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सरकार! दलितों में अंदेशे तो आपने ही पैदा किए

दलितों का ग़ुस्सा इस बिना पर है कि वे समझते हैं कि लंबे संघर्ष के बाद उन्हें जो संवैधानिक व क़ानूनी अधिकार मिले हैं, सत्तारूढ़ भाजपा व उसका मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें छीनना चाहते हैं.

Ghaziabad: A bike set on fire by a group of protesters during 'Bharat Bandh' call given by Dalit organisations against the alleged dilution of Scheduled Castes / Scheduled Tribes Act, in Ghaziabad on Monday. PTI Photo (PTI4_2_2018_000026B)

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एससी/एसटी एक्ट को कमज़ोर करने के ख़िलाफ़ सोमवार को बुलाए गए भारत बंद के दौरान कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया. (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1989 में बनाए गए अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान को नरम कर देने के खिलाफ ‘भारतबंद’ के रूप में दलितों की जो नाराजगी फूटी है और जिसमें हुई हिंसा में एक दर्जन से ज्यादा लोगों को जानें गंवानी पड़ी हैं, केंद्र सरकार उसका सारा जिम्मा सुप्रीम कोर्ट पर डालकर किनारे नहीं खड़ी हो सकती क्योंकि यह सारा बखेड़ा दलितों व वंचितों के अधिकारों की सुरक्षा के संबंध में उसके द्वारा रणनीति के तौर पर ‘बुद्धिमत्तापूर्वक’ अपनाई गई उदासीनता ने ही पैदा किया है.

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती समेत कई वरिष्ठ दलित नेता यूं ही नहीं कह रहे कि दलितों का गुस्सा इस बिना पर है कि वे समझते हैं कि लंबे संघर्ष के बाद उन्हें जो संवैधानिक व कानूनी अधिकार मिले हैं, सत्तारूढ़ भाजपा व उसका मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें जैसे भी बने छीनना चाहते हैं.

उनकी यह बात इस तथ्य से प्रमाणित होती है कि सुप्रीम कोर्ट ने दस दिन पहले उक्त कानून के तहत आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी के बजाय मामले की जांच और अग्रिम जमानत का प्रावधान किया, तो नरेंद्र मोदी सरकार ने यूं जताया कि जैसे कोई खास बात हुई ही नहीं.

उसका यह रवैया तब था, जब न सिर्फ दलित संगठन बल्कि भाजपा व उसके सहयोगी दलों के दलित सांसद और मंत्री भी इसको लेकर गंभीर निराशा और असहमति प्रदर्शित कर रहे थे.

सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग करते हुए वे पूछ रहे थे कि सरकार की निगाह में किसकी कानूनी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है-दलितों की या उनकी जो शिकायत करते हैं कि इस कानून की मार्फत उन्हें नाहक सताया जाता है.

यहां समझना चाहिए कि बाद में पानी सिर से ऊपर होता देख मोदी सरकार ने जो पुनर्विचार याचिका दायर की और जिस पर सुनवाई में दलितों को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल कोई राहत दिलाने में विफल रही, उसकी जरूरत ही नहीं पड़ती अगर उसने शुरू से ही राजनीतिक काइयांपन प्रदर्शित करने के बजाय मसले को ईमानदारी पूर्वक गंभीरता से लिया होता.

आखिरकार न्यायालय के विवादित फैसले से पहले अटार्नी जनरल को किसने रोक रखा था कि वेे सरकार का पक्ष रखते हुए वे बातें न कहें, जो अब पुनर्विचार याचिका में कह रहे हैं? वे कहते तो दलित संगठनों को भी अपनी ओर से तत्काल सुनवाई की वह याचना भी नहीं करनी पड़ती, जिसे न्यायालय ने नहीं माना.

इस सबसे उद्वेलित दलित संगठनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान किया तो भी सरकार ने उनसे संवाद की राह नहीं चुनी. उलटे उसके सवर्ण मानसिकता के हिमायती बंद को बेवजह का राजनीतिक स्टंट ठहराने पर उतर आये.

उनकी मानें तो चूंकि न्यायालय ने अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए उसमें यह बदलाव किया था, इसलिए उस पर सवाल नहीं उठाये जा सकते.

आगे, दलितों द्वारा ‘देश की सबसे बड़ी अदालत के फरमान’ के विरोध की अंधनिन्दा की रौ में उन्हें यह याद रखना भी गवारा नहीं हुआ कि अभी ‘पद्मावत’ की रिलीज के विवाद में करणी सेना ने न्यायालय के आदेशों का कैसा ‘सम्मान’ किया था!

प्रसंगवश, यह करणी सेना ‘भारत बंद’ के दौरान राजस्थान के बाड़मेर में दलितों के प्रदर्शन के खिलाफ सड़क पर उतर आई और टकराव पर अमादा हो गई. राजस्थान सरकार को इसका पहले से अंदेशा था, फिर भी उसने ऐसे इंतजाम नहीं किए कि दलित शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज करा लें.

दलितों का आरोप है कि उसने जानबूझकर अराजकता की स्थिति निर्मित होने दी, ताकि उसे लेकर दलितों को आरोपित किया जा सके.

कोढ़ में खाज यह कि ‘भारत बंद’ के पहले से जारी ऐसी परस्पर अविश्वास बढ़ाने और उस भरोसे को, दलितों से जिसे हासिल करने की सरकार की ओर से औपचारिक कोशिशें भी नहीं की गईं और तोड़ने की कुछ शक्तियों की सक्रियताओं के बीच मोदी सरकार ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटा मेरे बाबा का’ की राह पर चलती रही. ऐसे में उसकी प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठने ही थे.

