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गुरु नानक पर बनी फिल्म ‘नानक शाह फकीर’ का सिख संगठन विरोध क्यों कर रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सिख संगठनों द्वारा जताई जा रही आपत्ति की वजह से किसी भी सिनेमाघर में फिल्म रिलीज़ नहीं हो सकी है. अकाल तख़्त ने निर्देशक हरिंदर सिंह सिक्का को सिख कौम से बाहर कर देने का आदेश दिया है.

(फोटो साभार: फेसबुक)

फिल्म नानक शाह फकीर का पोस्टर और निर्देशक हरिंदर सिंह सिक्का. (फोटो साभार: फेसबुक/Hello NRI)

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत का विवाद किसी तरह ख़त्म हुआ था कि फिल्म से जुड़ा एक नया विवाद सामने है. यह विवाद गुरु नानक के जीवन पर बनी फिल्म नानक शाह फकीर को लेकर है.

यह फिल्म 2014 में ही बनकर तैयार हो गई थी. इसे पहली बार कान्स फिल्म समारोह में 2014 को प्रदर्शित किया गया था. इस फिल्म को U/A सर्टिफिकेट दिया गया था. इसके बाद 16 अप्रैल 2015 को यह भारत के सिनेमाघरों में रिलीज़ कर दी गई थी.

तभी फिल्म पर विवाद हो गया था. सिख संगठनों इस फिल्म के विरोध में सड़कों पर और सिनेमाघरों के बाहर प्रदर्शन किए. प्रदर्शनों की उग्रता और दर्शकों की सुरक्षा के देखते हुए सिनेमाघरों के मालिकों ने यह फिल्म चलानी बंद कर दी.

दूसरी ओर फिल्म के निर्माता हरिंदर सिंह सिक्का ने सिख संगठनों से संपर्क किया. क्या चर्चा हुई. यह तो पता नहीं चला. बाद में हुआ यह कि फिल्म के निर्माता पूर्व नौसेना अधिकारी हरिंदर सिंह सिक्का ने यह फिल्म ख़ुद ही सिनेमाघरों से वापस ले ली.

अब यह फिल्म फिर से 13 अप्रैल 2018 को पूरे भारत में प्रदर्शन के लिए तैयार थी तो सिख संगठन फिर विरोध में सामने हैं. इस बार अकाल तख़्त के जत्तेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने सबसे अपील की है वे इस फिल्म का शांतिपूर्ण विरोध करें.

अकाल तख़्त का हुक्म है, इसलिए पंजाब के शहरों में इस फिल्म का जगह-जगह विरोध शुरू हो गया है.

पिछली बार फिल्म का विरोध होने पर फिल्म के निर्माता हरिंदर सिंह सिक्का सिख संगत और आम लोगों के लिए खुला पत्र लिखा था जिसे उस समय समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया था.

इसमें उसने विनम्रता से बतलाया था कि उन्होंने यह फिल्म गुरु जी के जीवन और सिख धर्म की आदर्शों को दुनिया को दिखलाने के लिए बनाई है. गुरु नानक और उनके परिवार के सदस्यों को भी बहुत संयत रूप में दिखलाया गया है. यहां तक कि गुरु नानक के पिता की उग्रता को भी कम कर दिया गया है. उन्होंने बतलाया कि उनका लक्ष्य फिल्म बना कर पैसा कमाना नहीं है. वह फिल्म से होने वाली आय को स्वयं के लिए इस्तेमाल नहीं करेगा.

आज फिल्म के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों का जो कारण बतलाया जा रहा है वह यह है कि फिल्म में गुरु नानक को दिखलाया गया है. फिल्म के विरोधियों के अनुसार सिख परंपरा में गुरु महाराज के चित्र नहीं बनाए जा सकते हैं. वे दिव्य पुरुष थे. सिख चित्र बनाकर उसकी पूजा उपासना के ख़िलाफ़ हैं.

इसके उत्तर में फिल्म के निर्माता का कहना है कि फिल्म में गुरु नानक का अभिनय किसी कलाकार ने नहीं किया है. फिल्म में कहीं गुरु नानक का चेहरा दिखलाई नहीं देता है. उनका चित्र प्रकाश का चित्र है. जिसे कम्प्यूटर पर वीएफएक्स तकनीक का इस्तेमाल कर बनाया गया है.

फिल्म नानक शाह फकीर के आॅडियो लॉन्च पर गायक कैलाश खेर. (फोटो साभार: फेसबुक/Jai ho!-A R Rahman Club)

फिल्म नानक शाह फकीर के आॅडियो लॉन्च पर गायक कैलाश खेर. (फोटो साभार: फेसबुक/Jai ho!-A R Rahman Club)

अकाल तख़्त ने 30 मार्च 2018 को फिल्म निर्माता को हुक्म दिया कि वे इस फिल्म का प्रदर्शन न करें. इस बार फिल्म निर्माता सिख संगठनों के विरोध के सामने झुकने के बजाय सुप्रीम कोर्ट चले गए.

इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. दिनांक 10 अप्रैल 2018 को प्रधान न्यायधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायाधीश एएम खानविलकर और न्यायाधीश आई. चंद्रचूड़ की बेंच ने यह फैसला सुनाया कि जब फिल्म को, फिल्म सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट प्राप्त हो गया है तब किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह फिल्म के प्रदर्शन को रोके. इसके साथ ही माननीय अदालत ने सरकार को भी यह आदेश दिया कि वे फिल्म के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए सभी उचित कदम उठाएं.

