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क्या आधुनिक शिक्षा के पैरोकार सर सैयद अहमद ख़ान औरतों की तालीम के ख़िलाफ़ थे?

सर सैयद का मानना था कि जब मर्द लायक़ हो जाते हैं, तब औरतें भी लायक़ हो जाती हैं. जब तक मर्द लायक़ न हों, औरतें भी लायक़ नहीं हो सकतीं. यही सबब है कि हम कुछ औरतों की तालीम का ख़्याल नहीं करते हैं.

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लड़कों के लिए पश्चिमी उच्च शिक्षा की हिमायत करने वाले सर सैयद अहमद ख़ान लड़कियों की तालीम के विरोधी थे. धर्म की तथाकथित जानकारी और पर्दे को लड़कियों का गहना समझते थे. इस तरह की तालीम देने के लिए ‘ज़नाना मकतब’ की स्थापना के प्रस्ताव को मंज़ूर किए जाने में सर सैयद ने किसी तरह का एतराज़ ज़ाहिर नहीं किया.

उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के जिन तरीक़ों की चर्चा की है, उसका रिवाज उनके ख़ानदान में भी था, सर सैयद के इस महिला विरोधी विचारों का अध्ययन दिलचस्प है कि इस में तीन तरह की औरतों का ज़िक्र किया गया है जो सीने-पिरोने से लेकर ख़ाना-दारी के कामों को सीखने में महारत हासिल करती थीं.

उन्हें ऐसी चीज़ें पढ़ाई जाती थी जो औरतों के लिए ‘ज़रूरी’ है, और तो और उनकी निगरानी भी की जाती थी. सर सैयद जुमे के दिन का ज़िक्र दिलचस्पी के साथ करते हैं जब लड़कियां मिलकर अलग-अलग तरह के पकवान बनाती थीं, इसमें कभी-कभी भाईयों को बुलाकर खाना खिलाने का रिवाज भी था.

लड़कियों की इस तरह की तालीम की चर्चा सर सैयद ने मोहम्मडन एजुकेशनल कांग्रेस के तीसरे वार्षिक अधिवेशन (लाहौर) में किया था. लड़कियों की कुल तालीम दीनियात (धर्म की शिक्षा) और अपनी तरह से सभ्य बनाए जाने की परंपरा पर आधारित थी.

कहा जा सकता है कि बुनियादी तौर पर उन्हें अच्छी बीवी बनने का पाठ पढ़ाया जाता था. महत्वपूर्ण बात ये है कि लड़कियों की तालीम के ये तरीक़े मुसलमानों के उच्च वर्ग के लिए थे, पसमांदा और पिछड़ों की तालीम के किसी तरीक़े का ज़िक्र सर सैयद ने नहीं किया जिन्हें वो ‘बद-ज़ात’ और जुलाहा कहा करते थे.

वो लड़कियों को ऐसी तालीम देना चाहते थे जिससे मर्द आसानी से उन पर हुकूमत कर सकें. लड़कियों की तालीम का उम्दा तरीक़ा उनकी नज़र में वो था जिससे ‘लड़कियों के दिल में नेकी और ख़ुदा-तरसी(अल्लाह का डर), रहम और मोहब्बत और अख़लाक़’ पैदा हो. उनके विचार में;

यही तालीम उनके दीन और दुनिया दोनों की भलाई के लिए काफ़ी थी और अब भी यही तालीम काफ़ी है. मैं नहीं समझता कि औरतों को अफ़्रीक़ा और अमरीका का भूगोल सिखाने और अलजेब्रा और त्रिकोणमिति के क़वाइद बताने और अहमद शाह और मुहम्मद शाह और मरहट्टों और देहलियों की लड़ाईयों के क़िस्से पढ़ाने से क्या नतीजा है. (पेज: 65-66, ख़ुतबात-ए-सर सैयद :जिल्द दोम)