वे उठे और ‘भारत बंद’ के इतर इस सवाल तक जा पहुंचे कि अभी कुछ महीने पहले जब केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने कहा था कि उनकी पार्टी संविधान बदलने के लिए सत्ता में आई है, तो भाजपा ने सिर्फ उनके कथन से खुद को अलग करके ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों कर ली थी? उन्हें मंत्री पद से क्यों नहीं हटाया था?

कर्नाटक के नाराज दलितों ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से यह सवाल पूछा तो वे कोई जवाब नहीं दे सके. शायद इसीलिए इधर उत्तर प्रदेश में बहराइच की भाजपा की दलित सांसद सावित्री बाई फुले को भी ‘संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ’ रैली की जरूरत महसूस हुई, ताकि बाबा साहेब आंबेडकर के नाम में ‘राम जी’ जोड़नेे और उनकी मूर्तियों के साथ तोड़-फोड़ की घटनाओं का सार्थक विरोध कर सकें.

बहरहाल, दलितों में बढ़ती असुरक्षा सुप्रीम कोर्ट के संदर्भित फैसले से नहीं शुरू होती. वह नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके गृहराज्य से लेकर समूचे देश में दिन प्रतिदिन बढ़ती गई है क्योंकि न सिर्फ ‘मनुस्मृति’ द्वारा शासित हिंदू राज का अभिलाषी उसका पितृ संगठन बल्कि सहयोगियों का एक बड़ा तबका भी दलितों को बराबरी के अधिकारों का विरोधी है.

Jodhpur: Members of Dalit community and Bhim Sena stage a protest during 'Bharat Bandh' against the alleged 'dilution' of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes Act by Supreme court, in Jodhpur on Monday. PTI Photo(PTI4_2_2018_000047B)

राजस्थान के जोधपुर में एससी/एसटी एक्ट को कमज़ोर करने के ख़िलाफ़ सोमवार को बुलाए गए भारत बंद के दौरान प्रदर्शन करते लोग. (फोटो: पीटीआई)

आम लोग आंध्र प्रदेश में रोहित बेमुला की बहुचर्चित आत्महत्या के साथ गुजरात के बहुचर्चित ऊना कांड को अभी भूले भी नहीं हैं कि उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित युवक को अपनी बरात के रास्ते के लिए गुहार लगानी पड़ी है.

अपने गांव के सवर्णों की इस जिद के खिलाफ कि जो रास्ता दलितों की बरातों के लिए इस्तेमाल होता है, उसकी बरात उसी से जानी चाहिए.

गुजरात में पिछले साल मूंछे रखने पर दलितों पर जानलेवा हमले हुए और अभी हाल में भावनगर में एक दलित युवक को इसलिए मार दिया गया कि उसने घुड़सवारी का शौक पूरा करने के लिए घोड़ा खरीदा और तमाम धमकियों के बावजूद उस पर बैठकर घूमता रहा.

सवाल है कि क्या ऐसी दयनीय स्थिति में होने के बावजूद दलित किसी कानून का दुरुपयोग करने की स्थिति में हो सकते हैं? हम जानते हैं कि कानून का फायदा हमेशा उन्हीं शक्तियों को मिलता है जो उसका मनोनुकूल अनुपालन कराने की स्थिति में हों.

दलित अभी इतने सक्षम नहीं हैं, इसलिए उनके उत्पीड़न के मामले या तो दर्ज ही नहीं होते या फिर अंजाम तक नहीं पहुंच पाते. ये दोनों ही काम राज्य की मशीनरी के हैं और उसे इसे सम्पादित करने में विफलता की जिम्मेदारी स्वीकारनी चाहिए.

लेकिन गिनती के मामलों में ‘सम्पन्न’ दलितों ने इस कानून का दुरुपयोग भी किया भी हो तो क्या उसकी आड़ में उसके प्रावधान नरम कर सारे दलितों की सुरक्षा दांव पर लगाई जा सकती है, सो भी जब वह कानून एक साथ उनकी ढाल भी हो और आश्वासन भी?

इसका जवाब वैसे ही ‘नहीं’ में देना होगा जैसे इसका कि क्या किसी भी कानून को इतना निरंकुश होना चाहिए कि उसके तहत दर्ज झूठे मामलों में भी जमानत न दी जा सके?

दुर्भाग्य से इधर हम लगातार देख रहे हैं कि छात्र हों, किसान, नियुक्तियों में धांधली से त्रस्त बेरोजगार, नौजवान, परीक्षाओं में पेपर लीक के खिलाफ आंदोलित परीक्षार्थी या दलित, जो भी समुदाय अपनी मांगों के साथ सड़क पर उतरता और सरकार को उसके कर्तव्य याद दिलाता है, उसके खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि जैसे इस निजाम में किसी को भी अपनी आवाज उठाने का हक नहीं है. इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे देश का लोकतंत्र प्रश्नांकित होता है.

आगे देश में ‘सबका साथ और सबका विकास’ की वास्तविक परिस्थितियां बनें और बात सबसे सौमनस्य और सबके सम्मान तक पहुंचे तो असुविधाजनक स्वरों को प्रश्नांकित करने के बजाय उनसे संवाद शुरू करना और उनके गुस्से को समझना होगा-यथासंभव अतिशीघ्र. सरकार इस काम में जितना विलंब करेगी, जटिलताएं और समस्याएं उतनी ही बढ़ती जाएंगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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