भारत

राम मनोहर लोहिया: सच्चे लोकतंत्र की शक्ति सरकारों के उलट-पुलट में बसती है

जन्मदिन विशेष: लोहिया कहते थे कि किसी शख़्सियत का जन्मदिन मनाने या उसकी मूर्ति लगाने से, उसके निधन के 300 साल बाद तक परहेज रखना चाहिए ताकि इतिहास निरपेक्ष होकर यह फैसला कर पाए कि वह इसकी हक़दार थी या नहीं.

डॉ. राम मनोहर लोहिया. (जन्म: 23 मार्च 1910 - अवसान: 12 अक्टूबर 1967)

डॉ. राम मनोहर लोहिया. (जन्म: 23 मार्च 1910 – अवसान: 12 अक्टूबर 1967)

साल 1910 में 23 मार्च यानी आज ही के दिन उत्तर प्रदेश में फ़ैज़ाबाद ज़िले के अकबरपुर कस्बे, जो अब अंबेडकरनगर ज़िले का मुख्यालय है, में जन्मे समाजवादी चिंतक डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने ने देश की राजनीति में ग़ैर-कांग्रेसवाद की अवधारणा को जन्म दिया.

अपनी नीतियों व विचारों की ‘तात्कालिक अस्वीकार्यता’ झेलते हुए भी आने वाले समय में अपनी जनस्वीकार्यता को लेकर वह अगाध विश्वास से भरे रहते थे.

कहते भी थे, ‘लोग मेरी बात सुनेंगे, पर मेरे मरने के बाद.’ उनका यह कथन उन्हें अपना राजनीतिक आराध्य मानने वाली समाजवादी पार्टी के दफ़्तरों की दीवारों पर आज, उसके दुर्दिन में भी लिखा या कहना चाहिए टंगा मिल जाता है.

जहां तक समाजवादी पार्टी की बात है, कोई ढाई दशक पहले अस्तित्व में आने के बाद से ही वह लगातार डाॅ. लोहिया की राजनीतिक विरासत की सबसे बड़ी दावेदार बनी रही है.

लेकिन अकबरपुर में लोहिया की जन्मभूमि में, सच पूछिये तो उनके बस एक ही निर्दम्भ वारिस हुआ करते थे- उनके बचपन के साथी बंसी नाई. लंबे वक़्त तक बीमार रहने के बाद दो साल पहले बंसी नाई का भी निधन हो गया और इसके साथ ही लोहिया निपट लावारिस होकर रह गए.

प्रसंगवश, डाॅ. लोहिया की मां उन्हें जन्म देने के थोड़े ही समय बाद चल बसी थीं. उनके पीछे जिन विशालहृदया ने डाॅ. लोहिया को मातृवत स्नेह से अपना दूध पिलाकर पाला, वह इन्हीं बंसी की दादी थीं.

दादी की देखरेख में बालक बंसी और राम मनोहर साथ-साथ रहते, खेलते-कूदते व खाते-पीते थे.

अलबत्ता, बड़े होने तक दोनों की राहें एकदम अलग हो गईं लेकिन दोनों के साझा बचपन की मीठी यादें शतायु होकर इस दुनिया से गए बंसी के दिलोदिमाग में ख़ासे गहरे तक रची-बसी थीं. डाॅ. लोहिया की चर्चा चलने पर वे अत्यंत भावुक हो जाते थे.

अपने बचपन के ‘मीत’ के प्रति बंसी की श्रद्धा ऐसी थी कि बीमारी व वृद्धावस्था के बावजूद वे बिना नागा किए हर सुबह उठकर अपने शहर में लगी डाॅ. लोहिया की प्रतिमा तक जाते, स्वच्छ पानी से उसे धोते, उस पर पुष्पांजलि अर्पित करते और सामर्थ्य भर साफ़-सफ़ाई करते थे.

लेकिन उनके देहांत के बाद के दो बरसों में ही नाना प्रकार के अतिक्रमणों व अवैध क़ब्ज़ों के शिकंजे में जकड़ गई डाॅ. लोहिया की यह प्रतिमा साफ़-सफ़ाई तक की मोहताज हो चली है.

काबिल-ए-ग़ौर यह कि गुज़र-बसर का कोई ठीक-ठाक ज़रिया न होने के बावजूद बंसी ने कभी किसी से अपनी इस श्रद्धा का कोई प्रतिफल या प्रतिदान नहीं चाहा.

