रवेश देने के लिए उस परिभाषा को ही बदल दिया. इन सीटों पर प्रवेश लेने वाला मूलत: एनआरआई होना चाहिए, लेकिन सरकार ने ऐसा प्रावधान कर दिया कि एनआरआई का आश्रित भी दाखिला ले सकता है.’

वे आगे बताते हैं, ‘इसका मतलब ये हुआ कि अगर कोई किसी से भी लिखवा ले कि वह यहां एनआरआई आश्रित है, तो उसका दाखिला हो सकता है. भले ही वो कभी विदेश ही न गया हो.’

क्या कभी मिल सकेगा व्यापमं में न्याय?

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फाइल फोटो: पीटीआई

वर्ष 2015 में जब घोटाले की जांच एसटीएफ से लेकर सीबीआई को सौंपी गई थी, तब उम्मीद की गई कि अब इस महाघोटाले की परत दर परत उजागर होते समय नहीं लगेगा. लेकिन सीबीआई जांच की मांग करने वाले ही अब जांच से संतुष्ट नजर नहीं आते.

आशीष चतुर्वेदी कहते हैं, ‘एसटीएफ की जांच से सीबीआई जांच की तुलना करें तो सीबीआई की जांच एसटीएफ से भी निम्न दर्जे की है. एसटीएफ राज्य सरकार के अधीन थी, उसके बाद भी उसने कई प्रभावशाली लोगों को पकड़ा. वहीं, सीबीआई स्वतंत्र एजेंसी कहलाती है, बावजूद इसके उसने प्रभावशाली और हाई प्रोफाइल लोगों को छुआ भी नहीं है. उनसे पूछताछ नहीं की, उनकी जांच नहीं की. बस व्हिसल ब्लोअर्स को प्रताड़ित किया जा रहा है.’

पारस सकलेचा कहते हैं, ‘कुल 212 प्रकरण एसटीएफ ने व्यापमं घोटाले के संबंध में दर्ज किए थे. अदालत के आदेश से सभी प्रकरणों की जांच इनको करना है. लेकिन अब तक सीबीआई केवल 55 में चालान पेश कर पाई है. सारे प्रकरणों के सभी बिंदुओं पर ये इसी रफ्तार से जांच करेंगे तो दस सालों तक भी जांच पूरी नहीं कर पाएंगे. जुलाई में इन्हें जांच अपने हाथ में लिए 3 साल हो जाएंगे.

ढाई साल से ज्यादा समय में इन्होंने ये किया है कि जिन मामलों में एसटीएफ पहले ही चालान पेश कर चुकी थी, 70-80 प्रतिशत जांच पूरी कर चुकी थी, ये उनमें से सिर्फ 55 की ही जांच कर पाए हैं. जबकि इनके पास अपने और राज्य सरकार के कर्मचारी मिलाकर 300 से 400 का स्टाफ है.’

वे आगे कहते हैं, ‘वास्तव में सीबीआई लीपापोती कर रही है. जांच के नाम पर खानापूर्ति कर रही है. उसके ऊपर केंद्र सरकार और राज्य शासन का दबाव है. सीबीआई के अधिकारी उस दबाव के चलते काम कर रहे हैं और उन निर्देशों का पालन कर रहे हैं जो उनको मिल रहा है. वरना, सरकारी जांच एजेंसी में किसी की नियुक्ति होती है तो एक स्वाभाविक प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत माना जाता है कि अगर उसने दो-तीन साल उस प्रकरण पर अध्ययन किया है, तो उसको उस पर काम करने दिया जाए ताकि वह आगे की कार्रवाई का सामना आसानी से कर सके क्योंकि नया आदमी आएगा तो उसको समझने में फिर से सालों लग जाएंगे.’

किस तरह जांच को ऊपर से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है, इस पर वे कहते हैं, ‘नवंबर 2017 में अदालत में चालान पेश किया जाना था, उसके ठीक एक महीने पहले डीआईजी मनीष सिन्हा को बदल दिया गया और तरुण गुहा को प्रभार सौंप दिया गया. महत्वपूर्ण चालान पेश करने के समय इस तरह परिवर्तन किया गया. हम इस बात को तब भी समझ रहे थे कि कहीं न कहीं बड़े स्तर पर कोई खेल खेला जाने वाला है. और यह सब केंद्र और राज्य सरकार बड़े रसूखदार लोगों को बचाने के लिए कर रही हैं. चालान देखने से तो यह साफ पता ही चलता है.’

सकलेचा एक उदाहरण भी देते हैं. वे बताते हैं, ‘2012 के आरोप-पत्र में जो कॉलेज और परीक्षा कक्ष के अंदर पर्यवेक्षक या जांचकर्ता थे, परीक्षा निरीक्षक थे, उनको तो आरोपी बना दिया. लेकिन, जो वरिष्ठ आईएएस पर्यवेक्षण के लिए नियुक्त किए गए थे, उनमें से किसी को आरोपी नहीं बनाया गया. 2012 और 2013 के आरोप-पत्र में रंजना चौधरी, जो उस समय की व्यापमं अध्यक्ष थीं, उन्हें साफ छोड़ दिया गया.’

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

आनंद राय कहते हैं, ‘जो भी बड़े रसूखदार लोगो के मामले हैं, सरकार खुद उन्हें कोर्ट में हार रही है. इसको लेकर हमने भोपाल में एक प्रेस वार्ता भी की थी. सबसे बड़ी बात ये है कि हारने के बाद सरकार उन मामलों में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करती. जो साबित करता है कि सरकार की उनसे सांठ-गांठ है.’