सर सैयद के अनुसार,

‘औरतों की तालीम, नेक अख़लाक़,नेक ख़सलत(अच्छी आदत), ख़ाना-दारी के उमूर (घर के काम), बुज़ुर्गों का अदब, पति की मोहब्बत, बच्चों की परवरिश, धर्म का जानना होनी चाहिए. इस का मैं हामी हूं , इसके सिवा और किसी तालीम से बेज़ार हूं.’ (पेज: 279-280, ख़ुतबात-ए-सर सैयद :जिल्द दोम)

सर सैयद अपने तमाम ख़्यालात में खुल कर लड़कियों की तालीम की मुख़ालिफ़त करते नज़र आते हैं. उनकी नज़र में औरतों को ऐसी तालीम की ज़रूरत क़तई नहीं थी जिनसे उन्हें अपने इंसान होने का ज़रा सा भी एहसास हो. सर सैयद दरअसल लड़कों की तालीम के ज़रिए लड़कियों की तालीम का ग़ायबाना इंतिज़ाम कर रहे थे. वे कहते हैं,

‘हमारा मंशा यही है कि ये तालीम जो हम दिला रहे हैं, लड़कों की नहीं है बल्कि लड़कियों की है जिनके वो बाप होंगे.’ (पेज : 223,ख़ुतबात-ए-सर सैयद :जिल्द दोम)

‘जब मर्द लायक़ हो जाते हैं, औरतें भी लायक़ हो जाती हैं. जब तक मर्द लायक़ न हों औरतें भी लायक़ नहीं हो सकतीं. यही सबब है कि हम कुछ औरतों की तालीम का ख़्याल नहीं करते हैं.’ (पेज : 224)

मेरे ख़्याल में तो सर सैयद साहब उल्टी बात कह गए हैं, औरत पढ़ी लिखी होती है तो बच्चे की परवरिश बेहतर तरीक़े से होती है. ख़ुद सर सैयद ने अपनी माता से ‘गुलिस्तान’ के कुछ सबक़ पढ़ने का ज़िक्र किया है.

वो मर्द को औरत का ख़ुदा समझते हैं?  शायद यही वजह है कि औरत की तालीम मर्द के माध्यम से करवाना चाहते हैं. इस हवाले से कहते हैं कि ‘ख़ुदा की बरकत ज़मीन से नहीं आती बल्कि आसमान से उतरती है. सूरज की रौशनी भी नीचे से नहीं आती बल्कि ऊपर से आती है. इसी तरह मर्दों की तालीम से औरतों की तालीम होती है.’ (पेज : 224)

गोया मर्द औरत का ख़ुदा है, उसका सूरज है ? उनके इस तरह के ख़्यालात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनकी नज़र में ‘तरक़्क़ी पसंदी’ के क्या अर्थ थे.

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एएमयू कैंपस (फोटो साभार: ट्विटर)

उनका तालीमी प्लान औपनिवेशिक विचार से ज़्यादा अलग नहीं, औपनिवेशिकों ने ख़ुद को हिंदुस्तानियों के सामने उच्च  शिक्षा की मिसाल के तौर पर पेश किया था, सर सैयद ने मर्दों को औरतों के सामने इसी तरह रखा.

‘मेरी राय में औरतों की तालीम का माध्यम मर्द ही होंगे.’ (पेज : 224)

औरतों की तालीम का वाहिद ज़रिया उनकी नज़र में मर्द थे, और तो और वो उसे प्रकृति का नियम क़रार देते हैं. अब ये कहने की ज़रूरत शायद नहीं रह जाती कि सर सैयद का शुमार भी उन्हीं लोगों में होता है जो औरत को मर्द की मुट्ठी में देखना पसंद करते हैं.