जब भी प्रदेश में समाजवादी पार्टी की डाॅ. लोहिया को अपना ‘राजनीतिक आराध्य’ बताने वाली सरकारें बनीं, शुभचिंतकों ने बंसी को सुझाया कि वे लपककर उनका ‘फ़ायदा’ उठा लें. पर बंसी ने कहा कि वे अपनी दादी के दूध की कीमत मांगने जाने से पहले चाहेंगे कि धरती फट जाए और वे उसमें धंस जाएं!

हां, प्रसंग के दूसरे पहलू पर जाएं तो अपनी बारी पर सत्ता के लाभों के बंदरबांट में जी-भरकर उलझी ‘समाजवादी’ सरकारों ने अपनी ओर से बंसी के जीते जी कभी भी उनकी खोज-ख़बर लेना गंवारा नहीं किया और अब जब न ‘समाजवादी’ सरकारें रह गई हैं और न ही बंसी तो लगता ही नहीं कि डाॅ. लोहिया की जन्मस्थली उसी प्रदेश का हिस्सा है जिसकी ‘समाजवादी’ व ‘आंबेडकरवादी’ सरकारों को ज़िलों, सरकारी योजनाओं व संस्थानों के नामों के बेमतलब विवादों को ‘डॉ. राम मनोहर लोहिया बनाम डाॅ. भीमराव आंबेडकर’ का रूप देने और उनके बहाने अपनी ‘भक्ति’ प्रदर्शित करने की पुरानी आदत रही है.

विडंबना यह कि अब वे सरकारें अस्तित्व में ही नहीं हैं और जिस सरकार ने उनकी जगह ली है, उसकी पेशानी पर इस तथ्य से कोई बल ही नहीं पड़ता कि डाॅ. लोहिया की जन्मभूमि में उनकी यादें संजोने का फिलहाल कोई एक भी उपक्रम नहीं है. वहां करोड़ों की लागत से लोहिया से जुड़े शोधों के लिए जो लोहिया संस्थान बना है, वह भी निष्प्रयोज्य पड़ा हुआ है.

एक समय जॉर्ज फर्नांडीज़ चाहते थे कि अकबरपुर को ‘लोहिया धाम’ नाम से ज़िला बनाया जाए. उन्होंने अपने तईं इसके लिए कुछ प्रयत्न भी किए थे. पर बात बनी नहीं और सपा-बसपा के झगड़े में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने 29 सितंबर, 1995 को इसे डाॅ. आंबेडकर के नाम से ज़िला बना दिया.

तब उनके क़दम का व्यापक विरोध हुआ था. पर तब से अब तक अकबरपुर में बहने वाली तमसा नदी में इतना पानी बह चुका है कि कोई भी ज़िले के नाम से आंबेडकर का नाम हटाने या लोहिया का नाम लगाने की बात नहीं करता.

लेकिन दुर्भाग्य यह कि जहां डाॅ. लोहिया की स्मृतियां बची हुई हैं, वे आगे भी बची रहें, इसके लिए उनके संरक्षण की कोई योजना भी न सरकार के पास है, न ही इस हेतु कोई जनपहल दिखती है.

डाॅ. लोहिया की जो प्रतिमा 26 अक्टूबर, 1991 को उनके अनुयायियों के बड़े संघर्षों के बाद लगी थी, उसे अतिक्रमणों से और जिस घर में लोहिया का जन्म हुआ था, उसे अवैध क़ब्ज़ेदारों से बचाने जैसे छोटे-मोटे काम भी नहीं हो रहे.

एक समय इस अंचल के लिखने-पढ़ने वालों में अकबरपुर नगरपालिका परिषद द्वारा संचालित डाॅ. लोहिया पुस्तकालय व वाचनालय का जलवा हुआ करता था, लेकिन अब उसका कोई पुरसाहाल नहीं है.

अंग्रेज़ी हटाना और हिंदी लाना रहा होगा कभी डाॅ. लोहिया के एजेंडे में सबसे ऊपर, फ़ैज़ाबाद में जिस अवध विश्वविद्यालय से उनका नाम जुड़ा हुआ है, उसमें न भाषाओं का विभाग है और न ही डाॅ. लोहिया के अकादमिक कामों को आगे बढ़ाने का कोई उपक्रम होता है. उसमें श्रीराम शोध पीठ तो है लेकिन डाॅ. लोहिया के नाम की कोई पीठ नहीं है.

डाॅ. लोहिया प्रायः कहा करते थे कि सच्चे लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीवनीशक्ति सरकारों के उलट-पलट में बसती है, लेकिन चुनावी मुक़ाबलों में प्रत्याशियों की हार-जीत को उन्होंने कभी भी ज़्यादा महत्व नहीं दिया.

उनका मानना था कि चुनाव, प्रत्याशियों की हार-जीत से कहीं आगे, पार्टियों द्वारा अपनी नीतियों व सिद्धांतों को जनता के बीच ले जाने के सुनहरे अवसर होते हैं.