एक ओर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला है तो दूसरी ओर अकाल तख़्त के जत्तेदार ज्ञानी गुरु बच्चन सिंह ने फिल्म पर पूर्ण बैन लगाने का आदेश दिया है. साथ ही यह भी कहा कि ऐसे विवादों को रोकने के लिए सिख सेंसर बोर्ड बनाया जाएगा. जिसमें श्रीमनी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, सिख संस्थाओं, उनकी शाखाओं, संत समाज और फिल्म के प्रतिनिधि होंगे.

कहा गया कि जिस किसी को सिख धर्म पर फिल्म बनानी हो वह अपनी स्क्रिप्ट इस बोर्ड को पेश करेगा. इस सिख सेंसर बोर्ड की कमेटी के अनुमोदन के बाद ही अकाल तख़्त फिल्म बनाने की अनुमति देगा. उसके बाद ही फिल्म बनाई जा सकेगी.

ऐसा लगता है शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने गुरु परंपरा और गुरु महाराजों पर कॉपीराइट ले लिया है. जिससे अब गुरुओं और उनकी शिक्षाओं बारे में जो कुछ लिखा जाएगा उनकी अनुमति लेने के बाद ही लिखा जाएगा.

यह स्थिति भय पैदा करती है. यह अभिव्यक्ति और व्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है. धार्मिक संगठन व्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ खड़ा है.

जब यह फिल्म 2015 में रिलीज हुई थी तब मैंने इस फिल्म को बड़ौदा के मल्टीप्लेक्स में केवल पांच और दर्शकों के बीच बैठ कर देखा था. डर के कारण लोग फिल्म देखने ही नहीं आए कि कहीं कोई पीछे से आकर मार न दे.

समाचार पत्रों में इस फिल्म की समीक्षाएं नहीं लिखीं गईं. न अच्छी न बुरी. खामोश रह कर फिल्म को मर जाने दिया.

इस बार भी वही स्थिति है. 13 अप्रैल को बैसाखी पर यह फिल्म रिलीज होने वाली थी, लेकिन किसी भी सिनेमाघर में यह लगी नहीं. बुक माई शो जैसी वेबसाइट देख कर भी यह मालूम नहीं होता कि फिल्म किस शहर में किस सिनेमाघर में रिलीज हुई है.

मेरे विचार से यह एक अच्छी बायोपिक फिल्म है. जो रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी की तरह नानक को दुनिया से परिचित करवाती है. फिल्म का सबसे उज्ज्वल पक्ष इसका संगीत है. उत्तम सिंह और एआर रहमान ने कर्णप्रिय संगीत दिया है. रबाब के तारों का जादू है. उस पर पंडित जसराज का गायन है.

(फोटो साभार: फेसबुक/Sath-ਸੱਥ)

(फोटो साभार: फेसबुक/Sath-ਸੱਥ)

फिर कौन है जो इस फिल्म को रोक रहा है और अपने इस काम में सफल हो रहा है. यह कैसी व्यवस्था है इस पर विचार करें. आप इस फिल्म को इस लिए भी देख सकते हैं कि कोई आपको यह फिल्म देखने से रोक रहा है.

बीते 12 अप्रैल को अकाल तख़्त में एक बैठक हुई. जिसमें फिल्म के निर्माता हरिंदर सिंह सिक्का को तनखैया (रोटी बेटी का संबंध ख़त्म करना) घोषित कर सिख कौम से बाहर कर देने का आदेश जारी कर दिया गया. उन्होंने केंद्र और पंजाब सरकार और सिनेमाघर के मालिकों को फिल्म अपने जोखिम पर रिलीज करने का फरमान सुनाया.

12 अप्रैल को ही गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाख़िल की गई और फिल्म की रिलीज़ की तारीख़ 13 अप्रैल को देखते हुए. तत्काल सुनवाई की मांग की गई. जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया.

16 अप्रैल की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अपने 10 अप्रैल के आदेश को बरक़रार रखा है. अर्थात फिल्म के प्रदर्शन पर क़ानूनन कोई रोक नहीं है. अगली सुनवाई के लिए 8 मई 2018 की तिथि निर्धारित कर दी है.

समाज के लिए यह घातक स्थिति है. सरकार की ओर फिल्म पर कोई रोक नहीं है. मगर कोई भी सिनेमाघर यह फिल्म नहीं दिखला रहा है. धार्मिक संगठनों ने मिलकर फिल्म का प्रदर्शन रुकवा दिया है. और सब खामोश हैं.

2015 में राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में इस फिल्म पर रोक लगाईं थी. वह इन संगठनों के सरकार पर दबाव की नीति थी.

तीन साल के समय में ये संगठन स्वयं ही इतने शक्तिशाली और प्रभावशाली हो गए हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ये फिल्म का प्रदर्शन रोक पाने में सफल हो रहे हैं.

ऐसा लगता है अब वह दिन दूर नहीं है जब चित्रकार शोभा सिंह के गुरु महाराज के बनाए चित्रों को उतारने और नष्ट करने का हुक्म सुना दिया जाएगा और हम उसे मान लेंगे. कोर्ट के आदेश, इन संगठनों के सामने कमज़ोर साबित हो रहे है. यह संविधान और लोकतंत्र के नष्ट होने की आहट है. देश का तालिबानीकरण ऐसे ही शुरू होता है.

(लेखक नई दिल्ली स्थित हमदर्द विश्वविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर हैं.)

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