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सच्चर कमेटी के अध्यक्ष रहे पूर्व मुख्य न्याया​धीश राजिंदर सच्चर का निधन

संप्रग सरकार ने 2005 में राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में मुस्लिमों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक दशा का पता लगाने के लिए सच्चर कमेटी बनाई थी.

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिंदर सच्चर. (फोटो: विकिमीडिया कॉमंस)

दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिंदर सच्चर. (फोटो: विकिमीडिया कॉमंस)

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिंदर सच्चर का शुक्रवार को निधन हो गया. वह 94 वर्ष के थे.

इस हफ़्ते की शुरुआत में उन्हें नई दिल्ली फोर्टिस अस्पताल में भर्ती कराया गया था. न्यायमूर्ति सच्चर का निधन दोपहर करीब 12 बजे हुआ. उनका बढ़ती उम्र संबंधी परेशानियों का इलाज चल रहा था.

एक पारिवारिक सूत्र ने बताया, ‘उन्हें हृदय संबंधी रोग था, कुछ महीनों पहले उन्हें पेसमेकर लगाया गया था. स्टैंट भी लगाया गया था.’

उन्होंने बताया, ‘उन्हें इस हफ़्ते की शुरुआत में अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. वह खाना नहीं खा पा रहे थे, उन्हें उल्टियां हो रही थीं. फिर उन्हें निमोनिया हो गया और उनकी मृत्यु हो गई.’

न्यायाधीश राजिंदर सच्चर 06 अगस्त, 1985 से 22 दिसंबर, 1985 तक दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे.

सच्चर प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे जिन्होंने भारत के मुस्लिमों की सामाजिक, शैक्षणिक और अार्थिक स्थिति से जुड़ी रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है.

संप्रग सरकार के समय मुस्लिमों की दशा का अध्ययन करने को लेकर बनाई गई सच्चर कमेटी के अध्यक्ष थे.

सच्चर कमेटी ने नवंबर 2006 में संसद में 403 पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत की थी. समिति की रिपोर्ट में मुसलमानों के बीच पिछड़ेपन की सीमा को दिखाया, जिसके बाद मुस्लिम असमानता पर सार्वजनिक रूप से बातचीत शुरू हुई.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के मुक़ाबले मुसलमानों में ज़्यादा पिछड़ापन है. शिक्षा में कमी के अलावा, प्रशासनिक सेवाओं और पुलिस बल में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम था. समस्या की गहराई और तत्कालता पर ज़ोर देते हुए कमेटी ने सभी क्षेत्रों में भेदभाव की शिकायतों को दूर करने के लिए एक क़ानूनी तंत्र शुरू करने के लिए एक समान अवसर आयोग की संस्था की बात कही.

सात सदस्यीय समिति ने अपनी सिफ़ारिशों में बताया था कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास में आने वाली बाधाओं को कैसे दूर किया जा सकता है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायाधीश सच्चर ने 1952 में शिमला से वकालत शुरू की थी. इसके बाद वह नागरिक, आपराधिक और राजस्व से जुड़े मामलों की प्रैक्टिस करने के लिए सुप्रीम कोर्ट आ गए थे.

1970 में दो साल के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के एडिशनल जज रहने के बाद वे दिल्ली हाईकोर्ट के जज बने. दिल्ली हाईकोर्ट के अलावा वे सिक्किम और राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस भी रह चुके थे.

रिपोर्ट के अनुसार, सच्चर कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने से पहले वह नागरिक अधिकारों को लेकर काफ़ी मुखर है. 1990 में ‘रिपोर्ट आॅन कश्मीर सिचुएशन’ के सह-लेखकों में से वह एक थे, उस वक़्त कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था.

मुख्य न्यायाधीश अज़ीज़ मुशब्बेर अहमदी की अध्यक्षता में बनाई गई एक सलाहकार कमेटी में भी न्यायाधीश सच्चर को शामिल किया गया था. यह कमेटी मानवाधिकार संरक्षण अधिनियन की समीक्षा के लिए बनाई गई थी.

इस कमेटी ने साल 2000 में अपनी रिपोर्ट दी थी. कमेटी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्यता में बदलाव के अलावा आयोग को विस्तान देने की सिफ़ारिश की गई थी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संसद में महिलाओं को आरक्षण की मांग करने वाले प्रबल समर्थकों में से न्यायाधीश सच्चर भी एक थे.

साल 2003 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण के साथ मिलकर इराक पर हुए अमेरिकी हमले की निंदा की थी. उन्होंने इसे अनुचित, अन्यायपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय क़ानून व संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया था.

रिटायर होने के बाद जस्टिस सच्चर मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) के साथ जुड़ गए थे.

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