इतिहास गवाह है कि 1962 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को चुनौती देने के लिए उनके निर्वाचन क्षेत्र फूलपुर से वे ख़ुद प्रत्याशी बने तो इस सुनहरे अवसर का भरपूर इस्तेमाल किया. लेकिन उनकी यह मान्यता अब उनके विरोधियों को हीं नहीं उनके अनुयायियों को भी रास नहीं आती.

उन अनुयायियों को तो और भी नहीं, जो बदलाव की बात करते-करते यथास्थिति के पैरोकार बन गए हैं, जनसंघर्षों का रास्ता छोड़ अवसरवादी राजनीति में रम गए हैं और ‘सुरक्षित’ सीटों से टिकट पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

अकबरपुर में डाॅ. लोहिया के एक अभिन्न सहयोगी थे, चौधरी सिब्ते मोहम्मद नक़वी. मई, 1963 में फ़र्रुखाबाद के कांग्रेस सांसद मूलचंद के निधन के बाद उस सीट के लिए उपचुनाव घोषित हुआ था.

तब आम चुनाव में पं. नेहरू से हारकर लोकसभा पहुंचने से रह गए डाॅ. लोहिया अपने उन समर्थकों के दबाव में एक बार फिर चुनाव मैदान में उतरे, जिनके अनुसार देश की जटिल होती जा रही स्थिति के मद्देनज़र उनका संसद में होना ज़रूरी था.

वे सिब्ते को प्रचार कार्य में मदद के लिए अकबरपुर से फर्रुखाबाद ले जा रहे थे तो रास्ते में पार्टी के किसी साथी ने कह दिया कि सिब्ते भाई के चलते मुसलमानों के वोट हमें आसानी से मिल जाएंगे.

इतना सुनना था कि डाॅ. लोहिया ने मोटर रुकवाकर सिब्ते को उतारा और अकबरपुर लौट जाने को कह दिया. साथियों से बोले, ‘जो भी वोट मिलने हैं, हमारी नीतियों व सिद्धांतों के आधार पर मिलें तो ठीक. किसी कार्यकर्ता के धर्म, संप्रदाय या जाति के नाते मिले तो क्या मिले! इस तरह वोट बढ़ाकर जीतने से बेहतर होगा कि मैं फूलपुर की तरह यह मुक़ाबला भी हार जाऊं.’

सिब्ते और साथियों ने बहुत बार कहा कहा कि इस बाबत वे एक बार फिर सोच लें, लेकिन वे अडिग रहे और सिब्ते को लौट जाना पड़ा.

मुलायम ने अपने मुख्यमंत्री काल में मायावती के आंबेडकर पार्क की तर्ज पर लखनऊ में लोहिया पार्क का निर्माण शुरू कराया तो इन्हीं सिब्ते ने उनको कड़ा पत्र लिखकर पूछा था कि तुम लोहिया का क़द उनके नाम पर बने पार्कों और मूर्तियों से क्यों तय करना चाहते हो? डाॅ. लोहिया इसके मोहताज नहीं हैं. उनको याद ही करना हो तो अच्छे कामों से याद करो, उनके रास्ते पर चलकर, उनके सपनों की सरकार चलाकर. तब मुलायम ने उनको जवाब देना भी ठीक नहीं समझा था.

ठीक तो ख़ैर उन्होंने डाॅ. लोहिया की उस बात को याद रखना भी नहीं ही समझा, जो उन्होंने अपने जन्मदिन की बाबत कही थी, ‘23 मार्च मेरे जन्मदिवस से ज़्यादा भगत सिंह का शहादत दिवस है और इसे उनका शहादत दिवस ही रहना चाहिए.’

वे व्यक्तिगत रूप से भी अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे. कहते थे कि किसी शख़्सियत का जन्मदिन मनाने या उसकी मूर्तियां लगाने से उसके निधन के बाद के 300 साल तक परहेज रखना चाहिए. इतिहास को निरपेक्ष होकर यह फैसला करने के लिए कि शख़्सियत इसकी हक़दार थी या नहीं, इतना समय ज़रूर देना चाहिए.

लेकिन आज उनकी विरासत की सबसे बड़ी दावेदार समाजवादी पार्टी में उसके सुप्रीमो व संरक्षक का जन्मदिन राजसी ठाठ से मनाया जाता है, डाॅ. लोहिया का कर्मकांड की तरह और भगत सिंह का शहादत दिवस मनाया ही नहीं जाता!