वे बताते हैं, ‘नापतौल विभाग की सब इंस्पेक्टर की परीक्षा में आरएसएस प्रमुख के. सुदर्शन का निजी सहायक मिहिर चौधरी भी आरोपी  था. उसका केस हार गए. आगे अपील भी नहीं की गई. सुधीर भदौरिया व्यापमं में कंट्रोलर और डायरेक्टर थे, उनकी बेटी मेघना भदौरिया का पीईटी 2013 में फर्जी तरीके से चयन हुआ. सुधीर का आरएसएस और भाजपा नेता राम माधव से जुड़ाव था.

वो केस भी हार गए. एक केस था प्रीपीजी 2012 एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा का, उसमें सारे बड़े आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के बच्चे शामिल थे. वहां भी सरकार हार गई. पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का भी नाम एक एक्सेल शीट में था. राज्यपाल रामनरेश यादव का नाम भी घोटाले में शामिल था. सब बरी हो गए. इसलिए कहीं न कहीं तो सरकार मिली हुई है.’

वे आगे घोटाले पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहते हैं, ‘ईमानदार अधिकारियों का भी यहां से तबादला कर दिया जाता है. फिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बोलते हैं कि व्यापमं में उन्हें क्लीन चिट मिल गई. लेकिन, जब आप जांच ही नहीं करने दोगे, वकील भी आपकी विचारधारा वाले हैं, तो फिर सजा कैसे होगी?

सबसे बड़ी बात कि जो 634 छात्र-छात्राएं सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कॉलेजों से बाहर किए गए, उनमें से अधिकांश गरीब तबके से थे जिन्होंने जमीन गिरवी रखकर रैकेटियर्स को पैसे दिए. सभी केस सरकार के प्रतिनिधि ही लड़े. इन बच्चों को सजाएं मिलती गईं और रसूखदार बचते गए. इसलिए सजा तो होगी लेकिन किन लोगों को होगी. अलग-अलग श्रेणी के आरोपी हैं, आईएएस, आईपीएस, वकील, मंत्री इनको या गरीब बच्चे और रैकेटियर्स (मध्यस्थ) को?’

वे आगे कहते हैं, ‘शिवराज के इस्तीफे की हमारी मांग इसलिए है क्योंकि विधि विभाग उनके ही अधीन है और व्यापमं घोटाले में उनकी भूमिका पर सवालिया निशान है. उनके मंत्री इसमें शामिल हैं, पूरी सरकार शामिल है. बावजूद इसके विधि विभाग के जरिए वे खुद तय कर रहे हैं कि सीबीआई का जज कौन बनेगा? सीबीआई के ट्रायल कोर्ट का जज कौन बनेगा, विधि विभाग किस वकील को नियुक्त करेगा, उन्हें कितना पैसा देगा, एडवोकेट जनरल मध्य प्रदेश का कौन होगा, उनका प्रमोशन सब शिवराज तय कर रहे हैं.’

वे एक उदाहरण देते हुए बताते हैं, ‘पुरुषेंद्र कौरव पहले डिप्टी एडवोकेट जनरल थे. तीन साल में वे व्यापमं के कई केस हारे. इसके बावजूद वे मध्य प्रदेश के एडिशनल एडवोकेट जनरल बनाए गए. तो क्या केस हारना मैरिट है जिसके आधार पर किसी को प्रमोट किया जाए? उसको बंगला दे दिया, गाड़ी दे दी. क्यों? क्योंकि वो केस हार रहा है.’

मामले में न्याय की आस लगाए बैठे पक्षकारों का मानना है कि सीबीआई जांच के नाम पर बस कॉपी-पेस्ट कर रही है. एसटीएफ ने जो जांच रिपोर्ट तैयार की थी, उसका मिलता-जुलता ही ये तैयार कर रहे हैं.

पारस सकलेचा कुछ सीबीआई अधिकारियों से हुई उनकी बातचीत का हवाला देते हुए बताते हैं, ‘सरकार जो कारस्तानी कर रही है, वह अपनी जगह, सीबीआई के अधिकारी खुद जांच में कम रुचि दिखा रहे हैं. कुछ अधिकारियों ने बातचीत में मुझे बताया कि व्यापमं घोटाला उस स्तर का है कि हम एक नया आरोपी बनाते हैं तो साथ में पांच नाम और जुड़ जाते हैं. क्योंकि एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुड़ी ही इस तरह है. इसलिए जो चल रहा है, उसे चलने दीजिए. वरना कितनी जांच करेंगे, किन-किन की जांच करेंगे हम और कब तक जांच करेंगे हम?’

आनंद राय कहते हैं, ‘एक भी अतिरिक्त आरोपी सीबीआई ने नहीं बनाया. ऊपर से जो भी जेल में थे, सीबीआई जांच आने के बाद उन्हें भी जमानत मिल गई. एसटीएफ अच्छी जांच कर रही थी. उसके प्रमुख सुधीर शाही काफी वरिष्ठ अधिकारी थे. सीबीआई में काम करने वाले उनसे जूनियर हैं. लेकिन, शाही मुख्यमंत्री, उनके परिवार, बड़े आईएएस-आईपीएस, उमा भारती जैसे रसूखदार लोगों पर हाथ नहीं डाल पा रहे थे. राज्य का एक एडीजी स्तर का आदमी हाथ डाल भी कैसे पाता. इसलिए हमारी मजबूरी थी सीबीआई जांच की मांग करना, लेकिन अब निराशा होती है.’

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