ऐसा नहीं है कि उनके ख़्यालात बाद में बदल गए, उन्होंने जो बातें 1888 में लाहौर में कही थीं, 6 साल बाद अलीगढ़ में भी इसी तरह के ख़्यालात का इज़हार करते हैं बल्कि उसे ‘क़ानून-ए-क़ुदरत की मुवाफ़िक़त’ यानी प्रकृति के नियम से जोड़कर अपनी बात में ज़्यादा असर पैदा करने की कोशिश करते हैं.

ये वही कोशिश है जो ब्रिटिशों ने हिंदुस्तानियों के साथ की थी, ख़ुद को कुदरती तौर पर हाकिम और हिंदुस्तानियों को ग़ुलाम बताकर अपनी हुकूमत मज़बूत की थी.

काबिल-ए-तवज्जो बात ये है कि वो औरत के ‘दूजे’ होने का एहसास बार-बार कराते हैं, गोया हव्वा की बेटियों का वजूद आदम की वजह से है. एक तरफ़ जहां वो अंग्रेज़ी तालीम हासिल करने को वक़्त की ज़रूरत कहते हुए अहमियत देते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ लड़कियों को इस से महरूम रखना चाहते हैं.

बज़ाहिर इस की कोई वजह दिखाई नहीं देती कि इतना पढ़ा-लिखा इंसान, वक़्त और ज़माने के लिहाज़ से चलने वाला लड़कियों की तालीम को नज़र-अंदाज क्यों कर देता है. न सिर्फ नज़र-अंदाज़ करता है बल्कि उस की मुख़ालिफ़त भी करता है:

इस में कुछ शक नहीं कि लड़कियों की तालीम के लिए आम स्कूल के बनाने को ,जहां कि आम लड़कियां बिला-लिहाज़ उसके कि किस क़ौम-ओ-ख़ानदान की हैं , चादर या बुर्क़ा ओढ़ कर या डोली में बिठा कर भेजी जावें , मैं  पसंद नहीं करता. (पेज : 279)

इस से एक बात और साफ़ हो जाती है कि सर सैयद हुसूल-ए-तालीम के तहत जो भी ख़िदमात अंजाम दे रहे थे , इस में मुसलामानों का उच्च वर्ग ही उनकी तवज्जो का मर्कज़ था. मुख़्तलिफ़ क़ौम-ओ-ख़ानदान की लड़कियां एक साथ जमा हों, वो उस के सख़्त ख़िलाफ़ नज़र आते हैं.

ये कहना दुरुस्त होगा कि सर सैयद पितृसत्ता में बुरी तरह जकड़े हुए थे और औरतों को मर्द के नीचे  देखना पसंद करते थे. अपनी एक तक़रीर में उन्होंने साफ़ किया कि वो तालीम-ए-निस्वां के मुख़ालिफ़ नहीं हैं बल्कि उनके लिए इस तरह की तालीम का तसव्वुर रखते हैं जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया.

मेरी नज़र में इस तरह की तालीम का तसव्वुर ही ‘औरत के पैदा होने से ज़्यादा औरत के बनाए जाने’ का ज़िम्मेदार है, जिसका ज़िक्र ‘द सेकंड सेक्स’ में किया गया है कि औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है.

इससे हमें जानने में आसानी होती है कि हमारे मुल्क के तथाकथित ‘तरक़्क़ी-याफ़्ता’ लोग अपनी सोच और ज़हनियत में कितने तरक़्क़ी-याफ़्ता थे. सदियों बाद आज भी औरत की हालत में बदलाव नहीं आया तो इसकी वजह कहीं न कहीं मर्दों की यही ज़ेहनियत है.

अफ़सोस की बात तो ये है कि इस में पढ़े-लिखे मर्दों ने अहम रोल अदा किया है. सर सैयद के विचारों को यहां रखने का उद्देश्य यही है कि मर्दों की सोच का न सिर्फ़ मूल्यांकन किया जाए बल्कि सर सैयद जैसे लोगों की ज़रूरत से इनकार करते हुए उनके लिटरेचर को जला दिया जाए, तभी औरतों को इस समाज में अपना हक़ मिलेगा.

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