विडंबना यह कि लोहिया अपनी जन्मभूमि में अकबरपुर की ही तरह कर्मभूमि फर्रुखाबाद व कन्नौज में भी कुछ कम लावारिस नहीं हैं. उनकी राजनीतिक सक्रियता से पहले फर्रुखाबाद की पहचान ‘खुला खेल फर्रुखाबादी’ जैसी कहावतों से होती थी, इतिहास बना चुके ठगों से अथवा उन आलुओं से, जिनके बारे में वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने कभी ‘जनसत्ता’ के अपने चर्चित स्तंभ ‘कागद कारे’ में लिखा था कि जैसा आलू फर्रुखाबाद में होता है, पहाड़ियों में तो नहीं ही होता, यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के किसी और देश में भी नहीं. एक जैसा बीज और एक जैसी खाद देने पर भी नहीं.

1954 में सात गुना कर दिए गए आबपाशी कर को किसानों पर भारी ज़ुल्म बताकर लोहिया ने वहां ऐतिहासिक नहर-रेट आंदोलन शुरू किया और पीड़ित किसानों को अपने अधिकारों के लिए मरने की हद तक जाने की सलाह दी तो वह एक तरह से फर्रुखाबाद के राजनीतिक प्रशिक्षण और उसकी पहचान बदलने की भी शुरुआत थी.

चार जुलाई, 1954 को फर्रुखाबाद व कायमगंज में ताबड़तोड़ दो सभाओं के बाद वे भोजन कर रहे थे तो अचानक पुलिस द्वारा उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. फिर तो वहां उनके पक्ष में ऐसा जनसमर्थन उमड़ा कि सिविल नाफ़रमानी जैसे हालात पैदा हो गए.

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को यह कहकर उनकी आलोचना करनी पड़ी कि आज़ाद देश में ऐसी सिविल नाफ़रमानी की क्या ज़रूरत?

1963 में हुए उपचुनाव में इसी फर्रुखाबाद ने डाॅ. लोहिया को पहली बार लोकसभा में प्रवेश दिलाकर ‘तीन आना बनाम…’ वाली प्रसिद्ध बहस में उन्हें इस ‘रहस्योद्घाटन’ का मौका दिया कि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि देश के लोग साढ़े तीन या चार आने रोज़ पर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं जबकि फ़रेबी प्रधानमंत्री इस संबंध में पंद्रह आने की बात कर रहे हैं!

लेकिन अब जातीय गोलबंदियों में फंसा फर्रुखाबाद अपने आलू किसानों की दुर्दशा के ख़िलाफ़ भी ठीक से मुंह नहीं खोल पाता. फर्रुखाबाद में यह याद करने वाले भी कम ही हैं कि एक समय डाॅ. लोहिया ने यहां ‘जाति तोड़ो’ आंदोलन भी चलाया था और उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि जातीय गोलबंदियों को हराकर ही दी जा सकती है.

दूसरी ओर जिस कन्नौज ने 1967 में उनको चुना और 12 अक्टूबर, 1967 को अंतिम सांस लेते वक़्त वे लोकसभा में जिसके प्रतिनिधि थे, उसका हाल भी फर्रुखाबाद से अलग नहीं है.

उसके सांसदों के देखते-देखते इस इत्र-नगरी (कन्नौज) का सुगंध उद्योग अपना वैभव खोता जा रहा है, जबकि यह उद्योग वहां सम्राट हर्षवर्धन के समय से होता रहा है और इसके साक्षी महज़ वैदिक आख्यान अथवा बौद्ध ग्रंथ ही नहीं, कई महाकाव्य और पुरावशेष भी हैं.

अब कन्नौज की संदल मिलों में से ज़्यादातर बंद हो गई हैं और बाकी भी बंद होने के कगार पर हैं और इत्र के जिस कारोबार को कभी कला का दर्जा प्राप्त था, उस पर दोहरा संकट है.

कच्चा माल, ख़ास तौर पर चंदन की लकड़ी, महंगी होती जा रही है और बाज़ार सिंथेटिक सुगंधों से भरता जा रहा है. दूसरी ओर इत्र की महंगी प्राकृतिक सुगंध अपने घटते क़द्रदानों की कठिन परीक्षा लेती लगती है.

चंदन की लकड़ी के लिए इत्र कारोबारी मुख्यतया तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल पर निर्भर हैं, जहां सरकारें उसकी वार्षिक नीलामी कराती हैं.

इत्र के कारोबारियों ने कई बार आवाज़ उठाई कि इस लकड़ी की छमाही या तिमाही नीलामी की व्यवस्था कराकर उस पर लगने वाली एक्साइज़ ड्यूटी घटा दी जाए, लेकिन किसी ने भी उनकी नहीं सुनी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

Comments